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मंगलवार, 2 सितंबर 2008

कथा-व्यथा - सितम्बर 2008

कथा-व्यथा - सितम्बर 2008






कवि मंच में भाग लें। कवि मंच की सदस्यता ग्रहण कर अपनी कविता स्वयं पोस्ट करें। - ई-हिन्दी साहित्य सभा


प्रधान संपादक:

प्रकाश चण्डालिया


संपादक:

शम्भु चौधरी


सहयोगी:

1.पवन निशान्त
2.मयंक सक्सेना
3.श्रद्धा जैन



अनुक्रम

संपादकीय  
पत्र-पत्रिका प्राप्ती  
सूचना:  कथा महोत्सव-2008  
पाब्लो नेरुदा  
राजनैतिक बनाम सामाजिक लोकतंत्र  
समीक्षा काव्य संग्रह-‘‘अभिलाषा’’  
श्रद्धांजलि: कवि वेणुगोपाल को  
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कविताएं






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E-mail:kathavyatha@gmail.com


चित्र Haridas Chattopadhyay,Secretary,TOLIC
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संपादकीय:


ये दुःख की नहीं, कलम की व्यथा है
जो समझ गये उनकी कथा है।



दोस्तों कथा-व्यथा का दूसरा अंक आज जारी कर रहा हूँ। प्रथम अंक में कई पत्र आये अच्छा लगा कि आप सभी ने हमारे इस प्रयास को तहेदिल से स्वीकारा। पिछले माह में हमने दो ई-पुस्तकें भी जारी की  1. 'आडी तानें सीधी ताने'   2. 'सन्नाटे के शिलाखंड पर'  ये दोनों पुस्तकें श्री हरीश भादानी जी की है। हमारा यह प्रयास रहेगा कि देश-विदेश के हिन्दी साहित्यकारों की बातें, लेख ,कविता, कहानी इत्यादि को यूनिकोड में हस्तांतरित या परिवर्तित किया जा सके। भले ही वो किसी भी भाषा की ही क्यों न हो। जो सुविधा हमें गुगल्स समूह ने दी है, इसका हम किस प्रकार लाभ ले सकते हैं, इस पर हमें विचार करना चाहिये। मैने देखा कि कई लोगों को हम आपस में जानने लगे, कौन कैसा लिख रहा है। उसकी क्या पहचान है या होनी चाहिये ये सुविधा इंटरनेट के जाल ने हमें उपलब्ध करा दी है। आज हमें इस मंच का प्रयोग कुछ इस प्रकार करना चाहिये कि हमारे साहित्य को विश्व गंभीरता से ग्रहण करे। विश्व हमारी छवी को, हमारी सभ्यता का न सिर्फ सूचक समझे, भारतीय सभ्यता को स्वीकार भी करे। हम साहित्य के प्रति कितने सजग हैं, हमें यह अवसर मिला है। विश्व हमारी बातों को यूनिकोड के माध्यम से अपनी भाषा में अनुवाद कर पढ़ रहा है। एक विदेशी सज्जन ने मुझे 'बधाई' भेजी। उन्होंने लिखा कि "हिन्दी कविता के अनुवाद को देख कर मैं दंग रह गया। हमारे देश में ऐसी कविता तो पढ़ने को ही नहीं मिलती।" यहाँ हम किसी व्यक्ति विशेष की बात नहीं करना चाहते। आईये! हम 'हिन्दी दिवस' के अवसर पर प्रण लें कि हिन्दी में साहित्य की रचना करते समय नाम की चिंता न करें, तभी हिन्दी के प्रति हम सब की सच्ची सेवा होगी। कुछ मित्रों ने इस ई-पत्रिका को सहयोग देने बावत मेल किया था। हम उन सभी का आभार व्यक्त करते हैं। यदि वे किसी प्रकार का विज्ञापन देना चाहें तो हम सहर्ष स्वीकार करेंगें।

आपका ही: शम्भु चौधरी, संपादक 'कथा-व्यथा'
ई-हिन्दी साहित्य सभा


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राजनैतिक बनाम सामाजिक लोकतंत्र

राम शिव मूर्ति यादव




  भारत का समाज लम्बे अरसे से अन्यायी रहा है। इसका अन्यायी चरित्र दो तरह के प्रशासनों से तैयार हुआ है- प्रथमतः, राजनैतिक प्रशासन और द्वितीयतः, सामाजिक प्रशासन। राजनैतिक प्रशासन का सम्बन्ध जहाँ वाह्य से है, वहीं सामाजिक प्रशासन का सम्बन्ध आन्तरिक से है। अर्थात प्रथम जहाँ शरीर को प्रभावित करता है वहीं दूसरा मन या आत्मा को। प्रथम जहाँ संविधान, कानून, दण्ड, कारागार के माध्यम से भयभीत करके नियंत्रण रखता है, वहीं दूसरा मन या आत्मा पर जन्म से ही धर्म, ईश्वर, नैतिकता, स्वर्ग-नरक इत्यादि सामाजिक संस्कारों और धार्मिक अनुष्ठानों के माध्यम से नियंत्रण रखता है। प्रथम जहाँ पुलिस, सेना, नौकरशाही का इस्तेमाल करता है, वहीं दूसरा पंडा-पुरोहित, पुजारी, साधु, शंकराचार्य के माध्यम से शासन करता है। यद्यपि दोनों ही तरह के प्रशासनों ने पूरे समाज को अपने अनुरूप जकड़ रखा है परन्तु सामाजिक प्रशासन, राजनैतिक प्रशासन की अपेक्षा ज्यादा प्रभावी है क्योंकि यह लम्बे समय से चली आ रही तमाम परम्पराओं, रीति-रिवाजों और संस्कारों के माध्यम से समाज को शासित करता है, जिससे इसका प्रभाव भी लम्बी अवधि तक चलता है। सामाजिक प्रशासन के सभी कारक स्थिर और स्थायी होते हैं, जैसे ईश्वर की अवधारणा, धर्म की अवधारणा, रीति-रिवाज और परम्पराओं की अवधारणा। ये अवधारणायें आये दिन परिवर्तित नहीं होतीं वरन् सदियों तक सतत् अपने आप चलती रहती हैं। निहित स्वार्थी वर्ग बीच-बीच में इसके अनुकूल वातावरण भी तैयार करते रहते हैं, जिससे कि यह पौधा मुरझाने नहीं पाता। इसके विपरीत राजनैतिक प्रशासन परिवर्तित होता रहता है, यथा- संविधान, कानून, सरकारें सभी समय-समय पर बदलते रहते हैं। कभी-कभी तो विदेशी शासक भी कब्जा कर अपना राजनैतिक प्रशासन स्थापित कर लेते हैं जैसे भारत में मुगलों और अंग्रेजों का शासन। परन्तु इनके समय में भी सामाजिक प्रशासन ज्यों का त्यों बरकार रहा। कारण कि पहले से जिस वर्ग का सामाजिक प्रशासन पर प्रभुत्व था, उस वर्ग को मिलाकर शासन करना इन विदेशियों को सुविधाजनक लगा। अतः मुगलों और अंग्रेजों इत्यादि ने भारतीय सामाजिक व्यवस्था से छेड़छाड़ नहीं किया। सुसान बेली ने अपनी पुस्तक ‘कास्ट सोसायटी एण्ड पॉलिटिक्स इन इण्डिया’ में जिक्र किया है कि-‘‘18वीं सदी में देशी शासकों ने अपने राजतंत्र का अधिकाधिक ब्राह्मणीकरण किया और कुछ ने तो राज्य के महत्वपूर्ण पद और कार्य ब्राह्मण मूल के लोगों को ही सौंपे। अंग्रेजों ने इस परम्परा को न केवल बरकरार रखा अपितु उसे संस्थाबद्ध भी किया।’’


    उल्लेखनीय है कि जिस वर्ग या जाति के हाथ में सामाजिक प्रशासन होता है, प्रायः उसी के हाथ में राजनैतिक प्रशासन भी हो जाता है। वस्तुतः सामाजिक प्रशासन, राजनैतिक प्रशासन के लिए एक मजबूत आधार प्रदान करता है। भारत में द्विजवर्ग ने इस स्थिति का फायदा उठाकर सदियों से राजनैतिक और सामाजिक दोनों प्रशासनों पर अपना नियन्त्रण बनाये रखा और आज भी काफी हद तक वही स्थिति बरकरार है। यहाँ तक कि मुगलों और अंग्रेजों के शासन काल में भी इन द्विजों के हितों पर खरोंच तक नहीं आई और इसी के सहारे उन्होंने जमींदार, आनरेरी मजिस्ट्रेट, तालुकदार जैसे तमाम महत्वपूर्ण पदों को हथिया लिया। अंग्रेजी साम्राज्यवाद के कारण जहाँ एक ओर अत्यन्त विषम सामाजिक, राजनैतिक व आर्थिक व्यवस्था थी, वहीं दूसरी तरफ द्विजवर्ग के चलते जाति व्यवस्था ने असमानता को एक सामाजिक वैधता दे रखी थी। विदेशी शासकों के लिए यह सुविधाजनक भी था क्योंकि स्थानीय प्रभुत्व वर्ग को मिलाने से उनका काम आसान हो गया। सामाजिक प्रशासन में परिवर्तन करना यद्यपि किसी क्रान्ति से कम नहीं, परन्तु समय-समय पर तमाम महान विभूतियों ने इसको चुनौती दी है और उसके सुखद परिणाम भी सामने आये। कबीरदास, रैदास, गुरुनानक, नारायणगुरु, ज्योतिबा फुले, डॉ.अम्बेडकर इत्यादि ने सामाजिक प्रशासन के पुरातनपंथी कारकों - अन्धविश्वासों, रूढ़िगत परम्पराओं, मूर्तिपूजा, अस्पृश्यता, जातिवाद इत्यादि पर हमला बोला। शिवाजी को शासन सत्ता तब मिली जब महाराष्ट्र के संतों ने द्विजों के सामाजिक प्रशासन के खिलाफ आवाज उठाई तो दक्षिण में पेरियार ने जब ब्राह्मणवाद के खिलाफ आन्दोलन छेड़ा, तब द्रमुक पार्टी सत्ता में आयी। बिहार में 1915 के दौरान निम्न समझी जाने वाली जातियों ने जनेऊ पहन कर अपनी सामाजिक हैसियत को आगे बढ़ाने का आन्दोलन आरम्भ किया। इसी प्रकार जब डॉ. अम्बेडकर ने ब्राह्मणवादी संस्कृति और मनुवादी व्यवस्था के खिलाफ खुला आन्दोलन छेड़ा तो दलितों में चेतना पैदा हुई और उसी का प्रतिफल है कि आज दलित सत्ता के तमाम शीर्ष ओहदों तक पहुँच पाए हैं।


    स्पष्ट है कि बिना सामाजिक प्रशासन के राजनैतिक प्रशासन नहीं मिलता और मिलता भी है तो उसका चरित्र स्थायी नहीं होता। कारण कि उस वर्ग के लोगों में जागरुकता, चेतना और स्वाभिमान का अभाव होता है, जिससे वे अपने जायज अधिकारों को नहीं समझ पाते। उनको जन्म से ही ऐसे संस्कारों और हीनता के भावों से कुपोषित कर दिया जाता है कि वे संघर्ष करना भूलकर भाग्यवाद के सहारे जी रहे होते हैं। उनको कोल्हू के बैल की तरह एक घेरे में ही सीमित कर दिया जाता है। अतः सामाजिक परिवर्तन के लिए इस वर्ग को जागरुक, चेतनशील और चैकन्ना बनना होगा तभी वास्तविक रूप से सामाजिक परिवर्तन आयेगा और राजनैतिक परिवर्तन के लिए सामाजिक परिवर्तन का होना एक अति आवश्यक कारक है। इस हेतु सर्वप्रथम समाज को बदलना पड़ेगा, जो कि एक दुरूह कार्य है। वैसे तो समय-समय पर ऐसे बहुतेरे समाज सुधारक हुये, जिन्होंने सड़ी-गली सामाजिक व्यवस्था के विरुद्ध आवाज उठाई परन्तु ये सभी पुरातनपंथी समाज व्यवस्था के पोषक द्विज वर्गों में से ही थे। फिर यह कैसे सम्भव है कि ये अपने ही लोगों को सदियों से प्राप्त जन्मना विशेषाधिकारों का हनन करते। इन समाज सुधारकों ने ऊपरी तौर पर सामाजिक व्यवस्था को बदलने का प्रयास तो किया, किन्तु उस पुरातनपंथी सामाजिक व्यवस्था की जड़ पर हमला नहीं किया। कहीं न कहीं यह एक तरह से शोषित, पिछड़े और दलित वर्ग के बीच फूट रही चिंगारी को दबाने के लिए महज एक सेटी-वाल्व के रूप में साबित हुआ और यही कारण था कि इन समाज सुधारकों के प्रयास से सामाजिक व्यवस्था में कोई बुनियादी और दूरगामी परिवर्तन सम्भव नहीं हुआ। द्विज वर्ग की सामाजिक प्रभुता ज्यों की त्यों बनी रही और समाज में ऊँच-नीच की भावना और जातिगत कारक जैसे तत्व यथावत् बने रहे जिससे सामाजिक लोकतंत्र स्थापित नहीं हो सका।


     डॉ.अम्बेडकर ने कहा था कि राजनैतिक सुधारों की अपेक्षा सामाजिक सुधार ज्यादा कठिन हंै। अपने कटु अनुभवों के आधार पर उन्होंने देख लिया था कि हिन्दू धर्म में विगत के तमाम सुधारवादी आन्दोलनों के बावजूद समता और भ्रातृत्व की भावना नहीं आ पाई और भविष्य में भी इसकी दूर-दूर तक कोई सम्भावना नजर नहीं दिख रही थी। 1935 में एक सभा में उन्होंने अपने अनुयायियों से कहा था कि-‘‘आप लोग ऐसा धर्म चुनें, जिसमें समान दर्जा, समान अधिकार और समान अवसर हों।’’ डॉ. अम्बेडकर को हिन्दू जाति-व्यवस्था का बचपन से ही काफी कटु और तीखा अनुभव था और इसीलिये उन्होंने भारतीय संस्कृति को जाति आधारित ब्राह्मण संस्कृति कहा था। वे हिन्दू समाज की जाति व्यवस्था से सर्वाधिक आहत थे। यही कारण रहा कि वर्ण-व्यवस्था और जाति-व्यवस्था के खिलाफ जैसा खुला संघर्ष उन्होंने किया, वैसी मिसाल भारत के इतिहास में मिलना दुर्लभ है। डॉ. अम्बेडकर ने संविधान सभा को संविधान समर्पित करते हुये कहा था कि-‘‘राजनैतिक लोकतन्त्र तभी सार्थक होगा जब देश में सामाजिक लोकतन्त्र कायम होगा।’’ संविधान तो लागू हो गया पर दुर्भाग्य से आज तक भारत में सामाजिक लोकतन्त्र स्थापित नहीं हो सका। कारण स्पष्ट है कि निहित स्वार्थी वर्गों ने बड़े जटिल ताने-बाने के माध्यम से अपना सामाजिक प्रशासन स्थापित कर रखा है और धर्मिक संस्कारों व सांस्कृतिक परम्पराओं की आड़ में इसे अभेद्य बना दिया है। इस अभेद्य दुर्ग को एक झटके में तोड़ना सम्भव नहीं है वरन् इसके लिए अथक् संघर्ष और सतत् सद्-प्रयासों की जरूरत है। आजकल दलित, पिछड़े और आदिवासी जैसे शोषित वर्ग इस ब्राह्मणवादी व्यवस्था को तोड़ने के लिए प्रयासरत हैं, विशेषकर दलित साहित्य के माध्यम से सामाजिक परिवर्तन का यह कार्य बखूबी किया जा रहा है। वहीं दूसरी तरफ ब्राह्मणवादी वर्ग अपनी सामाजिक प्रभुता को बचाये रखने हेतु एड़ी-चोटी का पसीना एक किये हुये है और अपने इस लक्ष्य की प्राप्ति हेतु किसी भी हद तक जाने को तैयार है। वस्तुतः इसी सामाजिक प्रभुता के बल पर वह आबादी में मात्र 15 प्रतिशत होते हुये भी राजनैतिक, धार्मिक, सांस्कृतिक, तकनीकी, चिकित्सकीय, शैक्षणिक और आर्थिक क्षेत्रों में अपना पूर्ण वर्चस्व बनाये हुये हैं। यहाँ तक कि दलितों, पिछड़ों और आदिवासियों को आरक्षण तक का सहारा लेने में सतत् अवरोध खड़ा किया जा रहा है, जबकि सामाजिक न्याय के सम्वर्द्धन हेतु आरक्षण व्यवस्था भारतीय संविधान तक में निहित है। वस्तुतः वर्तमान परिप्रेक्ष्य में सामाजिक प्रशासन और इसके द्वारा निहित हितों की पूर्ति स्वयं में एक साध्य बन गई है। अतः आज सबसे बड़ी आवश्यकता है कि दलित, पिछड़े, आदिवासी मिलकर सामूहिक रूप से ब्राह्मणवादियों के इस सामाजिक प्रशासन और उसमें सन्निहित उनके स्वार्थी हितों के चक्रव्यूह को ध्वस्त करें, फिर राजसत्ता तो उनके हाथों में स्वतः आ जायेगी। पर अफसोस कि डॉ. अम्बेडकर, ज्योतिबा फूले, पेरियार जैसी महान विभूतियों के अलावा द्विजों की इस सामाजिक प्रशासन रूपी अवधारणा के तन्तुओं को किसी अन्य ने नहीं समझा या समझने का प्रयास नहीं किया। यही कारण है कि आज भी हिन्दू सामाजिक व्यवस्था उसी प्राचीन मनुवादी सूत्रों से संचालित हो रही है। आर.एस.एस. जैसे संगठनों की स्थापना भी कहीं न कहीं इसी मकसद से की गई। सार्वजनिक मंचों पर भाषणों और प्रवचनों के जरिये सामाजिक समता व भ्रातृत्व का तो खूब प्रचार किया जाता है किन्तु हिन्दू सामाजिक व्यवस्था के रस्मों-रिवाज और परम्परायें, रोजमर्रा का जीवन, जन्म-मरण, विवाह, खान-पान, सम्बोधन, अभिवादन इत्यादि सब कुछ अभी भी मनुवाद से ओत-प्रोत हैं। हिन्दुओं की प्राचीन जीवन पद्धति जिसमें सब कुछ जाति आधारित है, जस की तस है। अगर उसमें कुछ परिवर्तन आया भी तो वह नगण्य है। अंग्रेंजो ने भी इस देश पर शासन करने के लिए उस सामंती और पुरोहिती सत्ता के सामाजिक आधार को पोषित और पुनर्जीवित किया, जिसका आधिपत्य पहले से ही भारतीय समाज पर था। इस सन्दर्भ में भारत के प्रथम गर्वनर जनरल लॉर्ड वारेन हेस्टिंटग्स का कथन दृष्टव्य है- ‘‘यदि अंग्रेजों को भारतीयों पर स्थायी शासन करना है, तो उन्हें संस्कृत में उपलब्ध हिन्दुओं के उन पुराने कानूनों पर महारत हासिल करनी चाहिए, जिनके कारण एक ही जाति के मुट्ठी भर लोग हजारों साल तक बहुसंख्यक वर्ग पर शासन करते रहे। इस नीति से जहाँ भारतीयों को गुलामी की जंजीरों का भार थोड़ा हल्का लगेगा, वहीं उन्हें यह भी महसूस होगा कि ये लोग हमारे पुरोहितों की तरह हमारे शुभचिन्तक हैं और इनकी भाषा भी वही है, जो हमारे पुरोहितों की है।’’

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    इसी सन्दर्भ में आर्थिक विकास और सामाजिक विकास पर भी प्रकाश डालना उचित होगा। आधुनिक परिवेश में आर्थिक विकास की बात करने पर भूमण्डलीकरण, उदारीकरण और निजीकरण का चित्र दिमाग में आता है। संसद से लेकर सड़कों तक जी.डी.पी. व शेयर-सेंसेक्स के बहाने आर्थिक विकास की धूम मची है और मीडिया भी इसे बढ़ा-चढ़ाकर पेश करता है। जिस देश के संविधान में लोक कल्याणकारी राज्य की परिकल्पना की गई हो, वहाँ सामाजिक विकास की बात की गौण हो गई है। यहाँ तक कि नोबेल पुरस्कार विजेता प्रख्यात अर्थशास्त्री डॉ. अमत्र्य सेन ने भी भारतीय परिप्रेक्ष्य में इंगित किया है कि - शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास जैसी आधारभूत सामाजिक आवश्यकताओं के अभाव में उदारीकरण का कोई अर्थ नहीं है। आर्थिक विकास में जहाँ पूजीपतियों, उद्योगपतियों, बहुराष्ट्रीय कम्पनियों अर्थात राष्ट्र के मुट्ठी भर लोगों को लाभ होता है, वहीं भारत का बहुसंख्यक वर्ग इससे वंचित रह जाता है या नगण्य लाभ ही उठा पाता है। इस प्रकार ट्रिंकल डाउन का सिद्धान्त फेल हो जाता है। अतः सामाजिक विकास जो कि बहुसंख्यक वर्ग की आधारभूत आवश्यकताओं के पूरी होने पर निर्भर है, के अभाव में राष्ट्र का समग्र और चहुमुखी विकास सम्भव नहीं है। एक तरफ गरीब व्यक्ति अपनी गरीबी से परेशान है तो दूसरी तरफ देश में करोड़पतियों-अरबपतियों की संख्या प्रतिवर्ष बढ़ती जा रही है। तमाम कम्पनियों पर करोड़ों रुपये से अधिक का आयकर बकाया है तो इन्हीं पूँजीपतियों पर बैंकों का भी करोडों रुपये शेष है। डॉ. अमत्र्य सेन जैसे अर्थशास्त्री ने भी स्पष्ट कहा है कि समस्या उत्पादन की नहीं, बल्कि समान वितरण की है। आर्थिक विकास में पूँजी और संसाधनों का केन्द्रीकरण होता है जो कि कल्याणकारी राज्य की अवधारणा के खिलाफ है। फिर भी तमाम सरकारें सामाजिक विकास के मार्ग में अवरोध पैदा करती रहती हैं। जिस देश की 70 प्रतिशत जनसंख्या नगरीय सुविधाओं से दूर हो, एक तिहाई जनसंख्या गरीबी रेखा के नीचे हो, लगभग 40 प्रतिशत जनसंख्या अशिक्षित हो, जहाँ गरीबी के चलते करोड़ों बच्चे खेलने-कूदने की उम्र में बालश्रम में झोंक दिये जाते हों, जहाँ कृषि आधारित अर्थव्यवस्था में हर साल हजारों किसान फसल चैपट होने पर आत्महत्या कर लेते हों, जहाँ बेरोजगारी सुरसा की तरह मुँह बाये खड़ी हो-वहाँ शिक्षा को मँहगा किया जा रहा है, सार्वजनिक संस्थानों को औने-पौने दामों में बेचकर निजीकरण को बढ़ावा दिया जा रहा है, सरकारी नौकरियाँ खत्म की जा रही हैं, सब्सिडी दिनों-ब-दिन घटायी जा रही है, निश्चिततः यह राष्ट्र के विकास के लिए शुभ संकेत नहीं है।

    अमेरिका के चर्चित विचारक नोम चोमस्की ने भी हाल ही में अपने एक साक्षात्कार में भारत में बढ़ते द्वन्द पर खुलकर चर्चा की है। चोमस्की का स्पष्ट मानना है कि भारत में जिस प्रकार के विकास से आर्थिक दर में वृद्धि हुयी है, उसका भारत की अधिकांश जनसंख्या से कोई सीधा वास्ता नहीं दिखता। यहीं कारण है कि भारत सकल घरेलू उत्पाद के मामले में जहाँ पूरे विश्व में चतुर्थ स्थान पर है, वहीं मानव विकास के अन्तर्राष्ट्रीय मानदण्डों मसलन, दीर्घायु और स्वस्थ जीवन, शिक्षा, जीवन स्तर इत्यादि के आधार पर विश्व में 126 वें नम्बर पर है। आम जनता की आर्थिक स्थिति पर गौर करें तो भारत संयुक्त राष्ट्र संघ के 54 सर्वाधिक गरीब देशों में गिना जाता है। संयुक्त राष्ट्र की मानव विकास रिपोर्ट को मानें तो जैसे-जैसे भारत की विकास दर में वृद्धि हुयी है, वैसे-वैसे यहाँ मानव विकास का स्तर गिरा है। आज 0-5 वर्ष की आयुवर्ग के भारतीय बच्चों में से लगभग 50 फीसदी कुपोषित हैं तथा प्रति 1000 हजार नवजात बच्चों में 60 फीसदी से ज्यादा पहले वर्ष में ही काल-कवलित हो जाते हैं। स्पष्ट है कि उपरी तौर पर भारत में विकास का जो रूप दिखायी दे रहा है, उसका सुख मुट्ठी भर लोग ही उठा रहे हैं, जबकि समाज का निचला स्तर इस विकास से कोसों दूर है।


    अब समय आ गया है कि गरीब, किसान, दलित, पिछड़े और आदिवासी वर्गों में व्यापक चेतना तथा जागरुकता पैदा की जाय जिससे वे अपनी आधारभूत आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु सरकारों को बाध्य कर सकें। यद्यपि यह काम इतना आसान नहीं है क्योंकि द्विज वर्ग आम लोगों का उनकी जरूरतों की तरफ से ध्यान हटाने के लिए सदैव नाना प्रकार के स्वांग रचते रहते हैं। कभी मन्दिर-मस्जिद, कभी राष्ट्रवाद, कभी साम्प्रदायिकता, कभी कश्मीर तो कभी आतंकवाद की बात उठाकर लोगों को गुमराह किया जाता है जिससे मूल मुद्दे नेपथ्य में चले जाते हैं। आज जरूरत है कि देश में सबके साथ समान व्यवहार किया जाये, सबको समान अवसर प्रदान किया जाये और जो वर्ग सदियों से दमित-शोषित रहा है उसे संविधान में प्रदत्त विशेष अवसर और अधिकार देकर आगे बढ़ने का मार्ग प्रशस्त किया जाये, तभी इस देश में सामाजिक न्याय और सामाजित लोकतंत्र का मार्ग प्रशस्त होगा और भारत एक समृद्ध राष्ट्र के रूप में विश्व के मानचित्र पर अपना अग्रणी स्थान बना सकेगा।

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परिचय:
जन्म तिथिः 20 दिसम्बर 1943, जन्म स्थानः सरांवा, जौनपुर (उ.प्र.) पिता:स्व.श्री सेवा राम यादव, शिक्षा: एम.ए. (समाज शास्त्र), काशी विद्यापीठ, वाराणसी  लेखनः देश की विभिन्न प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं- अरावली उद्घोष, युद्धरत आम आदमी, समकालीन सोच,आश्वस्त, अपेक्षा, बयान, अम्बेडकर इन इण्डिया, अम्बेडकर टुडे, दलित साहित्य वार्षिकी, दलित टुडे, मूक वक्ता, सामथ्र्य, सामान्यजन संदेश, समाज प्रवाह, गोलकोण्डा दर्पण, शब्द, कमेरी दुनिया, जर्जर, कश्ती, प्रेरणा अंशु, यू.एस.एम. पत्रिका दहलीज, दि मॉरल, इत्यादि में विभिन्न विषयों पर लेख प्रकाशित। इण्टरनेट पर विभिन्न वेब-पत्रिकाओं में लेखों का प्रकाशन।  प्रकाशनः   सामाजिक व्यवस्था एवं आरक्षण (1990)। लेखों का एक अन्य संग्रह प्रेस में। सम्मानः भारतीय दलित साहित्य अकादमी द्वारा ‘‘ज्योतिबा फुले फेलोशिप सम्मान‘‘। राष्ट्रीय राजभाषा पीठ इलाहाबाद द्वारा ’’भारती ज्योति’’ सम्मान।   रूचियाँ:रचनात्मक लेखन एवं अध्ययन, बौद्धिक विमर्श, सामाजिक कार्यों में रचनात्मक भागीदारी।
  सम्प्रति: उत्तर प्रदेश सरकार में स्वास्थ्य शिक्षा अधिकारी पद से सेवानिवृत्ति पश्चात स्वतन्त्र लेखन व अध्ययन एवं समाज सेवा।


सम्पर्क:


श्री राम शिव मूर्ति यादव, स्वास्थ्य शिक्षा अधिकारी (सेवानिवृत्त), तहबरपुर, पो0-टीकापुर, आजमगढ़(उ.प्र.)-276208


E-mail:rsmyadav@rediffmail.com
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समीक्षा काव्य संग्रह-‘‘अभिलाषा’’

व्यक्तिगत सम्बन्धों की कविता में सामाजिक सहानुभूति का मानस-संस्पर्श



     मनुष्य को अपने व्यक्तिगत सम्बन्धों के साथ ही जीवन के विविध क्षेत्रों से प्राप्त हो रही अनुभूतियों का आत्मीकरण तथा उनका उपयुक्त शब्दों में भाव तथा चिन्तन के स्तर पर अभिव्यक्तीकरण ही वर्तमान कविता का आधार है। जगत के नाना रूपों और व्यापारों में जब मनीषी को नैसर्गिक सौन्दर्य के दर्शन होते हैं तथा जब मनोकांक्षाओं के साथ रागात्मक सम्बन्ध स्थापित करने में एकात्मकता का अनुभव होता है, तभी यह सामंजस्य सजीवता के साथ समकालीन सृजन का साक्षी बन पाता है। युवा कवि एवं भारतीय डाक सेवा के अधिकारी कृष्ण कुमार यादव ने अपने प्रथम काव्य संग्रह ‘‘अभिलाषा’’ में अपने बहुरूपात्मक सृजन में प्रकृति के अपार क्षेत्रों में विस्तारित आलंबनों को विषयवस्तु के रूप में प्राप्त करके ह्नदय और मस्तिष्क की रसात्मकता से कविता के अनेक रूप बिम्बों में संजोने का प्रयत्न किया है। "अभिलाषा" का संज्ञक संकलन संस्कारवान कवि का इन्हीं विशेषताओं से युक्त कवि कर्म है, जिसमें व्यक्तिगत सम्बन्धों, सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक समस्याओं और विषमताओं तथा जीवन मूल्यों के साथ हो रहे पीढ़ियों के अतीत और वर्तमान के टकरावों और प्रकृति के साथ पर्यावरणीय विक्षोभों का खुलकर भावात्मक अर्थ शब्दों में अनुगुंजित हुआ है। परा और अपरा जीवन दर्शन, विश्व बोध तथा विद्वान बोध से उपजी अनुभूतियों ने भी कवि को अनेक रूपों में उद्वेलित किया है। इन उद्वेलनों में जीवन सौन्दर्य के सार्थक और सजीव चित्र शब्दों में अर्थ पा सके हैं।


     संकलन की पहली कविता है- "माँ" के ममत्व भरे भाव की नितान्त स्नेहिल अभिव्यक्ति। जिसमें ममता की अनुभूति का पवित्र भाव-वात्सल्य, प्यार और दुलार के विविध रूपों में कथन की मर्मस्पर्शी भंगिमा के साथ कथ्य को सीधे-सीधे पाठक तक संप्रेषित करने का प्रयत्न बनाया है। शब्द जो अभिधात्मक शैली में कुछ कह रहे हैं वह बहुत स्पष्ट अर्थान्विति के परिचायक हैं, परन्तु भावात्मकता का केन्द्र बिन्दु व्यंजना की अंतश्चेतना संभूत व आत्मीयता का मानवी मनोविज्ञान बनकर उभरा है। गोद में बच्चे को लेकर शुभ की आकांक्षी माँ बुरी नजर से बचाने के लिये काजल का टीका लगाती है, बाँह में ताबीज बाँधेती है, स्कूल जा रहे बच्चे की भूख-प्यास स्वयं में अनुभव करती है, पड़ोसी बच्चों से लड़कर आये बच्चे को आँचल में छिपाती है, दूल्हा बने बच्चे को भाव में देखती है, कल्पना के संसार में शहनाईयों की गूँज सुनती है, बहू को सौंपती हुई माँ भावुक हो उठती है। नाजों से पाले अपने लाड़ले को जीवन धन सौंपती हुई माँ के अश्रु, करूणा विगलित स्नेह और अनुराग के मोती बनकर लुढ़क पड़ते हैं। कवि का "माँ" के प्रति भाव अभ्यर्थना और अभ्यर्चना बनकर कविता का शाश्वत शब्द सौन्दर्य बन जाता है।


     कृष्ण कुमार यादव का संवेदनशील मन अनुमान और प्रत्यक्ष की जीवन स्मृतियों का जागृत भाव लोक है, जहाँ माँ अनेक रूपों में प्रकट होती है। कभी पत्र में उत्कीर्ण होकर, तो कभी यादों के झरोखों से झांकती हुई बचपन से आज तक की उपलब्धियों के बीच एक सफल पुत्र को आशीर्वाद देती हुई। किसी निराश्रिता, अभाव ग्रस्त, क्षुधित माँ और सन्तति की काया को भी कवि की लेखनी का स्पर्श मिला है, जहाँ मजबूरी में छिपी निरीहता को भूखी कामुक निगाहों के स्वार्थी संसार के बीच अर्धअनावृत आँचल से दूध पिलाती मानवी को अमानवीय नजरों का सामना करना पड़ रहा है। माँ के विविध रूपों को भावों के अनेक स्तरों पर अंकित होते देखना और कविता को शब्द देना आदर्श और यथार्थ की अनुभूतियों का दिल में उतरने वाला शब्द बोध है।


     नारी का प्रेयसी रूप सुकोमल अनुभूतियों से होकर जब भाव भरे ह्नदय के नेह-नीर में रूपायित होता है तब स्पर्श का सुमधुर कंकड़ किस प्रकार तरंगायित कर देता है, ज्योत्सना स्नान प्रेम की सुविस्तारित रति-रजनी के आगोश में बैठे खामोश अंर्तमिलन के क्षणों को इन पंक्तियों में देखें-रात का पहर/जब मैं झील किनारे/ बैठा होता हूँ/चाँद झील में उतर कर/नहा रहा होता है/कुछ देर बाद/चाँद के साथ/एक और चेहरा/मिल जाता है/वह शायद तुम्हारा है/पता नहीं क्यों/ बार-बार होता है ऐसा/मैं नहीं समझ पाता/सामने तुम नहा रही हो या चाँद/आखिरकार झील में/एक कंकड़ फेंककर/खामोशी से मैं/ वहाँ से चला आता हूँ।

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     तलाश, तुम्हें जीता हूँ, तुम्हारी खामोशी, बेवफा, प्रेयसी, तितलियाँ, प्रेम, कुँवारी किरणें, शीर्षक कवितायें जिन वैयक्तिक भावनाओं की मांसल अभिव्यक्तियों को अंगडा़इयों में उमंग से भरकर दिल के झरोखों से झाँकती संयोग और वियोग की रसात्मकता का इजहार करती हैं, वह गहरी सांसों के बीच उठती गिरती जन्म-जन्म से प्यासी प्रीति पयस्विनी के तट पर बैठे युगल की ह्नदयस्पन्दों में सुनी जाने वाली शरीर की खुशबू और छुअन का स्मृति-स्फीत संसार है। इनमें आंगिक चेष्टाओं और ऐन्द्रिक आस्वादनों की सौन्दर्यमयी कल्पना का कलात्मक प्रणयन ह्नदयवान रसज्ञों के लिये रसायन बन सकता है। "प्रेयसी" उपखण्ड की इन कविताओं में सुकोमल वृत्तियों की ये पंक्तियाँ दृष्टव्य हो सकती हैं- सूरज के किरणों की/पहली छुअन/ थोड़ी अल्हड़-सी/ शर्मायी हुई, सकुचाई हुई/ कमरे में कदम रखती है/वही किरण अपने तेज व अनुराग से/वज्र पत्थर को भी/पिघला जाती है/शाम होते ही ढलने लगती हैं किरणें/जैसे कि अपना सारा निचोड़/ उन्होंने धरती को दे दिया हो/ठीक ऐसे ही तुम हो।


     जीवन प्रभात से प्रारम्भ होकर विकास, वयस्कता, प्रौढ़ता और वार्धक्य की अवस्थाओं को लांघती कविता की गम्भीर ध्वनि मादकता के उन्माद को जीवन सत्य का दर्शन कराने में सक्षम भी हो जाती है। नारी के स्त्रीत्व को मातृत्व और प्रेयसी रूपों से आगे बढ़ाता हुआ कवि, शोषण, उत्पीड़न, अनाचार, अन्याय के पर्याय बन चुके संदेश से दलित व अबला जीवन से भी साक्षात्कार कराता है, जहाँ महीयसी की महिमा, खंड-खंड हो रही भोग्या बनकर देह बन जाती है। स्त्री विमर्श की इन कविताओं में सामाजिक और वैयक्तिक विचारणा की अनेक संभावनाओं से साक्षात्कार करता कवि भाव और विचार में पूज्या पर हो रहे अनन्त अत्याचारों का पर्दाफाश करता है। बहू को जलाना, हवस का शिकार होना तथा श्वोश् बन कर सड़क के किनारे अधनंगी, पागल और बेचारी बनी बेचारगी क्या कुछ नहीं कह जाती, जो इन कविताओं में बेटी और बहू के रूप में कर्तव्यों की गठरी लादे जीवन की डगर पर अर्थहीन कदमों से जीने को विवश हो जाती है। स्त्री विमर्श का यथार्थ, दलित चेतना की सोच इन कविताओं में वर्तमान का सत्य बन कर उभरी हैं।


     ईश्वर की कल्पना मनुष्य को जब मिली होगी, उसे आशा का आस्थावन विश्वास भी मिला होगा। कृष्ण कुमार यादव ने भी ईश्वर के भाव रूप को सर्वात्मा का विकास माना है। उनका मानना है कि धर्म-सम्प्रदाय के नाम पर घरौदों का निर्माण न तो उस अनन्त की आराधना है, और न ही इनमें उसका निवास है। कवि ने ईश्वर के लिए लिखा है-मैं किसी मंदिर-मस्जिद गुरूद्वारे में नहीं/मैं किसी कर्मकाण्ड और चढ़ावे का भूखा नहीं/नहीं चाहिए मुझे तुम्हारा ये सब कुछ/मैं सत्य में हूँ, सौन्दर्य में हूँ, कर्तव्य में हूँ /परोपकार में हूँ, अहिंसा में हूँ, हर जीव में हूँ/अपने अन्दर झांको, मैं तुममें भी हूँ/फिर क्यों लड़ते हो तुम/बाहर कहीं ढूँढते हुए मुझे। कवि ईश्वर की खोज करता है अनेक प्रतीकों में, अनेक आस्थाओं में और अपने अन्दर भी। वह भिखमंगों के ईश्वर को भी देखता है और भक्तों को भिखमंगा होते भी देखता है, बच्चों के भगवान से मिलता है और स्वर्ग-नरक की कल्पनाओं से डरते-डराते मन के अंधेरों में भटकते इन्सानों की भावनाओं में भी खोजता है।


     बालश्रम, बालशोषण और बाल मनोविज्ञान को "अभिलाषा" की कविताओं में जिन शीर्षकों में अभिव्यक्त किया गया है, उनमें प्रमुख हैं-अखबार की कतरनें, जामुन का पेड़, बच्चे की निगाह, वो अपने, आत्मा, बच्चा और मनुष्य तथा बचपन। इन रचनाओं में बाल मन की जिज्ञासा, आक्रोश, आतंक, मासूमियत, प्रकृति, पर्यावरण आदि का मनुष्य के साथ, पेड़-पौधों के साथ व जीव-जन्तुओं के साथ निकट सम्बन्ध आत्मीयता की कल्पना को साकार करते हुए, अतीत और वर्तमान की स्थितियों से तुलना करते हुए, आगे आने वाले कल की तस्वीर के साथ व्यक्त किया गया है। बहुधा जीवन और कर्तव्य बोध से अनुप्राणित इस खण्ड की कविताओं में कवि ने बच्चे की निगाह में बूढ़े चाचा को भीख का कटोरा लिए हुए भी दिखाया है और हुड़दंग मचाते जामुन के पेड़ तथा मिट्टी की सोधी गंध में मौज-मस्ती करते भी स्मृति के कोटरों में छिपी अतीत की तस्वीर से निकालकर प्रस्तुत करते पाया है। बच्चों के निश्छल मन पर छल की छाया का स्वार्थी प्रपंच किस प्रकार हावी होता है और झूठे प्रलोभन व अहंकार के वशीभूत हुए लोग उन्हें भय का भूत दिखाते हैं और जीवन भर के लिये कुरीतियों का गुलाम बना देते हैं, यह भी इन कविताओं में दृष्टव्य हुआ है।


     मन के एकांत में जीवन की गहन चेतना के गम्भीर स्वर समाहित होते हैं। जब मनुष्य आत्मदर्शी होकर प्रकृति से तादात्म्य स्थापित करता है, तब संसार के हलचल भरे माहौल से अलग, उसे मखमली घास और पेड़ों के हरित संसार में रची-बसी अलौकिक सुन्दरता का दर्शन होता है और चिड़ियों की चहचहाहट सुनाई देती है। वह मन की खिड़की खोल कर देखता है तभी उसे अपने अस्तित्व के दर्शन होते हैं। अकेलेपन का अहसास कराती नीरवता, मानव जीवन की हकीकत, बचपन से जवानी और बुढ़ापे तक का सफर अनेक आशाओं और निराशाओं का अंधेरा और उजाला नजर आने लगता है अकेलेपन में। इस प्रकार की कविताएं भी इस संकलन की विशेषता हैं।


     वर्तमान समय की ग्राम्य और नगर जीवन स्थितियों में पनप रही आपा-धापी का टिक-टिक-टिक शीर्षक से कार्यालयी दिनचर्या, अधिकारी और कर्मचारी की जीवन दशायें, फाइलें, सुविधा शुल्क तथा फर्ज अदायगी शीर्षकों में निजी अनुभव और दैनिक क्रियाकलापों का स्वानुभूत प्रस्तुत किया गया है। प्रकृति के साथ भी कवि का साक्षात्कार हुआ है-पचमढ़ी, बादल, नया जीवन तथा प्रकृति के नियम शीर्षकों में। इनमें मनुष्य के भाव लोक को आनुभूतिक उद्दीपन प्रदान करती प्रकृति और पर्यावरण की सुखद स्मृतियों को प्रकृतस्थ होकर जीवन के साथ-साथ जिया गया है।


     नैतिकता और जीवन मूल्य कवि के संस्कारों में रचे बसे लगते हैं। उसे अंगुलिमाल के रूप में अत्याचारी व अनाचारी का दुश्चरित्र-चित्र भी याद आता और बुद्ध तथा गाँधी का जगत में आदर्श निष्पादन तथा क्षमा, दया, सहानुभूति का मानव धर्म को अनुप्राणित करता चारित्रिक आदर्श भी नहीं भूलता। वर्तमान समय में मनुष्य की सद्वृत्तियों को छल, दंभ, द्वेष, पाखण्ड और झूठ ने कितना ढक लिया है, यह किसी से छिपा नहीं है। इन मानव मूल्यों के अवमूल्यन को कवि ने शब्दों में कविता का रूप दिया है।


     कृष्ण कुमार यादव ने "अभिलाषा" में कविता को वस्तुमत्ता तथा समग्रता के बोध से साधारण को भी असाधारण के अहसास से यथार्थ दृष्टि प्रदान की है, जो प्रगतिशीलता चेतना की आधुनिकता बोध से युक्त चित्तवृत्ति का प्रतिबिम्ब है। इसमें कवि मन भी है ओर जन मन भी। मनुष्य इस संसार में सामाजिकता की सीमाओं में अकेला नहीं रहता। उसके साथ समाज रहता है, अतः अपने सम्पर्कों से मिली अनुभूति का आभ्यन्तरीकरण करते हुए कवि ने अपनी भावना की संवेदनात्मकता को विवेकजन्य पहचान भी प्रदान की है। रूढ़ि और मौलिकता के प्रश्नों से ऊपर उठकर जब हम इन कविताओं को देखते हैं तो लगता है कि सहज मन की सहज अनुभूतियों को कवि ने सहज रूप से सामयिक-साहित्यिक सन्दर्भों से युग-बोध भी प्रदान करने का प्रयास किया है। दायित्व-बोध और कवि कर्म में पांडित्य प्रदर्शन का कोई भाव नहीं है, फिर भी यह तो कहा ही जा सकता है कि विचार को भाव के ऊपर विजय मिली है। कविता समकालीन लेखन और सृजन के समसामयिक बोध की परिणति है सो ‘‘अभिलाषा’’ की रचनाएँ भी इस तथ्य से अछूती नहीं हैं।


     भाषा और शब्द भी आज के लेखन में अपनी पहचान बदल रहे हैं। वह श्वोश् हो गया है, वे और उन का स्थान भी तद्भव रूपों ने ले लिया है। श्री यादव ने भी अनेक शब्दों के व्याकरणीय रूपों का आधुनिकीकरण किया है।


     वैश्विक जीवन दृष्टि, आधुनिकता बोध तथा सामाजिक सन्दर्भों को विविधता के अनेक स्तरों पर समेटे प्रस्तुत संकलन के अध्ययन से आभासित होता है कि श्री कृष्ण कुमार यादव को विपुल साहित्यिक ऊर्जा सम्पन्न कवि ह्नदय प्राप्त है, जिससे वह हिन्दी भाषा के वांगमय को स्मृति प्रदान करेंगे।


समालोच्य कृति- अभिलाषा (काव्य संग्रह)
कवि- कृष्ण कुमार यादव
प्रकाशक- शैवाल प्रकाशन, दाऊदपुर, गोरखपुर
पृष्ठ- 144, मूल्य- 160 रुपये
समीक्षक- डा0 राम स्वरूप त्रिपाठी पूर्व हिन्दी विभागाध्यक्ष, डी.ए.वी. कालेज, कानपुर
E-mail:drdeepti25kkyadav.y@rediffmail.com

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कविताएं


श्रीमती कुसुम सिन्हा की तीन कविताएं



1. बनकर सुगन्ध


बनकर सुगन्ध तुम जीवन की
बगिया को मेरे मंहकाओ
नयनों के पथ से उतर उतर
मेरे तन मन में बस जाओ
बन फूल मेरी हर धड़कन में
मेरी सासों में बस जाओ
बनकर सुगन्ध तुम जीवन की
बगिया को मेरे मंहकाओ
जब नींद न आए रातों को
और बेचैनी सी हो मन में
चंदा की किरणों से झर झर
तुम मीठी लोरी बन जाओ
बनकर सुगन्ध तुम जीवन की
बगिया को मेरे मंहकाओ
मेरे घर की दोहरी आंगन
तेरी यादों से मंहक रहे
हर अंग में मेरे चंदन की
बन गंध आज तुम मुस्काओ
बनकर सुगंध तुम जीवन की
बगिया को मेरे मंहकाओ
यह रात चांदनी भी तेरी
आहट से जैसे महंक रही
मेरे हर सुर में बंधकर तुम
मेरे गीतों में बस जाओ
बनकर सुगन्ध तुम जीवन की
बगिया को मेरे मंहकाओ
यह हवा चल रही झूम झूम
कुद मतवाली सी चाल से जो
शायद तुमको छूकर आई
तुम और न उसको बहकाओ
बनकर सुगन्ध तुम जीवन की
बगिया को मेरे मंहकाओ
तेरे आने की आहट से
धरती अंबर हैं महक रहे
इन बेला के फूलों को तुम
अपनी सुगन्ध से महंकाओ
बनकर सुगन्ध तुम जीवन की
बगिया को मेरे मंहकाओ


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2. आया बसन्त

 

फूलों की गन्ध लिए आया बसन्त
पेड़ों की फुनगी पर, कोमल से पल्लव
वृक्षों के झुरमुट में, पक्षी का कलरव
डालों के साथ-साथ, गाती हवाएं हैं
तन मन झुलसाती, गर्मी का हुआ अन्त
फूलों की गन्ध लिए आया बसन्त
टहनी पर दिखने लगी, कोमल कलिकाएं
मन के आंगन में छाए, सपनों के साए
उड़ते है हवा संग, फूलों के मकरंद
मन के आंगन में छाए, सपनों के साए
उड़ते है हवा संग, फूलों के मकरंद
फूलों की गन्ध लिए आया बसन्त
आमोंके बौरों से होकर मतवाली
गाती है कुहू कुहू कोयलिया काली
छेड़ों मत सपनों को मन में बस जाने दो
नए नए रचने दो गीतों के छंद
फूलों की गन्ध लिए आया बसन्त
मादक से मौसम ने मन की आतुरता ने
खोल दिए ताले चुप्पी के बंद
फूलों की गन्ध लिए आया बसन्त


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3. आजकल चीटियाँ

 

हैरान हूं मैं
बहुत हैरान हूं
जानकर कि चीटियों ने
सैंकड़ों वर्ष पुरानी
परम्पराओं को तोड़ डाला है
मान्यताओं को मिटा डाला है और
आजकल मीठी चीजों की ओर
देखती भी नहीं?
आजकल चीटियां
काटती भी कम हैं
मनुष्य के व्यक्तित्व की मिठास
कम जो गई है?
निराश हो छोड़ दिया
मीठा ही खाना?
नमकीन दीख जाय तो दौड़ पड़ती हैं
अगर वह हल्दीराम का हुआ तो?
बाबा रे लाइन ही लगा देती है?
आजकल चीटियां
बहुत हेल्थ कांसस हैं
डाइबिटीज ना हो जाय
इसलिए मीठा खाना छोड़ ही दिया?
आजकल चीटियां
अकसर फोन के कनेक्शन के गिर्द
या उसके तारों पर
रेंगती नजर आती हैं?
आजकल चीटियां
हाई टेक हो गई हैं?
टेलीफोन की टेक्नोलोजी
समझ लेना चाहती हैं
या फोन पर लोगों की बातें
सुनने को बेताब ये चीटियां
नजर आती हैं हर जगह पर कहीं
रहता हो आपके घर में
अगर कोई जवान जोड़ा
बढ़ जाती है बहुत पेरशानी उनकी
चीटियां कभी फोन के कनेक्शन के गिर्द
या उसके तारों पर रेंगती नजर आती है
बहुत परेशान है मेरी सुमी
आजकल गलियां भी देती है
बेहाया बेशर्मा बदमाश
पर ये वैसे ही रेंगती दौड़ती भागती नजर आती है
आजकल चीटियां
आखिर इक्कीसवी सदी की हैं
क्यों हो पुराने जमाने जैसी?
हैरान हूं मैं बहुत परेशान हूं मैं
यह जानकर कि चीटियां ने सैकड़ो वर्ष पुरानी
परम्पराओं को तोड़ डाला है और
मान्यताओं को भी मिटा डाला है।


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कुसुम सिन्हा का परिचय:


आपको साहित्य में अभिरूचि पिता से विरासत में मिली। पटना युनिवर्सिटी से हिन्दी में एम.ए. किया और बी.एड. भी। आप गत २५ वर्षों से विभिन्न विद्यालयों में हिन्दी पढाती रहीं हैं । १९९७ में अमरीका चली गई । अमरीका में भारतीय बच्चों को हिन्दी पढ़ाने के लिए 'बाल बिहार' नामक एक स्कूल से जुड़ गई। तभी से कहानी, कविताएं लिखने का काम पूरे मनोयोग से करने लगी। अमरीका से प्रकाशित कई पत्र-पत्रिकाओं में आपकी रचनाएं प्रकाशित होती रहती है। विश्वा साहित्य कुन्ज, सरस्वती सुमन, क्षितिज, आदि आपके काव्य संग्रह 'भाव नदी से कुछ बूंदे' प्रकाशित हो चुकी है। दो पुस्तकें प्रकाशनाधीन हैं।

Address:
Kusum Sinha
1770 Riverglen Drive
Suwanee, GA 30024

E-mail: kusumsinha2000@yahoo.com





श्रीमती श्रद्धा जैन की तीन कविताएं




1. वो मुसाफिर किधर गया होगा


जब मिटा के शहर गया होगा
एक लम्हा ठहर गया होगा

है, वो हैवान ये माना लेकिन
उसकी जानिब भी डर गया होगा

तेरे कुचे से खाली हाथ लिए
वो मुसाफिर किधर गया होगा

ज़रा सी छाँव को वो जलता बदन
शाम होते ही घर गया होगा

नयी कलियाँ जो खिल रही फिर से
ज़ख़्म ए दिल कोई भर गया होगा


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2. मालूम न था हमको

 

आई जो कभी दूरी ,कर देगी जुदा हमको
वो लौट न पाएँगे मालूम न था हमको

रिश्तों की कसौटी पर खुद को ही मिटा आए
हम चलते रहे तन्हा, थे साथ नहीं साए
अश्कों के सिवा उनसे, कुछ भी न मिला हमको
वो लौट न पाएँगे मालूम न था हमको

मौला ये बता दे मुझे, मेरा दिल क्यूँ सुलगता है
सूरज में जलन है गर, क्यूँ चाँद पिघलता है
साँसों के भी चलने से, लगता है बुरा हमको
वो लौट न पाएँगे मालूम न था हमको

सोचा कि मना लूँ उन्हें, मिन्नत भी कई कर लूँ
कदमों में गिर जाऊं, बाहों में उन्हें भर लूँ
होगा ये नही लेकिन, आसां जो लगा हमको
वो लौट न पाएँगे, मालूम न था हमको

गिरते हुए कदमों की, आहट पर न जाना तुम
मर जाएँगे हम यूँ ही, न अश्क़ गिराना तुम
आँसू ये तेरे अब भी, देते हैं सज़ा हमको
वो लौट न पाएँगे, मालूम न था हमको


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3. जिगर की बात

 

हमने छुपा के रखी थी सबसे जिगर की बात
सुनते हैं फिर भी गैरों से, अपने ही घर की बात

छोटी सी बात से ही तो बुनियाद हिल गयी
मज़बूत हैं कहते रहे, दीवार ओ दर की बात

बनना सफ़ेदपोश तो कालिख लगाना सीख
उंगली उठाना बन गया अब तो हुनर की बात

बातें फक़त बनाने में न जाए ये उमर
लाओ अगर अमल में तो होगी असर की बात

जज़्बात दिल के मैंने, जो बेबाक लिख दिए
कुछ लोग कहे रहे हैं के होगी कहर की बात

वादे के इंतेज़ार में, जब रात ढल गयी
महफ़िल में तब से हो रही अश्क़ भर की बात

जब भी मिली है मंज़िल, रस्ता बदल लिया
हमको तो शौक़ "श्रद्धा" करते सफ़र की बात


परिचय:


श्रीमती श्रद्धा जैन

शिक्षा - विज्ञान में MSc और कंप्यूटर Advance accounting में डिप्लोमा। विदिशा में पली बढ़ी मगर पिछले नौ सालों से सिंगापुर निवासी हूँ। फिलहाल आप एक अंतर्राष्ट्रीय विद्यालय में शिक्षिका के रूप में कार्यरत हैं। 'विदिशा' भारत के मध्यप्रदेश में भोपाल शहर के पास एक बहुत छोटा सा शहर है। आपने केमिस्ट्री में अपनी शिक्षा पूरी की और वक़्त की हवा ने आपको सिंगापुर पहुँचा दिया यहाँ आकर देश की सभ्यता की खूबियों को जाना, जाना रिश्ते क्या हैं, अपनो का साथ कैसा होता है, और अपने देश की मिट्टी में कितना सकुन है कुछ एहसास कलम से काग़ज़ पर उतर आए और श्रद्धा आप सबके बीच आ गयी !


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दीप्ति गुप्ता की 'मृत्यु' पर चार कविताएं



1. 'मौत में मैने जीवन को पनपते देखा है'




मौत में मैने जीवन को पनपते देखा है !

सूखी झड़ती पत्तियों के बीच फूल को मुस्कुराते देखा है,
मौत में मैने जीवन को पनपते देखा है !

दो बूँद सोख कर नन्हे पौधे को लहलहाते देखा है,
मौत में मैने जीवन को पनपते देखा है !

'पके' फलों के गर्भ में, जीवन संजोये बीजों को छुपे देखा है,
मौत में मैने जीवन को पनपते देखा है !

मधुमास की आहट से, सूनी शाखों में कोंपलों को फूटते देखा है
मौत में मैने जीवन को पनपते देखा है !

राख के ढेर में दबी चिन्गारी को चटकते, धधकते देखा है।
मौत में मैने जीवन को पनपते देखा है !

सूनी पथराई आँखों में प्यार के परस से सैलाब उमड़ते देखा है,
मौत में मैने जीवन को पनपते देखा है !

बच्चों की किलकारी से, मुरझाई झुर्राई दादी को मुस्काते देखा है,
मौत में मैने जीवन को पनपते देखा है !


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2. मृत्यु तुम शतायु हो

 

मृत्यु तुम शतायु हो, चिरायु हो
तभी तो इन शब्दों के समरूप हो, समध्वनि हो,
शतायु, चिरायु, मृत्यु
तुम अमर हो, अजर हो,
तुम अन्त हो, अनन्त हो,
तुम्हारे आगे कुछ नहीं,
सब कुछ तुम में समा जाता है,
सारी दुनिया, सारी सृष्टि
तुम पर आकर ठहर जाती है,
तुम में विलीन हो जाती है,
तुम अथाह सागर हो,
तुम निस्सीम आकाश हो,
इस स्थूल जगत को अपने में समेटे हो,
फिर भी कितनी सूक्ष्म हो
संसार समूचा तुमसे आता, तुम में जाता,
महिमा तुम्हारी हर कोई गाता,
रहस्यमयी सुन्दर माया हो
आगामी जीवन की छाया हो


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3. जीवन के दो छोर

 

जीवन के दो छोर
एक छोर पे जन्म
दूसरे पे मृत्यु
जन्म से आकार पा कर
जीवन एक दिन मृत्यु में विलय हो जाता है
ऐसा तुम्हे लगता है,
पर मुझे तो कुछ और नज़र आता है,
"मृत्यु जन्म की नींव है "
जहाँ से जीवन फिर से पनपता है,
मृत्यु वही अन्तिम पड़ाव है,
जिस से गुज़र कर, जिसकी गहराईयों में पहुँचकर
सारे पाप मैल धो कर, स्वच्छ और उजला हो कर
जीवन पुनः आकार पाता है !
'मृत्यु' उसे सँवार कर, जन्म की ओर सरका देती है,
और यह 'संसरण' अनवरत चलता रहता है !
फिर तुम क्यों मृत्यु से डरते हो, खौफ खाते हो ?
अन्तिम पड़ाव, अन्तिम छोर है वह,
जन्म पाना है तो सृजन बिन्दु की ओर प्रयाण करना होगा,
इस अन्तिम पड़ाव से गुज़रना होगा,
उस पड़ाव पे पहुँचकर, तुम्हे जीवन का मार्ग दिखेगा,
तो नमन करो- जीवन के इस अन्तिम, चरम बिन्दु को
जो जीवन स्रोत है, सर्जक है !


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4. बोलो कहाँ नहीं हो तुम

 

बोलो कहाँ नहीं हो तुम ?
बोलो कहाँ नहीं हो तुम ?
सोई मौत को जगाया मैने कह कर यह -
बोलो कहाँ नहीं हो तुम !
बोलो कहाँ नहीं हो तुम !

अचकचा कर उठ बैठी वह,
देखा मुझे चकित होकर कुछ,
बोली - मैं तो सबको अच्छी लगती हूँ - सुप्त-लुप्त
मुझे जगा रही क्यों तुम ?
मैं बोली - जीवन अच्छा, बहुत अच्छा लगता है
पर, बुरी नहीं लगती हो तुम
बुरी नहीं लगती हो तुम !
ख्यालों में निरन्तर बनी रहती हो तुम
जैसे साँसों में जीवन,
जीवन का ऐसा हिस्सा हो तुम,
जिसे अनदेखा कर सकते, नहीं हम,
ऐसी एक सच्चाई तुम
नकार जिसे सकते नहीं हम,
जीवन के साथ हर पल, हर क्षण,
हर ज़र्रे ज़र्रे में तुम,
बोलो कहाँ नहीं हो तुम ?
बोलो कहाँ नहीं हो तुम ?

जल में हो तुम, थल में हो तुम,
व्योम में पसरी, आग में हो तुम,
सनसन तेज़ हवा में हो तुम,
सूनामी लहरों में तुम,
दहलाते भूकम्प में तुम,
बन प्रलय उतरती धरती पर जब,
तहस नहस कर देती सब तुम,
अट्ठाहस करती जीवन पर,
भय से भर देती हो तुम !
उदयाचल से सूरज को, अस्ताचल ले जाती तुम,
खिले फूल की पाँखों में, मुरझाहट बन जाती तुम,
जीवन में कब - कैसे, चुपके से, छुप जाती तुम
जब-तब झाँक इधर-उधर से, अपनी झलक दिखाती तुम,
कभी जश्न में चूर नशे से, श्मशान बन जाती तुम,
दबे पाँव जीवन के साथ, सटके चलती जाती तुम,
कभी पालने पर निर्दय हो, उतर चली आती हो तुम
तो मिनटों में यौवन को कभी, लील जाती हो तुम,
बाट जोहते बूढ़ों को, कितना -कितना तरसाती तुम,
बोलो कहाँ नहीं हो तुम ?
बोलो कहाँ नहीं हो तुम ?


E-mail:drdeepti25@yahoo.co.in
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कुन्डलिया: यही है भैया सावन : देवेन्द्र कुमार मिश्रा





सावन आयो-बर्षा लायो, इन्द्र धनुष की रचना ।
सजनी चली मायके अपने, साजन देखें सपना ।।
साजन देखें सपना, मिलन की बाँधे आस ।
वैरी पपीहा पिहु-पिहु बोले, विरह बढाये प्यास ।।
डाली-डाली-डले हैं झूले, मौसम हुआ सुहावन ।
सखी-सहेली करें हठकेली, झूम के आया सावन ।।

हरियाली की ओढ़ चुनरिया, वर्षा रानी आई ।
पैरों में झरनों की झर-झर, पायलिया झनकाई ।।
पायलिया झनकाई, रंग-बिरंगे पुष्प खिले बालो में हो गजरा ।
नदियाँ-नाले कुआँ तल ईयाँ , चारों ओर नीर का कजरा ।।
मयूर नृत्य कर रहस रचाये, चाल चले मतवाली ।
उगी हैं फसलें भाँति-भाँति की, गहना पहने हरियाली ।।

दामिनि दमिके-मेघा गरजें, रिम-झिम बरसे नीर ।
गये पिया परदेस भीगें तन-मन, बढती जाये पीर ।।
बढती जाये पीर, तन में आग लगाये ।
कुहू-कुहू कोयल की बोली, मन में हूक उठाये ।।
विरह की मारी दर-दर डोले, इन्तिजार में कामिनि ।
आजाओ मिल जायें ऐसे, जैसे मेघा-दामिनि ।।

सावन के शुभ सोमवार, महाकाल की पूजा ।
चले काँबडिया अमरनाथ को, ऐसा नहीं है दूजा ।।
ऐसा नहीं है दूजा, भाई-बहिन का प्यार ।
रक्षाबंधन ऐसा बंधन, राखी का त्योहार ।।
हाथों मेंहदी रचाई, रहे सुहाग पावन ।
तरह-तरह मिष्ठान बने हैं, यही है भैया सावन ।।


पता:
अमानगंज मोहल्ला नेहरु बार्ड न0 13
छतरपुर (म.प्र.)

E-mail:devchp@gmail.com
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मैं बारूद में हूं- पवन निशान्त




मैं बारूद में था
और लगातार फट रहा था
मैं फट रहा था और बहरों के
कान लगातार फोड़ रहा था
उनसे मैल निकल रहा था
मवाद निकल रहा था
चीखें निकल रही थीं
कई कराह रहे थे और कुछ कसमसा रहे थे
फूटे कान बुदबुदाने लगे थे
वे फटना नहीं चाहते थे मगर
मैंने उन्हें फोड़ दिया था।
मैं सालों बारूद में रहा
और दसों दिशाओं से गायब हो गए बहरे
सर्जरी कराने लगे कई बहरे
या कान को हाथ में रखकर चलने लगे
बारूद का खौफ बहरों पर तारी था
कोई बहरा ढूंढ लाने पर ईनाम घोषित कर दिया गया था
ढूंढे नहीं मिलते थे बहरे
जनता अदालत के बीच पड़ी कुर्सियों पर
तहसील दिवस में चौड़ी टेबिल के इर्द-गिर्द
और न उस इमारत में जहां चुनी हुई राजनैतिक आत्माएं
गांधी का सूत पहने सबसे पहले बहरा होने का
उपक्रम करतीं अक्सर दिख जाती थीं।
मैं बारूद में हूं
कोई गूंगा है तो भी
उसे सुना जाने लगा है
खेत पर खाली हाथ जाने वाले
मुआवजे के हकदार हो गए हैं
साइकिल चला लेने वाले
लखटकिया बाइक लेकर लौट रहे हैं
कोई बोलता है तो उसे चीख माना जाने लगा है
शिकायत करते ही समाधान चलकर आने लगे हैं
लोगों की चौखट पर सुबह सुबह।
अफसर फूटे कानों से अलंकृत हैं
और उपकृत दिखने की मुद्रा में खड़े हैं
गति को रोक देने वाला निशान (यह निशान लाल भी हो सकता था)
दौड़ते हुए सिस्टम की पहचान है अब।
मैं बारूद में बसे रहना चाहता हूं
लोगों ने मुझे दीर्घायु होने का आशीर्वाद दिया है।।


परिचय:

जन्म-11 अगस्त 1968, रिपोर्टर दैनिक जागरण, रुचि-कविता, व्यंग्य, ज्योतिष और पत्रकारिता
पता-69-38, महिला बाजार, सुभाष नगर, मथुरा, (उ.प्र.) पिन-281001.

E-mail:pawannishant@yahoo.com
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हर राह में सफलता है- सुनील कुमार सोनु



चाहे जिस राह चलो
हर राह में सफलता है
कोई ऎसी गली नहीं
जिसमे की लगे विफलता है।
नामूमकिन नहीं कुछ भी
गाँठ बांध लें अभी
आदमी के उबलते खून से
वर्फ के चट्टान पिघलता है
विफलता आखिर होता है क्या?
कोई आ कै जरा समझाये,
बात कड़ी मेहनत की हो जो
ज्यादा करे वह ताज ले जाए
जीत उसी की होगी जिसकी
दिल में घोर तत्पर्ता है
देखो जर नदी, झीलों को
कितना कोमल इसकी जलधारा है।
अविराम चट्टानों से लड़ता
कहो कब ये हारा है।
निडर निरंतर बहते जो पथ पर
उसीके आँखों में खुशियाँ झलकती है
साहस के दामन न छोड़
मनुष्य है तू सर्वश्रेष्ठ प्राणी
अरे कुछ सबक ले चीटी से
इक्कीसवीं बार चढ़ेगी की गजब कहानी
इतिहास लिखता वही जीवन में
जिसके छाती पे कष्ट संभलता है
चाहे जिस रह चलो
हर रह में सफलता है




Room No.318 New ADC Hostel, NIFFT, Hatia, Ranchi-834003 (Jharkhand)

E-mail:sunilkumarsonus@yahoo.com
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प्रो. सी.बी. श्रीवास्तव "विदग्ध" की दो कविता



बदल डालो उसे , बह रही हवा जो .....

 

देश ने तो तरक्की बहुत की मगर, देश निष्ठा हुई आज बीमार है
बोलबाला है अपराध का हर जगह, जहाँ देखो वहीं कुछ अनाचार है

नीति नियमों को हैं भूल बैठे सभी, मूलतः जिनके हाथों में अधिकार हैं
नहीं जनहित का जिनको कोई ख्याल है, ऐसे लोगों की ही भरमार है
सोच उथला है, धनलाभ की वृत्ति है, दृष्टि ओछी, नहीं दूरदर्शी नयन
कुर्सियाँ लोभ के हैं भँवर जाल में, दूर उनसे बहुत अब सदाचार है

नियम और कायदे सिर्फ कहने को हैं, हर दुखी दर्द सहने को लाचार है
योजनायें अनेकों हैं कल्याण हित, किंतु जनता का बहुधा तिरस्कार है
सारे आदर्श तप त्याग गुम हो गये, बढ़ गया बेतरह अनीतिकरण
दलालों का चलन है, सही काम कोई चाह के भी न कर पाती सरकार है

देश कल कारखानों से बनते नही, देश बनते हैं श्रम और सदाचार से
देश के नागरिको की प्रतिष्ठा, चलन, समझ श्रम , गुण तथा उनके आचार से
है जरूरी कि अनुभव से लें सीख सब, सुधारे आचरण और वातावरण
सचाई, न्याय, कर्तव्य की लें शरण, देश से अपने जो तनिक प्यार है

बदलने होंगे व्यवहार सबको हमें, अपने सुख के लिये देश हित के लिये
जहाँ भी है आज तक अंधेरा घना, जलाने होंगे उन झोपड़ियों में दिये
देश में आज जो सब तरफ हो रहा देख उसको जरूरी है नव जागरण
क्योंकि जो पीढ़ियाँ आने वाली हैं कल उनको भी सुख से जीने का अधिकार है

जो सरल शांत सच्चे हैं वे लुट रहे, सब लुटेरों के हाथो में व्यापार है
देश हित जिन शहीदों ने दी जान थी क्या यही उनकी श्रद्धा का उपहार है ?
है कसम देश की सब उठो बंधुओं! बदल डालो उसे बह रही जो हवा
बढ़े नैतिक पतन हित हरेक नागरिक और नेता बराबर गुनहगार है।


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मँहगाई

 

घटती जाती सुख सुविधायें, बढ़ती जाती है मँहगाई
औ॔" जरूरतों ने जेबों संग, है अनचाही रास रचाई

मुश्किल में हर एक साँस है, हर चेहरा चिंतित उदास है
वे ही क्या निर्धन निर्बल जो, वो भी धन जिनका कि दास है
फैले दावानल से जैसे, झुलस रही सारी अमराई !
घटती जाती सुख सुविधायें, बढ़ती जाती है मँहगाई !!

पनघट खुद प्यासा प्यासा है, क्षुदित श्रमिक ,स्वामी किसान हैं
मिटी मान मर्यादा सबकी, हर घर गुमसुम परेशान है
कितनों के आँगन अनब्याहे, बज न पा रही है शहनाई
घटती जाती सुख सुविधायें, बढ़ती जाती है मँहगाई !!

मेंहदी रच जो चली जिंदगी, टूट चुकी है उसकी आशा
पिसा जा रहा आम आदमी, हर चेहरे में छाई निराशा
चलते चलते शाम हो चली, मिली न पर मंजिल हरजाई
घटती जाती सुख सुविधायें, बढ़ती जाती है मँहगाई !!

मिट्टी तक तो मँहगी हुई है, हुआ आदमी केवल सस्ता
चूस रही मंहगाई जिसको, खुलेआम दिन में चौरस्ता
भटक रही शंकित घबराई, दिशाहीन बिखरी तरुणाई
घटती जाती सुख सुविधायें, बढ़ती जाती है मँहगाई !!

नई समस्यायें मुँह बाई, आबादी ,वितरण, उत्पादन
यदि न सामयिक हल होगा तो, रोजगार, शासन, अनुशासन
राष्ट्र प्रेम, चारीत्रिक ढ़ृड़ता की होगी कैसे भरपाई ?
घटती जाती सुख सुविधायें, बढ़ती जाती है मँहगाई !!


संपर्क पता: प्रो0 सी.बी. श्रीवास्तव "विदग्ध" विद्युत मंडल कालोनी ,
रामपुर , जबलपुर मो. ०९४२५४८४४५२
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इन्दिरा चौधरी की दो कविता



बहता लहू

 

मेरी धमनियों में बहता लहू
पुकार-पुकार पूछ रहा मुझसे
आखिर कब तक बहता रहूँ,
इन शिरायों के भीतर?
कई बार चिल्ला पड़ता है,
खौलता और उबलता भी है।
चित्त-विक्षिप्त कर देता हर वक्त
फिर इस पुकार को
अन्तरात्मा की पुकार समझ
मैं देने जबाब होती हूँ, उद्दत तो
बह पड़ता है आँसूओं का सैलाब
इस उबलते लहू को मार देता है छींटा
हूँक सी उठती है अन्तरात्मा से,
मेरे लहू मर्यादा में रहना हो तो,
तो इन्ही धमनियों में बहना होगा।


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क्या दोषी है कोशी?




क्या दोषी है कोशी?
क्या दोषी है सिर्फ कोशी ?
कल तक जो छ्लछल बहती
निर्मल शीतल सी जो रहती
आज बन गई वह पागल।
क्या दोषी है सिर्फ कोशी ?
दोषी है क्या बांध , जो यूँ ही ध्वस्त हुआ।
दोषी है क्या वह अभियन्ता?
दोषी है क्या ठेकेदार?
दोषी है क्या मंत्री-संतरी
नहीं.............
अजागरूक जनता
जो सिर्फ चाहती है सुविधा,
देती है दोष
बुराईयों से लड़ने करती है संगठन
फिर स्वयं नई बुराईयों को देती है जन्म
भोगती कौन
मासूम जनता।



संपर्क: FD-453/2, Salt Lake City, Kolkata-700106


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दिल का जख्म



महेश कुमार वर्मा, पटना

E-mail:vermamahesh7@gmail.com
Webpage : http://popularindia.blogspot.com






 

कोई आए मेरे दिल का दर्द सुन ले
कोई तो दिल के जख्म पर मलहम लगा दे

है जख्म ये जो भरती नहीं
है इसकी दवा जो मिलती नहीं
कोई आए मेरे दिल का दर्द सुन ले
कोई तो दिल के जख्म पर मलहम लगा दे

क्या सुनाऊं दिल का हाल
पापियों ने किया इसे बेहाल
थी अरमां आसमां छूने को
पर ऊँचाई से उसने ऐसा धकेला
कि दिल टुकड़े-टुकड़े हुए
दिल टुकड़े-टुकड़े हुए
किसी तरह टुकड़े को जोड़कर
नया जीवन जीना चाहा
पर आगे के राह में
उसने ऐसा रोड़ा लगाया
कि दिल का जख्म बढ़ता ही गया
दिल का दर्द बढ़ता ही गया
कोई आए मेरे दिल का दर्द सुन ले
कोई तो दिल के जख्म पर मलहम लगा दे

बहुत कोशिश किया दिल के जख्म को भरने का
पर नहीं किया था उसने रत्ती भर भी सद्व्यवहार मेरे साथ
उसने किया था मेरे दिल पर आघात ही आघात
मेरे दिल का जख्म बढ़ता ही गया
दिल का जख्म बढ़ता ही गया
मुझसे उसने दुनियाँ का सब कुछ छीन लिया था
नहीं छोड़ा था उसने कुछ मेरे लिए
सिवाय दिल के जख्म के
सिवाय दिल के जख्म के
कोई आए मेरे दिल का दर्द सुन ले
कोई तो दिल के जख्म पर मलहम लगा दे
कोई तो दिल के जख्म पर मलहम लगा दे
कोई तो दिल के जख्म पर मलहम लगा दे


संपर्क पता:  DTDC कुरियर ऑफिस,  सत्यनारायण मार्केट, मारुती (कारलो) शो रूम के सामने,
बोरिंग रोड, पटना (बिहार),  पिन: 800001 (भारत) Contact No.: +919955239846
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पाब्लो नेरुदा

- अरुण माहेश्वरी
http://arunmaheshwari.blogspot.com




कवि के साथ ही एक कूटनीतिज्ञ थे, फ्रांस के राजदूत, कम्युनिस्ट सिनेटर, चीलें के राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार, और लम्बे अर्से तक निर्वासित एक राजनीतिक शरणार्थी थे। उन पर जितनी पाबन्दियाँ लगीं, उतना ही उनका निजी संसार विस्तृत होता चला गया। उन्हें जितना कैदखानों में रखने की कोशिश की गई, वे उतने ही ज्यादा आजाद रहें। उनकी दृढ़ वैचारिक प्रतिबद्धता ही उनके खुले और अदम्य मानवीय व्यवहार का आधार बनी। उनके मित्रों में पाब्लो पिकासो, आर्थर मिलर, लोर्का, नाजिम हिकमत से लेकर सड़कों के आम आदमी और सभी लघु और तिरस्कृत मानी जाने वाली चीजें शामिल थीं। वे जनता के कवि थे। ‘‘मैंने कविता में हमेशा आम आदमी के हाथों को दिखाना चाहा। मैंने हमेशा ऐसी कविता की आस की जिसमें उँगलियों की छाप दिखाई दे। मिट्टी के गारे की कविता, जिसमें पानी गुनगुना सकता हो। रोटी की कविता जहाँ हर कोई खा सकता हो।’’ उनसे पूछा गया ‘‘आप क्यों लिखना चाहते हैं’’ उनका उत्तर था ‘‘मैं एक वाणी बनना चाहता हूँ।’’ दुनिया में नेरुदा की एक पहचान ‘जनवाणी के कवि’ के रूप में रही है। उनके लेखन के विषयों में राजनीति से लेकर समुद्र और एक साधारण चीलेंवासी से लेकर रिचर्ड निक्सन तक, सब समान सहजता और विस्मय के साथ आते हैं। नोबेल पुरस्कार से पुरस्कृत, कम्युनिस्ट, प्रेम का गायक और जनवाणी का कवि पाब्लो नेरुदा की रचनाएँ सुरीली घंटियों और चेतावनी के घंटों, दोनों की ध्वनियाँ सुनाती हैं।
हिन्दी में अब तक नेरुदा की कविताओं का तो कइयों ने अनुवाद किया है, जिनमें खासतौर पर चन्द्रबली सिंह का किया हुआ अनुवाद चयन और गुणवत्ता, दोनों ही लिहाज से श्रेष्ठ कहा जा सकता है।
हिन्दी में नेरुदा के बारे में चेतना पैदा करने में जिन चन्द लोगों की विशेष भूमिका रही है, उनमें एक उल्लेखनीय नाम डॉ. नामवर सिंह का है। पचास के दशक से ही उन्होंने नेरुदा की कविताओं पर लिखना शुरू कर दिया था। चन्द्रबली सिंह और प्रभाती नौटियाल द्वारा अनूदित, साहित्य अकादमी द्वारा प्रकाशित नेरुदा की कविताओं के संकलनों की भूमिका भी उन्होंने ही लिखी।


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गीला बचपन



पाब्लो नेरुदा, जिनका मूल नाम था नेफ्ताली रिकार्दो रेइस बासोल्ता, का जन्म मध्य चीले के एक छोटे से शहर पराल में 12 जुलाई 1904 के दिन हुआ था। नेरुदा जब सिर्फ 10 वर्ष के थे तभी से उन्होंने कविता लिखनी शुरू कर दी थी। फीनस्तीन के अनुसार उनकी पहली काव्य-पंक्तियाँ अपनी माँ के लिए ही लिखी गई थी। नेरुदा की पहली साहित्यिक रचना 18 जुलाई 1917 के ‘लॉ मनाना’ नाम की पत्रिका में प्रकाशित हुई थी जिसको शीर्षक था ‘Entusiasmo y perseverancia’(उत्साह और धैर्य) ।
1920 में ‘सेवा आस्त्रेल’ नाम की पत्रिका में उनकी कविताएँ उनके पेन नेम पाब्लो नेरुदा के नाम से प्रकाशित हुई थी। यह नाम उन्होंने अपने परिवार की डाँट से बचने के लिए अपनाया था। उनके माता-पिता नहीं चाहते थे कि नेरुदा साहित्यकार बने। 1927 में उनके एक और संकलन 'अमपदजम चवमउए कम' veinte poems de amor y Una Cancion (प्रेम की बीस कविताएँ और विषाद का एक गीत) के प्रकाशन के साथ ही इस संकलन की कविताओं पर जो चर्चा हुई उससे वे स्पैनिश कविता की दुनिया में एक विश्व प्रसिद्ध कवि माने जाने लगे। तब वे सिर्फ 23 वर्ष की उम्र के थे।
खुद नेरुदा ने अपनी पूरब की इस यात्रा की स्मृतियों के बारे में बाद में जो कविताएँ लिखी उनमें से कुछ उनके संकलन ‘The Moon in the Labyrinth’ (भूलभुलैया में चाँद) में प्रकाशित हुई है जिनका हिन्दी में चन्द्रबली सिंह ने अपने ‘पाब्लो नेरुदा कविता संचयन’ में अनुवाद किया है। यहाँ ऐसी कुछ कविताओं के अंशों पर गौर करना मुनासिब होगा, ताकि इस काल के उनके अनुभवों को ज्यादा समग्रता में देखा जा सके


इनमें एक कविता है:‘आरम्भिक यात्राएँ’


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‘‘पहली बार जब मैंने सागर की यात्रा की,
मैं अन्तहीन रहा,
मैं सारी दुनिया से उम्र में छोटा था।
और तट पर मेरा स्वागत करने की
विश्व की अनन्त टनटनाहट उठी।
मुझे दुनिया में होने का बोध नहीं था।
मेरी आस्था दफ्न मीनार में थी।
बहुत कर्म में मैंने बहुत ज्यादा चीजें पायीं थी,
.....
और तब मैंने समझा कि नग्न हूँ,
मुझे और कपड़ों से ढँकने की जरूरत है।
मैंने कभी गम्भीरता से जूतों के बारे में नहीं सोचा था।
मेरे पास बोलने के लिए भाषाएँ नहीं थी।
सिर्फ खुद की किताब ही पढ़ सकता था।
.....
दुनिया औरतों से भरी पड़ी थी,
किसी दुकान की शीशों की खिड़की में लदे सामानों-सी
.....
मैंने सीखा कि वीनस कोई दन्तकथा नहीं थी।
निश्चित और दृढ़ वह थी, अपनी शाश्वत दो भुजाओं के साथ,
और उसके कठोर मुक्ता फल ने
मेरी लैंगिक लोलुप धृष्टता सह लीं’’
अन्य कविता है-‘पूरब में अफीम’
‘‘सिंगापुर से आगे, अफीम की गन्ध आने लगी।
ईमानदार अंग्रेज इसे अच्छी तरह जानता था।
जेनेवा में वह इसका छिपकर व्यापार करनेवालों की
निन्दा करता था,
लेकिन उपनिवेशों में हर बन्दरगाह
कानूनी धुएँ के बादल उठाता था।
.....
मैंने चारों ओर देखा। दयनीय शिकार
दास, रिक्शों और बागानों से आए कुली,
बेजान लदुआ घोडे़
सड़क के कुत्ते,
दीन दुष्प्रयुक्त जन।
यहाँ, अपने घावों के बाद,
मानव नहीं बल्कि लदुआ पशु होने के बाद,
चलते-चलते और पसीना बहाते-बहाते रहने के बाद,
खून का पसीना बहाने, आत्मा से रिक्त होने के बाद,
वहाँ पड़े थे,
.....अकेले,
पसरे हुए,
अन्त में लेटे हुए, वे कठोर पाँवों के लोग।
हरेक ने भूख का विनिमय
आनन्द के एक धुँधले अधिकार के लिए किया था।’’


इन्हीं अनुभवों की एक और कविता है-
‘रंगून 1927’


‘‘रंगून में देर कर आया।
हर चीज वहाँ पहले से ही थी-
रक्त का,
स्वप्नों और स्वर्ण का,
एक नगर,
एक नदी जो
पाशविक जंगल से
घुटन भरे नगर में
और उसकी कुष्ठग्रस्त सड़कों पर प्रवाहित थी।
श्वेतों के लिए एक श्वेता होटल
और सुनहरे लोगों के लिए स्वर्ण का एक पैगोडा था।
यही था जो
चलता था
और नहीं चलता था।....’’


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श्रद्धांजलि: कवि वेणुगोपाल को

- मयंक सक्सेना




देश में नक्सलवादी आन्दोलन ने कई तरह के प्रभाव पैदा किए ..... कुछ अच्छे - कुछ बुरे और कुछ समझ से परे ! इन्ही प्रभावों के फलस्वरूप कुछ साहित्य भी उपजा जिसमे आम आदमी ..... गरीब आदमी की हताशा और दुःख से उपजा विद्रोह गीत था .... तंत्र के ख़िलाफ़ गुस्सा और रोष का संगीत था ! इस दौरान इस हवा ने कई क्रांतिकारी कवि पैदा किए, उन्ही में से एक और सबसे अलग कवि हुए वेणुगोपाल ....जिस दौर में नक्सल आन्दोलन उपजा और तब से अब तक वेणुगोपाल ने कम लिखा पर जो लिखा उसे पढ़ना किसी भी विद्रोही कवि या व्यक्ति के लिए ज़रूरी है भले ही आज हम नक्सलियों और उनके आन्दोलन को भटकता देख रहे हैं पर यदि उस आन्दोलन की मूल विचारधारा को समझना है तो ज़रा एक बार वेणुगोपाल की कविताओं की और दृष्टि फेरें....

कवि वेणुगोपाल का सोमवार देर रात निधन हो गया। वह 65 वर्ष के थे और कैंसर से पीडित थे। 22 अक्टूबर 1942 को आंध्र प्रदेश के करीमनगर में जन्मे वेणुगोपाल का मूल नाम नंद किशोर शर्मा था और वह देश में नक्सलवादी आंदोलन से उभरे हिंदी के प्रमुख क्रांतिकारी कवियों में से थे। उन्होंने दो शादियां की थीं और उनके एक पुत्र और तीन पुत्रियां हैं। वेणुगोपाल के तीन कविता संग्रह प्रकाशित हुए थे, जिनमें वे हाथ होते-1972, हवायें चुप नहीं रहती-1980 और चट्टानों का जलगीत-1980। इसके अलावा उन्होंने काम सौंदर्य शास्त्रों की भूमिका शीर्षक से एक शोध ग्रंथ भी लिखा था।
वेणुगोपाल ने प्रमुख रंगकर्मी बब कारंत के नाटकों का निर्देशन भी किया था और उनमें अभिनय भी किया था। वह हैदराबाद में रहकर स्वतंत्र पत्रकारिता करते थे।

उनके बारे में ज़्यादा कहने से बेहतर होगा की आप उनकी रचना खुद पढ़ें और सोचें।



ख़तरे


ख़तरे पारदर्शी होते हैं।
ख़ूबसूरत।
अपने पार भविष्य दिखाते हुए।
जैसे छोटे से गुदाज बदन वाली बच्ची
किसी जंगली जानवर का मुखौटा लगाए
धम्म से आ कूदे हमारे आगे
और हम डरें नहीं।
बल्कि देख लेंउसके बचपन के पार
एक जवान खुशी
और गोद में उठा लें उसे।
ऐसे ही कुछ होते हैं ख़तरे।
अगर डरें तो ख़तरे
और अगर नहीं
तो भविष्य दिखाते रंगीन पारदर्शी शीशे के टुकड़े।


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और सुबह है


हम
सूरज के भरोसे मारे गए
और
सूरज घड़ी के।
जो बंद इसलिए पड़ी है
कि
हम चाबी लगाना भूल गए थे
और
सुबह है
कि
हो ही नहीं पा रही है।



अंधेरा मेरे लिए


रहती है रोशनी
लेकिन दिखता है अंधेरा
तो
कसूर
अंधेरे का तो नहीं हुआ न!
और
न रोशनी का!
किसका कसूर?
जानने के लिए
आईना भी कैसे देखूं
कि अंधेरा जो है
मेरे लिए
रोशनी के बावजूद!
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प्रेषक का संपर्क पता:

जी न्यूज़, FC-19, फ़िल्म सिटी, सेक्टर 16 A,
नॉएडा, उत्तर प्रदेश - 201301

E-mail: mailmayanksaxena@gmail.com
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सूचना:  कथा महोत्सव-2008
अभिव्यक्ति, भारतीय साहित्य संग्रह तथा वैभव प्रकाशन द्वारा आयोजित

  • अभिव्यक्ति, भारतीय साहित्य संग्रह तथा वैभव प्रकाशन की ओर से कथा महोत्सव २००८ के लिए हिन्दी कहानियाँ आमंत्रित की जाती हैं।
  • दस चुनी हुई कहानियों को एक संकलन के रूप में में वैभव प्रकाशन, रायपुर द्वारा प्रकाशित किया जाएगा और भारतीय साहित्य संग्रह से www.pustak.org पर ख़रीदा जा सकेगा।
  • इन चुनी हुई कहानियों के लेखकों को ५ हज़ार रुपये नकद तथा प्रमाणपत्र सम्मान के रूप में प्रदान किए जाएँगे। प्रमाणपत्र विश्व में कहीं भी भेजे जा सकते हैं लेकिन नकद राशि केवल भारत में ही भेजी जा सकेगी।
  • महोत्सव में भाग लेने के लिए कहानी को ईमेल अथवा डाक से भेजा जा सकता है। ईमेल द्वारा कहानी भेजने का पता है-
    teamabhi@abhivyakti-hindi.org

डाक द्वारा कहानियाँ भेजने का पता है- रश्मि आशीष, संयोजक- अभिव्यक्ति कथा महोत्सव-२००८, ए - ३६७ इंदिरा नगर, लखनऊ- 226016, भारत

महोत्सव के लिए भेजी जाने वाली कहानियाँ स्वरचित व अप्रकाशित होनी चाहिए तथा इन्हें महोत्सव का निर्णय आने से पहले कहीं भी प्रकाशित नहीं होना चाहिए।

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कहानी के साथ लेखक का रंगीन पासपोर्ट आकार का चित्र व संक्षिप्त परिचय होना चाहिए।
कहानियाँ लिखने के लिए A - ४ आकार के काग़ज़ का प्रयोग किया जाना चाहिए।
ई मेल से भेजी जाने वाली कहानियाँ एम एस वर्ड में भेजी जानी चाहिए। प्रमाण पत्र तथा परिचय इसी फ़ाइल के पहले दो पृष्ठों पर होना चाहिए। फ़ोटो जेपीजी फॉरमैट में अलग से भेजी जा सकती है। लेकिन इसी मेल में संलग्न होनी चाहिए। फोटो का आकार २०० x ३०० पिक्सेल से कम नहीं होना चाहिए। कहानी यूनिकोड में टाइप की गई हो तो अच्छा है लेकिन उसे कृति, चाणक्य या सुशा फॉन्ट में भी टाइप किया जा सकता है।

कहानी का आकार २५०० शब्दों से ३५०० शब्दों के बीच होना चाहिए।

कहानी का विषय लेखक की इच्छा के अनुसार कुछ भी हो सकता है लेकिन उसमें मानवीय मूल्यों के प्रति आस्था होना ज़रूरी है।

इस महोत्सव में नए, पुराने, भारतीय, प्रवासी, सभी सभी देशों के निवासी तथा सभी आयु-वर्ग के लेखक भाग ले सकते हैं।

देश अथवा विदेश में हिन्दी की लोकप्रियता तथा प्रचार प्रसार के लिए चुनी गई कहानियों को आवश्यकतानुसार प्रकाशित प्रसारित करने का अधिकार अभिव्यक्ति के पास सुरक्षित रहेगा। लेकिन निर्णय आने के बाद अपना कहानी संग्रह बनाने या अपने व्यक्तिगत ब्लॉग पर इन कहानियों को प्रकाशित करने के लिए लेखक स्वतंत्र रहेंगे।
चुनी हुई कहानियों के विषय में अभिव्यक्ति के निर्णायक मंडल का निर्णय अंतिम व मान्य होगा।
कहानियाँ भेजने की अंतिम तिथि १५ नवंबर २००८ है।

पूर्णिमा वर्मन
टीम अभिव्यक्ति
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पत्र-पत्रिका प्राप्ती











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शनिवार, 9 अगस्त 2008

कथा-व्यथा - अगस्त 2008 प्रथम अंक

प्रधान सम्पादक : प्रकाश चण्डालिया    संपादक - शम्भु चौधरी
संपर्क : एफ.डी.- 453/2 साल्टलेक सिटी, कोलकाता - 700106
e-mail: kathavyatha@gmail.com


अगला अंक 7 सितम्बर तक नेट पर जारी कर दिया जायेगा।
e-mail:kathavyatha@gmail.com












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संपादकीय  पत्रिका प्राप्ती  लघुकथा  कहानी
कविता :-
हर तरफ आतंक  अखंड ये देश हमारा
स्वतंत्रता की ६१ वीं वर्षगाँठ
ॐची सोच   ऊँगली पकड़ कर वह बड़ी हुई
ऐ हिंद के युवा  संघर्ष   महिला शक्ति  आह्वान
कुछ-कुछ होता है   माँ    जीवन अल्प विराम
एशियाटिक सोसाइटी में राजस्थान - लेखक अम्बू शर्मा
वृद्धाश्रम-संस्कृति पनप रही है। - डॉ.गीता गुप्ता
आपके पत्र  समीक्षा करें



संपादकीय


कथा-व्यथा का पहला अंक आपकी आंखों के सामने है। ई-हिन्दी साहित्य सभा एक के बाद एक नये कदम की तरफ बढ़ते जा रही है। इस इ-पत्रिका का उद्देश्य न सिर्फ उन साहित्यकारों को प्रधानता देना है, वरन आपके सहयोग से उन साहित्यकारों को भी इस मंच पर स्थान देने का प्रयास करना है, जो किसी भी कारण से इन्टरनेट पाठकों से नहीं जुड़ पायें हैं। नई पीढ़ी के पास, खुद के साथ उनको भी पहुंचाना न सिर्फ हमारा कर्तव्य है, साहित्य सेवा भी। कथा का अर्थ है खुद की बात और व्यथा का मतलब साफ है साहित्य जगत के उन लोगों की बातें जो किसी भी कारण से इन्टरनेट से नाता नहीं जोड़ पाये है।
पिछले दिनों 'समाज विकास' पत्रिका का संपादन करते-करते एक बात महसूस की कि हमारे साहित्य जगत के ऐसे बहुतेरे विद्वान हैं, जिन्हें इस बात की कसक है कि वे नई पीढ़ी के बीच नहीं जा पा रहे। पुस्तकालय परम्परा धीरे-धीरे दम तोड़ती जा रही है। कुछ चल रहे हैं तो उनमें पाठकों का बहुत बड़ा अभाव खलता है। जो कदम पुस्तकालय तक पहुंचते हैं,उनमें ज्यादतर साहित्य के प्रति काफी उदासीन दिखायी पड़ते हैं। भले ही यह बात हम आज न मानें, पर जल्द ही हमारे समस्त साहित्य को किसी न किसी प्रकार से भी क्यों न हो, इन्टरनेट पर लाना होगा। पुस्तक-पत्रिकाओं के प्रकाशन का दौर समाप्त हो जायेगा। घर की अलमारियों में सजी पुस्तकें हमें काटने दौड़ेंगी। भले ही ये अलमारियां हमारे साहित्य का एक अभिन्न अंग रही है, परन्तु आज इसका स्थान लेप-टॉप लेती जा रही है, कहीं लेप-टॉप संस्कृति हमारी साहित्य-संस्कृति को लील न जाये, इसके लिये हम सबको अपनी जिम्मेदारियों का निर्वाह करना ही पड़ेगा। आप खुद के लिये तो लिखें ही, साथ ही थोड़ा वक्त उन साहित्यकारों के लिये भी निकाले जो नेट पर अपने साहित्य को देने में असमर्थ हैं या हो चुकें हैं। भले ही आप कथा-व्यथा के माध्यम से न सही, किसी भी माध्यम से आप अपनी कथा के साथ-साथ उनकी व्यथा को भी नेट के पाठकों तक जरूर पहुंचायें। आप जब भी अपनी बात लिखें तो कम से कम एक पेज में उनके साहित्य को भी टंकित करें, कारण न तो हमारे साहित्यकार अन्य देशों के साहित्यकारों की तरह समृद्घ हैं, न ही देश में साहित्य के प्रति सरकार की कोई योजना अभी तक बन पाई है जो भी प्रयास हो रहें हैं वे निजी तौर पर ही देखने को मिल रहे हैं। ई-हिन्दी साहित्य सभा के माध्यम से हम सिर्फ और सिर्फ साहित्य की सेवा करने वाले समान मानसिकता वाले बन्धुओं का मंच बनाने का विनम्र प्रयास कर रहें हैं। हम न तो स्वयं की पीठ थपथपाना चाहते हैं न ही यह चाहते हैं कि कोई हमारी पीठ थपथपाये। कार्य करना हो तो साथ आयें, एक नया कारवां बनाये।


- शम्भु चौधरी

email:kathavyatha@gmail.com



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कविता :-
 हर तरफ आतंक   अखंड ये देश हमारा   स्वतंत्रता की ६१ वीं वर्षगाँठ   
ॐची सोच   ऊँगली पकड़ कर वह बड़ी हुई   ऐ हिंद के युवा   संघर्ष   महिला शक्ति  आह्वान  कुछ-कुछ होता है    माँ    जीवन अल्प विराम
संपादकीय  पत्रिका प्राप्ती  लघुकथा  कहानी   आपके पत्र  समीक्षा करें
एशियाटिक सोसाइटी में राजस्थान - लेखक अम्बू शर्मा
वृद्धाश्रम-संस्कृति पनप रही है। - डॉ.गीता गुप्ता


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आपके पत्र
आपके द्वारा समीक्षात्मक पत्रों को यहाँ पर स्थान दिया जायेगा।
कृपया अपना पूरा, नाम व पता जरूर लिखें, संभव हो तो अपना संक्षिप्त परिचय भी देंवे।


Design of your web is very good

Design of your web is very good. I will send u some write-ups.
Thanks.
Have A Godd Day.
Regards,
Siddharth Kumar
Journalist
The Press Trust of India (PTI)
PTI Building, 4, Parliament Street, New Delhi-110 001
siddharth-bhardwaj@hotmail.com
siddharthkumarbhardwaj@gmail.com
Blog:
www.siddharthbhardwaj.blogspot.com

Mobile: +91-97111 18565



2.
भाई आपकी यह पत्रिका तो ब्लाग स्पोट पर ही है। कैसे किया इसे डिजाइन, कुछ इस बाबत बता सकें तो सच बहुत ही खूबसूअरत है। पूरी पत्रिका की शक्ल में है। आम ब्लाग की तरह नहीं। क्या मैं भी अपने ब्लाग में एसे परिवर्तन कर सकता हूँ ? यदि हां तो कैसे?

2008/8/13 vijay gaur


3.
सादर नमस्कार
भगवान श्री कृष्ण की नगरी से आपको प्रणाम
आप बहुत अच्छा काम कर रहे हैं। हिंदी के विस्तार के लिए हम लोगों की पहली पीढ़ियों ने बहुत हाय-तौबा की, लेकिन नेट की बदौलत अब इसका फैलाव हो रहा है। आपका प्रयास सराहनीय है और नए लोगों को संबल प्रदान करने वाला है। मैं मथुरा दैनिक जागरण में कार्यरत हूँ और कविता-व्यंग्य लिखना मेरा शौक है। वर्ष 85 से कविताएं लिख रहा हूँ। कइयों का प्रकाशन भी हुआ है। नया-नया ब्लागर हूं। आपके मंच का न केवल सदस्य बनना चाहता हूँ, बल्कि कोई सेवा-सहयोग हो तो अवगत कराएं। मेरा ब्लाग है-या मेरा डर लौटेगा.ब्लागसपोट.कॉम, मोबाइल नंबर 09412777909 - Pawan Nishant

http://yameradarrlautega.blogspot.com/
pawannishant@yahoo.com




4.
kapil ने कहा…
http://neerajrajput.blogspot.com/2008/08/blog-post_22.html
oopar diye gaye link par aapki tippani dekhi..to yeh bata uchit aur mehetvepoorn laga ki woh kavita maine likhi hai..karreb 5-6 mahine pehle orkut ki gulzaar aur gulzarians naamak 2 communities mein post kari thee. Wahin se sayad sareeman neeraj rajpoot ne chura li.. jald hi apni post kari hui kavita ka link bhi post karne ki koshish karoonga...


5.
Popular India ने कहा…
कथा- व्यथा अच्छी शुरुआत है। इसके लिए ई-हिन्दी साहित्य सभा परिवार को बहुतों धन्यवाद। एक सुझाव :
रचना के नीचे जो रचनाकार के नाम व पता दिए हैं वह तो ठीक, पर जो e-mail ID दिए हैं उसमें मेल करने का लिंक होना चाहिए। उसी तरह जिस लेखक का ब्लॉग या साईट दिया गया है उसमें भी लिंक होना चाहिए। इसी प्रकार लेखक के नाम के साथ उस लेखक का परिचय जहाँ लिखा गया है, उसका लिंक होना चाहिए। आशा है मेरे इन बात पर विचार करेंगे। हर तरफ आतंक कविता अच्छा लगा।
आपका
महेश August 11, 2008 8:03 PM



लघुकथा

भोजपुरी: गुड़ खाइब गुलगुला से परहेज   साझा दर्द   फालतू



भोजपुरी: गुड़ खाइब गुलगुला से परहेज


आईं ए बाबा, आईं बैठीं। राउर जूठन हमरो दुआर प गिरि जाइत त हमहूँ तरि जइतीं।
-का कहले हा रे ? तोरा इचिको तमीज ना भईल बोले के ? तोरा इचिको दिमाग बा कि ना?
हम बाभन हो के एगो चमार के दुआर के जूठन गिराइब? हमार धरमे भरनठ करे प लागल बाड़े का रे?
- छोड़ीं ए बाबा, खिसाई मत। हमरा से बड़ा भारी गलती हो गैल। हमरा के माफ क दीं।
- ठीक बा जो, आजु तोरा के माफ क दे तानीं बाकिर आइंदे ऐसन गलती मत करिहे।
- ठीक बा ए बाबा। आछा एगो बाति पूछीं, खिसिआइब ना नू?
- पूछ, का पूछे के बा ?
- ए बाबा, हमरा घरे पूजा करवला के बाद सीधा में जवन रउआ रासन-पताई भा कपड़ा-लत्ता मिलल हा ऊ रउआ दोकानी प बेंचि देबि कि घरे ले जाइब?
- अरे बुड़्बक, हमरा के एकदम से चोन्हरे का बूझले बाड़े? हम औने-पौने दाम में ई सभ सामान दोकानी प बेंचि दीं आ फेनु जरूरत पड़ला प उहे बतुसवा महंगा कीनि के ले आई। ई सभ हमरा घरहीं के लोग हवेखी।
- ठीक कहत बानीं ए बाबा - 'गुड़ खाइब' गुलगुला से परहेज।


डॉ.दिनेश प्रसाद शर्मा
पता: मुहल्ला व डाकघर - अनाईठ (आरा) जिला भोजपुर (बिहार) पिन:802301 मो. 09934647898




साझा दर्द


वृद्धाश्रम में गए पत्रकार ने वहाँ बरामदे में बैठी एक बुजुर्ग औरत से पूछा, 'माँजी, आपके कितने बेटे हैं?
औरत बोली, 'न बेटा, न बेटी। मेरी तो कोई औलाद नहीं।'
पत्रकार बोला, 'आपको बेटा न होने का गम तो होगा। बेटा होता तो आज आप इस वृद्धाश्रम में न होकर अपने घर होती।
बुजुर्ग औरत ने उत्तर में थोड़ी दूर बैठी एक अन्य वृद्धा की ओर इशारा करते हुए कहा, 'वह बैठी मेरे से भी ज्यादा दुखी। उसके तीन बेटे हैं, उससे पूछ ले।'
पत्रकार उस दूसरी बुढ़िया की ओर जाने लगा तो पास ही बैठा एक वृद्ध बोल पड़ा, 'बेटा, इस आश्रम में हम जितने भी लोग हैं, उनमें से इस बहन को छोड़कर, बाकी सभी के दो से पाँच तक बेटे हैं, परंतु एक बात हम सब में साझी है....।'
'वह क्या?' पत्रकार ने उत्सुकता से पूछा ।
'वह यह कि हममें से किसी के बेटी नहीं है । बेटी होती तो शायद हम यहाँ .... वृद्ध ने दर्दभरी आवाज में कहा ...नहीं होते।'


-श्यामसुंदर अग्रवाल, कोलकाता-700007




फालतू


पिछले सात दिन से सारा घर अस्त-व्यस्त हो रहा था। चारों ओर सामान बिखरा पड़ा था। कहीं बँधे सामान के बण्डल रखे थे तो कहीं कुछ गठरियाँ । कहीं नाजुक सामान के पैकिट पलंग पर अति सुरक्षित रूप से रखे हुए थे । मकान-शिफ्ट करने का काम आसान नहीं होता विशेष रूप से जब बड़े मकान से छोटे मकान में जाना हो ।
डॉ. संजय बड़े सरकारी बंगले में रहते थे, जिसमें सुख-सुविधा के अतिरिक्त शान-शौकत का भी हर सामान था । कुछ जरूरत की चीजें तो कुछ दिखावटी सब कुछ समाया हुआ था। इनमें से कुछ सुविधाएँ तो सरकार की ओर से थीं, कुछ अर्जित की हुई थीं। पिछले महीने वे अपनी सेवा-अवधि पूरी कर चुके थे। उन्हें शानदार विदाई दी गई । इस विदाई के साथ ही उन्हें सरकारी सुविधाओं से भी विदा लेनी थी।
अपनी नौकरी के दौरान ही उन्होंने एक डी.डी.ए. का फ्लैट जुटा लिया था। अब वे उसी मकान में शिफ्ट करने जा रहे थे। सामान ज्यादा था और फ्लैट दो बेडरूम का था । पूरा महीना वे इसी उधेड़बुन में रहे कि क्या ले जाएँ और क्या छोड़ जाएँ। फालतू सामान उन्होंने बेच दिया था। कुछ अपने छोटे भाई के यहाँ भिजवा दिया था। शेष मित्रों मे बाँट दिया था।
दो कमरे दोनों बेटों ने स्वयं ही बाँट लिए । वे कहाँ रहेंगे इस बारे में उन्हें सोचना नहीं पड़ा। इसका फैसला दोनों बेटों ने ही कर दिया। बड़े ने कहा-'आप दोनों को अब कमरा नहीं मिल पायेगा। अतः अपना सामान उतना ही ले जाएँ। पिछला स्टोर आपके लिए है सात बाई सात का। वह भी तो एक कमरा है। थोड़ा छोटा है बस !
'पर उसमें तो दो चारपाई नहीं आ पातीं।’ पिता ने अचम्भित होते कहा।
जानता हूँ, आप रात को सोने के लिए लॉबी में फोल्डिंग बिछा लेना। स्टोर में एक दीवान रहेगा। माँ स्टोर में ही सो जायेंगी। इसका समाधान छोटे ने कर दिया।
और तुम्हारी दादी माँ? सूरी साहब के स्वर में अब चिन्ता मिश्रित भय था। वे आशंकित हो उठे, माँ पिछले तीस साल से उन्हीं के साथ रहती थीं।
दादी माँ ? अब उन्हें आप चाचू के यहाँ भेज दिजिए। उनके पास तो बड़ा मकान है। बड़े ने दलील दी।
डॉ. सूरी अवाक्। चेहरा उतर गया। उन्हें लगा उनकी हड्डियों को निचोड़ता एक तीर किसी ने उनके सीने में गाड़ दिया हो। वे माँ को जड़ सामान कैसे बनाएँ ? उनसे वे कैसे कह पायेंगे कि तुम भी अब....।


- डॉ. शकुन्तला कालरा
-एन.डी. 57, पीतमपुरा, दिल्ली-110044



कहानी

मूल-मंत्र (कहानी)

-विजय राज चौहान


झींगा शेर तालाब के किनारे काँस के झुंडों के बीच में अपने भूखे बच्चों और पत्नी के साथ बैठा सूरज की मीठी धूप में ऊँघ रहा था | इस समय उसकी आँखें बंद थी ओर वह अपने सुनहरे दिनों के सपनों में खोया हुआ था उसे अपनी जवानी के उन दिनों याद आ रही थी जब वह खूब शक्तिशाली था उन दिनों का भी क्या रंग था, क्या ताकत थी, शरीर की चुस्ती ओर फुरती के आगे क्या मजाल थी कि कोई शिकार हाथों से निकल जाये | अगर उसे दिन में दो तीन बार भी शिकार के पीछे दौड़ना पड़ता था तो वह तब भी नहीं थकता था| लेकिन अब उम्र का तकाजा था कि अब उसे एक शिकार मारने के लिए भी तालाब किनारे कई-कई घंटे इंतजार करना पड़ता था, ओर कभी तो पूरा दिन भी कोई शिकार नहीं मिलता, भूखों ही सो जाना पड़ता था | उसकी यह हालत बूढ़े हो जाने के कारण थी क्योंकि अब उसके शरीर की शक्ति अब क्षीण हो चुकी थी इसलिए वह अब तालाब के किनारे पानी पीने आए एक-आध कमजोर पशु को ही मार पता था ओर उसी से ही अपने परिवार की भूख को शांत करता था |लेकिन आज शाम होने को आयी, कोई शिकार दिखाई नहीं दिया|
झींगा शेर की माँद से कुछ दूर पर ही शेरू नाम का एक गीदड़ भी अपनी पत्नी रानी और अपने दो बच्चों के साथ एक बिल में रहता था | शेरू के परिवार का पेट भी काफी हद तक झींगा शेर के शिकार के ऊपर ही निर्भर करता था क्योंकि जब झींगा किसी शिकार की मार डालता था तो शेरू का परिवार भी बची झूठन को कई दिनों तक खाता था | लेकिन आज शेरू के परिवार का भी भूख के मारे बूरा हाल हुआ जा रहा था | फ़िर भी वह अपने परिवार के साथ किसी शुभ घड़ी के इंतजार में, झींगे के ऊपर नजरे गडाये बैठा रहता |
आखिर जब सूरज छितिज में छूपने जा रहा था उसी वक्त शुभ घड़ी आ पहुँची ओर एक दरियाई घोड़ों का झुंड तालाब किनारे आ पहुँचा | झुंड को देखते ही दोनों परिवारों में खुशी ही लहर दौड़ गई , झींगे ने भी झुंड को देखते ही अपनी स्थिति को संभाला और खड़ा होकर कमर को धनुष बनाते हुए अँगड़ाई ली | उसने हाथ पैरों को झटका और किसी पहलवान की तरह से आगे पीछे किया और मूल-मन्त्र करने के लिए अपनी पत्नी को पास बुलाया जिससे झींगे के शरीर में एक उतेजना पैदा हो गई | उसने अपनी पूछ को कमर पर मोड़ा ओर आंखे लाल की,
फिर उसने अपनी पत्नी से पूछा-
-"देखो तो जरा मेरी पूछ मुंड कर पीठ पर आ गई हैं या नही"
शेरनी ने कहा -" हां स्वामी आप तो प्रचंड योद्धा की तरह से लग रहे हो "
इसके बाद झींगे ने पूछा- -" मेरी आँखें कैसी लग रही हैं "
शेरनी ने कहा -" स्वामी आप की आँखें तो इस समय ऐसी लग रही हैं मनो कोई
ज्वालामुखी लावा उगल रहा हो "
झींगे ने इतना सुना तो वह पूर्ण रूप से उत्तेजित हो गया और उसने तूफान की गति से दौड़ कर एक ही झटके में एक कमजोर से दिखाई देने वाले दरियाई घोड़े को मार गिराया जिसे वह खींचकर अपने झुंड में ले आया | इसके बाद पूरे परिवार ने व्रत तोड़ा ओर खूब डट कर खाया ओर फिर पेट पर हाथ फिराते हुए अपनी माँद की तरफ़ चल पड़े | झींगा शेर ने जब से शिकार किया तब से ही शेरू गीदड़ का परिवार भी उन पर आँखें गडाये बैठा था, झींगे का परिवार पतल से उठ कर चला तो शेरू जूठी
पतल को साफ़ करने के लिए उसकी तरफ़ दोडा और वह भी अपने परिवार सहित अपनी भूख मिटाने में जुट गया |
परिवार के सभी सदस्य जूठन को खा रहैं थे लेकिन शेरू की पत्नी रानी के मन में सुबह से व्रत करते-करते कुछ प्रश्न जमा हो रहे थे, जिन्हें पूछने का वह मोका तलाश रही थी |
आख़िर उसने भोजन करते-करते शेरू से पूछा -
-"स्वामी आख़िर हम कब तक दूसरों का जूठा खाते रहेंगे, किया हम अपने लिए ख़ुद शिकार नहीं कर सकते? "
शेरू ने रानी के ये वाक्य सुने तो मुँह चबाते हुए बोला -
-"अरे जब तक मिलता हैं तब तक खाओ, आगे की आगे सोचेंगे "
रानी त्योंरिया चढ़ाते हुए बोली -" नहीं आगे न खायेंगे, तुम अभी तो जवान हो, झींगा बूढ़ा हो चुका हैं लेकिन अब भी शिकार करता हैं क्या तुम नहीं कर सकते "
रानी की इस बात पर शेरू चुप रहा, कुछ न बोला |
उधर रानी ने पेट भर खाया और बच्चों को लेकर अपने बिल में जा लेटी |
शेरू वही जूठन चाटता रहा लेकिन रानी फ़िर उसके साथ न बोली |
शेरू की जूठन ख़त्म हुई तो वह भी बिल की तरफ चला ,लेकिन उदास कदमों से |
उसे वास्तव में रानी ने सोचने के लिए मजबूर कर दिया था वह जाकर बिल में लेट रहा, उसे नींद नहीं आ रही थी, वह सोच रहा था आख़िर झींगा इतना बड़ा शिकार कैसे मार लेता है, ऐसी कोन सी शक्ति है उसके पास जो उसमें बूढ़ा होने पर भी इतना जोश और ताकत पैदा कर देती हैं |
शेरू इन्हीं विचारों में काफी देर तक उलझा रहा ओर यह सोच कर सोया की कल झींगे शेर की जासूसी करता हूँ और देखता हूँ की ऐसी कोन सी शक्ति हैं जो उसमें इतना जोश भर देती हैं|
इतना सोच कर शेरू गीदड़ निश्चित होकर सो गया |
अगले दिन शेरू जल्दी जाग गया, उसने बिल से बहार मुह निकल कर देखा तो अभी
काफी अँधेरा था, पाला पड़ने से काफी ठंड थी |
लेकिन उसने उसकी परवाह नहीं की और वह अपनी पत्नी-बच्चों के उठने से पहले ही झींगे शेर की माँद की तरफ चल दिया, जाकर एक काँस के झुंड के पीछे छिप कर बैठ गया |
झींगा शेर अभी जागा न था, कुछ देर बाद सूरज की मीठी धूप चारों ओर फैली तो झींगा अपनी मांद से बहार आया, उसने कमर को धनुष बनाते हुए अँगड़ाई तोड़ी और फिर जाकर धूप में बैठ गया | इसके बाद उसके बच्चे और शेरनी जागी वे भी मांद से बहार आये, धूप में बैठ कर उंघने लगे, झींगा अपनी उसी तलाश में लग गया कि कब शिकार आये - कब वह उसे मार कर अपने आज के भोजन का इंतजाम करे |
काँस के झुंड के पीछे छिपा शेरू झींगे शेर कि इस सारी दिनचर्या बड़े ध्यान से देख रहा था। इस समय वह झींगे के हर पैंतरे को बड़े ध्यान से सीख कर रहा था |
झींगा अपने परिवार के साथ धूप में बैठा था तो एक जंगली भैंसा पानी कि टोह में उधर से आ निकला, वह धीमे और टूटे क़दमों से चल रहा था देखने से ऐसा प्रतीत हो रहा था कि शायद वह बीमार था और बीमारी में अपनी प्यास बुझाने तालाब किनारे आया था |
आख़िर जब झींगे ने जंगली भैंसे को देखा तो उसे सुबह-सुबह पै-बारह होते नजर आये और वह भैंसे को देखकर खड़ा हो गया|
झींगे शेर के खड़े होते ही शेरू गीदड़ के भी कान खड़े हो गये, उसकी एक आँख शिकार पर लगी हुई थी तो दूसरी आँख झींगे कि हर हरकत को बारीकी से देखता रहा |
ज्यों ही भैंसा तालाब में पानी पीने के लिए घुसा तो झींगे शेर ने अपना मूल-मंत्र पढ़ा |
वह पास बैठी शेरनी से बोला -" देखो तो जरा मेरी पूछ मुंड कर पीठ पर आ गई हैं या नहीं "
शेरनी ने कहा -" हां स्वामी आप तो प्रचंड योद्धा की तरह से लग रहे हो "
इसके बाद झींगे ने पूछा--" मेरी आँखें कैसी लग रही हैं "
शेरनी ने कहा -" स्वामी आप की आँखें तो इस समय ऐसी लग रही हैं मनो कोई ज्वालामुखी लावा उगल रहा हो "
शेर ने इतना सुना तो वह पूर्ण रूप से उत्तेजित हो गया और इससे पहले कि भैंसा पानी पीकर अपनी प्यास बुझाता, झींगे शेर ने एक ही वार में तूफान की गति से आगे बढ़कर भैंसे को धराशाई कर दिया और उसे खींचकर अपने झुंड में ले आया | काँस के झुंड के पीछे छुपा शेरू गीदड़, झींगे की ये सारी हरकतें देख रहा था, उसने जब झींगे का मूल-मंत्र सुना तो खुशी से झूम उठा और खुशी को कारण जमीन में लोटपोट हो गया | उसने भी आज शक्ति के उस मूल-मन्त्र को पा लिया
था जिसे पढ़कर वह भी अधिक शक्तिशाली हो सकता था | वह धूल से उठा ओर खुशी से कुचले भरता हुआ अपने बिल में जा घुसा |
शेरू की पत्नी रानी अब तक जग चुकी थी उसने शेरू को इतना खुश होते देखा तो बोली -
"क्या बात हैं बड़े खुश नजर आ रहे हो,ऐसा सुबह-सुबह किया मिल गया जो तुम फूले नहीं समां रहे हो"
शेरू बच्चों के पास बैठते हुए टांग पर टांग रखकर बोला -
"तुम कहती थी ना में शिकार नही कर सकता ओर में डरपोक और कायर हूँ, तो तुम झूठ बोलती थी, तुम नहीं जानती मेरे अन्दर कितनी शक्ति हैं, मैं चाँहू तो अच्छे से अच्छे बलशाली को धूल चटा सकता हूँ |
रानी त्योंरिया चढ़ाते हुए बोली - " रहने दो कभी किसी चूहे का शिकार तो किया नही, कहते हो बलशाली को धूल चटा सकता हूँ "
शेरू रहस्यमय मुस्कान होठों पर लाते हुए बोला -" अरे तुम्हें क्या पता, जब मैं तुम्हें अपनी शक्ति दिखाऊंगा तब देखना दांतों तले उँगली दबा लोगी, तुम बस ऐसा कहना जैसा मैं कहता हूँ "|
रानी -"ठीक हैं कह दूंगी लेकिन कुछ कर के तो दिखाओ "|
इसके बाद शेरू का पूरा परिवार उठा और जाकर तालाब किनारे काँस के झुंड में छिपकर बैठ गया, और शेरू इस बात का जार करने लगा की कब कोई शिकार आये और वह उसे अपने मूल-मंत्र से धराशायी करे |
शेरू को अपने परिवार सहित काँस में छुपे-छुपे शाम हो गई थी | सूरज अब डूबने ही वाला था लेकिन शेरू को अब तक कोई ऐसा शिकार दिखाई नहीं दिया था जिस पर वह अपना मूल-मंत्र आजमा सके |
आखिर जब शाम होने को आयी तो दरयाई-घोड़ो का वही झुंड जो कल आया था तलाब किनारे पानी पीने आ पंहुचा | जिसे देखते ही शेरू गीदड़ के मुह में पानी भर आया और उसके पैरो में खुजली होने लगी और ज्यों ही घोड़ो का झुंड तालाब में पानी पीने घुसा तो शेरू खड़ा हो गया | उसने भी अपनी कमर को धनुष बनाते हुए अँगड़ाई तोड़ी और अपनी पत्नी रानी से मूल-मंत्र पढ़ते हुए बोला -"देखो तो जरा मेरी पूछ मुड़कर पीठ पर आ गई हे या नहीं " |
रानी -"हाँ स्वामी आप तो इस समय एक प्रकांड योद्धा की तरह लग रहे हो" |
शेरू आँखें निकलते हुए -"और मेरी आँखें तो देखो लाल हुई या नहीं " |
रानी -"हाँ स्वामी आपकी तो इस समय ऐसी लग रही हे मनो ज्वालामुखी लावा उगल रहा हो" |
शेरू ने इतना सुना तो वास्तव में उसे अपने अन्दर एक शक्ति सी जान पड़ी |
वह तेजी से काँस के झुंड के ऊपर से कूदते हुए किसी तूफान की तरह से एक दरियाई घोड़े पर कूद पड़ा |लेकिन ज्योंही शेरू ने घोड़े की पिछली टांग में अपने दांत गाड़ने चाहे तो घोड़े ने अपनी शक्तिशाली दुल्लती से शेरू को काँस के झुंडों के ऊपर से दर्जनों मीटर दूर फेक दिया, जिसके कारण जमीन पर पड़ते ही शेरू का मुंह जमीन में चार-पाँच अंगुल नीचे धस गया |
उसकी लाल ज्वालामुखी आँखें धूल मिट्टी के कारण सूखे कुए की तरह से रूँध गई और उनका लाल रंग भी पीला-पीला सा दिखाई देने लगा | इसके आलावा उसकी धनुष रूपी पूँछ भी टूटकर नीचे को मुड़ती हुई किसी पिटी भिखारिन की भांति दोनों टाँगों के बीच में छुप गई |
इतना सब होने के बाद शेरू अपनी टूटी टांग से खड़ा हुआ और किसी पैर बंधे ख़च्चर की भांति लंगड़ता हुआ अपने बिल की तरफ़ चल दिया |
शेरू की महेरिया रानी अपने बच्चों के साथ इस समय दूर से अपने स्वामी की इस वीरता को देख रही थी |
लेकिन जब उसने स्वामी को स्वादिष्ट शिकार की जगह जंगली धूल खाते देखा तो उसे बड़ा दुःख हुआ और वह खबर लेने के लिए अपने स्वामी की तरफ़ दोड़ी | एक बार रानी डर गई थी लेकिन अगले ही पल शेरू की हालत पर रानी हँस पड़ी उसने
शेरू की इतनी बुरी हालत आज से पहले कभी नहीं देखी थी | शेरू ने जब पत्नी के द्वारा उपहास होते देखा तो वह जल उठा और वह रानी हो जलती आँखों से देखते हुए अपने बिल की दीवार के पास बैठ कर अपनी टांग के दर्द को जीब से चाटने लगा | लेकिन रानी को अब भी अपने स्वामी की इस मूर्खता भरी वीरता पर हँसी आ रही थी और वह हँसी के कारण मिट्टी में लोट-पोट थी |


-विजय राज चौहान
Welhamboy's school
Dehradun-241008
PH-No-09412900005

http://hindibharat.wordpress.com/
http://groups.google.com/group/hindi-bharat



संपादकीय  पत्रिका प्राप्ती  लघुकथा  कहानी
कविता :-
हर तरफ आतंक  अखंड ये देश हमारा
स्वतंत्रता की ६१ वीं वर्षगाँठ
ॐची सोच   ऊँगली पकड़ कर वह बड़ी हुई
ऐ हिंद के युवा  संघर्ष   महिला शक्ति  आह्वान
कुछ-कुछ होता है   माँ    जीवन अल्प विराम
एशियाटिक सोसाइटी में राजस्थान - लेखक अम्बू शर्मा
वृद्धाश्रम-संस्कृति पनप रही है। - डॉ.गीता गुप्ता
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एशियाटिक सोसाइटी में राजस्थान - लेखक अम्बू शर्मा


एशियाटिक सोसाइटीः- बंगाल में श्रीरामपुर-ग्राम में ईसाई-मिशनरीज ने, जॉब चार्नोक द्वारा 1698 में कोलकाता बसाने से पूर्व ही, चर्च बना लिया था; कॉलेज स्थापित कर लिया था तथा निजी मुद्रणालय भी चलाते थे। उसी से उन्होंने बीकानेरी-बोली (राजस्थानी-भाषा) में हिब्रू-भाषा की बाइबिल के टिप्पणीकार सेण्ट ल्यूक की गोस्पेल का अनुवाद हमारी देव- नागरी-लिपि में 1736 में गद्य में छाप लिया था। इसी कारण, एशियाटिक सोसाइटी ने भी अपने स्थापना-वर्ष 1784 से ही, 122 भाषाओं के निजी भाषा-विभागों में, राजस्थानी-विभाग भी (हिन्दी-विभाग से विलग) स्थापित कर लिया था। सिन्धी, डोगरी, कोंकणी, नेपाली, मणिपुरी, बोडो, सन्थाली, मैथिली इत्यादि अत्यन्त न्यून जन-संख्यावाली भाषाओं को तो, 8वीं सूची में जोड़ लिया गया है और हम 10 करोड़ राजस्थानियों की मातृ-भाषा को नहीं ।
राजस्थानियों की सक्रियताः- 19वीं शताब्दी के अन्तिम दशक (1891-1900) में कोलकाता के कुछ तरुण राजस्थानी एशियाटिक सोसाइटी के राजस्थानी-विभाग में रुचि लेने लगे थे; जैसेः-घनश्यामदासजी बिड़ला, प्रभुदयालजी हिम्मतसिंहका, भूरामलजी अग्रवाल इत्यादि। उन्हीं के प्रयास से, सोसाइटी के राजस्थानी-पाण्डुलिपि-विभाग में, जोधपुर से आए पं0 राम- कर्णजी आसोपा को 1894 में नियुक्ति मिली। तब सोसाइटी सर जार्ज गियर्सन के प्रधान-संपादकत्व में पृथ्वीराज-रासो का मुद्रण करने लगी थी। पृथ्वीराज रासो का मुद्रण, अधूरा ही, स्थगित कर दिया। आसोपाजी की विद्वत्ता से प्रभावित होकर, कोलकाता विश्व-विद्यालय में, सर आशुतोष मुखर्जी ने, रामकरणजी को ही इंचार्ज बना दिया जहाँ पण्डितजी ने कक्षा-प्रथम से लेकर पंचम तक की राजस्थानी-पाठ्य-पुस्तकें, व्याकरण एवं शब्द-कोश का निर्माण किया।
हरप्रसादजी शास्त्रीः- 1904 में एशियाटिक सोसाइटी ने, राजस्थानी भाषा विभाग, हरप्रसादजी शास्त्री को सौंपा। उन्होंने राजस्थान की यात्रा की; शताधिक पाण्डुलिपियाँ लाए और सूची-पत्र (विवरणात्मक) अंग्रेजी- भाषा में प्रकाशित हुआ जिसका हिन्दी अनुवाद, पश्चात्-क्रम में, जोधपुर की त्रैमासिक शोध पत्रिका ‘परम्परा’ में, विशेषांक स्वरूप में प्रकाशित हुआ।
लुईज पियाओ टेस्सीटोरीः-यूरोप के इटली-देश के उड़ीपी-ग्राम के एक तेजस्वी तरुण को 1908 में फ्रांसीसी-भाषा में रामचरित-मानस एवं वाल्मीकीय रामायण के तुलनात्मक
अध्ययन पर डाक्टरेट मिली। भारत-भर में डाक्टरेट की डिग्री का यह श्रीगणेश था। उन्हें भी पूर्वी-विश्व की विभिन्न सांस्कृतिक भाषाओं के गहन अध्ययन में उसी भाँति रुचि थी जिस भाँति, एशियाटिक सोसाइटी के संस्थापक एवं भारत के सर्वोच्च जज, विलियम जोन्स को थी। विलियम जोन्स की मृत्यु भी भाषा सीखने की थकान से ही हुई क्यों कि कलकत्ता-निवास में वे प्रति दिवस, न्यूनतम पाँच भाषाओं के विद्वान गुरुओं से, अनेक घण्टों तक, भाषाएँ ही सीखते रहते थे। लुईज पियाओ टेस्सीटोरी की मृत्यु भी राजस्थानी-भाषाओं की पाण्डुलिपियाँ संग्रह की रुचि ने ही, बीकानेरी के निकट चारणी-ढाणी में, लू से ग्रसित हुए और 4/5 मास पश्चात् सन् 1919 में, मात्र 31 वर्ष की अवस्था में, 22 नवम्बर को उनका निधन, बीकानेर में हुआ जहाँ उनकी विशाल समाधि एवं उसमें स्फटिक प्रतिमा, कानपुर में बड़ा व्यवसाय करनेवाले बीकानेरी सेठ हजारीमलजी बाँठिया द्वारा विनिर्मित है और प्रत्येक वर्ष वहाँ उस पुण्य-तिथि पर मायड-भाषा प्रेमियों का विराट मेला आयोजित होता है जिसमें विश्व-भर के सहस्रों राजस्थानी-भाषा-प्रेमी, कत्र्तव्यपूर्वक नियमित सम्मिलित होते हैं। बाँठियाजी ने 1988 में, सपत्नीक, 8 दिवसों तक, टेस्सीटोरीजी के जन्म-ग्राम उडीपी (इटली) में व्यतीत किए जहाँ वे, जोधपुर पोलो-2 के ठिकाने पर रहने वाले परम विद्वान डॉ0 शक्तिदानजी कविया को भी, साथ में ले गए थे।
एशियाटिक सोसाइटी में टेस्सीटोरीजीः- 1912 में एशियाटिक सोसाइटी ने उन्हें कोेलकाता बुलाया। 500 मासिक वेतन दिया रहने को विशाल भवन एवं घोड़ा-गाड़ी का वाहन दिया तथा 5/7 नौकर-दइया भी दिए। टेस्सीटोरीजी का सोसाइटी में कार्य था- राजस्थानी-पाण्डुलिपियों का अंग्रेजी-भाषा में Descriptive catalogue बनाना। वह तो छपा ही किन्तु 4/5 वर्ष यहीं कार्य किया तब राजस्थानी-भाषा की व्याकरण लिखी और 2/3 महत्त्वपूर्ण राजस्थानी-ग्रन्थों का वैसा ही विशाल सुसम्पादन किया जैसा हिन्दी में रामचन्द्रजी शुक्ल ने तुलसीदासजी तथा सूरदासजी के ग्रन्थों का सुसम्पादन कर, उन्हें धार्मिक-क्षेत्र से साहित्य-क्षेत्र में प्रस्थापित ही नहीं, किया अपितु 1929 में छपे अपने ‘हिन्दी-साहित्य का इतिहास’ में इन दोनों धार्मिक महात्माओं को हिन्दी-साहित्याकाश में चाँद-सूरज ही बना दिया।
टेस्सीटोरीजी राजस्थान में- फिर तो टेस्सीटोरीजी को राजस्थानी-भाषा की साहित्यिक समृद्धि के प्रति इतनी अधिक श्रद्धा जागी कि वे संस्कृत एवं लेटिन-भाषा को छोड़कर, विश्व की सभी भाषाओं की अपेक्षा, राजस्थानी को अधिक श्रेष्ठ साहित्यिक भाषा मानने लगे और अंग्रेजी-भाषा का स्तर भी, उनकी दृष्टि में राजस्थानी-भाषा की साहित्यिक गरिमा से, अत्यन्त निम्न रह गया।
अन्तिम चार वर्षों में, टेस्सीटोरीजी ने सहस्रो पाण्डुलियाँ राजस्थान के नगर एवं ढ़ाणियों में, घूम-घूम कर जोड़ी एवं कोलकाता की एशियाटिक सोसाइटी में भिजवाते रहे। वहीं राजस्थान की पवित्र भूमि में ही, पाण्डुलिपियों की शोध में, प्राणों की आहुति भी दे दी। धन्य है मात्र 31 वर्ष की अवस्था में, टेस्सीटोरीजी का, राजस्थानी-भाषा की सेवा में बलिदान होकर, अजर-अमर हो जाना।
विपिन-बिहारीजी त्रिवेदीः- सोसाइटी में राजस्थान से, पाण्डुलिपियों का आना, आज तक भी है क्यों कि जी.डी.बिड़ला एवं कृष्णकुमारजी बिड़ला ने, इसी कार्य हेतु, सोसाइटी को प्रभूत धन-राशि दे रखी है, उनसे, Descriptive Catalogue (अंग्रेजी में) बनाने का कार्य, 1957 में बनारस से, हिन्दी-पढ़ने आए, कोलकाता- युनिवर्सिटी के छात्र, विपिनबिहारीजी त्रिवेदी ने भी सँभाला। उन्होंने 114 पाण्डुलिपियाँ पढ़ी। पुस्तक भी छपी; किन्तु प्रायः आधी प्रवृष्टियाँ अशुद्ध रह गई क्यों कि वे, राजस्थान के विभिन्न सम्भागों की भिन्न-भिन्न वर्णमाला के 8/10 अक्षर ही नहीं समझ पाए। तो भी उन्हें व्यक्तिगत लाभ हुआ कि ग्रियर्सन के अधूरे ‘‘पृथ्वीराज-रासो की प्रामाणिकता’’ पर गौरीशंकर हीराचन्द ओझा की विरोध-सामग्री उन्हें, सोसाइटी में सहजतया ही उपलब्ध हो गई जिसकी सहायता से उन्होंने, ‘डाक्टरेट’ की डिग्री प्राप्त की। एक उदाहरण:- विपिनबिहारीजी के सूचीपत्र में पुस्तक ‘बिदर-बतीसी’ है। उन्होंने ‘बिदर’ का अर्थ ‘बहादुर’ किया और सभी बत्तीसों छन्द की टिप्पणी, वीर सैनिक के पक्ष में, प्रशंसापूर्ण कर दी जबकि ‘बिदर’ का अर्थ ‘कायर’ होता है और ये सभी बत्तीसों छन्द, कायर की विगर्हणा में हैं, न कि प्रशंसा में।
1957 से 11 वर्षों तक सोसाइटी में Rajasthani Catalogue का पद उसी भाँति रिक्त रहा जिस भाँति लुईज पियाओ टेस्सीटोरी के पश्चात् 40 वर्षों तक रिक्त रहा था क्योंकि 1957 से पूर्व, साक्षात्कार में, एक भी विद्वान, राजस्थानी-पाण्डुलिपि पढ़ने में सफल नहीं हुआ था अतः 1968 नवम्बर में हुए 40 विद्वानों के साक्षात्कार में मेरा चयन कर लिया गया।
साक्षात्कार-विधि, यों रहती थी कि चारों निर्णायक गण, विलग स्थानों पर, 100 वर्षों के अन्तर से, चार पाण्डुलिपियाँ खोल कर रखते थे। उस निश्चित पृष्ठ से एक निश्चित प्रघट्टक (अर्थात 5/7 पंक्तियाँ) वे चिन्हित करके, उनका अनुवाद स्वीय-भाषा (प्रायः बँगला या अंग्रेजी) में लिख कर रखते थे। हमें भी वे ही पंक्तियाँ पढ़ाकर अंग्रेजी में उनका अर्थ, मौखिक ही सुनते थे। बस मैं ही राजस्थानी होने के कारण तथा झुंझनूं पुस्तकालय में लाइब्रेरियन की नौकरी करने के कारण, राजस्थानी पाण्डुलिपियों को भी थोड़ी बहुत उलट-पुलट कर देख चुका था। दूसरे, कोलकाता में 1962 में आते ही तीन वर्षों में, पद्मावतीजी झुनझुनूंवाला के पास करपात्रीजी के प्रवचनों को ग्रुण्डिंग (जर्मन) टेप-रिकार्डर से सुन कर कागजों पर उतारने से, थकान मिटाने हेतु, उनके पुस्तक-संग्रह में रखी राजस्थानी पाण्डुलिपियों को पलटता रहता था क्योंकि वे मीराबाई के साहित्य पर
आधिकारिक शोधकर्ता मानी गई है। पद्मावतीजी एशियाटिक सोसाइटी की सदस्या भी थीं सो उनके साथ; सोसाइटी में इन राजस्थानी पाण्डुलिपियों के दर्शन कर चुका था।
पाण्डुलिपियाँ पढ़ने में कठिनाईः- हम खड़ी-बोली हिन्दी में, देवनागरी-लिपि की शिक्षा लेने वाले व्यक्ति, राजस्थानी-भाषा की पुरानी पाण्डुलिपियाँ पढ़ने में, प्रारम्भ में अत्यन्त दुविधा अनुभव करेंगे क्योंकि तब, हाथ से बने कागजों एवं स्याही, साँठी (लेखनी इत्यादि सामग्रियों में मितव्ययिता हेतु, पृष्ठ के चारों ओर कहीं भी एक-डेढ इंच स्थान, रिक्त नहीं छोड़ा जाता था (2) सभी पुस्तकें, प्रायः डिंगळ-शैली के अपरिचित छन्दों में (अर्थात्) कविता में ही लिखी जाती थीं। गद्य तो पारस्परिक पत्राचार में अथवा राजकीय अध्यादेशों अथवा पट्टे-परवानों, शिला-लेखों, प्रमाण-पत्रों व्यापारिक बहियों, विरोध-पत्रों, स्वीकृति-पत्रों, जन्म-पत्रों, पंचागों, इतिहास-ग्रन्थों में (यदाकदा) आदि में ही प्रयोग होता था। राजस्थान में सभी छोटे-बड़े राजा महाराजाओं के आश्रय में ही श्रेष्ठ साहित्यिक काव्य ग्रन्थों की रचना, निरन्तर होती थी। वे लाखों की संख्या में आज भी भूतपूर्वक राजाओं के गोदामों में सड़ी-गली अवस्था में प्रयत्नपूर्वक प्राप्त हैं और लाखों पाण्डुलिपियाँ काल-कवलित भी हो चुकी हैं (3) कहीं भी विरामादि-चिन्हों का प्रयोग नहीं होता था अतः एक ही पंक्ति में कविता की 2.5 पंक्ति भी हो सकती थी; साढ़े-तीन भी और साढ़े चार पंक्तियाँ भी (4) वाक्यों में, शब्दों के मध्य में रिक्त स्थान नहीं होता सो आज की खड़ीबोली हिन्दी में छपा समाचार-पत्र भी हम नहीं पढ़ पाएँगे यदि शब्दों मे मध्य का रिक्त स्थान, लुप्त कर दिया जाए। वैसी अवस्था में प्रत्येक वर्ण, लम्बी रेलगाड़ी तो बन जाएंगे किन्तु डिब्बों की लम्बाई नहीं जान पाएंगे। जैसेः-उसका मुख चन्द्रमा के समान सुन्दर है को पाण्डुलिपियों में लिखा रहता है और हम वर्ण भी नहीं जानते एवं डिंगल के छन्द भी नहीं; तो पढ़ेंगेः-


उसका मुखचन् द्रमाके समा नसुन्द रहै


इसी कारण, मेरे साक्षात्कार-काल में अन्य 39 विद्वान तो शून्य प्रतिशत अंक प्राप्त कर सके और मैं, अल्प-मात्रा में, पूर्वानुभव के बल पर भी मात्र 10 प्रतिशत अंक ही ला सका था। (5) चयन के पश्चात् मुझे भी पाण्डुलिपि, संभालकर पढ़ने का प्रशिक्षण, थोड़े-दिवसों तक तो दिया ही गया कि (क) पृष्ठ पुराना है तो अंगुलियों की असावधान छुअन से, वह तत्काल ही चूर्ण बन जाएगा (ख) मुँह मे श्वास से उस स्थान की स्याही उड़ जाएगी (ग) पृष्ठ को अधिक सूँघते रहेंगे तो हमारे श्वास में पुराने पृष्ठों के कीटाणु (विष) खिंच कर, रक्त में मिस जाएंगे (घ) सावधानी से भी, पृष्ठ अंगुलियों में पकड़ने में नहीं आए तो उस पुस्तक को Cellophene Paper (Trasparent paper) चिपकाने वाले विभाग में भेज देना चाहिए। फिर उन्हें चिमटी से पकड़कर उलटने में सुविधा होगी और पढ़ते समय भी उतनी कठिनाई नहीं रहेगी (ङ) लिपि एवं डिंगल भाषा तथा काव्य के छन्द समझने में तत्परता नहीं बरतनी चाहिए क्योंकि उन पाण्डुलिपियों में, आधुनिक अंग्रेजी विद्यालयों में, हिन्दी-भाषा के माध्यम से भी विद्यार्जन करने वाले सज्जन को सभी कुछ अपरिचित है और क्रमशः कई मास व्यतीत होते-होते ही, पठन सम्भव है सो 122 भाषाओं के इस पाण्डुलिपि विभाग में, कोई भी किसी का गुरु या मार्ग-दर्शन करने वाला नहीं है क्यों कि वे अपनी-अपनी भाषाओं की पाण्डुलिपियाँ ही पढ़ने और समझने में सफलता प्राप्त कर लेंगे-वही पर्याप्त है।
शुरू में तीन वर्ष में 522 ग्रन्थ पढ़े और । A descriptive catalogue of Rajasthani Manuscript, Part-II तैयार कर दिया था 1972 में जिसे शान्तिनिकेतन के हिन्दी-भवनाध्यक्ष रामसिंहजी तोमर ने प्रति तीसरे मास आकर जाँचा और प्रकाशन हेतु ok कर दिया किन्तु सोसाइटी की सुस्ती के कारण यह 2003 जनवरी में छपा 606 पृष्ठों में 1200 मूल्य में जो तभी इण्टरनैट पर भी आ गया है-
http://www.vedamsbooks.com/no30463htm.
किन्तु अब 5 वर्षों के पश्चात् दिल्ली की एक अन्य प्रकाशन संस्था ने भी मूल्य बढ़ाकर, अन्य इण्टरनैट की संख्या भी प्रदान की है जो इसे 1200/- के स्थान पर, 1800/- रुपयों में विक्रय कर रही है। इस सूचीपत्र को मेरी हस्तलिपि में, दो बड़े रजिस्टरों में, 1976 में जोधपुर विश्वविद्यालय के राजस्थानी विभागाध्यक्ष डॉ0 कल्याणसिंहजी शेखावत ने, पूरे दो दिन देखा और प्रशंसित किया। कल्याणसिंहजी 8/1/05 को पुनः कोलकाता आए तो मुझसे बोले ‘‘चलिए एशियाटिक सोसाइटी से वह आपका अंग्रेजी सूचीपत्र क्रय करें।’’


परिचय: जन्म: झुंझनूं 1/11/1934 (कार्तिक कृष्ण-पक्ष दशमी, 1991) पिता: पण्डित प्रह्लादरायजी महमिया, शिक्षा: एम.ए.हिन्दी, साहित्य-रत्न, बेसिक शिक्षा-प्रशिक्षित। बी.ए.भूगोल, उदयपुर, एम.ए. डिंगळ (राजस्थानी) 76% अंक।
वृत्ति: राजस्थान में 1954-62 राजकीय अध्यापक, कोलकाता में 1963-99 ज्ञानभारती-विद्यापीठ में अध्यापन।सम्पादन: तीन पत्रिकाएं राजस्थान में।
कोलकाता में सम्पादन:-
1. 1962 से राजस्थान-समाज (पाक्षिक) 2. 1963 से राजस्थान-स्टैण्डर्ड (साप्ताहिक) 3. लाडेसर (पाक्षिक) 1967 में। 4. 1971 से म्हारो देस (पाक्षिक) 5. 1971 में सरवर (पाक्षिक) 6. 1972 से अब तक निजी पत्रिका नैणसी (मासिक)
अम्बू-रामायण का लेखन प्रारम्भ 1947 में। 1949 तक, प्रारम्भ की 5000 पंक्तियाँ (दोहा-चैपाई) लिखी गई । ये पंक्तियाँ पुस्तक रूप में प्रथम संस्करण 1979 में झुंझनूं में छपीं। दूसरा संस्करण राम नवमी 1985 को, भारतीय भाषा परिषद कोलकाता में लोकार्पित हुआ । एक ही जिल्द में सम्पूर्ण रामायण, श्री प्रदीप ढेडिया की प्रेस में 1997 में झुंझनूं प्रगति संघ ने छपवाई। इसमें 22000 पंक्तियाँ तथा 837 पृष्ठ हैं ।
सम्मानः- झुंझनूं प्रगति संघ द्वारा, 14 अगस्त 1994 को ज्ञानमंच में। ‘अर्चना’ द्वारा 6 नवम्बर 2005 को रोटरी-क्लब में। कानपुर के हजारीमलजी बाँठिया द्वारा कोलकाता के कला-मन्दिर (तलकक्ष) में 23 जनवरी 2005 को। हनुमानगढ़ के हरिमोहनजी सारस्वत द्वारा 13/12/05 को सम्मान-सामग्री कोलकाता आई। ‘पारिजात’ की रजत-जयन्ती पर सम्मान, भारतीय भाषा-परिषद में 12/5/06 को जलज भादुड़ी द्वारा । रेडियो एवं टीवी परः- तीस वर्षों तक कहानियाँ, गीत, कविताएँ, वार्ताएँ, वार्तालाप आदि के प्रसारण में अकेले एवं सामूहिक रूप में भी सम्मिलित। विश्वम्भरजी नेवर ने ताजा-टीवी पर ‘सागर-मन्थन’ में प्रस्तुत किया।
मानद डॉक्टरेटः-‘राजस्थानी विकास-मंच जालौर ने मानद डी.आर.लिट् उपाधि दी।


- अम्बू शर्मा

सम्पर्क: 205, एस.के.देव मार्ग "श्रीभूमि", कोलकाता-700048
फोन: (033) 2534 2937, 2521 1052














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संपादकीय  पत्रिका प्राप्ती  लघुकथा  कहानी
कविता :-
हर तरफ आतंक  अखंड ये देश हमारा
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एशियाटिक सोसाइटी में राजस्थान - लेखक अम्बू शर्मा
वृद्धाश्रम-संस्कृति पनप रही है। - डॉ.गीता गुप्ता
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वृद्धाश्रम-संस्कृति पनप रही है। - डॉ.गीता गुप्ता


विगत दस-पन्द्रह वर्षों में समाज में तेंजी से परिवर्तन हुए हैं। संयुक्त परिवार टूट रहे है। एकल परिवार की परम्परा विकसित हो रही है। महानगरों में ही नहीं, छोटे शहरों-कसबों और गाँवों में भी परिवार बिखर रहे हैं। एक समय था । जब घर छोटे-छोटे हुआ करते थे, लेकिन उनमें पाँच-पाँच पीढ़ियाँ समा जाती थीं। अब भौतिक समृद्धि ने घर के स्थान पर विशाल अट्टालिकाएँ खड़ी कर दीं, किन्तु परिवार ‘हम दो-हमारे दो’ या ‘हम दो-हमारे एक’ में ही सिमटकर रह गये ।
भूमण्डलीकरण के इस दौर में देशों के बीच तो दूरियाँ कम हुईं परन्तु आत्मीय सम्बन्धों के बीच बड़ी-बड़ी खाइयाँ निर्मित हो गयीं । सम्बन्ध महज सम्बोधनों तक सीमित होकर रह गये। वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना दूर-दूर तक कहीं दिखाई नहीं देती। आंखिर इन परिस्थितियों के लिए कौन दोषी है ।
प्रतिस्पर्धा के वर्तमान युग में शिक्षा और जीविकोपार्जन के लिए बच्चे घर से दूर जा रहे हैं। यह स्वाभाविक है, किन्तु वे अपने संवेदनशून्य, संस्कारहीन और आत्मकेन्द्रित स्वभाव का परिचय दे रहे हैं, यह गम्भीर चिंता का विषय है। संयुक्त परिवार में जहाँ एकता, सौहार्द, सहकारिता, सहिष्णुता, संवेदनशीलता आदि मानवीय गुण सहज ही बच्चों में विकसित हो जाते थे, वहीं राग-द्वेष, मनो-मालिन्य, भेदभाव आदि के लिए कोई स्थान नहीं होता था, क्योंकि घर के बुजुर्ग कलह-क्लेश को दूर कर तत्काल मेल मिलाप करा देते थे । लेकिन आज बच्चे-युवा, सभी एकाकीपन की पीड़ा झेलने के लिए अभिशप्त हैं। एकल परिवार में एक या दो ही बच्चे होते हैं, जिन्हें कुछ भी मिल-बाँटकर जीने-खाने की आदत नहीं रहती । ऐसे में उनका दायरा सीमित होता चला जाता है ।
अब पैतृक व्यवसाय पीढ़ी-दर-पीढ़ी नहीं अपनाये जाते । बच्चे अपनी रूचि से शिक्षा ग्रहण कर व्यवसाय चुनना पसन्द करते हैं इसलिए वे घर से दूर अपना एक स्वतन्त्र संसार बसा लेते हैं, जिसमें रक्त-सम्बन्धों, इष्ट-मित्रों या आत्मीय जन तक का प्रवेश निषिद्ध है । उनके लिए धन-दौलत ही उनका इष्ट है । वे अधिकाधिक भौतिक ऐश्वर्य के स्वामी बनना चाहते हैं । उनके जीवन में भावनाओं का कोई स्थान नहीं है ।
परिवार टूटने का सबसे अधिक खामियांजा बच्चों को भुगतना पड़ा है। वे मानवीय सम्बन्धों की ऊष्मा और मिठास से वंचित हो गये। संयुक्त परिवार में सहज ही उनमें मानवीय गुणों का विकास हो जाता था, और माता-पिता को अतिरिक्त श्रम नहीं करना पड़ता था। लेकिन अब उनमें व्यक्तित्व-विकास हेतु आवश्यक मानवीय गुणों के लिए प्रशिक्षण-केन्द्रों की मदद ली जा रही है। दादा-दादी, नाना-नानी, मामा-मामी, चाचा-चाची आदि रिश्तें बच्चों के लिए अपरिचित हो गये हैं, क्योंकि अवकाश के दिनों में अब उन्हें विभिन्न कलाओं का प्रशिक्षण दिलवाना माता-पिता की दृष्टि में अधिक महत्वपूर्ण है, ताकि बच्चे कम उर्म में कोई कीर्तिमान रच सकें।
घर में बुजूर्गों की उपस्थिति जहाँ युवाओं के आचरण को मर्यादित रखती थी वहीं अब उनकी स्वच्छन्द जीवन-शैली में अनेक बुराईयों ने स्थान पा लिया है। धूम्रपान, मदिरा-सेवन, अनैतिक सम्बन्ध जैसी बुराइयों से जहाँ बड़ों की उपस्थिति बचाती थी, वहीं परिवार की प्रतिष्ठा का दायित्व बोध भी युवाओं को पथ-भ्रष्ट होने से रोकता था ।
संयुक्त परिवार का एक लाभ यह भी था कि शारीरिक-मानसिक या आर्थिक रूप से दुर्बल सदस्य का जीवन भी अच्छी तरह कट जाता था और किसी को भार अनुभव नहीं होता था, परन्तु आज समृद्धि के बावजूद परिजन उपेक्षा का शिकार होते हैं। पहले संयुक्त परिवार टूटे, फिर व्यक्ति के स्वार्थ ने उसे स्नेह के बन्धनों को तोड़कर आत्मकेन्द्रित होकर जीना सिखाया, फिर इसी स्वार्थ और भौतिक आकर्षणों ने उसे नितान्त अकेला कर दिया । यही कारण है कि एकल परिवार भी सुखमय जीवन का आधार नहीं है ।
यदि कहा जाय कि परिवार नामक संस्था में युवाओं की आस्था कम हो रही है तो अतिशयोक्ति न होगी। उनके जीवन में बुजुर्ग हाशिये पर जा चुके हैं। माता-पिता का हस्तक्षेप उन्हें स्वीकार नहीं और भौतिकता की चकाचैंध में वे इस कदर अंधे हो गये हैं कि मर्यादित जीवन जीना उन्हें पसन्द नहीं, फिर परिणाम क्या होगा ? तिरस्कृत, उपेक्षित बुजुर्ग वृद्धाश्रम में आश्रम लेने के लिए विवश हैं। भारत जैसे विशाल देश में वृद्धाश्रम-संस्कृति पनप रही है। माता-पिता अपनी ही सन्तान की उपेक्षा के शिकार हैं, क्योंकि उन्होंने बच्चों को जीवन-मूल्यों की शिक्षा नहीं दी। अपने संस्कृतिक मूल्य परम्पराएँ, आचार-विचार, मर्यादा, आदर्श आदि भुलाकर वे स्वयं भी आधुनिकता की अन्धी दौड़ में शामिल हो गये, ऐसे में उन्हें दुष्परिणाम तो भुगतना ही होगा।
तमाम स्थितियों के लिए सिर्फ युवा पीढ़ी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता । आज अभिभावकों को अपने बच्चों से मित्रवत् व्यवहार करते हुए उन्हें पारिवारिक मूल्यों से अवगत कराने की आवश्यकता है। स्वयं सदाचार का आदर्श प्रस्तुत करना होगा, ताकि वे आपका अनुसरण करें। धैर्य एवं शान्तिपूर्वक उन्हें आधुनिक मिथ्याडम्बरों और पश्चिम की लहर के दुष्परिणामों का हवाला देते हुए अपनी जड़ों से जोड़े रखने का अथक प्रयास करना होगा। तभी परिवार की अवधारणा बच पाएगी और बुजुर्ग सुरक्षित व सम्मानित जीवन जी सकेंगे।
ऐसे में, जबकि आधुनिक युवा परिवार नामक संस्था में दिलचस्पी नहीं रखते, सन्तानोत्पत्ति के लिए विवाह करके घर नहीं बसाना चाहते, बल्कि स्त्री मित्र के साथ जब तक निभे-तभी तक रहना चाहते हैं, स्पष्ट है कि उन्हें सही मार्गदर्शन की नितान्त आवश्यकता है। जीवन में धन-सम्पदा और भौतिक समृद्धि सर्वाधिक महत्वपूर्ण नहीं है । जीवन का सच्चा सुख अपने सांस्कृतिक मूल्यों के संरक्षण, पारम्परिक मर्यादाओं के अनुशीलन और सदाचार में ही निहित है। भारतीय संस्कृति की यह एक ऐसी विशेषता है, जिससे प्रत्येक युवा को परिचित कराया जाना चाहिए ताकि वह सही जीवन-मूल्य को समझ सके और अपने लक्ष्य को पहचान सके। यदि बचपन से बीज रूप में संस्कृति के मूल्यों ने उसके हृदय में स्थान पा लिया तो ‘परिवार’ के अस्तित्व पर मंडराते संकट के बादल अवश्य छंट जाएँगे।













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संपादकीय  पत्रिका प्राप्ती  लघुकथा  कहानी
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हर तरफ आतंक  अखंड ये देश हमारा
स्वतंत्रता की ६१ वीं वर्षगाँठ
ॐची सोच   ऊँगली पकड़ कर वह बड़ी हुई
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वृद्धाश्रम-संस्कृति पनप रही है। - डॉ.गीता गुप्ता
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हर तरफ आतंक  अखंड ये देश हमारा
स्वतंत्रता की ६१ वीं वर्षगाँठ
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ऐ हिंद के युवा  संघर्ष   महिला शक्ति  आह्वान
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एशियाटिक सोसाइटी में राजस्थान - लेखक अम्बू शर्मा
वृद्धाश्रम-संस्कृति पनप रही है। - डॉ.गीता गुप्ता
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संपादकीय  पत्रिका प्राप्ती
लघुकथा  कहानी




हर तरफ आतंक



हर तरफ आतंक का अधिकार है
हर तरफ फैला भ्रष्टाचार है
इस हालत का कौन जिम्मेदार है
देश को जला रहे,उसके पहरेदार है

गोद में खेले हो जिस माँ के
क्यों तुम आज उसको भूल गए
किसने बहकाया है तुम्हे इस तरह
आज क्यों उसके प्रतिकूल गए

रहनुमा है आज जो तुम्हारे
तुम्हारा ही सर्वनाश कर रहे है
फसांकर कर दलदलो में तुम्हे
आसमां पर वो उड़ रहे है

आरक्षित हो इस देश में तुम
किस आरक्षण के लिए हाहाकार है
देश को जला रहे,उसके पहरेदार है

देश के हो सैनिक तुम
फिर मांग रहे क्यूँ संरक्षण तुम
प्रतिभा क्या नहीं बेटो में तुम्हारे
किसके लिए मांग रहे आरक्षण तुम

आँखे खोलो और जरा देखो तो
बेटो में तुम्हारे कितना दम है
बिना आरक्षण के ही आज
शिखर तक पहुंचे कदम है

आरक्षण नहीं सफलता की सीढ़ी
श्रम और लगन ही इसका सार है
देश को जला रहे, क्यूँ उसके पहरेदार है

इन हवाओ का आरक्षण कौन देगा
मिट रहे संसाधनों का संरक्षण कौन देगा
नष्ट हो गयी है जो प्रकृति जो तुमसे
उसका आज आरक्षण कौन देगा

कुर्बां होने के लिए देश पर
शहीदों को आरक्षण किसने दिया था
पहुँचाया जिन्होंने देश को शिखर पर
उनको आरक्षण किसने दिया था

मन में साहस गर है बाजुओ में दम
बिना आरक्षण के तब कदमो में संसार है
देश को जला रहे,क्यूँ उसके पहरेदार है

देश पर न्योछावर बेटे को
माँ जहाँ ख़ुशी-ख़ुशी कर देती है
बलिदानों और शौर्य साहस की
वो तो पावन धरती है

शर्म से झुके सिर उसका
क्यूँ ऐसा आज काम कर रहे हो
गायी जाती जौहर गाथाएं जिस पर
उस मिट्टी को क्यूँ बदनाम कर रहे हो

दुष्कर्मो से आज तुम्हारे ही
वो धरती बहुत शर्मसार है
देश को जला रहे,क्यूँ उसके पहरेदार है


नाम -ब्रह्मनाथ त्रिपाठी 'अंजान'
फ़ोन -०१२० ४२४०९७० मो.न. ९८१०६५७१७८
email: buntytrip@gmail.com

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हर तरफ आतंक   अखंड ये देश हमारा   स्वतंत्रता की ६१ वीं वर्षगाँठ   
ॐची सोच   ऊँगली पकड़ कर वह बड़ी हुई   ऐ हिंद के युवा   संघर्ष   महिला शक्ति  आह्वान  कुछ-कुछ होता है    माँ    जीवन अल्प विराम
संपादकीय  पत्रिका प्राप्ती  लघुकथा  कहानी   कविता  आपके पत्र  समीक्षा करें
एशियाटिक सोसाइटी में राजस्थान - लेखक अम्बू शर्मा
वृद्धाश्रम-संस्कृति पनप रही है। - डॉ.गीता गुप्ता


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अखंड ये देश हमारा

नवजोत से प्रज्जवल
अखंड ये देश हमारा

मनमोहिनी शुभम् विस्मय
प्रकृति की वादियाँ है
अमरताल मे रसगान करती
बहती पावन नदियाँ है

चरणों मे लहराता सागर
बहती गंगा की अमृत धारा
नवजोत से प्रज्जवल
अखंड ये देश हमारा

नव सभ्यता मे मिश्रित
पुरा सभ्यता की सादगी है
आसमां से बात करता
यहीं पर हिमाद्रि है

शान्ति सदभावना और प्रेम
जग को ये संदेश हमारा
नवजोत से प्रज्जवल
अखंड ये देश हमारा



नाम -ब्रह्मनाथ त्रिपाठी 'अंजान' जन्म- १८ नवम्बर १९८९ जन्मस्थान- परियावां प्रतापगढ़ (उ.प्र.) निवास स्थान- नॉएडा, स्थायी निवास स्थान-परियावां प्रतापगढ़ (उ.प्र.) पिता- श्री राम कृष्ण त्रिपाठी ,एक कवि सम्वाद्कार और समाजसेवक है माँ - विमला त्रिपाठी,एक गृहणी धार्मिक विचारो की महिला है सात भाई बहनो मे सबसे छोटा हूँ इस समय नॉएडा में रह रहे हैं कविताओ की लिखने की कला पिताजी से विरासत में मिली इस समय अध्ययन कर रहा हूँ मैं gr.noida में btech कर रहा हूँ और gr.noida के इंजीनियरिंग कालेजो मे जो नए कवि लिखते है उन्हें प्रोत्शाहित करके gr.नॉएडा मे कविता के विकास मे काम कर रहा हूँ नए कवियों को एकत्रित करके उन्हें कवि सम्मेलनों के मंच पर लाने के लिए प्रयासरत हूँ शौक- किताबे पढ़ना,हिन्दी गाने और ग़ज़ल सुनना फ़ोन -०१२० ४२४०९७० मो.न. ९८१०६५७१७८
email:buntytrip@gmail.com

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हर तरफ आतंक   अखंड ये देश हमारा   स्वतंत्रता की ६१ वीं वर्षगाँठ   
ॐची सोच   ऊँगली पकड़ कर वह बड़ी हुई   ऐ हिंद के युवा   संघर्ष   महिला शक्ति  आह्वान  कुछ-कुछ होता है    माँ    जीवन अल्प विराम
संपादकीय  पत्रिका प्राप्ती  लघुकथा  कहानी   कविता  आपके पत्र  समीक्षा करें
एशियाटिक सोसाइटी में राजस्थान - लेखक अम्बू शर्मा
वृद्धाश्रम-संस्कृति पनप रही है। - डॉ.गीता गुप्ता


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स्वतंत्रता की ६१ वीं वर्षगाँठ
मना रहे हैं स्वतंत्रता की ६१ वीं वर्षगाँठ
पढ़ा रहे हैं सदाचारिता की पाठ
कर रहे हैं आपस में गरीबों के राशि के बंदरबाँट
यही है भारतीय स्वतंत्रता की वर्षगाँठ
स्वतंत्रता की ६१ वीं वर्षगाँठ
क्यों मनाऊं मैं स्वतंत्रता की वर्षगाँठ
आज मेरा देश स्वतंत्र है
पर इस देश के निवासी गुलाम हैं
भ्रष्टाचार व अन्याय के गुलाम
जुल्म व शोषण के गुलाम
घूसखोरी व अत्याचार के गुलाम
एक नहीं दो नहीं सभी हैं इनके गुलाम
यही है मेरे देश की पहचान
यहाँ किसी को बोलने का भी अधिकार नहीं है
यहाँ किसी को न्याय पाने का भी अधिकार नहीं है
नहीं होती है यहाँ आम जन के साथ न्याय
आम जन के लिए तो न्याय माँगना भी गुनाह हो जाता है
यदि माँगा वह न्याय और नहीं दिया पैसा
तो रक्षक भी उसका दुश्मन हो जाता है
क्योंकि यहाँ पैसे की ही बात सुनी जाती है
व पैसे की ही जीत होती है
एक नहीं दो नहीं नीचे से ऊपर तक सभी जगह है घूसखोरी व अत्याचार
इसे बंद करने के लिए नहीं है कोई सरकार
होती रही है होती रहेगी अन्याय व अत्याचार
हमें न्याय पाने का भी नहीं है अधिकार
हमें सच बोलने का भी नहीं है अधिकार
तो फिर क्यों मनाऊं मैं स्वतंत्रता दिवस
आज सच्चाई व इमानदारी का नहीं है नामों निशान
भारत में धर्म की कोई नहीं है पहचान
चूँकि भारत में सच्चाई, ईमानदारी व धर्म सभी का हो गया है नाश
तो क्यों न स्वतंत्रता दिवस के स्थान पर शोक दिवस ही मनाया जाए


- महेश कुमार वर्मा
DTDC Courier Office,
Satyanarayan market, Opposite Maruti (KARLO) Swhow Room,
Boring Road, Patna (Bihar) PIN : 800001 (INDIA) Contact No. : +919955239846

E-mail ID : vermamahesh7@gmail.com
Webpage : http://popularindia.blogspot.com

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ॐची सोच   ऊँगली पकड़ कर वह बड़ी हुई   ऐ हिंद के युवा   संघर्ष   महिला शक्ति  आह्वान  कुछ-कुछ होता है    माँ    जीवन अल्प विराम
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ॐची सोच
ॐची सोच हमेशा सोचो,
मन मैं कुनठा मत लाओ !
दृढ़ इच्छा शक्ति के बल पर,
मन में अटल विश्वास जगाओ !
कंकर से भी हीरा बनकर'
प्रतिभा अपनी दर्शाओ !!
ॐची सोच हमेशा ----------

आकाश गंगा अशंख तारो में
अपना असत्तव बनाओ !
ध्रुव तारे की तरह,
गगन मंडल में जगमगाओ !!
ॐची सोच हमेशा ----------

विपत्तियों से करो मुकबला,
कभी ना घबराओ !
प्रकृति से लो सीख,
काटो में गुलाब खिलाओ
ॐची सोच हमेशा ----------

कभी किसी पर आस्रित होकर
निरजीव ना बन जाओ !
राख में अंगारा बन,
स्वयँ पहचान बनाओ !!
ॐची सोच हमेशा ----------

आसहाय अपने को ना समझो,
निराशाओं को दूर भगाओ !
आशा रुपी दीप जलाकर,
कीचड में भी कमल खिलाओ !!
ॐची सोच हमेशा ----------

पतझर से नीरस मौसम में,
बसंत रितु सा बजूद बनाओ !
चारो ओर बहारे हो,
जग में ऐसा नाम कमाओ !!
ॐची सोच हमेशा ----------


देवेन्द्र कुमार मिश्रा
अमानगंज मोहल्ला नेहरु बार्ड न0 13, छतरपुर (म0प्र0)

email:devchp@gmail.com
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ऊँगली पकड़ कर वह बड़ी हुई
जिस दिन एक बेटी अपने घर से, अपने परिवार से, अपने भाई,मां तथा पिता से जुदा होकर अपनी ससुराल को जाने के लिए अपने घर से विदाई लेती है, उस समय उस किशोरमन की त्रासदी, वर्णन करने के लिए कवि को भी शब्द नही मिलते ! जिस पिता की ऊँगली पकड़ कर वह बड़ी हुई, उन्हें छोड़ने का कष्ट, जिस भाई के साथ सुख और दुःख भरी यादें और प्यार बांटा, और वह अपना घर जिसमे बचपन की सब यादें बसी थी.....इस तकलीफ का वर्णन किसी के लिए भी असंभव जैसा ही है !और उसके बाद रह जातीं हैं सिर्फ़ बचपन की यादें, ताउम्र बेटी अपने पिता का घर नही भूल पाती ! पूरे जीवन वह अपने भाई और पिता की ओर देखती रहती है !
राखी और सावन में तीज, ये दो त्यौहार, पुत्रियों को समर्पित हैं, इन दिनों का इंतज़ार रहता है बेटियों को कि मुझे बाबुल का या भइया का बुलावा आएगा ! नारी के इस रूप से बड़ा प्यार और कहीं नही मिलता !

ऊँगली पकड के पापा की
जब चलना मैंने सीखा था
पास लेटकर उनके मैंने
चाँद सितारे देखे थे ,
बड़े दिनों के बाद याद , पापा की गोदी आती है !
पता नहीं क्यों आज मुझे उस घर की यादें आती हैं

पता नहीं जाने क्यों मेरा
मन रोने को करता है ,
बार बार क्यों आज मुझे
यादें उस घर की आती हैं
बड़े दिनों के बाद आज , पापा सपने में आए थे !
पता नहीं मां क्यों मन को,मैं आज न समझा पाई हूँ

क्यों लगता अम्मा मुझको
इकलापन सा इस जीवन में
क्यों लगता मां , जैसे कोई
गलती की, लड़की बन के !
बड़े दिनों के बाद आज यादें उस घर की आयीं हैं !
पता नहीं मां सावन में ,यह ऑंखें क्यों भर आईं हैं

किस घर को अपना बोलूं ?
मां किस दर को अपना मानूं
भाग्यविधाता ने क्यों मुझको
जन्म दिया है , नारी का,
बड़े दिनों के बाद आज भैया की याद सताती है
पता नहीं क्यों सावन में पापा की यादें आती है !

आज बाग़ में बच्चों को
जब मैंने देखा झूले में ,
अपना बचपन याद आ गया
जो मैं भुला चुकी, कब से
बड़े दिनों के बाद आज क्यों बिसरी यादें आती हैं !
पता नही क्यों याद मुझे, पापा की पप्पी आती है !

तुम सब भले भुला दो लेकिन
मैं वह घर कैसे भूलूँ ?
तुम सब भूल गए भैय्या
पर मैं वे दिन कैसे भूलूँ ?
बड़े दिनों के बाद आज , उस घर की यादें आती हैं !
पता नहीं क्यों आज मुझे मां तेरी यादें आती हैं !



सतीश सक्सेना mob: 9811076451

http://satish-saxena.blogspot.com/
http://lightmood.blogspot.com/

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ऐ हिंद के युवा

ऐ हिंद के युवा तू आगे बढ़ लगाम थाम ले
तू हिंद कि पहचान है तू हिंद को पहचान दे

आयें लाखों दिक्कते पर तेरा कदम ना डिगे
शोषण किसीका होता देख तेरा खूं खौल उठे

तू बेफिक्र आगे बढ़ मुश्किलें कितनी ही आयेंगी
मन मे हो उमंग जिसके जीत उसको ही पायेगी

ऐ हिंद के युवा तू आगे बढ़ लगाम थाम ले
तू हिंद कि पहचान है तू हिंद को पहचान दे

देश का प्रहरी तू देश का मान है तू
देश का भविष्य तू देश का अरमान तू

जाग देख तेरे देश को दुश्मन ललकार रहा है
उठ थाम ले हथियार आतंक सीमा लाँघ रहा है

राम कृष्ण गौतम गाँधी की संतान है तू
राम रहीम नानक और जीसस का आशीर्वाद है तू

हिंद के नौजवान कर तू विजय का प्रयाण
समुद्र की गहराई आसमा की ऊँचाई हो तेरा अरमान


डॉ. श्रीकृष्ण मित्तल
परिचय : वाणिज्य सनातक दिल्ली विश्वविद्यालय में दिल्लीमहाविद्यालय का दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संगठन में माननीय श्री दत्तोपंत जी ठेंगडी जी के आशीर्वाद से अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की और से विद्यार्थी नेता व महापार्षद के रूप में प्रतिनिधित्व किया। विधि अध्यन मैसूर विश्वविद्यालय में कर बेल्फोर्ड अमरीका से विधि उच्स्नातक LLM व समाजसेवा विज्ञान में डॉक्टरेट की मानद उपाधी ग्रहण की। स्वर्गीय प्रधानमंत्री श्रीमतीइंदिरागाँधी जी से आशीर्वाद एवम प्रेरणा प्राप्त की। व्यवसाय: जाने मने उद्योगपति, आयातक, निर्यातक डॉ. मीतल ने बाल्यकाल में पारिवारिक व्यापर से प्रारम्भ कर दिल्ली, हरियाणा, उतरप्रदेश, बिहार व कर्णाटक आदि राज्यों में विभिन्न उद्योग स्थापित किये, सफलता पूर्वक चलाये. भारत के राष्ट्रपति महामहिम डॉ. शंकरदयालजीशर्मा व श्रीवसंतसाठेजी के करकमलों से उद्योगपत्र सम्मान और डॉ. भीष्मनारायणसींहजी से उद्योग रत्न सम्मान प्राप्त कीये। अपनी कार्यप्रणालीसे व्यापार उद्योग आदि के विभिन संघोंमें जैसे भारतीय जींक आक्साइड निर्माता संघ, भारतीय लघु मोम निर्माता संघ , भारतीय रसायन व्यापारी संघ, दिल्ली रसायन व्यापारी संघ, दिल्लीधातु व्यापारी संघ , मैसूर उद्योग व्यापार संघ, भारतीय सीरामीक सोसायटी पद भार ग्रहण किये. वर्तमान में कलाम्बोली स्टील मर्यादित व श्री चामुन्डी सिरामिक के अध्यक्ष के रूप में कार्यरत हैं.
awbikk@gmail.com
http://bhulibisriyaaden.blogspot.com



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ॐची सोच   ऊँगली पकड़ कर वह बड़ी हुई   ऐ हिंद के युवा   संघर्ष   महिला शक्ति  आह्वान  कुछ-कुछ होता है    माँ    जीवन अल्प विराम
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एशियाटिक सोसाइटी में राजस्थान - लेखक अम्बू शर्मा
वृद्धाश्रम-संस्कृति पनप रही है। - डॉ.गीता गुप्ता


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संघर्ष

आजकल
आज और कल
सुनते ही समय कटता है
दिशान्तरों में
चलते फिरते
आते जाते
युगान्तरों सा दिन निपटता हैं

सुबह घर से रोज़
हर रोज़
निकल कर
लम्बी दूरियां
पैदल चल कर
सूरज की तेज़ किरणों से
चुंधियाती आंखों को मलता
कोने से एक आंसू
टप से निकलता

तेज़ गर्मी में
शरीर की भाप का पसीना
थक कर
हांफता सीना
सिकुडी हुई जेबों में
पर्स की लाश
और
उस लाश के अंगो में
जीवन की तलाश
ख़ुद को हौसला देने को
बड़े लोगों की बड़ी बातें
पर
सोने की कोशिश में
छोटी पड़ती रातें

वो कहते हैं
हौसला रखो बांधो हिम्मत
तुम होनहार हो
संवरेगी किस्मत
ये संघर्ष
फल लाएगा
तू मुस्कुराएगा
बस
थोड़ा समय लेता है
अन्तर्यामी
सबको यथायोग्य देता है

मैं चल रहा हूँ
न तो
उनके प्रेरणा वाक्य
मुझे संबल देते हैं
न ही उनके ताने अवसाद
उनके आशीर्वादों से मैं
प्रफ्फुलित नहीं
न ही
उनकी झिड़की हैं याद

मैं चल रहा हूँ
क्यूंकि
मुझे चलना है
ये चाह नहीं
उत्साह नहीं
शायद यह नियति है
की
मुझे अभी चलना है

सुना है कि
पैरों के छालों के पानी से
जूते के तले के फटने से
जब पैर के तलों का
धरातल से मेल होता है
तब कहीं जा कर
संघर्ष का यज्ञ पूर्ण होता है
वही होती है
संघर्ष के वाक्य की इति
प्रतीक्षा में हूँ
कब होती है
संघर्ष की परिणिती



मयंक सक्सेना
Zee News Ltd., FC - 19, Sector 16A, Noida
09311622028














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कविता :-
हर तरफ आतंक  अखंड ये देश हमारा
स्वतंत्रता की ६१ वीं वर्षगाँठ
ॐची सोच   ऊँगली पकड़ कर वह बड़ी हुई
ऐ हिंद के युवा  संघर्ष   महिला शक्ति  आह्वान
कुछ-कुछ होता है   माँ    जीवन अल्प विराम
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राजेश चेतन, 126 माडर्न अपार्टमेन्ट, सेक्टर-15, रोहिणी, नई दिल्ली-110085
मोबाईल : +91 9811048542



"राजेश चेतन मूलतः राष्ट्रीय चेतना के कवि हैं। उनकी रचनाओं की ओजस्वी हुंकार में मातृभूमि, घर, प्यार और देश की अस्मिता से समर्पित संस्कारों की उदबोधन भरी पुकार है। देश की मिट्टी की सौंधी सुगंध से उनकी रचनायें सुवासित हैं। वे हंसाते हंसाते भी व्यंग्यमयी शैली में राष्ट्रीय गौरव की गरिमा का संदेश देना नहीं भूलतें। कविता चेतन के लिये मात्र मनोरंजन का साधन नहीं, राष्ट्र के प्रति सचेत सिपाही का काव्यात्मक समर्पण है और यह प्रतिबद्धता उन में सहज स्फूर्त है, ओढ़ी हुई नहीं है जैसा कि प्रायः अन्य रचनाकारों में देखने को मिलती हैं। यह इस बात से उजागर होता है कि वे अपने जीवन में भी इन भावनाओं को जीते हैं और प्रदीप्त करते हैं।"

- कविवर श्री ओम प्रकाश आदित्य, दिल्ली


पोखरण में
परमाणु के विस्फोट करने वाला
एक कुंवारा
जो विज्ञान को ही
स्वपन सुंदरी मानकर
प्यार करता रहा
अपने आविष्कारों पर ही मरता रहा
हेयर कटिंग सेलून
जाने से भी डरता रहा
जो जवानी में पति ना
बनने के लिये तन गया
वह बुढ़ापे में
राष्ट्रपति बन गया
और जाते जाते कैसी
परम्परा जोड़ गया
खुद पुनः शिक्षक
तथा हिन्दुस्तान को
शिक्षा देने के लिये
एक महिला को
राष्ट्रपति भवन
छोड़ गया
विधि का खेल निराला है
भाग्य बड़ा बलवाला है
क्या कर लेगा एन डी ए
यू पी ए रखवाला है
पर आम व्यक्ति
इस घटना से परेशान है
क्योंकि चहुंओर महिलाओं
का ही गुणगाण है
घर की राष्ट्रपति महिला
आफिस की राष्ट्रपति महिला
एक देश बचा था, वहां भी
पुरूषों की हार है, क्योंकि
अब उस पद पर भी
महिला ही सवार है
हमने सोनिया जी से पूछा
महिला शक्ति के लिये आप वरदान हैं
माना कि आप महान हैं परन्तु
महिलाओं के प्रति आपका दृष्टिभेद
हम समझ नहीं पाते
प्रतिभा ताई को राष्ट्रपति बनाया
तो कम से कम किरण बेदी को
दिल्ली का हवलदार तो बनाते
मेरे प्रश्न के उत्तर में
सोनिया जी मुस्कुराई तो
हमने अपनी कलम उठाई और लिखा -
यू पी ए आकाश देखिये दस जनपथ
पी एम का आवास देखिये दस जनपथ
कैसा शक्ति केन्द्र बना है भारत में
राष्ट्रपति निवास देखिये दस जनपथ



परिचय: जन्म : भिवानी ( हरियाणा ) शिक्षा : एम . काम. कृतित्व : करगिल की हुंकार (काव्य संकलन) 1999 : भारत को भारत रहने दो (काव्य संग्रह) 2001 : वनवासी राम (आडियो सी डी) 2004 : शंखनाद (वीडियो सी डी) 2005 : रंग दे बसंती (काव्य संकलन) 2007 : तिरंगा (आडियो सी डी) 2008 : सेतुबन्ध (काव्य संग्रह) 2008 : टेढ़ी बातें (व्यंग्यात्मक प्रश्नोत्तर) 2008 विदेश यात्राएँ : ब्रिटेन 2002 : फ्रांस 2002 : अमेरिका 2006 : ओमान 2006 : अमेरिका 2008 : कनाड़ा 2008 विशेष : 1989 हांसी , हरियाणा में पहली बार काव्य पाठ । : 1998 में गणतंत्र दिवस पर लाल किला कवि सम्मेलन में काव्य पाठ । : 2001 भारतीय साहित्य परिषद द्वारा सतपाल चुघ पुरस्कार । : 2002 यू के हिन्दी समिति लन्दन द्वारा सम्मानित । : 2003 में पुरूषोतम प्रतीक पुरस्कार से सम्मानित। : 2004 साहित्य भारती ,उन्नाव द्वारा रमई काका पुरस्कार से सम्मानित । : 2005 संस्कार भारती ,हापुड द्वारा राम कुमार समृति सम्मान । : 2005 सांस्कृतिक मंच, भिवानी द्वारा विशिष्ट सारस्वत सम्मान । : 2007 राजस्थान साहित्य, कला एवं सांस्कृतिक संस्थान द्वारा काव्य श्री सम्मान : 2007 में पानीपत का प्रतिष्ठित कलमदंश पुरस्कार : राष्ट्रीय स्तर के दो हजार से अधिक कवि सम्मेलनों में काव्य पाठ । अन्य : सह संयोजक राष्ट्रीय कवि संगम : पूर्व अध्यक्ष, अक्षरम : सांस्कृतिक संयोजक, रेडियो सबरंग, डेनमार्क सम्पर्क : 126 माडर्न अपार्टमेन्ट, सेक्टर-15 रोहिणी, नई दिल्ली-110089 मोबाईल : +91 9811048542
http://rajeshchetan.net

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वृद्धाश्रम-संस्कृति पनप रही है। - डॉ.गीता गुप्ता


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आह्वान


सीताराम महर्षि, कृष्ण कुटीर, रतनगढ़, राजस्थान






करना होगा आज देश की स्थितियों का मूल्यांकन।
आजादी की स्वर्ण जयंती मिलकर आज मनाते
उच्च स्वरों में माता के यश गीतों को दुहराते,
जिन सपनों के लिये शहीदों ने दी थी कुर्बानी
आज देश में कहीं नहीं उन स्थितियों को हम पाते।
वातावरण बना है दूषित, व्याकुल, चिंतित हर जन
भाषा, जाति, प्रांत, मजहब का चक्कर ऎसा चलता
हर भारतवासी का चिंतन नित जाता है छलता
देश प्रेम निस्वार्थ भाव के दर्शन है दुर्लभ से
अपना ही घर भरने का सपना आंखो में पलता।
करना होगा पुनः स्थापित लुप्त हुआ अपनापन
बिना भेद राग के गीत सभी भारतवासी दुहराएं,
नफरत की बातें जो करते तोड़ें उनसे नाता
करें एकता का जो सृजन बढ़ कर गले लगायें।
मातृभूमि के लिए समर्पित हों अपना तन-मन-धन।

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कुछ-कुछ होता है


धमचक मुलथानी, साभार : नई गुदगुदी




मैंने एक बूढ़े व्यक्ति से पूछा-
बाबा ! क्या तुम्हें कुछ-कुछ होता है?
वे बोले- इस बुढ़ापे में
क्या खाक होता है,
कुछ-कुछ के अलावा
सब कुछ होता है।

मैंने एक बूढ़ी अम्मा से पूछा-
माताजी, क्या आपको कुछ-कुछ होता है?
वह पोपले मुँह से बोली
मुँह में दाँत नहीं, पेट में आँत नहीं
इस बुढ़ापे में, किसी का साथ नहीं,
यह बूढ़ा मन
न हँसता है न रोता है,
इस बूढ़े शरीर में
सब जगह से कुछ-कुछ होता है।

फिर मैंने एक नौजवान कन्या से पूछा-
देवी! देवी क्या आप बतायेंगी
क्या? आपको कुछ-कुछ होता है-
वह अपनी एक चप्पल निकालकर बोली
हाँ, होता है बताऊँ !
मैंने कहा- बताना है
तो फिर चप्पल पहनकर बताइये
कुछ-कुछ कैसे होता है
मुझे समझ में आ जाये इस तरह समझाइये।
उतना सुनते ही वह मुस्काराई
फिर मेरे पास आई
पास आकर बोली- भाई साहब
जब बेटी जैसी बहु को जिंदा जलाया जाता है,
जब देश के सुरक्षा सौदे में कमीशन खाया जाता है,
जब नेताओं द्वारा पशुओं का चारा चबाया जाता है,
जब पटेल व नेहरू वाली संसद में
दागदारों को बिठाया जाता है,
जब भगतसिंह व आजाद को आतंकवादी बताया जाता है,
जब राजघाट पर झुठी कस्मों को खाया जाता है
जब कोई गर्भ में ही किसी कन्या का
प्राण हर ले जाता है।
जब माँ सरस्वती की वंदना पर भी प्रतिबंध लगाया जाता है।
फिर भी तुम जैसे युवक
देश की इस हालात को अनदेखा कर,
"चोली के पीछे क्या है" गाना गाता हैं,
तब मेरा मन भीतर से रोता है।
और क्या-क्या बताऊँ?
फिर मुझे कुछ-कूछ नहीं बहुत कुछ होता है।

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हर तरफ आतंक   अखंड ये देश हमारा   स्वतंत्रता की ६१ वीं वर्षगाँठ   
ॐची सोच   ऊँगली पकड़ कर वह बड़ी हुई   ऐ हिंद के युवा   संघर्ष   महिला शक्ति  आह्वान  कुछ-कुछ होता है    माँ    जीवन अल्प विराम
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एशियाटिक सोसाइटी में राजस्थान - लेखक अम्बू शर्मा
वृद्धाश्रम-संस्कृति पनप रही है। - डॉ.गीता गुप्ता


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माँ


जय कुमार 'रुसवा' पता: 66, पाथुरिया घाट स्ट्रीट, कोलकाता-700006


पूजनीय ना अधिक है कोई माँ से ज्यादा
माँ है चेतना, संस्कार, संस्कृति, मर्यादा
माँ जीवन की तसवीर बनाती इसीलिए तो
देवताओं ने सर्वप्रथम माँ को आराधा

अन्तर्मन पावन कर देता है स्वर माँ का
घर मन्दिर रहता है जब तक है घर माँ का
क्षीण आत्मबल कभी नहीं होने देता है
हाथ धरा जब तक रहता है सर पर माँ का

बोल तोतले शिशु के अगर न माँ अपनाती
तो कभी नहीं मानवता को भाषा मिल पाती
कभी न जीवन में मंजिल तक कदम पहुँचते
पहले कदम पे अगर न माँ ऊँगली पकड़ाती

अगर चोट बच्चे को लगती रोती है माँ
बीज हृदय में संस्कार के बोती है माँ
भले-बुरे का ज्ञान कराती सबसे पहले
बच्चे का पहला विद्यालय होती है माँ

जब भी जीवन में घड़ियाँ मुश्किल की आती
सबसे पहले माँ ही है धीरज बंधवाती
सभी उलझने चिन्तन की तब मिट जाती हैं
माँ गोदी में लेकर सर को जब सहलाती

माँ की गोदी में जीवन के सपने सरसे हैं
माँ की गोदी में दुलार के बादल बरसे हैं
माँ की गोदी में सिमटी है सृष्टि सारी
माँ की गोदी खातिर देवता भी तरसे हैं

है विशाल माँ का मन जैसे नील गगन
और है इतना कोमल जैसे खिला सुमन
अगर पिता मन होता अपने बच्चों का
तो माँ का मन होता उस मन की धड़कन

माँ के मन में है शबनम जैसी षीतलता
और पूजन के थाल सरीखी है पावनता
सुधा कुंभ है अगर कहीं है माँ के मन में
माँ के मन में गंगा-यमुना की निर्मलता

माँ के मन में रवि-शशि का आलोक भरा है
सहनशीलता माँ मन की उर्वरा धरा है
अगर स्वर्ग धरती पर कहीं उतरता है तो
वह तो केवल माँ के चरणों में उतरा है।

‘‘मातृ देवो भव’’ हर शास्त्र हमें कहता है
माँ के मन में ममता का झरना बहता है
माँ के मन से पावन ना स्थान है कोई
इसीलिए ईश्वर माँ के मन में रहता है।


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जीवन अल्प विराम


डॉ. गणेशदत्त सारस्वत, सारस्वत सदन, सिविल लाइन्स, सीतापुर-261001..


कौन सका है रोक, जिसका जाना है नियम।
व्यर्थ मनाना शोक, अजर-अमर है जीव यह।।
नष्वर तन दुख मूल, पंचतत्त्व से जो रचित।
मिल जाना है धूल, मात्र नियति इसकी यही।।
गर्व न कर तू मूढ़, यौवन पर, धन-धान्य पर।
समझ रहस्य निगूढ़, अचिर यहाँ की वस्तु हर।।
क्या होगा परिणाम, किसने देखा है यहाँ।
जीवन अल्प विराम, आज अगर तो कल नहीं।।
मत कर सोच-विचार, जो होय है हो रहा।
चिन्तन बना उदार, चिन्ता से रह दूर तू।।
तू उससे है भिन्न, दिखलायी जो दे रहा।
मत हो पगले! खिन्न, जो है वह तू भी वही।।
क्षणभंगुर सम्बन्ध, जितने भी हैं विश्व में।
कुछ दिन का अनुबन्ध, तदुपरान्त निःशेषसब।।
सभी स्वार्थ के मीत, प्रीति दिखावा है यहाँ।
छिपी हार में जीत, अद्भुत यह संसार है।।
स्मृतियों का कोष, सम्बल तेरा है यही।
देने किसी को दोष, भाग्य फलित होता सदा।।
होनी कर स्वीकार, अनहोनी होनी नहीं।
करना क्या प्रतिकार, जो तेरे वश में नहीं।।
विश्व का बाजार, जिसका ओर न छोर है।
साँसों का व्यापार, युगों-युगों से चल रहा।।
लाख करे उपचार, किन्तु न होता लाभ कुछ।
जीवन जाता हार, मौत जीत जाती यहाँ।।
रंगमंच छविवन्त, यह जग एक विशालतम।
है अभिनय जीवन्त, जिसका वह ही सफलतम।।
करना है जो काम, कर ले, देर लगा नहीं।
हो जाएगी शाम, पता नहीं किस ठौर कब।।
पूरी कर निज आयु, जितनी तुझको है मिली।
सुख या दुख की वायु, करे नहीं विचलित कभी।।














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कविता :-
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