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शुक्रवार, २ अक्तूबर २००९

समीक्षा: शमोएल अहमद का उपन्यास 'नदी'

नारी मन की विविध परतों को कुशलता से खोलता है - दीप्ति गुप्ता


हाल ही में मैंने शमोएल अहमद का उपन्यास नदी पढ़ा जिसने मुझे बहुत अधिक प्रभावित किया। इस उपन्यास में लेखक की सबसे बड़ी ख़ूबी यह है कि उन्होंने नारी मन की विविध परतों को जिस कुशलता से खोला है और उनमें समाए कोमलतम भावों को जिस बरीकी से अंकित किया है, वह नारी मन के भावों और नारी मनोविज्ञान पे उनकी गहरी पकड़ का परिचायक है। उन्होंने उपन्यास नायिका के दिलो – दिमाग़ में अलग –अलग परिस्थितियों में उभरते प्यार, घृणा, सुख, दुख, उत्साह, निराशा, कौतुक, आश्चर्य, विषाद, अवसाद और अकेलेपन को बड़ी ही सहजता और स्वभाविक ढंग से चित्रित किया। नारी मन को जिस बेबाकी से उन्होंने उकेरा है वह नि:सन्देह अतिसराहनीय है। सबसे बड़ी बात यह कि शमोएल अहमद ने समूचे उपन्यास में कहीं भी नायिका को पति के साथ ग़लत समझौते के लिए विवश नहीं किया है। जहाँ नायक रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में नियमों से हठधर्मिता की हद तक बँधा एक भावनाशून्य इंसान है, वहीं दूसरी ओर नायिका जीवन को सहजता से, किसी भी तरह की शर्त और नियमों के बंधन से मुक्त होकर जीने वाली भावुक और संवेदनशील नारी है। वह सृष्टि के कण-तृण से जुड़ाव महसूस करती है। प्रकृति के सौन्दर्य पे मुग्ध होकर, उससे एकात्म हो उठती है। सुहानी भोर, रुपहली चाँदनी,तारों भरी रुमानी रात उसे जब-तब लुभाती है। सृष्टि के उन अलौकिक क्षणों को वह भरपूर जीना चाहती है, मानो सांसों में उतार लेना चाहती है और ऐसे ख़ूबसूरत रूमानी पलों के एहसास को वह नायक के साथ जीकर अपने दिल में संजो लेने को आतुर रहती है, लेकिन संवेदनहीन नायक ऐसे पलों के अनूठेपन को महसूस न कर, हमेशा नायिका के साथ रूखेपन और कठोरता से पेश आता है। एक बार, दो बार, और बार–बार उसकी यह शुष्कता शनै: - शनै : कुरूपता में बदलती जाती है। नायिका नियमों, बन्धनों से परे होकर भी बेतरतीब और उलझी हुई नहीं है। सुलझी सोच से भरी है। पति द्वारा छोटी – छोटी बात पे उपेक्षित और अपमानित ज़रूर महसूस करती है, फिर भी पति के रंग में रंगना चाहती है, समझौता करने को तैयार रहती है, पर पति की तर्कहीन हठधर्मिता के कारण उसकी इस रिश्ते के प्रति बची खुची स्निग्धता भी जैसे सूखने लगती है। वह उमड़ती नदी की मानिन्द जीवन्त है, अठखेलियों से भरी है, प्रेम की तरंगों और लहरों से भरी है और अपने प्यार भरे प्रवाह की अंतिम मंज़िल समन्दर के साथ एक हो जाना मानती है। हांलाकि नायक का पौरुष से भरपूर व्यक्तित्व उसे रिझाता है और यह पौरुष ही उसके नज़दीक आने का कारण भी बनता है। लेकिन मन के स्तर पर लगातार नायक की यही परुषता दोंनो के बीच अलगाव का कारण बनती है। वह जीवनसाथी बनकर, हर पल, हर क्षण कठोरता से ही पेश आता है – यहाँ तक कि प्यार के भावनात्मक, नाज़ुक पलों में भी वह निहायत रूखा और यान्त्रिक बना रहता है। उसके व्यक्तित्व मे कभी भी कोमलता, भावनात्मक गरमाहट उभरकर ही नहीं आती। हर समय वह हठधर्मी की तरह अपने नियम और हठ पे अड़ा रहता है। जीवन की सुकोमल परतों से अछूता, निहायत ही पथरीला सा व्यक्ति है वह। न व्यक्तित्व में, न सोच में, न दिनचर्या में, कहीं भी लचीलापन नहीं.....पत्नी का दिल रखने के लिए भी वह न बातें करता है, न कॉफ़ी पीने में साथ देता है। जीवन की ख़ूबसूरतियों से महरूम, एक सपाट सा इंसान है जिसकी दिनचर्या नियमों से शुरू होती है और नियमों पे ख़त्म। उसमें किसी की – यहाँ तक कि अपनी नई नवेली दुल्हन की दख़लअंदाज़ी भी उसे पसन्द नहीं। उसके एकरस नियम - प्यार, अपनेपन, जीवन के ख़ूबसूरत लम्हों के ऊपर हैं। ऐसा जकड़ा सा, बंधा - बंधा इंसान न ख़ुद जीता है और न दूसरे को जीने देता है। उसके जीवन मे सपाट ज़न्दगी से उपजी जो कठोरता और रूखापन है, वह पूरी तरह उसके व्यक्तित्व में छाया हुआ है। वह तमतमाए सूरज की भाँति सदा पत्नी को झुलसाता रहता है, कभी भी गुनगुनी धूप बनकर, उसे सुखद एहसास से नहीं भरता। समर्पण के मखमली क्षणों में उसका यंत्रवत व्यवहार पत्नी को इस कदर कचोटता है कि वह उसे एक ‘’उत्पीड़क’’ नज़र आता है। जैसे वह खाना खाने के बाद, जी भर कर कई गिलास पानी पीता है, वैसे ही वह कामक्षुधा तृप्त करके, करवट लेकर जी भर के सोता है – उसकी बला से पास लेटी पत्नी, कुछ पलों के लिए उसके प्यार भरे स्पर्श को तरसे या उसकी बाहों के घेरे में सुकून से सोना चाहे। नायक स्वार्थी होने की हद तक भावनाहीन, सिर्फ़ अपने लिए जीने वाला प्राणी है, जबकि नायिका ठीक इसके विपरीत जीवन को पल-पल जीना चाहती है. सृष्टि की हर छोटी से छोटी चीज़ उसे खींचती है, लुभाती है – फूल, लताएँ, चाँद, तारे, नदी, नदी के पाट, शफ़्फ़ाक चाँदनी से भरपूर रेशमी रात – वह सबमें दिव्य सौन्दर्य, संगीत, प्यार की तरंगे- न जाने क्या – क्या ढूँढती है, अनुभव करती है, पति को इन ख़ूबसूरतियों की ओर खींचना चाहती है। पर पति की ओर से नरमाहट, किसी भी तरह की गरमाहट की कोई भी किरण न पाकर वह टूट –टूट जाती है। फिर भी नारी मन की सहज प्रवृत्ति उसे बार –बार पति से तालमेल बैठाने के लिए प्रेरित करती है कि कुछ वह झुके और कुछ पति झुके तो बीच का एक रास्ता ऐसा निकल आए कि दोंनो उस पर सम्भाव से जीवन भर साथ साथ चल सके। लेकिन पति तो रोबोट की तरह अपने में फ़ीड किए प्रोग्रामों से इस क़दर जुड़ा है कि उसके पास समझौते की कोई गुंजाइश ही नहीं, तो आहत नायिका का पिता के घर लौटना जैसे उसकी नियति बन जाता है। वह पत्नी है तो क्या हुआ, उसका अपना एक व्यक्तित्व है, अपनी एक पहचान है, उस पर वह, मननशील और चिन्तनशील स्वभाव की है, उसकी भी पसन्द –नापसन्द है। इतना होने पर भी जीवन साथी की ख़ातिर कई बिन्दुओं पर समर्पित होने को तैयार रहती है। पर पति को तो कोई फ़र्क ही नहीं पड़ता, वह उसके साथ रहे या न रहे,उसे क्या अच्छा लगता है, क्या बुरा लगता है, वह कब ख़ुश होती है, चहकती है, कब फफक पड़ती है ?? यह मानसिक उत्पीड़न, पति का भावनात्मक ठन्डापन उसकी भावनाओं को कुचल देता है. पति द्वारा पहले वह बैडरूम से दूसरे बैडरूम में विदा कर दी जाती है, फिर उस घर से पिता के घर विदा हो जाती है जो अन्तत: पति के जीवन से उसकी विदाई का संकेत है।

कोई भी जीवन साथी – चाहे वह पुरुष हो या नारी अपने भावनात्मक रूखेपन, ठन्डेपन, स्वार्थीपन और हठधर्मिता से अंजाने किस तरह जीवनसाथी को अपने से दूर कर देता है, इस पर शमोएल अहमद ने बड़े ही मनोवैज्ञानिक ढंग से क़लम चलाई है। बीच – बीच में प्राकृतिक चित्रण खूबसूरत बन पड़े हैं। नारी जीवन को उन्होंने बड़े क़रीब से जाना और परखा है। भाषा सहज, सरल, पारदर्शी, निखरी –निखरी,भावप्रवण और प्रवाहपूर्ण है। पाठक को अंत तक बाँधे रखने की क्षमता से भरपूर है। हर भाव, हर विचार सीधे दिलो दिमाग़ में उतरता चला जाता है।
इतने ख़ूबसूरत उपन्यास के लिए शमोएल अहमद की जितनी भी सराहना की जाए कम है। आशा है कि भविष्य में इसी तरह और भी उत्कृष्ट रचनाएँ पढ़ने को मिलती रहेगीं तथा वे अपनी क़लम से साहित्य को सम्पन्न बनाते रहेगें।

सोमवार, २९ जून २००९

कहानी: भीतरी सन्नाटे - यादवेन्द्र शर्मा ‘चन्द्र’


Yadwendra Sharma'chandra'परिचय: देश के जाने माने साहित्यकार और कथाकार यादवेन्द्र शर्मा ‘चन्द्र’ का 3 मार्च, मंगलवार की देर रात बीकानेर में निधन हो गया। वे 77 वर्ष के थे। उनके परिवार में पत्नी और तीन पुत्र हैं। साहित्य अकादमी नई दिल्ली, राजस्थान साहित्य अकादमी उदयपुर, राजस्थानी भाषा संस्कृति एवं साहित्य अकादमी बीकानेर सहित अनेक पुरस्कारों से सम्मानित यादवेन्द्र शर्मा ‘चन्द्र’ ने एक सौ से अधिक साहित्यिक कृतियों का सृजन किया। इनमें लगभग 70 उपन्यास और 25 कहानी संग्रह शामिल हैं। उनके चर्चित उपन्यास, ‘हजार घोड़ों पर सवार’ पर दूरदर्शन ने टेली फिल्म बनाई थी। उनकी कृति पर टेली फिल्म, गुलाबड़ी और चांदा सेठानी बनाई गई। ‘चन्द्र’ ने अपनी लेखनी से समाज को नई दिशा देने के लिए जीवनपर्यन्त सादगी व ईमानदारी से सृजन धर्म का निर्वाह किया। उन्होंने उपन्यास, कहानियाँ, कविता संग्रह एवं लघु नाटकों की 100 से ज्यादा पुस्तकों की रचना कर साहित्य के क्षेत्र में अपना अपूर्व योगदान दिया है जो सदैव एक मिसाल के रूप में जीवंत रहेगा। उनकी स्मृति को प्रणाम करते हुए यहाँ उनकी कहानी ‘भीतरी सन्नाटे’ प्रकाशित कर रहे हैं| संपर्क: - आशा लक्ष्मी, नया शहर बीकानेर - 334004
-संपादक




उसकी नौकरी मुम्बई में लग गई। एक बड़ी प्राइवेट कम्पनी में। आखिर वह सी.ए. था। अपने कस्बे ‘नोखा’ से महानगर मुम्बई आ गया।
शुरू में वह एक मध्यवर्गीय होटल ‘गुलनार’ में रहा। एक बेडरूम का हवादार कमरा। फॉम का बिस्तर था पर उसकी दूध सी सफेद चादर पर एक हलका सा दाग था जिससे वह बेचैनी का अनुभव करने लगा। उसने चादर चेंज करा ली।
पहली बार जब वह अपनी कम्पनी में आया तो उसके मालिक जी.एस. चावला ने उसका स्वागत किया। उसे अपने खास-खास कर्मचारियों से मिलाया जिसमें उसकी स्टेनो मिस ‘वन्दना’ भी थी।
आठ-दस दिनों में उसने दफ्तर के काम को पूरी तरह समझ लिया तो एक दिन वन्दना ने कहा, ‘‘सर! इफ यू डॉन्ट माइन्ड तो कुछ कहूँ।’’
रोहन ने कहा, ‘कहो।’
‘‘यह श्रीशा है न, यह विचित्र युवती है। बहुत ही बातूनी, खुले दिमाग़ की, फ्लर्ट.....’’
‘‘वन्दना! तुम्हें ऑफिस के डिसीप्लीन का पता नहीं है। श्रीशा क्या करती है, क्या खाती-पीती है, क्या पहनती है, वह किस- किस के साथ घूमती है, इसकी ऑफिस में कोई फाइल नहीं है। यह सही है कि वह अपना काम जिम्मेदारी से करती है। मैं तुम्हारा बॉस हूँ। ऊल जलूल बातें मुझें पसंद नहीं। उसने कठोर स्वर में कहा।
‘सॉरी सर!’ वन्दना सिर झुका कर चली गई।
रोहन ने एक अच्छे अफसर की तरह अपने ऑफिस का कार्य संभाल लिया।
अब वह मकान की तलाश में लग गया। वह ऐसा मकान चाहता था जहाँ अभिजात्य वर्ग के लोग रहते हों। उसके सारे पड़ोसी पढ़े-लिखे हों, अंग्रेजीदा हों तो उत्तम! फ्लैट में पश्चिम की ओर बरामदा हो जहाँ पछुआ हवा बेरोक आती रहे। उस मकान के आस-पास झुग्गी-झोंपड़ियाँ और चालें न हों। उनकी मौजूदगी उसे कीड़े-मकोड़े की तरह रहने वाले लोगों के बारे में सोचने के लिए विवश करेंगी और वह निरर्थक तनाव से घिर जाएगा, वह जरा एकांतप्रिय था। वह यह वाक्य अपने पर आरोपित करता रहता था कि वह भीड़ में अपने को अकेला आदमी समझता है।
वह बचपन से ही मितभाषी था। फालतू बोलने वाले छात्र- छात्राओं से वह बचा करता था। वह उनसे लगभग दूर ही रहता था, जो अपने को काफी आधुनिक कहते थे और सिगरेट-शराब पीते थे, उनसे भी बचता रहता था। इसलिए वह चाहता था, एक अपने मनोनुकूल वातावरण वाला मकान। शांत और खुला।
वह नौकरी के बाद मकान ढूँढ़ता रहता था। जब वह थक जाता था तो मुम्बई की चौपाटी पर जाकर बैठ जाता था। लहरें गिनता रहता था। कई बार अपनी इच्छा के विरुद्ध वह चर्च गेट के स्टेशन के मुख्य द्वार पर खड़ा हो जाता था और आदमियों की भीड़ का रेला देखता रहता था। वह देखता-रंग-बिरंगी पोशाकें। भागमभाग।
उसे जल्दी ही इस बात का पता चल गया कि वह अपने मन के अनुकूल फ्लैट ले नहीं सकता। उसका मालिकाना हक और पगड़ी देना उसके वश का फिलहाल तो नहीं है। परिवार की जिम्मेदारियाँ तो ‘ताड़का’ राक्षसी के मुख की तरह फैली थीं। तीन कुँवारी जवान बहिनें। पेंशन पर दाल-रोती खाने वाले माँ-बाप। .....वह उद्विग्न हो गया। उसके आगे मीलों अनंत मरुस्थल के टीबें फैल गए।
एक दिन उसने अपने चीफ एकाउन्टेंट प्यारेलाल को अपनी समस्या बताई।
प्यारेलाल ने कहा, ‘‘आप या तो अपने सपनों को भंग कर दीजिए या फिर जीवन की कटुता समझ लीजिए। यह मुम्बई है, यहाँ सोना जितना चाहो कुछ ही मिनटों में खरीद सकते हैं पर सोने की जगह आसानी से नहीं मिल सकती।.....फिर भी आप मिस श्रीशा से बात कीजिए। वह काफी जानकारियाँ रखती हैं।’’
‘‘श्रीशा जो आपके पास.....।’’
‘‘हाँ-हाँ, वही श्रीशा.....।’’
‘‘उसके बारे में.....।’’
‘‘नहीं मिस्टर रोहन, चाहे स्त्री हो चाहे पुरुष, सबके जीने का अपना-अपना तरीका है। व्यक्तिगत सुख और आनन्द भी सबके अलग होते हैं। रुचियाँ भी भिन्न-भिन्न होती हैं और परिभाषाएँ भी। मुझे कई बार लगता है कि यह श्रीशा जो है, वह नहीं है। इसने कृत्रिमता का एक लबादा पहन रखा है। उसकी एक क्वालिटी और है, वह सबकी मददगार भी है।’’
‘‘आप उसे मेरे पास भेजिए।’’
थोड़ी देर में श्रीशा उसके कैबिन में थी। आते ही विनम्रता से बोली, ‘गुड नून सर!’’
‘‘बैठिए.....आप मेरी प्रॉब्लम हल करने में मदद कर सकती हैं, मलकानी साहब कह रहे थे।’’
‘‘मुझे खुशी होगी यदि मैं आपके काम आ सकूँ तो।’’
‘‘श्रीशा जी! आप तो इसी शहर की उपज हैं। सारी एजुकेशन भी आपने यहीं पूरी की है। मैं सच कहता हूँ कि मैं आपको जरा भी कष्ट देना नहीं चाहता पर कई बार मनुष्य न चाहते हुए भी दूसरों को कष्ट देता है, मैं आपको......।’’
वह सहज मुस्कान अधरों पर लाते हुए बोली, ‘‘किसी भूमिका की जरूरत नहीं है। साफ-साफ बताइए कि आप मुझे क्या कष्ट देना चाहते हैं।’’
‘‘मैं कई रोज से फ्लैट के लिए परेशान हूँ।.....कभी मेरी जेब एलाऊ नहीं करती है और कभी......।’’
उसने संक्षिप्त रूप में बताया कि वह किस एरिया में और कैसा फ्लैट चाहता है।
‘और.....क्या खर्च कर सकते हैं?’
‘यही दो हज़ार....ज़्यादा से ज़्यादा तीन....इसके आगे मेरी क्षमता नहीं, मेरा भरा-पूरा परिवार है। उसकी भी परवरिश करनी है।’ रोहन ने कहा।
उसने ललाट में बल डाल कर अपना दायाँ कान खुजला कर कहा, ‘माफी चाहती हूँ।.....फिर आप किसी खोली में कमरा ले लीजिए। अपनी इच्छा का फ्लैट लेना है तो पाँच-सात हज़ार रुपए खर्च कीजिए या फिर पाँच-सात लाख पगड़ी दीजिए।’
‘यह संभव नहीं।’ उसने नई बात बताई, ‘दरअसल कम्पनी ने साफ-साफ कह दिया था कि तीन साल तक वह केवल तनख्वाह ही देगी। ऐसी स्थिति में.....।’
वह बीच में ही बोली, ‘मुझे आपकी बात बनती नज़र नहीं आती है। फिर भी मैं बाइ हर्ट, कोशिश करूँगी कि आपकी पाॅकेट के अनुसार काम हो जाए। फिर आपका लक।’
श्रीशा चली गई।
रोहन ने सोचा कि यह काफी आकर्षक है। गोरा रंग, कंजी आँखें, तीखे नाक-नक्श, फाँक की तरह अधर और निडर भी।
रोहन और उसके बीच संवाद कम ही थे। लेकिन मजबूरी का नाम महात्मा गांधी। सहिष्णु होना ही पड़ा। श्रीशा से रोहन को सदैव पूछना ही पड़ता था।
लगभग तीन दिनों के प्रयास के बाद श्रीशा ने रोहन को बताया, ‘मैंने सभी इलाकों का सर्वेक्षण कर लिया है। आप जिस एरिया में फ्लैट चाहते हैं रोहन बाबू, इतना किराया तो आटे में नमक जैसा है। पूरी रसोई नहीं मिल सकती। कहने का मतलब है, कारवालों की एरिया में कम से कम पाँच हज़ार रुपए तो किराया और पाँच लाख पगड़ी, वह भी वन बेड रूम की। उसमें पछुवा हवा नहीं आ सकती, आ सकती है तो केवल पंखे की हवा। हाँ, मेनन साहब की चाल में कमरा पाँच सौ रुपयों में मिल सकता है, किराए पर। पगड़ी एक लाख अलग से।’
‘नहीं मैडम, यह संभव नहीं है। आपको पता नहीं, मेरे कंधों पर दायित्वों का भयंकर बोझ है। मुझे मेरे माँ-बाप ने बड़े कष्टों में पढ़ाया है।’
इसके बाद रोहन भी प्रयास करता रहा और श्रीशा भी।
श्रीशा ने एक दिन मुलायम स्वर में कहा, ‘सर! आप मेरे बॉस हैं। मैं आपकी मानसिक स्थिति समझती हूँ। महानगरों की यह समस्या खत्म होगी ही नहीं। हज़ार मकान बनते हैं साथ ही पाँच- दस हज़ार नए लोग आ जाते हैं। सारा खेल खत्म हो जाता है। समस्या ज्यों की त्यों बनी रहती है। हाँ, यदि आप पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर सोचें तो मैं आपके सामने अच्छा और सस्ता प्रस्ताव रख सकती हूँ। आप अपनी अनुकूलताओं की कटौती करें।’
‘आप पहेलियाँ मत बुझाइए। साफ-साफ कहिए। बोलती आप कुछ ज़्यादा ही हैं।’
‘यह सही है। बोलती ज़्यादा हूँ। मजाकिया हूँ सर! हर आदमी का अपना अलग स्वभाव होता है। अलग आनन्द होता है। मैं समझती हूँ कि हमारे भीतर कई इंसान हैं जो पल-पल सक्रिय होते रहते हैं।’
‘अपनी रहस्यपूर्ण बातें बंद करिए प्लीज। शॉर्ट में कहिए।’
‘हमारे फ्लैट में तीन कमरे हैं। पूरा सेकेंड फ्लोर हमारा है। आजकल हमारी आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है। दस तारीख तक जेबें व बटुवे नंगे हो जाते हैं। मम्मी चाहती हैं कि हम कोई शरीफ और समय पर पैसा देने वाला पेईंग गेस्ट रख लें। जो कमरा हम आपको देंगे, उसमें अटेच्ड बाथरूम भी है। पूरब में खिड़की है, पछुवा हवा चलती है तो अवश्य कमरे में आती है। चूँकि मैं और मेरी मम्मी घर में दो ही जनें हैं, इसलिए घनघोर खामोशी भी रहती है। किराया दो हज़ार से कम नहीं होगा। यदि आप ब्रेकफास्ट, लंच व डिनर लेंगे तो एक हज़ार रुपए और, यानि तीन हज़ार में परिवार की तमाम सुविधाएँ। एकदम रीजनेबल रेट है यह। एक और कारण है। आजकल महानगरों का जीवन सुरक्षित नहीं है। अकेली औरतें आतंक से घिरी रहती हैं।’
‘मैं सोच कर बताऊँगा।’ उसने छोटा सा उत्तर दिया।
‘लेकिन जल्दी, तीन दिनों के भीतर! समझे। कई ग्राहक आ रहे हैं पर हमें परिचित व शरीफ पेईंग गेस्ट चाहिए।’ श्रीशा ने आँखों में स्पन्दन वाले भावों को चमकाया।
रोहन को अपने भीतर कुछ महसूस होता सा लगा। श्रीशा सिर झुका कर चली गई।
तीसरे दिन छुट्टी थी। गणेशोत्सव की। मुम्बई में अकल्पनीय हलचल। भाँति-भाँति की मूर्तियाँ! आकर्षक व भावभीनी। मूर्तिकारों की सारी सोच, कल्पना और श्रम गणेश जी को विभिन्न रूपों में साकार करने की योजनाएँ। योजनाएँ क्रियान्वित होती हैं पर जब वे श्रद्धामयी मूर्तियाँ पानी में समर्पित कर दी जाती हैं तो श्रीशा का मन तड़प उठता है।
उसने इसी कारण गणेशोत्सव में शामिल होना बंद सा कर दिया पर उसे नहीं पता, मिट्टी की मूर्ति अंत में मिट्टी में मिल जाती है।
सूरज के डूबने का समय था। क्षितिज लाल। स्त्री-पुरुष और बच्चे बेतहाशा समुद्र की ओर जा रहे थे। उनके चेहरों पर श्रद्धा का रंग दपदप कर रहा था।
श्रीशा अपने को प्रकृति के विभिन्न रंगों में डूबाना चाहती थी पर उसे क्यों बार-बार याद आ रहा था कि आज तीसरा दिन है। रोहन आज नहीं आएगा तो? उसकी आँखों में आशा का समुद्र सिकुड़ने लगा। उसकी आँखों में झिलमिलाते रंग मिटने लगे। आशा थी कि वे जरूर आएँगे। मकान की उन्हें बहुत जरूरत है पर साँझ का सूरज अस्त होने के करीब था।
सहसा उसने गणेश भगवान को स्मरण किया। कदाचित वह कहीं से रोहन को अपने भीतर कीड़े की तरह कुलबुलाते हुए महसूस कर रही थी।
सहसा घंटी बजी। वह लपक कर दरवाजे की ओर भागी। बिना सोचे और बिना जाने उसने तपाक से दरवाजा खोल दिया।
एक गोरा-गोरा मुरझाया चेहरा खड़ा था।
‘आइए सर।’
रोहन भीतर आया। घर पुराना पर साफ-सुथरा। श्रीशा उसे उसी कमरे में ले गई, जिसे उसे किराए पर देना था। कमरे में वह सब कुछ था जिनकी एक व्यक्ति को जरूरत होती है। पंखा, पर्दे, डबल-बेड, बाथरूम, अलमारी, सोफा और साइड स्टूलें।
इन सबको देख कर रोहन की आँखों में एक साथ कई प्रश्न चमके।
‘बैठिए सर! मैं पानी लेकर आती हूँ।’
वह कमरे से बाहर चली गई। वह नादान बालक की तरह कमरे को देखता रहा।
‘सर! पानी!’
उसने पानी पिया। गटागट।
‘चाय पीएँगे या कॉफी?’
‘कॉफी।’
चली गई श्रीशा।
वह सोचने लगा कि क्या यही वह श्रीशा है जो लोगों की नज़रों में काफी फ्लर्ट है। कुछ लोग तो इसे चालू भी कहते हैं। व्यंग्य में दबी जबान में गंदगी उछालते हैं कि इसके शरीर के समन्दर में कई लोग डुबकी लगा चुके हैं पर रोहन को वह बड़ी शालीन लगी।
वह कॉफी ले आई थी। कप हलके नीले रंग के थे। कॉफी के साथ उनका मेल अच्छा लग रहा था। अपने लिए भी वह कॉफी लाई थी।
‘इतनी देर में आपने कमरा तो देख लिया होगा?’ श्रीशा सहज स्वर में बोली, ‘अब आप मेरी बातों पर ध्यान रखकर यस-नो कहिए सर!’ श्रीशा की आँखों में सहसा सैलाब उभरा। स्वर का बुझापन बढ़ गया। बोली, ‘दबाव की बात नहीं है। आप हम पर दया नहीं करेंगे। यदि यह रूम आपको पसंद है तो आप यहाँ रहने आ सकते हैं। हमें भी किसी अच्छे किराएदार की तलाश है। आप सभी दृष्टियों से सही हैं। और लोग कहते हैं कि एक से भले दो और दो से तीन।’
रोहन चुप हो गया। गंभीर कोमलता उसके चेहरे से चिपक गई। क्षणिक गूँगापन!
कॉफी के एक साथ दो घूँट लेकर रोहन ने कहा, ‘मैं तुमसे उम्मीद रखूँगा कि तुम मुझे सच-सच बताओगी, चाहे वह सच नीम की तरह कडुवा भले ही हो। इस कमरे को देख कर मुझे लगा कि क्या पहले उसमें कोई रहता था?’
बुत-सी स्थिरता श्रीशा में आ गई। आँखों से लगा कोई संवाद उसके आगे प्रेतात्मा सा नाच रहा है।
रोहन ने फिर पूछा, ‘सच बताओ।’ वह सहसा उसके सन्निकट हो गया। आप से तुम पर आ गया। उसकी गर्दन झुक गई। लगता था कि वह किसी अपराध बोध से घिर गई हो। फिर भी साहस करके वह बुझे स्वर में आहिस्ता-आहिस्ता बोली, ‘हाँ, इसमें मेरे पति रहते थे। माइ हसबैंड!’
‘क्या?’ रोहन की आँखें विस्फारित हो गई। जैसे सब कुछ पल भर के लिए थम गया हो।
‘हाँ रोहन बाबू! इस कमरे में मैं और मेरे पति रहते थे। इस कमरे में जो कुछ भी है, उनका ही खरीदा हुआ है।’
‘अब वे कहाँ हैं?’
‘ही इज नो मोर सर! मैं इतनी भाग्यहीन हूँ कि तुरन्त विधवा हो गई।’
‘उन्हें क्या हुआ था?’
‘कुछ नहीं, वे अपाहिज थे। एक टाँग से लँगड़े थे। कहते थे कि किशोरावस्था में एक्सीडेंट हो गया था। प्रॉपर इलाज न होने के कारण वे बैसाखी के सहारे चलते थे।’
‘फिर तुमने शादी.....।’ रोहन की आँखों में विस्मय चमका।
वह उदास मुस्कान से बोली, ‘हमने प्रेम विवाह किया था। एक बार मैं दफ्तर से आ रही थी। एक मोड़ पर एक कार वाला उन्हें टक्कर मार गया। वे अचेत हो गए। मैंने देखा उन्हें कोई उठा नहीं रहा है। मैं नहीं जानती कि वह किसकी प्रेरणा थी पर मैं उन्हें राहगीरों की सहायता से अस्पताल ले गई। सुबह तक वह स्वस्थ हो गए। रात को मैं घर लौट आई थी। उनका एक मित्र आ गया था।’
‘जब वे अचेत थे तब मैंने गौर से उन्हें देखा था। वे एकदम गोरे थे। नाक-नक्शे भी अच्छे थे। बाल घुंघराले थे। मुझे सुन्दर लगे। अपाहिज न होते तो उनका व्यक्तित्व लगभग आप जैसा ही था।’
‘सुबह मैं फिर अस्पताल गई। डॉक्टर ने उन्हें छुट्टी दे दी। वे मुझे अपने घर पहुँचाने का आग्रह करने लगे। मैं उनके घर गई। यही घर था उनका। मैंने उनके लिए चाय बनाई। उन्होंने मेरा, दवाइयों व डॉक्टरों की फीस का हिसाब-किताब किया। उन्होंने पूछा, ‘इतने रुपये आप कहाँ से लाई? मैंने उन्हें बताया कि कल मुझे तनख्वाह मिली थी।’ मैं वहाँ से आने लगी तो उन्होंने कहा- ‘मैं आपका अहसान सदैव याद रखूँगा। आप मुझसे जरूर मिलिएगा। एक परिचित के रूप में ही सही।’ तभी उनकी नौकरानी आ गई।
मैं उनके यहाँ यदाकदा जाती रहती थी। किस आकर्षण के तहत जाती रही परिभाषित नहीं कर सकती। यह वास्तव में प्रेम भावना थी या उनके अपाहिजपन के प्रति मेरी करुण भावना द्रवित हो गई थी। बस, वे मुझे अच्छे जरूर लगने लगे थे। वे बहुत भावुक व वाक्य पटु भी थे।
एक बार नरेन ने कहा था, ‘देखो श्रीशा, प्रेम शब्दातीत है। वह केवल अनुभव किया जा सकता है। उसके अर्थ और मर्म मेरी दृष्टि में अनेक हैं। वह हृदय का सत्य है।’
वस्तुतः रोहन साहब! वह प्रेम की बहुत अधिक व्याख्याएँ करता रहता था। मैं उन्हें सुन-सुन कर हतप्रभ हो जाती थी। उनके भावुकतापूर्ण संवादों और मनमोहक महत्त्वाकांक्षाओं ने मुझे सम्मोहित सा कर दिया था। मैं स्वयं बेचैन रहने लगी उनके लिए।
एक दिन मैंने उनसे विवाह का प्रस्ताव रखा। तब उन्होंने बताया, ‘सुनो, मैं इस संसार में अकेला हूँ। आज मेरी सात पीढ़ी में कोई नहीं है। यह फ्लैट मेरे मरहूम चाचा ने दिया था। वे कुँवारे थे। मैं जाति का कायस्थ हूँ। मुझे जो कुछ भी मिला है, अपाहिज होने के कारण मिला है।’ .... उसने पल भर रुक फिर कहा, ‘मुझे तुमसे शादी करके बहुत खुशी होगी। मेरा यह दुर्दान्त एकांत और चुभती ऊब मिट जाएगी। तुम्हें इस पर गंभीरता से सोचना है।’
मैंने अपनी माँ को नरेन की सारी स्थिति बताई। अपनी घरेलू स्थितियों का विश्लेषण किया। एक ‘खोली’ में रहने वाले निम्न मध्यवर्गीय परिवार के लिए यह सुनहरा अवसर था। .....पर माँ अकेली हो जाएगी। मैंने तय कर लिया कि माँ को अपने पास रखूँगी।
मैंने सारी बातें नरेन को बताई। नरेन ने सहर्ष स्वीकार कर लिया कि माँ जी हमारे साथ रहें, मुझे कोई एतराज नहीं।
शुभ मुहूत्र्त देखकर हमने कोर्ट-मैरिज कर ली। ......सही, पक्की और सस्ती अदालती शादी। साक्षी थे मेरी माँ, मेरी दो सहेलियाँ, नरेन के बॉस और उसके दो मित्र। इन लोगों को ही हमनें होटल में पार्टी दी।
सुहागरात भी हमने फूलों की खुशबू में मनाई। मुझे लगा कि नरेन पूरा पक्का और तगड़ा मर्द है। टूटे लुंज पुंज पाँव पौरुष के प्रदर्शन में बाधा नहीं बनते।
चंद ही दिनों के बाद मुझे महसूस हुआ कि चाहे एरेंज मैरिज हो या लव मैरिज, लेकिन यह पत्थर की लकीर की तरह अमिट सत्य है कि पति होते ही हर मर्द हुक्मरान बन जाता है। जैसे उसके हुक्म की तामील तुरन्त हो। मैंने जाना कि मर्द की देह नब्बे प्रतिशत उसकी अपनी होती है और स्त्री की दस प्रतिशत अपनी। यही हाल उसके मन का होता है। वह शादी के पूर्व नरेन मेरा भावुक दोस्त था पर शादी के पश्चात् वह मेरा स्वामी बन गया। यदि मैं उसकी कोई बात नहीं मानती तो उसकी आकृति पर रंग-बिरंगी भाव-रेखाएँ दिखाई पड़ती थीं। वह स्थिर सा हो जाता था। उसकी आँखों में मौन-आज्ञा की किरणें चमक उठती थीं।
उसके इस व्यवहार से मैं बर्फ बनती जा रही थी। अपने को अन्तस को उत्तेजित सहसा नहीं कर पाती थी। मैं उससे उबने लगी। असहिष्णु हो गई। वाक्य-युद्ध होने लगे। मैं बिल्कुल अजनबी हो जाती थी। माँ भी एक माह के बाद आ गई थी। उसके कारण मैं जरा खुश थी। अपने को सुरक्षित समझती थी। हमारा कोई विशिष्ट नहीं, सामान्य जीवन चल रहा था। क्योंकि मैं भी कमाती थी।
कई बार कुछ घटनाएँ अनायास घट जाती हैं। वे अच्छी भी होती हैं और बुरी भी।
एक दिन वे दफ्तर से वेतन लेकर आए। बाज़ार से मेरे लिए साड़ी और मिठाई लाए। मुझे वह नई साड़ी पहनाई। कहा, ‘आज मेरा जन्मदिन है।’ रात को उन्होंने कई बार शरीर के समन्दर में गोते लगाए। वे असीम आह्लाद से घिरे थे।
सुबह मैं उठ कर काम में लग गई। वे देर से उठे। चाय पी। लैट्रिन में घुसे। घुसे तो फिर बाहर ही नहीं निकले। मैंने कई बार पुकारा। कोई उत्तर नहीं। मैंने माँ को कहा। माँ भी घबराई।.... मैंने उन्हें जोर-जोर से पुकारा। दरवाजा भड़भड़ाया।
अब मेरा धैर्य जाता रहा। मैं भाग कर निचली मंजिल के मिस्टर जोशी को बुला कर लाई। उन्होंने भी प्रयास किया। हमारी चिंता व घबराहट बढ़ती ही जा रही थी। अमंगल आशंकाएँ हमारा घेराव करने लगी थीं।
मिस्टर जोशी भाग कर एक मिस्त्री को लाए। उसने दरवाजा उखाड़ा। वे अर्धनग्न फर्श पर पड़े थे। जोशी जी ने उन्हें झिंझोड़ा, बार-बार पुकारा। दिल की धड़कनें सुनी पर निष्फल। जोशी ने मुझे दर्द भरी लुक दी और कहा-‘‘आई थिंक, ही इज नो मोर!’’
तभी कुछ लोग और आ गए थे। एक भाग कर डाक्टर को ले आया। उसने भी कह दिया कि हंसा उड़ गया। ....रोहन! सोचो, सारा खेल चंद मिनटों में खत्म हो गया कितनी अकल्पनीय घटना थी। कितना ही अपना हो पर मृत्यु के बाद उसे जितना जल्दी हो सकता है, आग के हवाले हम कर देते हैं। नरेन का दाह-संस्कार कर दिया गया। उसे मुखाग्नि मैंने दी।
मेरी सहेलियाँ और उनके मित्र ‘उठावणी’ में आए। बारहवें दिन मम्मी के दबाव पर ग्यारह ब्राह्मणों को भोजन कराया। उनके पकड़े गरीबों को बाँटे। उसकी बैसाखी समुद्र को दे दी, कभी वह लंगड़ा होगा या किसी को लंगड़ा करेगा तो उसके काम आएगी।
इसके बाद घर में धीरे-धीरे सन्नाटा पसर गया। प्रेतात्मा के घर का घुटनदार सन्नाटा। मुझे पीड़ादायक ऊब का अहसास पहली बार हुआ।
रोहन ! समय हर जख़्म को भर देता है। समय हर स्मृति को धुँधला कर देता है, समय पत्थर की लकीर को भी घिस देता है।
मैंने भी अपने को सामान्य कर लिया। जीने के लिए एक खूबसूरत व सुखद बहाना जरूरी है। भीतर के साँय-साँय करते सन्नाटों को मारने के लिए मैंने हँसी, मजाक, खुलेपन, सतहीपन से जीना शुरू कर दिया। लेकिन मेरा अन्तस पहाड़ी घाटियों की तरह सूना है। हाँ, नरेन के एक खास दोस्त ‘हाशमी’ को यह वहम हो गया था कि मैंने इस फ्लैट व लंगड़े पति से छुटकारा पाने के लिए उसकी हत्या कर दी है। उसने भाभीजान-भाभीजान कह कर मुझसे सम्पर्क भी बढ़ाया पर जब वह कुरेद-कुरेद कर सवाल पूछने लगा और कई बार उसने मेरा पीछा किया तो मैंने उसकी मनसा को भाँप लिया। मैंने उसे कह ही दिया, ‘मुझे उनके दोस्तों को सम्मान देना अच्छा लगता है पर मेरी जो जासूसी करता है, वह इंसान मेरे लिए घृणा के लायक है। हाशमी साहब! फिर कभी आप मुझसे बात नहीं करेंगे।’
अब आप ही बताइए, कई लोग निरर्थक हुशियारी करते हैं। सच तो यह है कि कोई मेरे निजी सच को नहीं जानता कि मैं कितनी दुखी और संकटों से घिरी हूँ। मैं इस देश की अधिकतर स्त्रियों की तरह जीती हूँ। मेरी आंतरिक पीड़ा को कोई नहीं समझता। लोग समझते हैं कि यह फ्लर्ट है। नहीं रोहन बाबू... मेरे भीतर कई ज्वार-भाटे हैं। दुखों, नीरसता, व्यर्थता और पलायन के कई प्रेत हैं। ये प्रेत कब मेरा गला घोंट दें मैं नहीं जानती। मैं अकेली भयभीत रहती हूँ।
रोहन इतनी देर खामोश बैठा था। बोला, ‘‘मैं यहाँ नहीं आऊँगा। न मैं तुम्हारे भीतर के सन्नाटों को तोड़ना चाहता हूँ और न बाहर की खुशियाँ मिटाना चाहता हूँ। मुझमें वह शक्ति भी नहीं है कि तुम्हारे पीड़ा के प्रेतों को भगा सकूँ। मैं शांति चाहता हूँ प्रगाढ़ शांति।’’
‘लेकिन आपको यहाँ आना ही है।’’
‘‘श्रीशा! औरत के साथ एक अकेला मर्द रहने से कई खतरें हैं। ये खतरें कई बार अनर्थ भी कर सकते हैं। मानसिक चैन को मिटा सकते हैं। गंदे विचार फैला सकते हैं। गलतफहमियों के कांटे चुभा सकते हैं।’’ उसके स्वर में तड़प थी।
‘‘रोहन बाबू! आपको यहाँ आना ही है। जरूर आना है और आपकी अपनी शर्तों पर आना है। झूठ चोर की तरह होता है, उसके पाँव कच्चे होते हैं अतः वह सच की झलक से भाग जाता है। हाँ, कई सयाने कहते हैं कि सच्चे व अच्छे आदमी के आने से वहाँ के सारे प्रेत भाग जाते हैं। मेरे अन्तस में कई प्रेत हैं। वे तो आपके आने से ही जरूर भाग जाएँगे। खतरों की बात? खतरों के बिना नये सुखों की तलाश नहीं होती।’ वह भावुक हो गई। उसकी आँखें छलक आई। रोहन उसे अपलक देखता रहा। वह थोड़ा सा मुस्कुराया।
सन्निकट स्थित मंदिर में शंख बज उठा। उसकी पवित्र और मधुर आवाज़ में प्रेरणाएँ थीं।

सोमवार, १६ फरवरी २००९

परिचय: महाश्वेता देवी -शम्भु चौधरी


Mahasweta Deviमहाश्वेता देवी एक ऐसा नाम जिसका ध्यान में आते ही उनकी कई-कई छवियां आंखों के सामने प्रकट हो जाती हैं। जिसने अपनी मेहनत व ईमानदारी के बलबूते अपने व्यक्तित्व को निखारा है। उन्होंने अपने को एक पत्रकार, लेखक, साहित्यकार और आंदोलनधर्मी के रूप में विकसित किया। महाश्वेता देवी का जन्म सोमवार 14 जनवरी १९२६ को ईस्ट बंगाल जो भारत विभाजन के समय पूर्वी पाकिस्तान वर्तमान में (बांग्लादेश) के ढाका शहर में हुआ था।
गत 13 फरवरी '2009 को सुबह 11.30 बजे सहारा समय (कोलकाता) की वरिष्ठ पत्रकार सईदा सादिया अज़ीम , हिन्द-युग्म (दिल्ली से) श्री शैलेश भारतवासी और मैं खुद कोलकाता स्थित महाश्वेता देवी के घर उसने मिलने गये थे।
महाश्वेता जी ने अपना सारा जीवन ही मानो आदिवासियों के साथ गुजार दिया हो। जल, जंगल और जमीन की लड़ाई के संघर्ष में खर्च कर दिया हो। उन्होंने पश्चिम बंगाल की दो जनजातियों 'लोधास' और 'शबर' विशेष पर बहुत काम किया है। इन संघर्षों के दौरान पीड़ा के स्वर को महाश्वेता ने बहुत करीब से सुना और महसूस किया है।
Mahasewta Devi and Shambhu Choudharyपीड़ा के ये स्वर उनकी रचनाओं में साफ-साफ सुनाई पड़ते हैं। उनकी कुछ महत्वपूर्ण कृतियों में 'अग्निगर्भ' 'जंगल के दावेदार' और '1084 की मां' हैं। आपको पद्मविभूषण पुरस्कार (२००६), रैमन मैग्सेसे (1997), भारतीय ज्ञानपीठ(1996) सहित कई अन्य पुरस्कारों से भी सम्मानित किया जा चुका है। पिछले दशक में महाश्वेता देवी को कई साहित्यिक पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है। आपको मग्सेसे पुरस्कार से भी सम्मानित किया जा चुका है जो एशिया महादीप में नोबेल पुरस्कार के समकक्ष माना जाता है।
फिर भी आप बोलती हैं कि आपने किसी पुरस्कार के लिये कार्य नहीं किया। बार-बार आदिवासी के प्रश्न पर विचलित होते इनको कई बार देखा गया। कहती हैं कि "हम लोग तब तक अपने आपको सभ्य नहीं कह सकतें,जब तक हम आदिवासियों के जीवन को नहीं बदल देते। आपने 'संथाल', 'लोधास', 'शबर' और मुंदास जैसे खास आदिवासी (आदिवासी जन जाति) लोगों के जीवन को बहुत गहराई से न सिर्फ अध्ययन ही किया इन पर बहुत कुछ अपनी कथाओं में समेटने का प्रयास भी किया है, आज भी आपको ऐसे समाचार विचलित कर देतें हैं जहाँ किसी आदिवास के ऊपर ज़ुल्म किया जाता है। आप सदैव से सामाजिक और राजनीतिक प्रासंगिक विषयों पर अपनी कलम से प्रहार करती रहीं हैं। आप एक जगह लिखती हैं- ‘‘एक लम्बे अरसे से मेरे भीतर जनजातीय समाज के लिए पीड़ा की जो ज्वाला धधक रही है, वह मेरी चिता के साथ ही शांत होगी.....।’’ आपने अपना पूरा जीवन और साहित्य, आदिवासी और भारतीय जनजातीय समाज को समर्पित कर दिया है। इसलिए नौ कहानियों संग्रह में से आठ कहानियों के केन्द्र में आदिवासी जाति केन्द्रित है, जो आज भी समाज की मूख्यधारा से कटकर जी रहा है।
Mahasveta Deviलेखिका महाश्वेता देवी 14 जनवरी 2009 को 83 वें साल की हो गई, पर इनके चेहरे पर हमें कहीं कोई थकान देखने को नहीं मिला। बातें ऐसे करती हैं जैसे कोई परिवार का सदस्य ही हो हम। वर्ष 1967 में नक्सलबाड़ी आंदोलन के दौरान उनकी लेखनी ने लोगों को दहला दिया था। आज भी किसी आंदोलन के नाम आपको आगे देखा जा सकता है। जब मैंने यह प्रश्न किया कि-"आप तो बुद्धदेव बाबू (वर्तमान में बंगाल के मुख्यमंत्री) को तो बहुत मानती थी, फिर नंदीग्राम और सिंगूर के मुद्दे पर आपने उनका साथ नहीं दिया?" बोलने लगी- " मैं बहुत दिन राजनीतिक की हूँ। किसानों की जमीं को दखल करके उद्योग कैसे लगाया जा सकता है?" तुम्हीं सोचो... फिर थोड़ा रूक कर किसान भूमिहीन हो जायेगा तो खायेगा क्या?
तब तलक फोटोग्राफर भी आ गया था। उसे देखते ही एकदम से उस पर बरस पड़ी "एई...ई अमार छ्वी कोथाई?" फिर मुस्कराते हुए बोलीं- " तारा.. ताड़ी छ्वी तुलो ... ओनेक काज कोरते होवे...."( देवज्योति फोटोग्रफर को देखते ही उस पर नाराज हो गई.... ए लड़के ... मेरी फोटौ कहाँ है? ... फिर थोड़ा मुस्कारते हुए कहा.. जल्दी से फोटो ले लो मुझे बहुत काम करना है अभी) इससे पहले जब हिन्द-युग्म के श्री शैलेश भारतवासी उनसे बात करना शुरू ही किये थे तो बात को शुरू करने के लिये मैंने जैसे ही बंगला में उनका परिचय देना शुरू किया तो बोलने लगी- "तुमी हिन्दीते बोलो... मैं अच्छा से हिन्दी जानती हूँ।"
आपने साहित्य व सांस्कृतिक आंदोलन के साथ राजनीतिक आन्दोलनों में भी भाग लिया है। तसलीमा नसरीन को कोलकाता से हटाये जाने के मामले को लेकर वे पश्चिम बंगाल व केंद्र सरकार के रवैये से काफी आहत हैं। आप बोलती हैं कि " इधर देश में जहाँ मुस्लमान हैं वहाँ हमलोग मुस्लीम उम्मीदवार तो जिधर हिन्दू हैं उधर हिन्दू उम्मीदवार खड़े करते हैं इससे देश कैसे चलेगा। सोचो तब तो उनकी भाषा में ही हमें बात करना होगा। हमने उनके साथ जो पल गुजारा इसे आपके साथ बाँटने का यह प्रयासभर है। किसी राजनैतिक विचारधारा से हमें कोई सरोकार नहीं है, फिर भी कहीं कोई बात आपको राजनीति सी लगती हो तो उसे नजरांदाज कर देंगे। इस अवसर पर आपको मेरे द्वारा संपादित कोलकाता से प्रकाशित एक समाजिक पत्रिका "समाज विकास" के कुछ साहित्य विशेषांक भी भेंट किया जिसे आपने स्वीकार करते हुए कहा कि- "खूब भालो काज कोरछो तुमी" ( खूब अच्छा काम करते हो तुम) चेहरे पर तेजस्व की रोशनी इस तरह चमक रही थी जैसे साक्षात हमने माँ का दर्शन कर लिया हो।
परिचय:
आप न सिर्फ एक प्रख्यात लेखिका एक सामाजिक कार्यकर्ता भी हैं। महाश्वेता देवी का जन्म सोमवार 14 जनवरी १९२६ को ईस्ट बंगाल जो भारत विभाजन के समय पूर्वी पाकिस्तान वर्तमान में (बांग्लादेश) के ढाका शहर में हुआ था। आपके पिता मनीष घटक एक कवि और एक उपन्यासकार थे, और आपकी माता धारीत्री देवी भी एक लेखकिका और एक सामाजिक कार्यकर्ता थी। आपकी स्कूली शिक्षा ढाका में हुई। भारत विभाजन के समय किशोरवस्था में ही आपका परिवार पश्चिम बंगाल में आकर बस गया। बाद में आपने विश्वभारती विश्वविद्यालय,शांतीनिकेतन से बी.ए.(Hons)अंग्रेजी में किया, और फिर कलकत्ता विश्वविद्यालय में एम.ए. अंग्रेजी में किया। कोलकाता विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य में मास्टर की डिग्री प्राप्त करने के बाद एक शिक्षक और पत्रकार के रूप में आपने अपना जीवन शुरू किया। तदुपरांत आपने कलकत्ता विश्वविद्यालय में अंग्रेजी व्याख्याता के रूप में नौकरी भी की। तदपश्चात 1984 में लेखन पर ध्यान केंद्रित करने के लिए आपने सेवानिवृत्त ले ली।
महाश्वेता जी ने कम उम्र में लेखन का शुरू किया और विभिन्न साहित्यिक पत्रिकाओं के लिए लघु कथाओं का महत्वपूर्ण योगदान दिया। आपकी पहली उपन्यास, "नाती", 1957 में अपनी कृतियों में प्रकाशित किया गया था
‘झाँसी की रानी’ महाश्वेता देवी की प्रथम रचना है। जो 1956 में प्रकाशन में आया। स्वयं उन्हीं के शब्दों में, "इसको लिखने के बाद मैं समझ पाई कि मैं एक कथाकार बनूँगी।" इस पुस्तक को महाश्वेता जी ने कलकत्ता में बैठकर नहीं बल्कि सागर, जबलपुर, पूना, इंदौर, ललितपुर के जंगलों, झाँसी ग्वालियर, कालपी में घटित तमाम घटनाओं यानी 1857-58 में इतिहास के मंच पर जो हुआ उस सबके साथ-साथ चलते हुए लिखा। अपनी नायिका के अलावा लेखिका ने क्रांति के तमाम अग्रदूतों और यहाँ तक कि अंग्रेज अफसर तक के साथ न्याय करने का प्रयास किया है। आप बताती हैं कि "पहले मेरी मूल विधा कविता थी, अब कहानी और उपन्यास है।" उनकी कुछ महत्वपूर्ण कृतियों में 'अग्निगर्भ' 'जंगल के दावेदार' और '1084 की मां', माहेश्वर, ग्राम बांग्ला हैं। पिछले चालीस वर्षों में, आपकी छोटी-छोटी कहानियों के बीस संग्रह प्रकाशित किये जा चुके हैं और सौ उपन्यासों के करीब (सभी बंगला भाषा में) प्रकाशित हो चुकी है।
आपकी कुछ कृतियां हिन्दी में:(सभी बंग्ला से हिन्दी में रुपांतरण)
अक्लांत कौरव, अग्निगर्भ, अमृत संचय, आदिवासी कथा, ईंट के ऊपर ईंट, उन्तीसवीं धारा का आरोपी, उम्रकैद, कृष्ण द्वादशी, ग्राम बांग्ला, घहराती घटाएँ, चोट्टि मुंडा और उसका तीर, जंगल के दावेदार, जकड़न, जली थी अग्निशिखा, झाँसी की रानी, टेरोडैक्टिल, दौलति, नटी, बनिया बहू, मर्डरर की माँ, मातृछवि, मास्टर साब, मीलू के लिए, रिपोर्टर, रिपोर्टर, श्री श्री गणेश महिमा, स्त्री पर्व, स्वाहा और हीरो-एक ब्लू प्रिंट आदि...

Contact Address: Smt. Mahasveta Devi, W-2C, 12/3 Phase- II, Golf Green, Kolakata - 700095 Phone: 033-24143033

रविवार, ८ फरवरी २००९

लघुकथा की प्रासंगिकता एवं उपादेयता -डॉ. वीरेन्द्र सिंह यादव

आर्थिक उदारीकरण, ग्लोबलाइजेशन अर्थात् एक ध्रुवीय होती दुनिया के इस वर्तमान भौतिकवादी युग में किश्त-किश्त जीवन जीता आदमी व्यक्तिगत जिजीविषा की पूर्ति हेतु दिनोंदिन आदमी नहीं, मशीन बनता जा रहा है। वह समय को अपना उत्पादक बनाकर बहुत ही चालाकी से उसका व्यापार कर रहा है, वास्तविकता यह है कि ऐसे समय में जब दुनियां की मण्डी में समय की कलाबाजी हो रही है, मनुष्य अपना समय निःस्वार्थ नष्ट नहीं कर सकता। इसलिए पेशेवर साहित्यधर्मियों एवं पाठकों को छोडकर शेष लोग अपनी मानसिक थकान मिटाने हेतु कुछ ऐसा पढ़ना या समझना चाहते हैं, जिसमें समय कम लगे और उन्हें उसका प्रतिफल पर्याप्त मात्रा में प्राप्त कर सकें। साथ ही उसके ग्रहण करने एवं समझने का दायरा दर्पण की तस्वीर की तरह पारदर्शी भी हो। आज लघुकथाओं की यही सार्थकता, प्रासंगिकता एवं उपादेयता भी है।

लघुकथाकार अनावश्यक कथा विस्तार, वर्णनात्मक फैलाव और विलगाव से बचता हुआ जीवन के छोटे घटना प्रसंग संवेदनाओं के माध्यम से व्यक्त करता है। विधा के रूप में जिस तरह साहित्य के गद्य रूप की कथा विधाएँ-उपन्यास एवं कहानी होती है, उसी तरह लघुकथा इन्हीं तत्वों के परिप्रेक्ष्य में लिखी जाती हैं। इन तीनों उपविधाओं में अन्तर मात्र कथानकों का होता है जिसके कारण इन तीनों में स्वतः ही आकारगत अन्तर आ जाना लाजमी है। इन्हीं प्रमुख बिन्दुओं पर इसका शिल्प केन्द्रित होता है, अब वह शिल्प चाहे पारम्परिक हो, प्रयत्न साध्य हो या स्वयंभू हो। जहाँ तक लघुकथा की पृथक पहचान का सवाल है, एक तो कथानक को लेकर आकारगत इसकी अपनी पृथक पहचान हैं तो दूसरी ओर हृदय में गहरे पैठकर मार करने की इसकी क्षमता विशेष पहचान रखती है। या यूँ कहा जाये कि “लघु कथा युगबोध को अभिव्यक्त करती है और नैतिक जीवनमूल्यों और नैतिक जीवनमूल्यों की राख के अन्दर कुरेदती हे। वह आलपिन की चुभन भी है और गन्ध की छुअन भी है। दरअसल लघुकथा की अनिवार्य शर्त रूप में न होकर गुण में है, शिक्षा में न होकर संस्कार में है दृश्य में न होकर प्रभाव में है, स्वास्थ्य में न होकर व्यक्तित्व में है और व्यक्तित्व कर्म से बनता है, कसरत से नहीं।”

लघुकथा अपनी वैचारिक प्रक्रिया के द्वारा आश्रय के मन में एक भावनात्मक रूप ग्रहण करती है, जिसके भीतर उद्‌बोधित शोक, मानवीय शोषण, गरीबी, उत्पीड़न, असहायता के प्रति करुणा अर्थात् मानव को त्रासद परिस्थितियों से मुक्त कराने के भाव से सराबोर हो उठता है, जिसके कारण आश्रय के मन में साहस का एक ऐसा नया भाव जागृत हो उठता है जो बुराइयों, अन्धविश्वासों, रूढ़ियों, साम्राज्यवादियों, नीतियों के विरोध में संघर्ष और चुनौती का वीरतापूर्वक परिचय देने लगता है। सही अर्थों में देखा जाये तो लघुकथा की यही सत्योन्मुखी संवेदनशीलता है, जो शोषणविहीन समाज अर्थात् मंगलकारी तत्व की स्थापना करना चाहती है।

आकार की बात करें तो लघुकथा पंचतंत्र की बोधकथा की तरह आरम्भ होती है किन्तु बोध कथा का उद्देश्य केवल उपदेशात्मक होता था जबकि आधुनिक लघुकथा का लक्ष्य बहुआयामी है। तुलमात्मक दृष्टि से अवलोकर करें तो लघु कथाहास्य से थोड़ी दूर बनाकर चलती है, वहीं दूसरी ओर व्यंग्य के प्रति इसका सम्बन्ध घनिष्ट होता है। क्योंकि आज के विसंगति प्रधान समाज पर यह करारा प्रहार करती है।

लघुकथा में व्यंग्य का होना अनिवार्य नहीं है, परन्तु व्यंग्य की उपस्थिति से लघुकथा में रोचकता आ जाती है। लघुकथा अपनी विशेषता से पाठक के मूड में जबर्दस्त परिवर्तन कर दे, साथ ही उसके मानस को कुछ सोचने पर विवश कर दे, उसमें वैचारिक विद्रोह का बीज बो दे। यह भी कहा जा सकता है कि लघुकथा एक पृष्ठ की गद्य सीमा में पूर्वजों सा प्राचीन या नवजात शिशु-सा ताजा कथानक, प्रत्यंचा से कसे हुए शब्द, फैशन के समान बन्धनहीन आकर्षक शैली और अन्त में कुछ करने अथवा बनने की ओर पाठक की तड़प का उद्देश्य लिए हुए हो। इन्टरनेटी युग मे सभी इसकी सार्थकता है।

लघुकथाओं की सर्जनात्मक शक्ति कहानी से किसी स्तर में कम नहीं मान जा सकती है। समसामयिक जीवन की विसंगतियों के विरुद्ध लघुकथाओं में जिस तीखेपन और वास्तविक रूप में विरोध/प्रतिरोध का स्वर गुंजित हुआ है, उससे इन लघुकथाओं की जीवन्तता की तस्वीर स्पष्ट दिखती है। इसके साथ ही अन्य सम्भावनाओं की आशा एवं प्रगति साफ दिखती है। वास्तव में मन के अंतःकोणों से लेकर विराट सामाजिक परिदृश्य को चित्रित करने में लघु कथाएँ निश्चय ही अपने नघु रूपबन्ध कहानी के अनुरूप दिखाई देती है।

लघुकथा सामाजिक विद्रूपताओं/विसंगतियों के विरुद्ध एक रचनात्मक आह्वान है। लघुकथा पाठकों को आज की आपा-धापी और समयाभाव के बीव जीवनानुभवों और यथार्थ के विविध सन्दर्भों आयामों का बोध कराती है। इन लघुकथाओं के माध्यम से रचनाकार उन जीवनपरिस्थितियों से परिचय कराता है जिनसे सम्पूर्ण मानवीय जीवन प्रभावित होता है। ये लघुकथाएँ कविता और गजलों की तरह सामाजिक, राजनीतिक और दैनिक जीवन की विसंगतियों/घटनाओं को विशिष्ट अन्दाज में वर्णन करती है। पढ़ने वाला इसके प्रति लगाव महसूस करने लगता है। वास्तविकता यह है कि लघुकथाओं में ’नावक‘ के मानक के समान सीमित शब्दों में बहुत कुछ कहने की असीमित शक्ति छिपी हुई है। उसमें व्यंग्य की पैनी धार है, आक्रोश के तीखे स्वर हैं, प्रतीकों और बिम्बों की सशक्त प्रयोगधर्मिता है, सारग्राहवाणी, है क्रान्तिधर्मी चेतना है, समूचे परिवेश को समेट लेने की अपरिमित क्षमता विद्यमान रहती है।

आज बाजारवाद ने लोकतंत्र को अभिजात्व वर्ग तक सीमित कर दिया है। आधुनिक भारत में पूँजीवाद के विकास के असंगत गति के परिणामस्वरूप ही सामाजिक, राजनीतिक विषमताओं जन्म हुआ। आजादी के बाद हमारे देश में पूँजीवादी व्यवस्था का शोषण चक्र जिस तीव्रता के साथ हुआ है उससे हमारे सामाजिक जीवन में अजीबोगरीब परिवर्तन हुए हैं। वर्गवादी और स्वार्थी सत्ता की राजनीति ने अब तक मानवीय मूल्यों को अपूरणीय क्षति पहुँचाई है, जिससे मानव अमानवीय जीवन जीने के लिए विवश हुआ है। भ्रष्टाचार, कालाबाजारी, स्मगलिंग, परिवारवाद, व्यक्तिवादी सोच को निरन्तर बढ़ावा मिलने के कारण सम्बन्धों में विघटन तेजी से आया है। व्यक्ति वर्गों और सम्प्रदायो में विभाजित हो गया है, वह उपभोक्ता संस्कृति का एक प्रोडक्ट बनकर रह गया है। साम्प्रदायिक, धार्मिक, आपराधिक राजनीति ने मनुष्य को असुरक्षा, भय और हिंसा के वातावरण में प्रवेश करने को मजबूर कर दिया है। अर्थशास्त्र की गणित के कारण रिश्वत, हिसां, लूट, बलात्कार तथा हत्या आदि को निरन्तर प्रश्रय मिल रहा है। नेता, अधिकारियों और पुलिस के त्रिगुट ने जहाँ अपने स्वार्थों की पूर्ति की है, वहीं मानव जीवन को प्रभावित/आतंकित भी किया है। इस पूँजीवादी व्यवस्था के पतनशील मूल्यों के कुप्रभाव के परिणामस्वरूप राष्ट्रीय एकता और अखण्डता की समस्या उत्पन्न हो गयी है। सूचना संचार के माध्यमों-प्रेस, पत्र, रेडियो, टेलिविजन द्वारा निरन्तर साहित्य-संस्कृति को क्षग्रिस्त करने का सफल-असफल प्रयास किया जा रहा है। पुलिस और नौकरशाही से तालमेल के कारण समाज में ऐसी घृणित घटनाओं का सृजन हो रहा है कि शर्म से सिर नीचा हो जाता है। इस तथ्य को प्रेस भी स्वीकार करता है। वोट बैंक, जातिवाद और राजनीति के कारण मानव मन, परिवार, गाँव, शहर और समूचे समाज में विघटन की सतत् प्रक्रिया जारी है। इक्कीसवीं सदी के हसीन सपनों में जीता हुआ व्यक्ति स्वतंत्रता, विकास, नई शिक्षा नीति के सुनहरे नारों के बीच आर्थिक संकट से उबरने के लिए भरपूर शक्ति से प्रयास कर रहा है। व्यवस्था की इन विसंगतियों और कुरूपताओं को यथार्थ अभिव्यक्ति देने में इन लघुकथाओं ने सशक्त और जारूक पेशकश की है। इनके माध्यम से पाठक प्रतिदिन के वातावरण में होने वाली घटनाओं एवं कशमकश से वाकिफ़ और रू-ब-रू होता है। दूसरी ओर वह उन परिस्थितियों के लिए ज़िम्मेदार ताक़तों/शक्तियों को पहचानने में सफल होता है, जिसकी वजह से व्यक्ति का जीवन विसंगतिपूर्ण और अमानवीयता की ओर अग्रसर होता चला आ रहा है। लघुकथा का मूल अर्थ/तेवर मानवीय सहानुभूति का भाव एवं व्यवस्था में होने वाली सडांध का विरोध करना पड़ रहा है, जो इसकी सार्थकता को सिद्ध करता है।

हिन्दी लघुकथाओं के विकास में लघु पत्र/पत्रिकाओं की विशिष्ट भूमिका रही है क्योंकि इन पत्रिकाओं के माध्यम से ही लघुकथाओं की पहचान स्पष्ट हो सकती है। वास्तविकता यह है कि इन पत्रिकाओं के माध्यम से अपनी विकास यात्रा के दौरान इन लघुकथाओं ने उन ऊँचेऊँचे सोपानों को स्पर्श किया जिनके आधार पर ही कहानी केन्द्रीय विधा के रूप में प्रतिष्ठित हुई। अपनी इस आत्म यात्रा में ही लघुकथाओं की लेखन परम्परा समृद्ध और प्रसिद्ध हुई है। सन् सत्तर के दशक में समकालीन विधाओं के बीच लघु कथा ने अपना एक स्वतंत्र वजूद बना दिया था। ’सारिका‘ जैसी महत्वपूर्ण कथापत्रिका ने लघुकथाओं के विशेषांक और महत्वपूर्ण अंकों को प्रकाशित कर लघुकथाओं के महत्व की स्वीकृति को सार्वजनिक किया है। वर्तमान समय में प्रत्येक पत्रिका में इस विधा के प्रति रुचि सम्पादकों का ध्यान आकृष्ट किए हुए हैं। हिन्दी आलोचकों ने अवश्य इस ओर अपनी उपेक्षा दृष्टि और संकीर्ण मानसिकता का परिचय दिया है। समय-समय पर लघुकथाओं के विशेषांक, प्रदर्शनी तथा सेमिनारों के बढ़ते प्रभाव ने इसकी प्रासंगिकता सिद्ध की है।

स्पष्ट है कि आकार, तकनीक एवं शैली के आधार पर लघुकथा की अपनी पृथक पहचान बन चुकी है। लघुकथा का शिल्प परिणाम एवं विस्तार में प्रौढ़ता प्राप्त कर चुका है। इसलिए वर्तमान में लघुकथा के प्रति अनेक रचनाकारों का समर्थन और उत्साह अकारण नहीं है। जिस तीव्रता के साथ लघुकथा समृद्धता की ओर अग्रसर हो रही है, वह किसी भी साहित्य के लिए आश्चर्य का विशय हो सकता है। यह कहा जा सकता है कि लघुकथा विधा की स्थापना व्यावहारिक, शास्त्रीय और सैद्धान्तिक दृष्टि से अपनी स्वाभाविक व सहज विकास यात्रा के प्रखर सोपान पर है, जो इसकी सार्थकता, प्रासंगिकता एवं उपादेयता को सिद्ध करता है।

F.I.R. का अपराधी

बड़े साहब हड़बड़ी में थे और अपना काम समेट कर कहीं जाने ही वाले थे कि अचानक हिम्मत सिंह ने चेम्बर में प्रवेश करते हुए विस्फोट किया- "साहब ठाकुर दुर्जन सिंह के खिलाफ F.I.R. दर्ज हुई है।"
इस समाचार से मानो कुर्सी खिसक गयी हो साहब की, उसीके पैसों से तो ये थाना चल रहा है; और फिर चुनाव सर पर है, ऐसी स्थिति में....!
क्या मुसीबत है, कोई चैन से बैठने भी नहीं देता है। साहब का मुंह कड़वा हो गया। ठाकुर साहब के खिलाफ ये कोई पहली शिकायत नहीं थी, अभी पिछले दिनों ही छोटे थाने के सिपाही ने दफ़्तर में सरकारी कागजों से छेड़छाड़ का आरोप लगाया था, हालाँकि उसने ठाकुर साहब का नाम नहीं लिया, पर बड़े साहब की तफ्तीश में उनका नाम स्पष्ट उजागर हुआ था। सिपाही को तो डांट-डपट कर और घुड़की देकर मामला दबाने को कह दिया गया था, और साथ में हिदायत भी दे दी गयी थी की अगर थाने में रहना है तो साहब लोगों की बातों को हज़म करने की आदत डाल लेवे, अभी ये मामला शांत भी नहीं हुआ था की ये नया मामला वो भी सीधे-सीधे इसी थाने में।
"मामला क्या है? किसने की है रिपोर्ट" - साहब ने एक प्रश्नभरी मुद्रा में हिम्म्त सिंह से पुछा
साहब का चेहरा देखकर हिम्मत सिंह को तो पसीने ही आ गये,
"आज दुखिया की तो खैर नहीं", हिम्मत सिंह ने मन ही मन में सोचा।
जी...ज्ज्ज्जी ! हजूर ! दुखिया ने कराई है रिपोर्ट, कह रहा है; मेरी जीवन भर की कमाई पूंजी ठाकुर साहब ने हड़प ली। बुढउ को ठाकुर साहब का भी डर नहीं, बताइए तो.. मैंने घुड़की दी पर उसने कहा- "फांसी पर लटक जाईब... झूठ न बोईली..." रिपोर्ट अभी नोट ही किया है; आगे आप जो आदेश देंवे।" हिम्मत सिंह ने कहा।
उधर मामला तूल पकड़ता जा रहा था, गांव में बात, जंगल की आग की तरह फैल रही थी, पत्रकार लोग सीधे साहब से जवाब पाने को उतावले हो रहे थे। चुप बैठने से भी काम चलने वाला नहीं था।
तुरन्त साहब ने ठाकुर साहब को फ़ोन मिला कर दो मिनट बातें की। पता नहीं ठाकुर सा'ब ने उधर से क्या बातें कही, साहब के चेहरे पर चमक आ गयी।
थाने में सभी हवलदारों की एक "राउंड टेबल मीटिंग" बुलाई गयी। आखिर महकमे की "इज़्ज़त" का सवाल था।
अगले दिन ये चर्चा आम थी- जाँच में पाया गया की दुखिया के पास कोई संपत्ति थी ही नहीं, सो कोई चोरी हुई ही नहीं, सारा मामला ठाकुर साहब की प्रतिष्ठा को धूमिल करने के लिए उठाया गया है,
इस सारे मामले में दुखिया स्पष्ट दोषी है, सरकारी कागजात भी दुखिया के खिलाफ चीख-चीख कर बयान दे रहे थे कि मामला निराधार पाया गया, अतः मामले को फाइनल अनुशंसा के साथ समाप्त समझा जाए।
सूबे में लगे ठाकुर दुर्जन सिंह के बड़े-बड़े बैनर "कानून में मुझे आस्था है" सड़कों पर लगा रहे थे। जो गाँव के लोगों के लिये जीत का एक बड़ा उत्सव जैसा ही था।
दूसरी तरफ दुखिया अपनी जीवनभर की पूंजी से हमेशा के लिये हाथ धोकर एक कोने में बैठा आँसु बहा रहा था।
मन ही मन में दुखिया थाने में जाने की भूल के लिये पश्चाताप भी कर रहा था और सोच रहा था- आखिर अपराधी कौन...?
जिसकी चोरी हुई....या जिसने चोरी की....?

- सुमित चमड़िया, पटना से

बुधवार, ४ फरवरी २००९

मेरे तो गिरधर गोपाल - श्यामसखा'श्याम


कृष्ण गोपाल बैंक में अधिकारी है । इधर कुछ दिनों से उनकी पत्नी मीरा और उनके बीच, कृष्ण गोपाल की सह्कर्मी, चुलबुली राधा को लेकर तना तनी चल रही है । मीरा जब भी टोकती है कि वे राधा से मेल जोल खत्म करदे तो कृष्ण गोपाल गुनगनाने लगते हैं -


''मैं तो राधा का भी श्याम
मैं तो मीरा का भी श्याम''

मीरा मन मसोस कर रह जाती है । एक दिन मीरा जो, कॉलेज में प्राध्यापिका थी अपने सहकर्मी के साथ घर आई। वे दोनो ड्राईंग रूम में बैठे थे तभी कृष्ण गोपाल राधा के साथ आए तो मीरा अपने सह्कर्मी को लेकर शयन कक्ष में जा बैठी। लगभग दो घन्टे बाद सह्कर्मी और मीरा बाहर निकले। उन्हें विदा कर जब मीरा अन्दर लौटी तो कृष्ण गोपाल ने पूछा 'ये क्या बदतमी$जी है।
ये था कौन जिसे तुम मेरे और राधा के सामने ही बेड़ रूम में ले गई। मीरा तुनक कर बोली ये हमारे नए प्रिंसीपल श्री आई जी गिरधर थे। और गुनगनाने लगी।
-

'मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो ना कोई '

इससे पहले कि मीरा अगली पंक्ति दोहराती कृष्ण गोपाल ने अपनी हथेली से उसका मुँह बन्द करते हुए कहा ''बस बाबा अब राधा कभी नहीं आएगी इस घर में।

श्यामसखा'श्याम;shyamskha`shyam

रामी - डॉ.दीप्ति गुप्ता


देवयानी की नींद निगलती हुई दूर से लहराती घड़ियाल की टन टन टन टन। सुबह के चार बजे थे। सहसा उँघता हुआ चौकीदार शेरसिंह कड़ाके की सर्दी में अपने बरसों पुराने फौजी ऒवरकोट से चिपटता हुआ लालटेन और लाठी सम्भाल कर कालेज के निकट ही कुछ ऊँचाई पर टीचर्स हास्टिल के नीचे वाले क्वार्टर की ऒर चला। शेर सिंह की उम्र साठ के लगभग है लेकिन जीवन के प्रति जीवंत दृष्टिकोण के कारण उसका हसँता हुआ चेहरा उसकी उम्र से दस वर्ष कम दीखता है। उम्र के इस थके मोड़ पर पहुँचने वाले, इस चौकीदार की चिलगोज़े जैसी आँखों से अभी भी मसखरी और चुस्ती टपकती है। क्वार्टर में पहुँचते ही शेरसिंह ने सबसे पहले दड़बे में फड़फड़ाती, चहकती मुर्गियों को दाना पानी दिया, फिर फटे टाट के पर्दे को हटाकर बरामदे में घुसते ही उसकी नजर उस कोने की ऒर गई, जो जगह की कमी का कारण एक छोटे से रसोईघर में परिवर्तित कर दिया गया था। अधबुझे चूल्हे के पास उसकी पत्नी रामी अपने चीथड़ों में दुबकी बैठी थी। उसने शेरसिंह के लिए चाय का गिलास तैयार कर रखा था। शेर सिंह ने गर्माहट पाने के लिए पास पड़ी एक छोटी सी लकड़ी से राख को कुरेदते हुए कहीं-कहीं चमक पड़ने वाले अंगारों को देखकर चूल्हे में एक दो बार फूँक मारी और चाय का गिलास थामकर बैठ गया। दोनों पति-पत्नी कबूतर और कबूतरी की तरह पास बैठे हुए धीरे धीरे चाय सुड़कने लगे।


शेर सिंह से एकदम विपरीत रामी के चेहरे पर समय ने दुःख और विषाद की अमिट रेखाएं खींच दी हैं। पिछले चार वर्षों से जैसे वह एकाएक मौन में चली गई है। तब से आज तक देवयानी ने रामी को कभी भी किसी से एक शब्द भी बोलते नहीं देखा। देवयानी को लगता, या तो रामी के शब्द चुक गए हैं या उसकी बोलने की इच्छा मर गई है। उसके उस अस्वाभाविक मौन तथा चेहरे पर गहरा आई रूग्ण उदासी के कारण कोई उसे विक्षिप्त तो कोई प्रेताभिभूत बताता है। कई बार शेरसिंह के कमरे से आवाजें आती, जो रात भर देवयानी का पीछा करती रहतीं। आज तक कोई डाक्टर व वैद्य रामी की सलोनी मुखाकृति की उन बीमार रेखाऒं को स्वस्थ नहीं कर पाया।


देवयानी अकसर सोचती कि रामी के जीवन में आए उस बदलाव का क्या कारण होगा? उसकी मोटी पपोटों वाली छोटी आँखों में उठता गिरता भावों का ज्वार-भाटा, रामी के अन्तस में घुमड़ते किसी तूफान का स्पष्ट संकेत देता, लेकिन शब्दों की अभिव्यक्ति के बिना उसे समझ पाना कठिन था। देवयानी ने रामी के उस अटूट मौन को अक्सर एक दर्द भरे कुमाँऊनी गीत में टूटते देखा था। रामी के दर्दीले स्वर में रचा बसा यह गीत "म्यारा मैता का देस ना बासा, घुघूति रूमझूम" देवयानी के भीतर दूर-दूर तक विचारों और नए-नए अनुमानों के ऐसे विकट झाड़ झंखाड़ खड़े कर देता जिनमें रामी के दुःख को जान लेने के लिए उसका व्याकुल मन उलझकर रह जाता। देवयानी ने कितनी बार एक कुशल मनोविश्लेषक की भाँति मीठे, तीखे और कड़ुवे प्रसंगों द्वारा रामी के अन्तस को झकझोर कर उसे मन की व्यथा उगल देने को मजबूर कर देना चाहा,किन्तु हठयोगी की तरह रामी ने कभी भी अपनी मौन समाधि को न तोड़ा। एक बार न जाने कैसे रामी देवयानी के बहुत कहने पर एक मस्त लोक गीत "बेडू पाको बारहमासा, काफल पाको चैता मेरी छैला" को उच्च स्वर में गा उठी थी, लेकिन उसके दर्द भरे स्वर ने उस थिरकते गीत को जैसे एक साथ कई पतझड़ों से लाद दिया था।


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ठीक साढ़े नौ बजे तैयार होकर देवयानी जैसे ही हास्टल की सीढ़ियों से नीचे उतरने लगी तो एकाएक चिड़िया कि तरह फुदकती 'नौनी' ने हाथ में तश्तरी से ढके कटोरे में कुछ लिए, देवयानी का रास्ता रोक लिया, और बोली -
"दीदी, माँ ने आपके लिए अरसा भेजा है।"
रामी का वो स्नेह, ममता भरा अपनत्व देवयानी के दिमाग में फिर विचारों के अनगिनत बुलबुले उठाने लगा। कैसी प्रेममयी है यह विक्षिप्त, भूली - भटकी रामी, या प्रेताभिभूत नारी ? देवयानी को लगता कि या तो रामी के विषय में लोगों की धारणाएँ सरासर गलत हैं, और यदि सही हैं तो उसे संतुलित व्यक्ति की भाँति उसकी पसंद की चीज भेजना कैसे याद रहता है ? देवयानी के लिए दिल की अतल गहराइयों में डूबकर कुछ सोचने के लिए मजबूर कर देने वाला आश्चर्य थी रामी। देवयानी ने प्यार से नौनी के हलके से चपत जड़ते हुए कहा- "जा रसोई में मेरी जाली की अलमारी में रख आ। अभी उप्रेती दीदी कमरे में ही हैं।" मिनट भर के प्रतीक्षा भरी मुद्रा में खड़ी देवयानी ने नौनी के कमरे से लौट आने पर खट-खट सीढ़ियाँ उतर कर कॉलिज का रास्ता पकड़ लिया।रामी कैसी भी हो, वह अभी भी नियमित रूप से स्कूल की सभी अध्यापिकाऒं को पानी पिलाने की ड्यूटी पूरी निष्ठा से निबाहती है। हाथ में पानी से भरे गिलासों की ट्रे थामे, एक पैर पर कुछ अधिक जोर देकर धीरे-धीरे सपाट चाल चलती, रामी कभी कभी तो एकदम रोबोट नज़र आती है।


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आज रविवार है। लेकिन रवि तो पिछले एक सप्ताह से ईद का चाँद बना हुआ है। आज भी सघन कोहरे की मोटी चादर ऒढ़े जैसे अटूट निद्रा में सोया हुआ है। हवा के स्पर्श से ऊँचे-ऊँचे चीड़ के पेड़ों की संगीतमयी झनझनाहट लिहाफ में लिपटे होने पर भी शरीर में एक सर्द सिहरन तरंगायित कर रहीं हैं। कोहरे ने समूचे परिवेश को इतना उबाऊ और शिथिल बना दिया है कि परिन्दे भी अपने घोंसलों में निस्पन्द पड़े हैं। दूर बादलों से घिरी पहाड़ियाँ थोड़े-थोड़े मुँह निकालकर झाँकती हुई, अलसाई सी नज़र आ रही हैं।
तभी बरामदे में कोई गम्भीर स्वर गूँजा। देवयानी ने देखा कि शेरसिंह हाँफता हुआ प्रिंसिपल मिस जंगपांगी से कह रहा है-" बहनजी, रामी इडर आया क्या ? सबेरे चार बजे से गायब है। शब जगह देख आया, मिलता ही नहीं।" इससे पहले कि उसकी बात खत्म होती, देवयानी लपककर शेरसिंह के क्वार्टर में नौनी के पास पहुँच गई। नौनी रूआंसी, खामोश खड़ी थी। देवयानी का दिल किसी दुर्भागी आशंका से भर उठा। दिमाग में एक साथ बुरे ख्यालों के हजारों कैक्टस उग आये। देवयानी झटपट नौनी को साथ लेकर अनायास ही ठण्डी सड़क से होती हुई टिफिन टॉप की ऒर चल पड़ी, जिधर- जिधर मन ने कहा, उधर ही वे दोनों चलते गये। लगभग सभी ऒर उसकी आँखें एक - एक दरख्त, एक-एक पत्ते को भेदकर रामी की खोज लेने को आतुर हो रही थी। रामी को खोजने में अभी दो घण्टे से अधिक समय नहीं बीता था, लेकिन देवयानी के लगा कि जैसे दो युग बीत गए और इस एहसास ने उसके दिल में निराशा की सर्द परतें जमानी शुरू कर दीं। आस पास कहीं भी जरा सी भी आहट होती तो वे दोनों सजग हुए, आशा भरी दृष्टि से उधर ही लगभग दौड़ पड़ते। कोहरे की धुन्ध में जल्दी से एक फुट दूर की वस्तु भी साफ नजर नहीं आती थी। कभी कोई जंगली चूहा ढालानों पर पड़े सूखे पत्तों को खड़खड़ाता निकल जाता तो कभी कोई गिलहरी पेड़ों के झुरमुट से सरसराती हुई तेजी से गुजर जाती। एक पल के लिए सुस्ताने को खड़ी हुई देवयानी, जमीन पर पड़े बेडूफल को चुगती हुई नौनी को शून्य दृष्टि से निहारने लगी कि तभी रामी का चिरपरिचित स्वर कहीं से अंधेरे में आशा की रूपहली किरण की तरह उभरा। देवयानी के हृदय में जैसे हजारों सुर्ख बुरांस एक साथ खिल उठे। सधे स्वर में उठती गिरती रामी की मधुर आवाज... कितनी मिठास... कितना दर्द है उसके गाने में। देवयानी और नौनी उस आवाज के सहारे चिकने स्लेटी पत्थरों पर सावधानी से कदम रखती हुईं आगे बढ़ीं और कुछ ही दूरी पर चीड़ के पेड़ों के नीचे निकल कर धीरे- धीरे चलती रामी को आगे जाते हुए देखा।
"रामी, ऒ रामी रूको"। देवयानी की पुकार से रामी के पाँव ठिठक गये। रामी ने पलटकर सूनी आँखों से देवयानी को देखा और अभिवादन में हाथ जोड़कर खड़ी हो गई। नौनी दौड़ कर उससे लिपट गई और बोली
- "माजी, तू कख गए छे। पिताजी, ई दीदी तिते खुजाणा छै। घोर चल। मिथे भूख लगणी छे।"
और रामी यंत्रवत सी देवयानी के साथ नौनी का हाथ थामें हुए लौट पड़ी। सहसा रामी की नासिका में झूलता बुलाक मानो देवयानी के ऊपरी होंठ पर एक अस्वाभाविक सी खुजली का आभास देने लगा। उसके गले में पड़ी लाल मूंगे व काली चरेऊ की मालाएँ देवयानी की जुबान तक आने वाले अनेक प्रश्नों को मानों उसके गले में ही घोंटने लगी। देवयानी का मन हुआ कि रामी को डाँटे, या धीरे से धमकाए। आखिर उसने सुबह से सबको इस तरह परेशान क्यूं कर डाला ? लेकिन उससे कुछ कहना तो जंगल में रोने जैसा है। दूर-दूर तक भटक कर थका देवयानी का मन कुछ भी समझ पाने में असमर्थ सा हुआ, एक अजीब से दमघोटू एहसास को पीने लगा। विचार के ताने बाने में उलझी देवयानी रामी को लेकर अब तक हॉस्टल पहुँच चुकी थी। कई जोड़ी आँखे इधर उधर से रामी को देखने के लिए उठी और एकाएक गायब हो गई। रामी एक अपराधी की सी चाल से रेंगती हुई नौनी के साथ क्वार्टर की ऒर चली गई।



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गहरी नींद में सोई देवयानी एकाएक किसी की दर्दनाक चीख से उठ बैठी। घड़ी में देखा तो रात के १२:३० बजे थे। बाहर कहीं दूर गीदड़ों की "हुंआ हुंआ" वातावरण को मनहूस बना रही थी। रात के सन्नाटे में झींगुरों की झनझनाहट भरी संगीतमयी चिकमिक ने उस परिवेश को अधिक रहस्यमय बना दिया था। तभी एक भयावह चीख रात की नीरवता को पार करती हुई, देवयानी के हृदय में कहीं गहराई से धँसती चली गई। देवयानी को समझते देर नहीं लगी - निःसन्देह वह रामी की ही आवाज थी। वही ऒझा की झाड़ फूँक और दर्द से छटपटाती रामी ! उसका मन हुआ कि तुरन्त नीचे जाकर रामी को अपनी बाहों में समेट कर अभय दान दे दे। देवयानी किसी द्वन्द्व में उलझी बहुत समय तक वैसे ही बैठी रही। फिर निढाल सी बिस्तर पे पसर गई। उसे नहीं मालूम कि कब उसकी आँख लगी । सवेरा हुआ तो रामी का चेहरा अनायास ही देवयानी की आँखों के सामने नाचने लगा । बिजली की सी गति से बिस्तर छोड़कर, शाल लपेटती हुई वह सम्मोहित सी शेरसिंह के क्वार्टर की ऒर लपकी । इससे पहले कि वह रामी के करीब पहुँच पाती, बाहर ही उसे शेर सिंह और नौनी का करूण विलाप सुनाई पड़ा । धड़कते दिल से वह कमरे में पहुँची तो देखा रामी चिर निद्रा में सोई थी । उसके चेहरे की उदास रेखाऒं में पहले से भी अधिक दुःख और पीड़ा घुली थी । शायद मरने से पूर्व उसने ओझा की झाड़ - फूँक की जिस पीड़ा को भोगा था, वही उसके मुख पर उभर आयी थी । देवयानी के भीतर घुमड़ती घनीभूत पीड़ा, ऒझा और शेरसिंह के प्रति क्रोध का ज्वालामुखी बनने लगी । किन्तु उस विदा के क्षण पथराये वातावरण में कुछ भी कर पाने में असमर्थ देवयानी का नपुंसक क्रोध आँखों से आँसू बनकर बह निकला । देवयानी को लगा कि रामी का दर्द भरा स्वर "म्यार मैता का देस ना बासा घुघूति रूमझूम" चारों दिशाऒं में चीख-चीख कर रो रहा है। शेरसिंह के अंधविश्वास के कारण प्रेताभिभूत समझी जाने वाली रामी ऒझा की झाड़ फूँक की बलि चढ़ चुकी थी । उसकी मौत मुक्ति नहीं वरन मानों एक प्रश्न-चिन्ह बनकर समाज के मस्तक पर चिपक गई थी !!

लघुकथा: मेहमाननवाज़ी


प्रासादनुमा आलीशान भवन में दावत चल रही थी। चारों ओर लज़ीज़ पकवानों के स्टाल लगे हुए थे जिनकी गंध सभी मेहमानों को बेचैन किये दे रही थी। तेज़ रंगीन रोशनियों और मादक संगीत की धुनों ने माहौल को और भी हसीन और आकर्षक बना दिया था। आकर्षक पोशाकों में सजी-धजी वेटरों की पूरी फ़ौज वहाँ तैनात थी जो घूम-घूमकर मेहमानों को खाना सर्व कर रही थी। एक चम्मच खाना भी ठीक से मुँह तक न जा पाता था कि कोई न कोई वेटर नया पकवान लेकर हाज़िर हो जाता था। दर्जनों फोटोग्राफर ओर वीडियोग्राफर मुस्तैदी से अपने-अपने कामों में लगे हुए थे। फ्लैश पर फ्लैश पड़ रहे थे। प्रशांत कुमार के लिए ये सब असह्य होता जा रहा था। उनके मुँह में दो-चार कौर भी ठीक से नहीं गए थे। वे अपनी प्लेट लिए-लिए चुपचाप एक कोने में जाकर खड़े हो गए।

जैसे ही मेज़बान राहुल बाबू की नज़र प्रशांत कुमार पर पड़ी वे उनकी ओर लपके। उनके पीछे-पीछे दर्जनों बैरे भी लज़ीज़ व्यंजनों से भरी ट्रे लेकर लपके और साथ ही फोटोग्राफरों ओर वीडियोग्राफरों का झुंड भी। राहुल बाबू ने प्रशांत कुमार से पूछा, ‘‘भाई साहब यहाँ अकेले क्यों खड़े हैं? क्या ख़िदमत करूँ मैं आपकी?’’ प्रशांत कुमार ने कहा, ‘‘ राहुल भाई मेहमाननवाज़ी की शूटिंग ही चलती रहेगी या खाना भी खाने दोगे?’’ ‘‘मैं समझा नहीं,’’ राहुल बाबू ने प्रशांत कुमार की तरफ किंचित हैरानी से देखते हुए पूछा। ‘‘समझने की ज़रूरत भी नहीं है। बस आप इतनी ख़िदमत कीजिए कि अपनी फौज को अपने साथ ले जाइये ताकि मैं इत्मीनान से खाना खा सकूँ’’, इतना कहकर प्रशांत कुमार राहुल बाबू को उनकी फौज के साथ वहीं छोड़कर पास ही खाली पड़ी एक मेज़ की ओर बढ़ गए।



सीताराम गुप्ता
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