<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-8753024558307711180</id><updated>2011-12-18T23:38:28.859-08:00</updated><category term='दीप्ति गुप्ता'/><category term='कहानी'/><category term='कथा-व्यथा'/><category term='यादवेन्द्र शर्मा ‘चन्द्र’'/><category term='अगस्त_2008'/><category term='Kanhaiyalal Sethia'/><category term='लघुकथा'/><category term='महाश्वेता देवी'/><category term='shyamskha`shyam'/><category term='सितम्बर 2008'/><category term='डॉ. वीरेन्द्र सिंह यादव'/><category term='इन्द्रा प्रताप  शर्मा'/><title type='text'>katha-vyatha कथा-व्यथा</title><subtitle type='html'></subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' 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uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>18</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8753024558307711180.post-6013862429825244443</id><published>2011-08-07T19:27:00.000-07:00</published><updated>2011-08-07T19:28:45.275-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='इन्द्रा प्रताप  शर्मा'/><title type='text'>संस्मरण: इन्द्रा प्रताप  शर्मा</title><content type='html'>रिटायर्ड होने के बाद मैंने दमोह के ओजस्विनी संस्थान में प्रिंसिपल का पद सम्हाला तो घर की समस्या सामने आई| सागर स्थित घर को मैं छोड़ना नहीं चाहती थी इसलिये मैंने प्रतिदिन ट्रेन से आने जाने की सोची| ट्रेन के समय कुछ ऐसे थे जो मुझे सूट कर गए| रेलवे स्टेशन घर से एक किलोमीटर दूर था| ८:२० ट्रेन का समय ; ८ बजे घर से निकलती ट्रेन पकड़ती १०बजे दमोह पहुँच जाती फिर ५ : २० की ट्रेन  पकड़ती और ७:३० तक घर पहुँच जाती| &lt;br /&gt;इस प्रतिदिन की यात्रा ने मेरी झोली में अनुभवों का खजाना भर दिया| उनमें से किसी ने दिल दुखाया तो किसी ने मानवीय उद्दात्त भावों से भर दिया तो कभी सोचने के लिए मजबूर कर दिया| &lt;br /&gt;आज जो घटना मैं आपको सुनाने जा रही हूँ वह एक ऐसी वृद्ध महिला की है जिसके आगे पीछे कोई नहीं था| मैं उसे अकसर एक टोकरी लिए देखती जिसमें कुछ धनिए की गड्डियाँ रखी होतीं| उसकी दुबली पतली काया पर बदरंग गहरी नीली धोती और हाथ में मटमैली सी टोकरी और उसमें  सजी हरी धनिए की कुछ पत्तियाँ; मुझे ऐसा लगता मानो मानव जनसमूह में एक छोटा सा द्वीप अपने नवजात  पौधों के साथ इधर उधर तैर रहा हो| मन में कौतुहल होता आखिर यह क्या है &lt;br /&gt;एक दिन वह मेरे ही कम्पार्टमेंट में चढ़ी और मेरे पास आकार बैठ गई| पैसेंजर ट्रेन में भीड़ कुछ  अधिक ही होती है फिर भी उसे नज़दीक बुलाकर उससे बातें शुरू कीं|| पहले कुछ इधर उधर की फिर उससे पूछ ही लिया कि तुम रोज़ टोकरी में धनिया ले कर कहाँ जाती हो और क्यों जाती हो? उसने कहा,” मैं यह धनिया सागर से खरीद कर दमोह ले जाती हूँ| बिक जाता है तो शाम की ट्रेन से वापिस आ जाती हूँ| इस ट्रेन में मुझे कोई पकड़ता भी नहीं है|” &lt;br /&gt;मैंने उससे कहा, “इतना सा धनिया तो तुम सागर में भी बेच सकती हो, इतनी दूर दूसरे शहर में क्यों आती हो और बेवजह कष्ट क्यों उठाती हो; अगर बेचना ही है तो कुछ और अधिक सब्जियाँ लाया करो जिससे तुम्हे कुछ ओर अधिक मुनाफ़ा हो|” उसने कुछ क्षण मेरी ओर ध्यान से देखा फिर बोली, “मेरी सामान खरीदने की लग्गत ( सामान खरीदने के लिए धन ) इतनी ही है| इसको बेच कर मुझे एक समय की रोटी मिल जाती है जो मैं दमोह में दोपहर को खा लेती हूँ और इतने पैसे भी बच जाते हैं जिनसे मैं अगले दिन के लिए धनिया भी खरीद लेती हूँ| मेरा रोज़ का यही क्रम है| और फिर रुक कर कुछ सोचते हुए उदास मन से बोली बाई दिन भी तो काटना होता है इस तरह आने जाने से मेरा दिन भी कट जाता है| ट्रेन में अकेलापन नहीं लगता |मुक्ते लोगों की मुक्ति बातें (बहुत से लोगों की बहुत सी बातें)| दिल बहल जाता है; लौटकर आती हूँ तो स्टेशन पर पानी पीती हूँ,कभी-कभी कुछ खाने को भी मिल जाता है |भीख माँगने वाले बच्चों को कभी – कभी एक दो रुपए दे देती हूँ तो वह भी मुझे कभी –कभी खाने को कुछ दे देते हैं | फिर कुछ देर चुप रहने के बाद बोली बाई न कोई अपना है न कोई अपना घर | &lt;br /&gt;उसके इस तरह अभिमान से जीने के तरीके को देख कर मुझे एक ओर अच्छा भी लगा तो दूसरी ओर मैनें सोचा ---ऐसा कब तक | क्या कोई दिन ऐसा आएगा जब मुझे अखबार के किसी कोने में एक खबर छपी दिखाई देगी कि रात की ख़ामोशी में स्टेशन पर एक बूढ़ी औरत ने दम तोड़ दिया या फिर उस खबर पर मेरी कभी निगाह ही नहीं पड़ेगी|&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित!&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8753024558307711180-6013862429825244443?l=kathavyatha.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kathavyatha.blogspot.com/feeds/6013862429825244443/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://kathavyatha.blogspot.com/2011/08/blog-post.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8753024558307711180/posts/default/6013862429825244443'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8753024558307711180/posts/default/6013862429825244443'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kathavyatha.blogspot.com/2011/08/blog-post.html' title='संस्मरण: इन्द्रा प्रताप  शर्मा'/><author><name>Shambhu Choudhary"Iac"</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03776713428128546589</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-bM0lY3JA5GU/Te8lUG5KtcI/AAAAAAAAAtM/R5w2g954Y6M/s220/shambhu_choudhary.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8753024558307711180.post-3024172524939649314</id><published>2009-10-02T03:46:00.000-07:00</published><updated>2009-10-02T03:52:02.467-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='दीप्ति गुप्ता'/><title type='text'>समीक्षा: शमोएल अहमद का उपन्यास 'नदी'</title><content type='html'>&lt;p align="left"&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#330000"  size=4&gt;नारी मन की विविध परतों को कुशलता से खोलता है - दीप्ति गुप्ता&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;हाल ही में मैंने शमोएल अहमद का उपन्यास नदी पढ़ा जिसने मुझे बहुत अधिक प्रभावित किया। इस उपन्यास में लेखक की सबसे बड़ी ख़ूबी यह है कि उन्होंने नारी मन की विविध परतों को जिस कुशलता से खोला है और उनमें समाए कोमलतम भावों को जिस बरीकी से अंकित किया है, वह नारी मन के भावों और नारी मनोविज्ञान पे उनकी गहरी पकड़ का परिचायक है। उन्होंने उपन्यास नायिका के दिलो – दिमाग़ में अलग –अलग परिस्थितियों में उभरते प्यार, घृणा, सुख, दुख, उत्साह, निराशा, कौतुक, आश्चर्य, विषाद, अवसाद और अकेलेपन को बड़ी ही सहजता और स्वभाविक ढंग से चित्रित किया। नारी मन को जिस बेबाकी से उन्होंने उकेरा है वह नि:सन्देह अतिसराहनीय है। सबसे बड़ी बात यह कि शमोएल अहमद ने समूचे उपन्यास में कहीं भी नायिका को पति के साथ ग़लत समझौते के लिए विवश नहीं किया है। जहाँ नायक रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में नियमों से हठधर्मिता की हद तक बँधा एक भावनाशून्य इंसान है, वहीं दूसरी ओर नायिका जीवन को सहजता से, किसी भी तरह की शर्त और नियमों के बंधन से मुक्त होकर जीने वाली भावुक और संवेदनशील नारी है। वह सृष्टि के कण-तृण से जुड़ाव महसूस करती है। प्रकृति के सौन्दर्य पे मुग्ध होकर, उससे एकात्म हो उठती है। सुहानी भोर, रुपहली चाँदनी,तारों भरी रुमानी रात उसे जब-तब लुभाती है। सृष्टि के उन अलौकिक क्षणों को वह भरपूर जीना चाहती है, मानो सांसों में उतार लेना चाहती है और ऐसे ख़ूबसूरत रूमानी पलों के एहसास को वह नायक के साथ जीकर अपने दिल में संजो लेने को आतुर रहती है, लेकिन संवेदनहीन नायक ऐसे पलों के अनूठेपन को महसूस न कर, हमेशा नायिका के साथ रूखेपन और कठोरता से पेश आता है। एक बार, दो बार, और बार–बार उसकी यह शुष्कता शनै: - शनै : कुरूपता में बदलती जाती है। नायिका नियमों, बन्धनों से परे होकर भी बेतरतीब और उलझी हुई नहीं है। सुलझी सोच से भरी है। पति द्वारा छोटी – छोटी बात पे उपेक्षित और अपमानित ज़रूर महसूस करती है, फिर भी पति के रंग में रंगना चाहती है, समझौता करने को तैयार रहती है, पर पति की तर्कहीन हठधर्मिता के कारण उसकी इस रिश्ते के प्रति बची खुची स्निग्धता भी जैसे सूखने लगती है। वह उमड़ती नदी की मानिन्द जीवन्त है, अठखेलियों से भरी है, प्रेम की तरंगों और लहरों से भरी है और अपने प्यार भरे प्रवाह की अंतिम मंज़िल समन्दर के साथ एक हो जाना मानती है। हांलाकि नायक का पौरुष से भरपूर व्यक्तित्व उसे रिझाता है और यह पौरुष ही उसके नज़दीक आने का कारण भी बनता है। लेकिन मन के स्तर पर लगातार नायक की यही परुषता दोंनो के बीच अलगाव का कारण बनती है। वह जीवनसाथी बनकर, हर पल, हर क्षण कठोरता से ही पेश आता है – यहाँ तक कि प्यार के भावनात्मक, नाज़ुक पलों में भी वह निहायत रूखा और यान्त्रिक बना रहता है। उसके व्यक्तित्व मे कभी भी कोमलता, भावनात्मक गरमाहट उभरकर ही नहीं आती। हर समय वह हठधर्मी की तरह अपने नियम और हठ पे अड़ा रहता है। जीवन की सुकोमल परतों से अछूता, निहायत ही पथरीला सा व्यक्ति है वह। न व्यक्तित्व में, न सोच में, न दिनचर्या में, कहीं भी लचीलापन नहीं.....पत्नी का दिल रखने के लिए भी वह न बातें करता है, न कॉफ़ी पीने में साथ देता है। जीवन की ख़ूबसूरतियों से महरूम, एक सपाट सा इंसान है जिसकी दिनचर्या नियमों से शुरू होती है और नियमों पे ख़त्म। उसमें किसी की – यहाँ तक कि अपनी नई नवेली दुल्हन की दख़लअंदाज़ी भी उसे पसन्द नहीं। उसके एकरस नियम - प्यार, अपनेपन, जीवन के ख़ूबसूरत लम्हों के ऊपर हैं। ऐसा जकड़ा सा, बंधा - बंधा इंसान न ख़ुद जीता है और न दूसरे को जीने देता है। उसके जीवन मे सपाट ज़न्दगी से उपजी जो कठोरता और रूखापन है, वह पूरी तरह उसके व्यक्तित्व में छाया हुआ है। वह तमतमाए सूरज की भाँति सदा पत्नी को झुलसाता रहता है, कभी भी गुनगुनी धूप बनकर, उसे सुखद एहसास से नहीं भरता। समर्पण के मखमली क्षणों में उसका यंत्रवत व्यवहार पत्नी को इस कदर कचोटता है कि वह उसे एक ‘’उत्पीड़क’’ नज़र आता है। जैसे वह खाना खाने के बाद, जी भर कर कई गिलास पानी पीता है, वैसे ही वह कामक्षुधा तृप्त करके, करवट लेकर जी भर के सोता है – उसकी बला से पास लेटी पत्नी, कुछ पलों के लिए उसके प्यार भरे स्पर्श को तरसे या उसकी बाहों के घेरे में सुकून से सोना चाहे। नायक स्वार्थी होने की हद तक भावनाहीन, सिर्फ़ अपने लिए जीने वाला प्राणी है, जबकि नायिका ठीक इसके विपरीत जीवन को पल-पल जीना चाहती है. सृष्टि की हर छोटी से छोटी चीज़ उसे खींचती है, लुभाती है – फूल, लताएँ, चाँद, तारे, नदी, नदी के पाट, शफ़्फ़ाक चाँदनी से भरपूर रेशमी रात – वह सबमें दिव्य सौन्दर्य, संगीत, प्यार की तरंगे- न जाने क्या – क्या ढूँढती है, अनुभव करती है, पति को इन ख़ूबसूरतियों की ओर खींचना चाहती है। पर पति की ओर से नरमाहट, किसी भी तरह की गरमाहट की कोई भी किरण न पाकर वह टूट –टूट जाती है। फिर भी नारी मन की सहज प्रवृत्ति उसे बार –बार पति से तालमेल बैठाने के लिए प्रेरित करती है कि कुछ वह झुके और कुछ पति झुके तो बीच का एक रास्ता ऐसा निकल आए कि दोंनो उस पर सम्भाव से जीवन भर साथ साथ चल सके। लेकिन पति तो रोबोट की तरह अपने में फ़ीड किए प्रोग्रामों से इस क़दर जुड़ा है कि उसके पास समझौते की कोई गुंजाइश ही नहीं, तो आहत नायिका का पिता के घर लौटना जैसे उसकी नियति बन जाता है। वह पत्नी है तो क्या हुआ, उसका अपना एक व्यक्तित्व है, अपनी एक पहचान है, उस पर वह, मननशील और चिन्तनशील स्वभाव की है, उसकी भी पसन्द –नापसन्द है। इतना होने पर भी जीवन साथी की ख़ातिर कई बिन्दुओं पर समर्पित होने को तैयार रहती है। पर पति को तो कोई फ़र्क ही नहीं पड़ता, वह उसके साथ रहे या न रहे,उसे क्या अच्छा लगता है, क्या बुरा लगता है, वह कब ख़ुश होती है, चहकती है, कब फफक पड़ती है ?? यह मानसिक उत्पीड़न, पति का भावनात्मक ठन्डापन उसकी भावनाओं को कुचल देता है. पति द्वारा पहले वह बैडरूम से दूसरे बैडरूम में विदा कर दी जाती है, फिर उस घर से पिता के घर विदा हो जाती है जो अन्तत: पति के जीवन से उसकी विदाई का संकेत है।&lt;p align="justify"&gt;कोई भी जीवन साथी – चाहे वह पुरुष हो या नारी अपने भावनात्मक रूखेपन, ठन्डेपन, स्वार्थीपन और हठधर्मिता से अंजाने किस तरह जीवनसाथी को अपने से दूर कर देता है, इस पर शमोएल अहमद ने बड़े ही मनोवैज्ञानिक ढंग से क़लम चलाई है। बीच – बीच में प्राकृतिक चित्रण खूबसूरत बन पड़े हैं। नारी जीवन को उन्होंने बड़े क़रीब से जाना और परखा है। भाषा सहज, सरल, पारदर्शी, निखरी –निखरी,भावप्रवण और प्रवाहपूर्ण है। पाठक को अंत तक बाँधे रखने की क्षमता से भरपूर है। हर भाव, हर विचार सीधे दिलो दिमाग़ में उतरता चला जाता है।&lt;br /&gt;इतने ख़ूबसूरत उपन्यास के लिए शमोएल अहमद की जितनी भी सराहना की जाए कम है। आशा है कि भविष्य में इसी तरह और भी उत्कृष्ट रचनाएँ पढ़ने को मिलती रहेगीं तथा वे अपनी क़लम से साहित्य को सम्पन्न बनाते रहेगें।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित!&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8753024558307711180-3024172524939649314?l=kathavyatha.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kathavyatha.blogspot.com/feeds/3024172524939649314/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://kathavyatha.blogspot.com/2009/10/blog-post.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8753024558307711180/posts/default/3024172524939649314'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8753024558307711180/posts/default/3024172524939649314'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kathavyatha.blogspot.com/2009/10/blog-post.html' title='समीक्षा: शमोएल अहमद का उपन्यास &apos;नदी&apos;'/><author><name>Shambhu Choudhary"Iac"</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03776713428128546589</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-bM0lY3JA5GU/Te8lUG5KtcI/AAAAAAAAAtM/R5w2g954Y6M/s220/shambhu_choudhary.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8753024558307711180.post-3143060911025717710</id><published>2009-06-29T21:42:00.000-07:00</published><updated>2009-06-29T21:52:38.350-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='यादवेन्द्र शर्मा ‘चन्द्र’'/><title type='text'>कहानी: भीतरी सन्नाटे - यादवेन्द्र शर्मा ‘चन्द्र’</title><content type='html'>&lt;font color="#330000" size=2&gt;&lt;b&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_-_J_ggR3oI4/SkmZpSdzFaI/AAAAAAAAAo4/YHLV89oQw5k/s1600-h/yadwendra+sharma.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 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ज्यादा पुस्तकों की रचना कर साहित्य के क्षेत्र में अपना अपूर्व योगदान दिया है जो सदैव एक मिसाल के रूप में जीवंत रहेगा। उनकी स्मृति को प्रणाम करते हुए यहाँ उनकी कहानी ‘भीतरी सन्नाटे’ प्रकाशित कर रहे हैं| संपर्क: - आशा लक्ष्मी, नया शहर बीकानेर - 334004 &lt;/b&gt; -संपादक&lt;/font&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसकी नौकरी मुम्बई में लग गई। एक बड़ी प्राइवेट कम्पनी में। आखिर वह सी.ए. था। अपने कस्बे ‘नोखा’ से महानगर मुम्बई आ गया।&lt;br /&gt;शुरू में वह एक मध्यवर्गीय होटल ‘गुलनार’ में रहा। एक बेडरूम का हवादार कमरा। फॉम का बिस्तर था पर उसकी दूध सी सफेद चादर पर एक हलका सा दाग था जिससे वह बेचैनी का अनुभव करने लगा। उसने चादर चेंज करा ली।&lt;br /&gt;पहली बार जब वह अपनी कम्पनी में आया तो उसके मालिक जी.एस. चावला ने उसका स्वागत किया। उसे अपने खास-खास कर्मचारियों से मिलाया जिसमें उसकी स्टेनो मिस ‘वन्दना’ भी थी।&lt;br /&gt;आठ-दस दिनों में उसने दफ्तर के काम को पूरी तरह समझ लिया तो एक दिन वन्दना ने कहा, ‘‘सर! इफ यू डॉन्ट माइन्ड तो कुछ कहूँ।’’&lt;br /&gt;रोहन ने कहा, ‘कहो।’&lt;br /&gt;‘‘यह श्रीशा है न, यह विचित्र युवती है। बहुत ही बातूनी, खुले दिमाग़ की, फ्लर्ट.....’’&lt;br /&gt;‘‘वन्दना! तुम्हें ऑफिस के डिसीप्लीन का पता नहीं है। श्रीशा क्या करती है, क्या खाती-पीती है, क्या पहनती है, वह किस- किस के साथ घूमती है, इसकी ऑफिस में कोई फाइल नहीं है। यह सही है कि वह अपना काम जिम्मेदारी से करती है। मैं तुम्हारा बॉस हूँ। ऊल जलूल बातें मुझें पसंद नहीं। उसने कठोर स्वर में कहा।&lt;br /&gt;‘सॉरी सर!’ वन्दना सिर झुका कर चली गई।&lt;br /&gt;रोहन ने एक अच्छे अफसर की तरह अपने ऑफिस का कार्य संभाल लिया।&lt;br /&gt;अब वह मकान की तलाश में लग गया। वह ऐसा मकान चाहता था जहाँ अभिजात्य वर्ग के लोग रहते हों। उसके सारे पड़ोसी पढ़े-लिखे हों, अंग्रेजीदा हों तो उत्तम! फ्लैट में पश्चिम की ओर बरामदा हो जहाँ पछुआ हवा बेरोक आती रहे। उस मकान के आस-पास झुग्गी-झोंपड़ियाँ और चालें न हों। उनकी मौजूदगी उसे कीड़े-मकोड़े की तरह रहने वाले लोगों के बारे में सोचने के लिए विवश करेंगी और वह निरर्थक तनाव से घिर जाएगा, वह जरा एकांतप्रिय था। वह यह वाक्य अपने पर आरोपित करता रहता था कि वह भीड़ में अपने को अकेला आदमी समझता है।&lt;br /&gt;वह बचपन से ही मितभाषी था। फालतू बोलने वाले छात्र- छात्राओं से वह बचा करता था। वह उनसे लगभग दूर ही रहता था, जो अपने को काफी आधुनिक कहते थे और सिगरेट-शराब पीते थे, उनसे भी बचता रहता था। इसलिए वह चाहता था, एक अपने मनोनुकूल वातावरण वाला मकान। शांत और खुला।&lt;br /&gt;वह नौकरी के बाद मकान ढूँढ़ता रहता था। जब वह थक जाता था तो मुम्बई की चौपाटी पर जाकर बैठ जाता था। लहरें गिनता रहता था। कई बार अपनी इच्छा के विरुद्ध वह चर्च गेट के स्टेशन के मुख्य द्वार पर खड़ा हो जाता था और आदमियों की भीड़ का रेला देखता रहता था। वह देखता-रंग-बिरंगी पोशाकें। भागमभाग।&lt;br /&gt;उसे जल्दी ही इस बात का पता चल गया कि वह अपने मन के अनुकूल फ्लैट ले नहीं सकता। उसका मालिकाना हक और पगड़ी देना उसके वश का फिलहाल तो नहीं है। परिवार की जिम्मेदारियाँ तो ‘ताड़का’ राक्षसी के मुख की तरह फैली थीं। तीन कुँवारी जवान बहिनें। पेंशन पर दाल-रोती खाने वाले माँ-बाप। .....वह उद्विग्न हो गया। उसके आगे मीलों अनंत मरुस्थल के टीबें फैल गए।&lt;br /&gt;एक दिन उसने अपने चीफ एकाउन्टेंट प्यारेलाल को अपनी समस्या बताई।&lt;br /&gt;प्यारेलाल ने कहा, ‘‘आप या तो अपने सपनों को भंग कर दीजिए या फिर जीवन की कटुता समझ लीजिए। यह मुम्बई है, यहाँ सोना जितना चाहो कुछ ही मिनटों में खरीद सकते हैं पर सोने की जगह आसानी से नहीं मिल सकती।.....फिर भी आप मिस श्रीशा से बात कीजिए। वह काफी जानकारियाँ रखती हैं।’’&lt;br /&gt;‘‘श्रीशा जो आपके पास.....।’’&lt;br /&gt;‘‘हाँ-हाँ, वही श्रीशा.....।’’&lt;br /&gt;‘‘उसके बारे में.....।’’&lt;br /&gt;‘‘नहीं मिस्टर रोहन, चाहे स्त्री हो चाहे पुरुष, सबके जीने का अपना-अपना तरीका है। व्यक्तिगत सुख और आनन्द भी सबके अलग होते हैं। रुचियाँ भी भिन्न-भिन्न होती हैं और परिभाषाएँ भी। मुझे कई बार लगता है कि यह श्रीशा जो है, वह नहीं है। इसने कृत्रिमता का एक लबादा पहन रखा है। उसकी एक क्वालिटी और है, वह सबकी मददगार भी है।’’&lt;br /&gt;‘‘आप उसे मेरे पास भेजिए।’’&lt;br /&gt;थोड़ी देर में श्रीशा उसके कैबिन में थी। आते ही विनम्रता से बोली, ‘गुड नून सर!’’&lt;br /&gt;‘‘बैठिए.....आप मेरी प्रॉब्लम हल करने में मदद कर सकती हैं, मलकानी साहब कह रहे थे।’’&lt;br /&gt;‘‘मुझे खुशी होगी यदि मैं आपके काम आ सकूँ तो।’’&lt;br /&gt;‘‘श्रीशा जी! आप तो इसी शहर की उपज हैं। सारी एजुकेशन भी आपने यहीं पूरी की है। मैं सच कहता हूँ कि मैं आपको जरा भी कष्ट देना नहीं चाहता पर कई बार मनुष्य न चाहते हुए भी दूसरों को कष्ट देता है, मैं आपको......।’’&lt;br /&gt;वह सहज मुस्कान अधरों पर लाते हुए बोली, ‘‘किसी भूमिका की जरूरत नहीं है। साफ-साफ बताइए कि आप मुझे क्या कष्ट देना चाहते हैं।’’&lt;br /&gt;‘‘मैं कई रोज से फ्लैट के लिए परेशान हूँ।.....कभी मेरी जेब एलाऊ नहीं करती है और कभी......।’’&lt;br /&gt;उसने संक्षिप्त रूप में बताया कि वह किस एरिया में और कैसा फ्लैट चाहता है।&lt;br /&gt;‘और.....क्या खर्च कर सकते हैं?’&lt;br /&gt;‘यही दो हज़ार....ज़्यादा से ज़्यादा तीन....इसके आगे मेरी क्षमता नहीं, मेरा भरा-पूरा परिवार है। उसकी भी परवरिश करनी है।’ रोहन ने कहा।&lt;br /&gt;उसने ललाट में बल डाल कर अपना दायाँ कान खुजला कर कहा, ‘माफी चाहती हूँ।.....फिर आप किसी खोली में कमरा ले लीजिए। अपनी इच्छा का फ्लैट लेना है तो पाँच-सात हज़ार रुपए खर्च कीजिए या फिर पाँच-सात लाख पगड़ी दीजिए।’&lt;br /&gt;‘यह संभव नहीं।’ उसने नई बात बताई, ‘दरअसल कम्पनी ने साफ-साफ कह दिया था कि तीन साल तक वह केवल तनख्वाह ही देगी। ऐसी स्थिति में.....।’&lt;br /&gt;वह बीच में ही बोली, ‘मुझे आपकी बात बनती नज़र नहीं आती है। फिर भी मैं बाइ हर्ट, कोशिश करूँगी कि आपकी पाॅकेट के अनुसार काम हो जाए। फिर आपका लक।’&lt;br /&gt;श्रीशा चली गई।&lt;br /&gt;रोहन ने सोचा कि यह काफी आकर्षक है। गोरा रंग, कंजी आँखें, तीखे नाक-नक्श, फाँक की तरह अधर और निडर भी।&lt;br /&gt;रोहन और उसके बीच संवाद कम ही थे। लेकिन मजबूरी का नाम महात्मा गांधी। सहिष्णु होना ही पड़ा। श्रीशा से रोहन को सदैव पूछना ही पड़ता था।&lt;br /&gt;लगभग तीन दिनों के प्रयास के बाद श्रीशा ने रोहन को बताया, ‘मैंने सभी इलाकों का सर्वेक्षण कर लिया है। आप जिस एरिया में फ्लैट चाहते हैं रोहन बाबू, इतना किराया तो आटे में नमक जैसा है। पूरी रसोई नहीं मिल सकती। कहने का मतलब है, कारवालों की एरिया में कम से कम पाँच हज़ार रुपए तो किराया और पाँच लाख पगड़ी, वह भी वन बेड रूम की। उसमें पछुवा हवा नहीं आ सकती, आ सकती है तो केवल पंखे की हवा। हाँ, मेनन साहब की चाल में कमरा पाँच सौ रुपयों में मिल सकता है, किराए पर। पगड़ी एक लाख अलग से।’&lt;br /&gt;‘नहीं मैडम, यह संभव नहीं है। आपको पता नहीं, मेरे कंधों पर दायित्वों का भयंकर बोझ है। मुझे मेरे माँ-बाप ने बड़े कष्टों में पढ़ाया है।’&lt;br /&gt;इसके बाद रोहन भी प्रयास करता रहा और श्रीशा भी।&lt;br /&gt;श्रीशा ने एक दिन मुलायम स्वर में कहा, ‘सर! आप मेरे बॉस हैं। मैं आपकी मानसिक स्थिति समझती हूँ। महानगरों की यह समस्या खत्म होगी ही नहीं। हज़ार मकान बनते हैं साथ ही पाँच- दस हज़ार नए लोग आ जाते हैं। सारा खेल खत्म हो जाता है। समस्या ज्यों की त्यों बनी रहती है। हाँ, यदि आप पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर सोचें तो मैं आपके सामने अच्छा और सस्ता प्रस्ताव रख सकती हूँ। आप अपनी अनुकूलताओं की कटौती करें।’&lt;br /&gt;‘आप पहेलियाँ मत बुझाइए। साफ-साफ कहिए। बोलती आप कुछ ज़्यादा ही हैं।’&lt;br /&gt;‘यह सही है। बोलती ज़्यादा हूँ। मजाकिया हूँ सर! हर आदमी का अपना अलग स्वभाव होता है। अलग आनन्द होता है। मैं समझती हूँ कि हमारे भीतर कई इंसान हैं जो पल-पल सक्रिय होते रहते हैं।’&lt;br /&gt;‘अपनी रहस्यपूर्ण बातें बंद करिए प्लीज। शॉर्ट में कहिए।’&lt;br /&gt;‘हमारे फ्लैट में तीन कमरे हैं। पूरा सेकेंड फ्लोर हमारा है। आजकल हमारी आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है। दस तारीख तक जेबें व बटुवे नंगे हो जाते हैं। मम्मी चाहती हैं कि हम कोई शरीफ और समय पर पैसा देने वाला पेईंग गेस्ट रख लें। जो कमरा हम आपको देंगे, उसमें अटेच्ड बाथरूम भी है। पूरब में खिड़की है, पछुवा हवा चलती है तो अवश्य कमरे में आती है। चूँकि मैं और मेरी मम्मी घर में दो ही जनें हैं, इसलिए घनघोर खामोशी भी रहती है। किराया दो हज़ार से कम नहीं होगा। यदि आप ब्रेकफास्ट, लंच व डिनर लेंगे तो एक हज़ार रुपए और, यानि तीन हज़ार में परिवार की तमाम सुविधाएँ। एकदम रीजनेबल रेट है यह। एक और कारण है। आजकल महानगरों का जीवन सुरक्षित नहीं है। अकेली औरतें आतंक से घिरी रहती हैं।’&lt;br /&gt;‘मैं सोच कर बताऊँगा।’ उसने छोटा सा उत्तर दिया।&lt;br /&gt;‘लेकिन जल्दी, तीन दिनों के भीतर! समझे। कई ग्राहक आ रहे हैं पर हमें परिचित व शरीफ पेईंग गेस्ट चाहिए।’ श्रीशा ने आँखों में स्पन्दन वाले भावों को चमकाया।&lt;br /&gt;रोहन को अपने भीतर कुछ महसूस होता सा लगा। श्रीशा सिर झुका कर चली गई।&lt;br /&gt;तीसरे दिन छुट्टी थी। गणेशोत्सव की। मुम्बई में अकल्पनीय हलचल। भाँति-भाँति की मूर्तियाँ! आकर्षक व भावभीनी। मूर्तिकारों की सारी सोच, कल्पना और श्रम गणेश जी को विभिन्न रूपों में साकार करने की योजनाएँ। योजनाएँ क्रियान्वित होती हैं पर जब वे श्रद्धामयी मूर्तियाँ पानी में समर्पित कर दी जाती हैं तो श्रीशा का मन तड़प उठता है।&lt;br /&gt;उसने इसी कारण गणेशोत्सव में शामिल होना बंद सा कर दिया पर उसे नहीं पता, मिट्टी की मूर्ति अंत में मिट्टी में मिल जाती है।&lt;br /&gt;सूरज के डूबने का समय था। क्षितिज लाल। स्त्री-पुरुष और बच्चे बेतहाशा समुद्र की ओर जा रहे थे। उनके चेहरों पर श्रद्धा का रंग दपदप कर रहा था।&lt;br /&gt;श्रीशा अपने को प्रकृति के विभिन्न रंगों में डूबाना चाहती थी पर उसे क्यों बार-बार याद आ रहा था कि आज तीसरा दिन है। रोहन आज नहीं आएगा तो? उसकी आँखों में आशा का समुद्र सिकुड़ने लगा। उसकी आँखों में झिलमिलाते रंग मिटने लगे। आशा थी कि वे जरूर आएँगे। मकान की उन्हें बहुत जरूरत है पर साँझ का सूरज अस्त होने के करीब था।&lt;br /&gt;सहसा उसने गणेश भगवान को स्मरण किया। कदाचित वह कहीं से रोहन को अपने भीतर कीड़े की तरह कुलबुलाते हुए महसूस कर रही थी।&lt;br /&gt;सहसा घंटी बजी। वह लपक कर दरवाजे की ओर भागी। बिना सोचे और बिना जाने उसने तपाक से दरवाजा खोल दिया।&lt;br /&gt;एक गोरा-गोरा मुरझाया चेहरा खड़ा था।&lt;br /&gt;‘आइए सर।’&lt;br /&gt;रोहन भीतर आया। घर पुराना पर साफ-सुथरा। श्रीशा उसे उसी कमरे में ले गई, जिसे उसे किराए पर देना था। कमरे में वह सब कुछ था जिनकी एक व्यक्ति को जरूरत होती है। पंखा, पर्दे, डबल-बेड, बाथरूम, अलमारी, सोफा और साइड स्टूलें।&lt;br /&gt;इन सबको देख कर रोहन की आँखों में एक साथ कई प्रश्न चमके।&lt;br /&gt;‘बैठिए सर! मैं पानी लेकर आती हूँ।’&lt;br /&gt;वह कमरे से बाहर चली गई। वह नादान बालक की तरह कमरे को देखता रहा।&lt;br /&gt;‘सर! पानी!’&lt;br /&gt;उसने पानी पिया। गटागट।&lt;br /&gt;‘चाय पीएँगे या कॉफी?’&lt;br /&gt;‘कॉफी।’&lt;br /&gt;चली गई श्रीशा।&lt;br /&gt;वह सोचने लगा कि क्या यही वह श्रीशा है जो लोगों की नज़रों में काफी फ्लर्ट है। कुछ लोग तो इसे चालू भी कहते हैं। व्यंग्य में दबी जबान में गंदगी उछालते हैं कि इसके शरीर के समन्दर में कई लोग डुबकी लगा चुके हैं पर रोहन को वह बड़ी शालीन लगी।&lt;br /&gt;वह कॉफी ले आई थी। कप हलके नीले रंग के थे। कॉफी के साथ उनका मेल अच्छा लग रहा था। अपने लिए भी वह कॉफी लाई थी।&lt;br /&gt;‘इतनी देर में आपने कमरा तो देख लिया होगा?’ श्रीशा सहज स्वर में बोली, ‘अब आप मेरी बातों पर ध्यान रखकर यस-नो कहिए सर!’ श्रीशा की आँखों में सहसा सैलाब उभरा। स्वर का बुझापन बढ़ गया। बोली, ‘दबाव की बात नहीं है। आप हम पर दया नहीं करेंगे। यदि यह रूम आपको पसंद है तो आप यहाँ रहने आ सकते हैं। हमें भी किसी अच्छे किराएदार की तलाश है। आप सभी दृष्टियों से सही हैं। और लोग कहते हैं कि एक से भले दो और दो से तीन।’&lt;br /&gt;रोहन चुप हो गया। गंभीर कोमलता उसके चेहरे से चिपक गई। क्षणिक गूँगापन!&lt;br /&gt;कॉफी के एक साथ दो घूँट लेकर रोहन ने कहा, ‘मैं तुमसे उम्मीद रखूँगा कि तुम मुझे सच-सच बताओगी, चाहे वह सच नीम की तरह कडुवा भले ही हो। इस कमरे को देख कर मुझे लगा कि क्या पहले उसमें कोई रहता था?’&lt;br /&gt;बुत-सी स्थिरता श्रीशा में आ गई। आँखों से लगा कोई संवाद उसके आगे प्रेतात्मा सा नाच रहा है।&lt;br /&gt;रोहन ने फिर पूछा, ‘सच बताओ।’ वह सहसा उसके सन्निकट हो गया। आप से तुम पर आ गया। उसकी गर्दन झुक गई। लगता था कि वह किसी अपराध बोध से घिर गई हो। फिर भी साहस करके वह बुझे स्वर में आहिस्ता-आहिस्ता बोली, ‘हाँ, इसमें मेरे पति रहते थे। माइ हसबैंड!’&lt;br /&gt;‘क्या?’ रोहन की आँखें विस्फारित हो गई। जैसे सब कुछ पल भर के लिए थम गया हो।&lt;br /&gt;‘हाँ रोहन बाबू! इस कमरे में मैं और मेरे पति रहते थे। इस कमरे में जो कुछ भी है, उनका ही खरीदा हुआ है।’&lt;br /&gt;‘अब वे कहाँ हैं?’&lt;br /&gt;‘ही इज नो मोर सर! मैं इतनी भाग्यहीन हूँ कि तुरन्त विधवा हो गई।’&lt;br /&gt;‘उन्हें क्या हुआ था?’&lt;br /&gt;‘कुछ नहीं, वे अपाहिज थे। एक टाँग से लँगड़े थे। कहते थे कि किशोरावस्था में एक्सीडेंट हो गया था। प्रॉपर इलाज न होने के कारण वे बैसाखी के सहारे चलते थे।’&lt;br /&gt;‘फिर तुमने शादी.....।’ रोहन की आँखों में विस्मय चमका।&lt;br /&gt;वह उदास मुस्कान से बोली, ‘हमने प्रेम विवाह किया था। एक बार मैं दफ्तर से आ रही थी। एक मोड़ पर एक कार वाला उन्हें टक्कर मार गया। वे अचेत हो गए। मैंने देखा उन्हें कोई उठा नहीं रहा है। मैं नहीं जानती कि वह किसकी प्रेरणा थी पर मैं उन्हें राहगीरों की सहायता से अस्पताल ले गई। सुबह तक वह स्वस्थ हो गए। रात को मैं घर लौट आई थी। उनका एक मित्र आ गया था।’&lt;br /&gt;‘जब वे अचेत थे तब मैंने गौर से उन्हें देखा था। वे एकदम गोरे थे। नाक-नक्शे भी अच्छे थे। बाल घुंघराले थे। मुझे सुन्दर लगे। अपाहिज न होते तो उनका व्यक्तित्व लगभग आप जैसा ही था।’&lt;br /&gt;‘सुबह मैं फिर अस्पताल गई। डॉक्टर ने उन्हें छुट्टी दे दी। वे मुझे अपने घर पहुँचाने का आग्रह करने लगे। मैं उनके घर गई। यही घर था उनका। मैंने उनके लिए चाय बनाई। उन्होंने मेरा, दवाइयों व डॉक्टरों की फीस का हिसाब-किताब किया। उन्होंने पूछा, ‘इतने रुपये आप कहाँ से लाई? मैंने उन्हें बताया कि कल मुझे तनख्वाह मिली थी।’ मैं वहाँ से आने लगी तो उन्होंने कहा- ‘मैं आपका अहसान सदैव याद रखूँगा। आप मुझसे जरूर मिलिएगा। एक परिचित के रूप में ही सही।’ तभी उनकी नौकरानी आ गई।&lt;br /&gt;मैं उनके यहाँ यदाकदा जाती रहती थी। किस आकर्षण के तहत जाती रही परिभाषित नहीं कर सकती। यह वास्तव में प्रेम भावना थी या उनके अपाहिजपन के प्रति मेरी करुण भावना द्रवित हो गई थी। बस, वे मुझे अच्छे जरूर लगने लगे थे। वे बहुत भावुक व वाक्य पटु भी थे।&lt;br /&gt;एक बार नरेन ने कहा था, ‘देखो श्रीशा, प्रेम शब्दातीत है। वह केवल अनुभव किया जा सकता है। उसके अर्थ और मर्म मेरी दृष्टि में अनेक हैं। वह हृदय का सत्य है।’&lt;br /&gt;वस्तुतः रोहन साहब! वह प्रेम की बहुत अधिक व्याख्याएँ करता रहता था। मैं उन्हें सुन-सुन कर हतप्रभ हो जाती थी। उनके भावुकतापूर्ण संवादों और मनमोहक महत्त्वाकांक्षाओं ने मुझे सम्मोहित सा कर दिया था। मैं स्वयं बेचैन रहने लगी उनके लिए।&lt;br /&gt;एक दिन मैंने उनसे विवाह का प्रस्ताव रखा। तब उन्होंने बताया, ‘सुनो, मैं इस संसार में अकेला हूँ। आज मेरी सात पीढ़ी में कोई नहीं है। यह फ्लैट मेरे मरहूम चाचा ने दिया था। वे कुँवारे थे। मैं जाति का कायस्थ हूँ। मुझे जो कुछ भी मिला है, अपाहिज होने के कारण मिला है।’ .... उसने पल भर रुक फिर कहा, ‘मुझे तुमसे शादी करके बहुत खुशी होगी। मेरा यह दुर्दान्त एकांत और चुभती ऊब मिट जाएगी। तुम्हें इस पर गंभीरता से सोचना है।’&lt;br /&gt;मैंने अपनी माँ को नरेन की सारी स्थिति बताई। अपनी घरेलू स्थितियों का विश्लेषण किया। एक ‘खोली’ में रहने वाले निम्न मध्यवर्गीय परिवार के लिए यह सुनहरा अवसर था। .....पर माँ अकेली हो जाएगी। मैंने तय कर लिया कि माँ को अपने पास रखूँगी।&lt;br /&gt;मैंने सारी बातें नरेन को बताई। नरेन ने सहर्ष स्वीकार कर लिया कि माँ जी हमारे साथ रहें, मुझे कोई एतराज नहीं।&lt;br /&gt;शुभ मुहूत्र्त देखकर हमने कोर्ट-मैरिज कर ली। ......सही, पक्की और सस्ती अदालती शादी। साक्षी थे मेरी माँ, मेरी दो सहेलियाँ, नरेन के बॉस और उसके दो मित्र। इन लोगों को ही हमनें होटल में पार्टी दी।&lt;br /&gt;सुहागरात भी हमने फूलों की खुशबू में मनाई। मुझे लगा कि नरेन पूरा पक्का और तगड़ा मर्द है। टूटे लुंज पुंज पाँव पौरुष के प्रदर्शन में बाधा नहीं बनते।&lt;br /&gt;चंद ही दिनों के बाद मुझे महसूस हुआ कि चाहे एरेंज मैरिज हो या लव मैरिज, लेकिन यह पत्थर की लकीर की तरह अमिट सत्य है कि पति होते ही हर मर्द हुक्मरान बन जाता है। जैसे उसके हुक्म की तामील तुरन्त हो। मैंने जाना कि मर्द की देह नब्बे प्रतिशत उसकी अपनी होती है और स्त्री की दस प्रतिशत अपनी। यही हाल उसके मन का होता है। वह शादी के पूर्व नरेन मेरा भावुक दोस्त था पर शादी के पश्चात् वह मेरा स्वामी बन गया। यदि मैं उसकी कोई बात नहीं मानती तो उसकी आकृति पर रंग-बिरंगी भाव-रेखाएँ दिखाई पड़ती थीं। वह स्थिर सा हो जाता था। उसकी आँखों में मौन-आज्ञा की किरणें चमक उठती थीं।&lt;br /&gt;उसके इस व्यवहार से मैं बर्फ बनती जा रही थी। अपने को अन्तस को उत्तेजित सहसा नहीं कर पाती थी। मैं उससे उबने लगी। असहिष्णु हो गई। वाक्य-युद्ध होने लगे। मैं बिल्कुल अजनबी हो जाती थी। माँ भी एक माह के बाद आ गई थी। उसके कारण मैं जरा खुश थी। अपने को सुरक्षित समझती थी। हमारा कोई विशिष्ट नहीं, सामान्य जीवन चल रहा था। क्योंकि मैं भी कमाती थी।&lt;br /&gt;कई बार कुछ घटनाएँ अनायास घट जाती हैं। वे अच्छी भी होती हैं और बुरी भी।&lt;br /&gt;एक दिन वे दफ्तर से वेतन लेकर आए। बाज़ार से मेरे लिए साड़ी और मिठाई लाए। मुझे वह नई साड़ी पहनाई। कहा, ‘आज मेरा जन्मदिन है।’ रात को उन्होंने कई बार शरीर के समन्दर में गोते लगाए। वे असीम आह्लाद से घिरे थे।&lt;br /&gt;सुबह मैं उठ कर काम में लग गई। वे देर से उठे। चाय पी। लैट्रिन में घुसे। घुसे तो फिर बाहर ही नहीं निकले। मैंने कई बार पुकारा। कोई उत्तर नहीं। मैंने माँ को कहा। माँ भी घबराई।.... मैंने उन्हें जोर-जोर से पुकारा। दरवाजा भड़भड़ाया।&lt;br /&gt;अब मेरा धैर्य जाता रहा। मैं भाग कर निचली मंजिल के मिस्टर जोशी को बुला कर लाई। उन्होंने भी प्रयास किया। हमारी चिंता व घबराहट बढ़ती ही जा रही थी। अमंगल आशंकाएँ हमारा घेराव करने लगी थीं।&lt;br /&gt;मिस्टर जोशी भाग कर एक मिस्त्री को लाए। उसने दरवाजा उखाड़ा। वे अर्धनग्न फर्श पर पड़े थे। जोशी जी ने उन्हें झिंझोड़ा, बार-बार पुकारा। दिल की धड़कनें सुनी पर निष्फल। जोशी ने मुझे दर्द भरी लुक दी और कहा-‘‘आई थिंक, ही इज नो मोर!’’&lt;br /&gt;तभी कुछ लोग और आ गए थे। एक भाग कर डाक्टर को ले आया। उसने भी कह दिया कि हंसा उड़ गया। ....रोहन! सोचो, सारा खेल चंद मिनटों में खत्म हो गया कितनी अकल्पनीय घटना थी। कितना ही अपना हो पर मृत्यु के बाद उसे जितना जल्दी हो सकता है, आग के हवाले हम कर देते हैं। नरेन का दाह-संस्कार कर दिया गया। उसे मुखाग्नि मैंने दी।&lt;br /&gt;मेरी सहेलियाँ और उनके मित्र ‘उठावणी’ में आए। बारहवें दिन मम्मी के दबाव पर ग्यारह ब्राह्मणों को भोजन कराया। उनके पकड़े गरीबों को बाँटे। उसकी बैसाखी समुद्र को दे दी, कभी वह लंगड़ा होगा या किसी को लंगड़ा करेगा तो उसके काम आएगी।&lt;br /&gt;इसके बाद घर में धीरे-धीरे सन्नाटा पसर गया। प्रेतात्मा के घर का घुटनदार सन्नाटा। मुझे पीड़ादायक ऊब का अहसास पहली बार हुआ।&lt;br /&gt;रोहन ! समय हर जख़्म को भर देता है। समय हर स्मृति को धुँधला कर देता है, समय पत्थर की लकीर को भी घिस देता है।&lt;br /&gt;मैंने भी अपने को सामान्य कर लिया। जीने के लिए एक खूबसूरत व सुखद बहाना जरूरी है। भीतर के साँय-साँय करते सन्नाटों को मारने के लिए मैंने हँसी, मजाक, खुलेपन, सतहीपन से जीना शुरू कर दिया। लेकिन मेरा अन्तस पहाड़ी घाटियों की तरह सूना है। हाँ, नरेन के एक खास दोस्त ‘हाशमी’ को यह वहम हो गया था कि मैंने इस फ्लैट व लंगड़े पति से छुटकारा पाने के लिए उसकी हत्या कर दी है। उसने भाभीजान-भाभीजान कह कर मुझसे सम्पर्क भी बढ़ाया पर जब वह कुरेद-कुरेद कर सवाल पूछने लगा और कई बार उसने मेरा पीछा किया तो मैंने उसकी मनसा को भाँप लिया। मैंने उसे कह ही दिया, ‘मुझे उनके दोस्तों को सम्मान देना अच्छा लगता है पर मेरी जो जासूसी करता है, वह इंसान मेरे लिए घृणा के लायक है। हाशमी साहब! फिर कभी आप मुझसे बात नहीं करेंगे।’&lt;br /&gt;अब आप ही बताइए, कई लोग निरर्थक हुशियारी करते हैं। सच तो यह है कि कोई मेरे निजी सच को नहीं जानता कि मैं कितनी दुखी और संकटों से घिरी हूँ। मैं इस देश की अधिकतर स्त्रियों की तरह जीती हूँ। मेरी आंतरिक पीड़ा को कोई नहीं समझता। लोग समझते हैं कि यह फ्लर्ट है। नहीं रोहन बाबू... मेरे भीतर कई ज्वार-भाटे हैं। दुखों, नीरसता, व्यर्थता और पलायन के कई प्रेत हैं। ये प्रेत कब मेरा गला घोंट दें मैं नहीं जानती। मैं अकेली भयभीत रहती हूँ।&lt;br /&gt;रोहन इतनी देर खामोश बैठा था। बोला, ‘‘मैं यहाँ नहीं आऊँगा। न मैं तुम्हारे भीतर के सन्नाटों को तोड़ना चाहता हूँ और न बाहर की खुशियाँ मिटाना चाहता हूँ। मुझमें वह शक्ति भी नहीं है कि तुम्हारे पीड़ा के प्रेतों को भगा सकूँ। मैं शांति चाहता हूँ प्रगाढ़ शांति।’’&lt;br /&gt;‘लेकिन आपको यहाँ आना ही है।’’&lt;br /&gt;‘‘श्रीशा! औरत के साथ एक अकेला मर्द रहने से कई खतरें हैं। ये खतरें कई बार अनर्थ भी कर सकते हैं। मानसिक चैन को मिटा सकते हैं। गंदे विचार फैला सकते हैं। गलतफहमियों के कांटे चुभा सकते हैं।’’ उसके स्वर में तड़प थी।&lt;br /&gt;‘‘रोहन बाबू! आपको यहाँ आना ही है। जरूर आना है और आपकी अपनी शर्तों पर आना है। झूठ चोर की तरह होता है, उसके पाँव कच्चे होते हैं अतः वह सच की झलक से भाग जाता है। हाँ, कई सयाने कहते हैं कि सच्चे व अच्छे आदमी के आने से वहाँ के सारे प्रेत भाग जाते हैं। मेरे अन्तस में कई प्रेत हैं। वे तो आपके आने से ही जरूर भाग जाएँगे। खतरों की बात? खतरों के बिना नये सुखों की तलाश नहीं होती।’ वह भावुक हो गई। उसकी आँखें छलक आई। रोहन उसे अपलक देखता रहा। वह थोड़ा सा मुस्कुराया।&lt;br /&gt;सन्निकट स्थित मंदिर में शंख बज उठा। उसकी पवित्र और मधुर आवाज़ में प्रेरणाएँ थीं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित!&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8753024558307711180-3143060911025717710?l=kathavyatha.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kathavyatha.blogspot.com/feeds/3143060911025717710/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://kathavyatha.blogspot.com/2009/06/blog-post.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8753024558307711180/posts/default/3143060911025717710'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8753024558307711180/posts/default/3143060911025717710'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kathavyatha.blogspot.com/2009/06/blog-post.html' title='कहानी: भीतरी सन्नाटे - यादवेन्द्र शर्मा ‘चन्द्र’'/><author><name>Shambhu Choudhary"Iac"</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03776713428128546589</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-bM0lY3JA5GU/Te8lUG5KtcI/AAAAAAAAAtM/R5w2g954Y6M/s220/shambhu_choudhary.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_-_J_ggR3oI4/SkmZpSdzFaI/AAAAAAAAAo4/YHLV89oQw5k/s72-c/yadwendra+sharma.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8753024558307711180.post-2257672739197611167</id><published>2009-02-16T08:32:00.000-08:00</published><updated>2009-02-22T05:48:25.549-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='महाश्वेता देवी'/><title type='text'>परिचय: महाश्वेता देवी -शम्भु चौधरी</title><content type='html'>&lt;p align="justify"&gt; &lt;br /&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 250px; height: 187px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_-_J_ggR3oI4/SZmSn0tC91I/AAAAAAAAAno/WwgdYjoN8Ps/s200/mahasweta-devi1.jpg" border="0" alt="Mahasweta Devi"id="BLOGGER_PHOTO_ID_5303431249065604946" /&gt;महाश्वेता देवी एक ऐसा  नाम जिसका ध्यान में आते ही उनकी कई-कई छवियां आंखों के सामने प्रकट हो जाती हैं। जिसने अपनी मेहनत व ईमानदारी के बलबूते अपने व्यक्तित्व को निखारा है। उन्होंने अपने को एक पत्रकार, लेखक, साहित्यकार और आंदोलनधर्मी के रूप में विकसित किया। महाश्वेता देवी का जन्म सोमवार 14 जनवरी १९२६ को ईस्ट बंगाल जो भारत विभाजन के समय पूर्वी पाकिस्तान वर्तमान में  (बांग्लादेश) के ढाका शहर में हुआ था।&lt;br /&gt;       गत 13 फरवरी '2009 को सुबह 11.30 बजे सहारा समय (कोलकाता) की वरिष्ठ पत्रकार सईदा सादिया अज़ीम , हिन्द-युग्म (दिल्ली से) श्री शैलेश भारतवासी और मैं खुद कोलकाता स्थित महाश्वेता देवी के घर उसने मिलने गये थे। &lt;br /&gt;महाश्वेता जी ने अपना सारा जीवन ही मानो आदिवासियों के साथ गुजार दिया हो। जल, जंगल और जमीन की लड़ाई के संघर्ष में खर्च कर दिया हो। उन्होंने पश्चिम बंगाल की दो जनजातियों 'लोधास' और 'शबर' विशेष पर बहुत काम किया है। इन संघर्षों के दौरान पीड़ा के स्वर को महाश्वेता ने बहुत करीब से सुना और महसूस किया है। &lt;br /&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 213px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_-_J_ggR3oI4/SZmS_ut9w3I/AAAAAAAAAnw/4odNgKLSits/s320/Mahasewtaji_S-Choudhary2.jpg" border="0" alt="Mahasewta Devi and Shambhu Choudhary"id="BLOGGER_PHOTO_ID_5303431659775705970" /&gt;&lt;font color="#cc0000"&gt;पीड़ा के ये स्वर उनकी रचनाओं में साफ-साफ सुनाई पड़ते हैं। उनकी कुछ महत्वपूर्ण कृतियों में 'अग्निगर्भ' 'जंगल के दावेदार' और '1084 की मां' हैं। आपको पद्मविभूषण पुरस्कार (२००६), रैमन मैग्सेसे (1997), भारतीय ज्ञानपीठ(1996) सहित कई अन्य पुरस्कारों से भी सम्मानित किया जा चुका है।  पिछले दशक में महाश्वेता देवी को कई साहित्यिक पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है। आपको मग्सेसे पुरस्कार से भी सम्मानित किया जा चुका है जो एशिया महादीप में नोबेल पुरस्कार के समकक्ष माना जाता है।&lt;/font&gt;&lt;br /&gt;फिर भी आप बोलती हैं कि आपने किसी पुरस्कार के लिये कार्य नहीं किया। बार-बार आदिवासी के प्रश्न पर विचलित होते इनको कई बार देखा गया। कहती हैं कि "हम लोग तब तक अपने आपको सभ्य नहीं कह सकतें,जब तक हम आदिवासियों के जीवन को नहीं बदल देते। आपने 'संथाल', 'लोधास',  'शबर' और मुंदास जैसे खास आदिवासी (आदिवासी जन जाति) लोगों के जीवन को बहुत गहराई से न सिर्फ अध्ययन ही किया इन पर बहुत कुछ अपनी कथाओं में समेटने का प्रयास भी किया है, आज भी आपको ऐसे समाचार विचलित कर देतें हैं जहाँ किसी आदिवास के ऊपर ज़ुल्म किया जाता है।  आप सदैव से सामाजिक और राजनीतिक प्रासंगिक  विषयों पर अपनी कलम से प्रहार करती रहीं हैं। आप एक जगह लिखती हैं- ‘‘एक लम्बे अरसे से मेरे भीतर जनजातीय समाज के लिए पीड़ा की जो ज्वाला धधक रही है, वह मेरी चिता के साथ ही शांत होगी.....।’’ आपने अपना पूरा जीवन और साहित्य, आदिवासी और भारतीय जनजातीय समाज को समर्पित कर दिया है। इसलिए नौ कहानियों संग्रह में से आठ कहानियों के केन्द्र में आदिवासी जाति केन्द्रित है, जो आज भी समाज की मूख्यधारा से कटकर जी रहा है। &lt;br /&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 247px; height: 320px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_-_J_ggR3oI4/SZmTh8MVS1I/AAAAAAAAAn4/bqXOjY4e4mM/s320/mahasweta-devi2.jpg" border="0" alt="Mahasveta Devi"id="BLOGGER_PHOTO_ID_5303432247508290386" /&gt;लेखिका महाश्वेता देवी 14 जनवरी 2009 को 83 वें साल की हो गई, पर इनके चेहरे पर हमें कहीं कोई थकान देखने को नहीं मिला। बातें ऐसे करती हैं जैसे कोई परिवार का सदस्य ही हो हम। वर्ष 1967 में नक्सलबाड़ी आंदोलन के दौरान उनकी लेखनी ने लोगों को दहला दिया था। आज भी किसी आंदोलन के नाम आपको आगे  देखा जा सकता है। जब मैंने यह प्रश्न किया कि-"आप तो बुद्धदेव बाबू (वर्तमान में बंगाल के मुख्यमंत्री) को तो बहुत मानती थी, फिर नंदीग्राम और सिंगूर के मुद्दे पर आपने उनका साथ नहीं दिया?"  बोलने लगी-  " मैं बहुत दिन राजनीतिक की हूँ। किसानों की जमीं को दखल करके उद्योग कैसे लगाया जा सकता है?" तुम्हीं सोचो... फिर थोड़ा रूक कर किसान भूमिहीन हो जायेगा तो खायेगा क्या?&lt;br /&gt;        तब तलक फोटोग्राफर भी आ गया था। उसे देखते ही एकदम से उस पर बरस पड़ी "एई...ई अमार छ्वी कोथाई?" फिर मुस्कराते हुए बोलीं- " तारा.. ताड़ी छ्वी तुलो ... ओनेक काज कोरते होवे...."( देवज्योति फोटोग्रफर को देखते ही उस पर नाराज हो गई.... ए लड़के ... मेरी फोटौ कहाँ है? ... फिर थोड़ा मुस्कारते हुए कहा.. जल्दी से फोटो ले लो मुझे बहुत काम करना है अभी)  इससे पहले जब हिन्द-युग्म के श्री शैलेश भारतवासी उनसे बात करना शुरू ही किये थे तो बात को शुरू करने के लिये मैंने जैसे ही बंगला में उनका परिचय देना शुरू किया तो बोलने लगी- "तुमी हिन्दीते बोलो... मैं अच्छा से हिन्दी जानती हूँ।"&lt;br /&gt;     आपने साहित्य व सांस्कृतिक आंदोलन के साथ राजनीतिक आन्दोलनों में भी भाग लिया है। तसलीमा नसरीन को कोलकाता से हटाये जाने के मामले को लेकर वे पश्चिम बंगाल व केंद्र सरकार के रवैये से काफी आहत हैं। आप बोलती हैं कि " इधर देश में जहाँ मुस्लमान हैं वहाँ हमलोग मुस्लीम उम्मीदवार तो जिधर हिन्दू हैं उधर हिन्दू उम्मीदवार खड़े करते हैं इससे देश कैसे चलेगा। सोचो तब तो उनकी भाषा में ही हमें बात करना होगा। हमने उनके साथ जो पल गुजारा इसे आपके साथ बाँटने का यह प्रयासभर है। किसी राजनैतिक विचारधारा से हमें कोई सरोकार नहीं है, फिर भी कहीं कोई बात आपको राजनीति सी लगती हो तो उसे नजरांदाज कर देंगे। इस अवसर पर आपको मेरे द्वारा संपादित कोलकाता से प्रकाशित एक समाजिक पत्रिका &lt;strong&gt; "समाज विकास" &lt;/strong&gt;  के कुछ साहित्य विशेषांक भी भेंट किया जिसे आपने स्वीकार करते हुए कहा कि- "खूब भालो काज कोरछो तुमी" ( खूब अच्छा काम करते हो तुम) चेहरे पर तेजस्व की रोशनी इस तरह चमक रही थी जैसे साक्षात हमने माँ का दर्शन कर लिया हो।&lt;br /&gt;&lt;font color="#cc0000" size=3&gt;परिचय:&lt;/font&gt;&lt;br /&gt;     आप न सिर्फ एक प्रख्यात लेखिका एक सामाजिक कार्यकर्ता भी हैं।  महाश्वेता देवी का जन्म सोमवार 14 जनवरी १९२६ को ईस्ट बंगाल जो भारत विभाजन के समय पूर्वी पाकिस्तान वर्तमान में  (बांग्लादेश) के ढाका शहर में हुआ था। आपके पिता मनीष घटक एक कवि और एक उपन्यासकार थे, और आपकी माता धारीत्री देवी भी एक लेखकिका और एक सामाजिक कार्यकर्ता थी। आपकी स्कूली शिक्षा ढाका में हुई। भारत विभाजन के समय किशोरवस्था में ही आपका परिवार पश्चिम बंगाल में आकर बस गया। बाद में  आपने विश्वभारती विश्वविद्यालय,शांतीनिकेतन से बी.ए.(Hons)अंग्रेजी में किया, और फिर कलकत्ता विश्वविद्यालय में  एम.ए. अंग्रेजी में किया। कोलकाता विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य में मास्टर की डिग्री प्राप्त करने के बाद एक शिक्षक और पत्रकार के रूप में आपने अपना जीवन शुरू किया। तदुपरांत  आपने  कलकत्ता विश्वविद्यालय में  अंग्रेजी व्याख्याता के रूप में  नौकरी भी की। तदपश्चात 1984 में लेखन पर ध्यान केंद्रित करने के लिए आपने सेवानिवृत्त ले ली। &lt;br /&gt;      महाश्वेता जी ने कम उम्र में लेखन का शुरू किया और विभिन्न साहित्यिक पत्रिकाओं के लिए लघु कथाओं का महत्वपूर्ण योगदान दिया। आपकी पहली उपन्यास, "नाती", 1957 में अपनी कृतियों में प्रकाशित किया गया था &lt;br /&gt;‘झाँसी की रानी’ महाश्वेता देवी की प्रथम रचना है। जो 1956 में प्रकाशन में आया। स्वयं उन्हीं के शब्दों में,  "इसको लिखने के बाद मैं समझ पाई कि मैं एक कथाकार बनूँगी।" इस पुस्तक को महाश्वेता जी ने कलकत्ता में बैठकर नहीं बल्कि सागर, जबलपुर, पूना, इंदौर, ललितपुर के जंगलों, झाँसी ग्वालियर, कालपी में घटित तमाम घटनाओं यानी 1857-58 में इतिहास के मंच पर जो हुआ उस सबके साथ-साथ चलते हुए लिखा। अपनी नायिका के अलावा लेखिका ने क्रांति के तमाम अग्रदूतों और यहाँ तक कि अंग्रेज अफसर तक के साथ न्याय करने का प्रयास किया है। आप बताती हैं कि "पहले मेरी मूल विधा कविता थी, अब कहानी और उपन्यास है।" उनकी कुछ महत्वपूर्ण कृतियों में 'अग्निगर्भ' 'जंगल के दावेदार' और '1084 की मां', माहेश्वर, ग्राम बांग्ला हैं। पिछले चालीस वर्षों में, आपकी छोटी-छोटी कहानियों के बीस संग्रह प्रकाशित किये जा चुके हैं और  सौ उपन्यासों के करीब (सभी बंगला भाषा में) प्रकाशित हो चुकी है। &lt;br /&gt;&lt;font color="#cc0000" size=3&gt;&lt;a href="http://pustak.org/bs/home.php?author_name=Mahasweta%20Devi" target="new"&gt;आपकी कुछ  कृतियां हिन्दी में:&lt;/a&gt;&lt;small&gt;(सभी बंग्ला से हिन्दी में रुपांतरण)&lt;/small&gt; &lt;/font&gt;&lt;br /&gt;अक्लांत कौरव, अग्निगर्भ, अमृत संचय, आदिवासी कथा,  ईंट के ऊपर ईंट,  उन्तीसवीं धारा का आरोपी, उम्रकैद, कृष्ण द्वादशी, ग्राम बांग्ला, घहराती घटाएँ, चोट्टि मुंडा और उसका तीर, जंगल के दावेदार, जकड़न, जली थी अग्निशिखा, झाँसी की रानी, टेरोडैक्टिल, दौलति, नटी, बनिया बहू, मर्डरर की माँ, मातृछवि, मास्टर साब, मीलू के लिए, रिपोर्टर, रिपोर्टर, श्री श्री गणेश महिमा, स्त्री पर्व, स्वाहा और हीरो-एक ब्लू प्रिंट आदि...&lt;br /&gt;&lt;font color="#cc0000"&gt;&lt;br /&gt;Contact Address: Smt. Mahasveta Devi, W-2C, 12/3 Phase- II, Golf Green, Kolakata - 700095 Phone: 033-24143033&lt;/font&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित!&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8753024558307711180-2257672739197611167?l=kathavyatha.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kathavyatha.blogspot.com/feeds/2257672739197611167/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://kathavyatha.blogspot.com/2009/02/blog-post_16.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8753024558307711180/posts/default/2257672739197611167'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8753024558307711180/posts/default/2257672739197611167'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kathavyatha.blogspot.com/2009/02/blog-post_16.html' title='परिचय: महाश्वेता देवी -शम्भु चौधरी'/><author><name>Shambhu Choudhary"Iac"</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03776713428128546589</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-bM0lY3JA5GU/Te8lUG5KtcI/AAAAAAAAAtM/R5w2g954Y6M/s220/shambhu_choudhary.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_-_J_ggR3oI4/SZmSn0tC91I/AAAAAAAAAno/WwgdYjoN8Ps/s72-c/mahasweta-devi1.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8753024558307711180.post-6486069745824081727</id><published>2009-02-08T20:36:00.000-08:00</published><updated>2009-02-08T20:37:38.539-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='डॉ. वीरेन्द्र सिंह यादव'/><title type='text'>लघुकथा की प्रासंगिकता एवं उपादेयता -डॉ. वीरेन्द्र सिंह यादव</title><content type='html'>&lt;p align="justify"&gt;आर्थिक उदारीकरण, ग्लोबलाइजेशन अर्थात् एक ध्रुवीय होती दुनिया के इस वर्तमान भौतिकवादी युग में किश्त-किश्त जीवन जीता आदमी व्यक्तिगत जिजीविषा की पूर्ति हेतु दिनोंदिन आदमी नहीं, मशीन बनता जा रहा है। वह समय को अपना उत्पादक बनाकर बहुत ही चालाकी से उसका व्यापार कर रहा है, वास्तविकता यह है कि ऐसे समय में जब दुनियां की मण्डी में समय की कलाबाजी हो रही है, मनुष्य अपना समय निःस्वार्थ नष्ट नहीं कर सकता। इसलिए पेशेवर साहित्यधर्मियों एवं पाठकों को छोडकर शेष लोग अपनी मानसिक थकान मिटाने हेतु कुछ ऐसा पढ़ना या समझना चाहते हैं, जिसमें समय कम लगे और उन्हें उसका प्रतिफल पर्याप्त मात्रा में प्राप्त कर सकें। साथ ही उसके ग्रहण करने एवं समझने का दायरा दर्पण की तस्वीर की तरह पारदर्शी भी हो। आज लघुकथाओं की यही सार्थकता, प्रासंगिकता एवं उपादेयता भी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लघुकथाकार अनावश्यक कथा विस्तार, वर्णनात्मक फैलाव और विलगाव से बचता हुआ जीवन के छोटे घटना प्रसंग संवेदनाओं के माध्यम से व्यक्त करता है। विधा के रूप में जिस तरह साहित्य के गद्य रूप की कथा विधाएँ-उपन्यास एवं कहानी होती है, उसी तरह लघुकथा इन्हीं तत्वों के परिप्रेक्ष्य में लिखी जाती हैं। इन तीनों उपविधाओं में अन्तर मात्र कथानकों का होता है जिसके कारण इन तीनों में स्वतः ही आकारगत अन्तर आ जाना लाजमी है। इन्हीं प्रमुख बिन्दुओं पर इसका शिल्प केन्द्रित होता है, अब वह शिल्प चाहे पारम्परिक हो, प्रयत्न साध्य हो या स्वयंभू हो। जहाँ तक लघुकथा की पृथक पहचान का सवाल है, एक तो कथानक को लेकर आकारगत इसकी अपनी पृथक पहचान हैं तो दूसरी ओर हृदय में गहरे पैठकर मार करने की इसकी क्षमता विशेष पहचान रखती है। या यूँ कहा जाये कि “लघु कथा युगबोध को अभिव्यक्त करती है और नैतिक जीवनमूल्यों और नैतिक जीवनमूल्यों की राख के अन्दर कुरेदती हे। वह आलपिन की चुभन भी है और गन्ध की छुअन भी है। दरअसल लघुकथा की अनिवार्य शर्त रूप में न होकर गुण में है, शिक्षा में न होकर संस्कार में है दृश्य में न होकर प्रभाव में है, स्वास्थ्य में न होकर व्यक्तित्व में है और व्यक्तित्व कर्म से बनता है, कसरत से नहीं।” &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लघुकथा अपनी वैचारिक प्रक्रिया के द्वारा आश्रय के मन में एक भावनात्मक रूप ग्रहण करती है, जिसके भीतर उद्‌बोधित शोक, मानवीय शोषण, गरीबी, उत्पीड़न, असहायता के प्रति करुणा अर्थात् मानव को त्रासद परिस्थितियों से मुक्त कराने के भाव से सराबोर हो उठता है, जिसके कारण आश्रय के मन में साहस का एक ऐसा नया भाव जागृत हो उठता है जो बुराइयों, अन्धविश्वासों, रूढ़ियों, साम्राज्यवादियों, नीतियों के विरोध में संघर्ष और चुनौती का वीरतापूर्वक परिचय देने लगता है। सही अर्थों में देखा जाये तो लघुकथा की यही सत्योन्मुखी संवेदनशीलता है, जो शोषणविहीन समाज अर्थात् मंगलकारी तत्व की स्थापना करना चाहती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आकार की बात करें तो लघुकथा पंचतंत्र की बोधकथा की तरह आरम्भ होती है किन्तु बोध कथा का उद्देश्य केवल उपदेशात्मक होता था जबकि आधुनिक लघुकथा का लक्ष्य बहुआयामी है। तुलमात्मक दृष्टि से अवलोकर करें तो लघु कथाहास्य से थोड़ी दूर बनाकर चलती है, वहीं दूसरी ओर व्यंग्य के प्रति इसका सम्बन्ध घनिष्ट होता है। क्योंकि आज के विसंगति प्रधान समाज पर यह करारा प्रहार करती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लघुकथा में व्यंग्य का होना अनिवार्य नहीं है, परन्तु व्यंग्य की उपस्थिति से लघुकथा में रोचकता आ जाती है। लघुकथा अपनी विशेषता से पाठक के मूड में जबर्दस्त परिवर्तन कर दे, साथ ही उसके मानस को कुछ सोचने पर विवश कर दे, उसमें वैचारिक विद्रोह का बीज बो दे। यह भी कहा जा सकता है कि लघुकथा एक पृष्ठ की गद्य सीमा में पूर्वजों सा प्राचीन या नवजात शिशु-सा ताजा कथानक, प्रत्यंचा से कसे हुए शब्द, फैशन के समान बन्धनहीन आकर्षक शैली और अन्त में कुछ करने अथवा बनने की ओर पाठक की तड़प का उद्देश्य लिए हुए हो। इन्टरनेटी युग मे सभी इसकी सार्थकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लघुकथाओं की सर्जनात्मक शक्ति कहानी से किसी स्तर में कम नहीं मान जा सकती है। समसामयिक जीवन की विसंगतियों के विरुद्ध लघुकथाओं में जिस तीखेपन और वास्तविक रूप में विरोध/प्रतिरोध का स्वर गुंजित हुआ है, उससे इन लघुकथाओं की जीवन्तता की तस्वीर स्पष्ट दिखती है। इसके साथ ही अन्य सम्भावनाओं की आशा एवं प्रगति साफ दिखती है। वास्तव में मन के अंतःकोणों से लेकर विराट सामाजिक परिदृश्य को चित्रित करने में लघु कथाएँ निश्चय ही अपने नघु रूपबन्ध कहानी के अनुरूप दिखाई देती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लघुकथा सामाजिक विद्रूपताओं/विसंगतियों के विरुद्ध एक रचनात्मक आह्वान है। लघुकथा पाठकों को आज की आपा-धापी और समयाभाव के बीव जीवनानुभवों और यथार्थ के विविध सन्दर्भों आयामों का बोध कराती है। इन लघुकथाओं के माध्यम से रचनाकार उन जीवनपरिस्थितियों से परिचय कराता है जिनसे सम्पूर्ण मानवीय जीवन प्रभावित होता है। ये लघुकथाएँ कविता और गजलों की तरह सामाजिक, राजनीतिक और दैनिक जीवन की विसंगतियों/घटनाओं को विशिष्ट अन्दाज में वर्णन करती है। पढ़ने वाला इसके प्रति लगाव महसूस करने लगता है। वास्तविकता यह है कि लघुकथाओं में ’नावक‘ के मानक के समान सीमित शब्दों में बहुत कुछ कहने की असीमित शक्ति छिपी हुई है। उसमें व्यंग्य की पैनी धार है, आक्रोश के तीखे स्वर हैं, प्रतीकों और बिम्बों की सशक्त प्रयोगधर्मिता है, सारग्राहवाणी, है क्रान्तिधर्मी चेतना है, समूचे परिवेश को समेट लेने की अपरिमित क्षमता विद्यमान रहती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज बाजारवाद ने लोकतंत्र को अभिजात्व वर्ग तक सीमित कर दिया है। आधुनिक भारत में पूँजीवाद के विकास के असंगत गति के परिणामस्वरूप ही सामाजिक, राजनीतिक विषमताओं जन्म हुआ। आजादी के बाद हमारे देश में पूँजीवादी व्यवस्था का शोषण चक्र जिस तीव्रता के साथ हुआ है उससे हमारे सामाजिक जीवन में अजीबोगरीब परिवर्तन हुए हैं। वर्गवादी और स्वार्थी सत्ता की राजनीति ने अब तक मानवीय मूल्यों को अपूरणीय क्षति पहुँचाई है, जिससे मानव अमानवीय जीवन जीने के लिए विवश हुआ है। भ्रष्टाचार, कालाबाजारी, स्मगलिंग, परिवारवाद, व्यक्तिवादी सोच को निरन्तर बढ़ावा मिलने के कारण सम्बन्धों में विघटन तेजी से आया है। व्यक्ति वर्गों और सम्प्रदायो में विभाजित हो गया है, वह उपभोक्ता संस्कृति का एक प्रोडक्ट बनकर रह गया है। साम्प्रदायिक, धार्मिक, आपराधिक राजनीति ने मनुष्य को असुरक्षा, भय और हिंसा के वातावरण में प्रवेश करने को मजबूर कर दिया है। अर्थशास्त्र की गणित के कारण रिश्वत, हिसां, लूट, बलात्कार तथा हत्या आदि को निरन्तर प्रश्रय मिल रहा है। नेता, अधिकारियों और पुलिस के त्रिगुट ने जहाँ अपने स्वार्थों की पूर्ति की है, वहीं मानव जीवन को प्रभावित/आतंकित भी किया है। इस पूँजीवादी व्यवस्था के पतनशील मूल्यों के कुप्रभाव के परिणामस्वरूप राष्ट्रीय एकता और अखण्डता की समस्या उत्पन्न हो गयी है। सूचना संचार के माध्यमों-प्रेस, पत्र, रेडियो, टेलिविजन द्वारा निरन्तर साहित्य-संस्कृति को क्षग्रिस्त करने का सफल-असफल प्रयास किया जा रहा है। पुलिस और नौकरशाही से तालमेल के कारण समाज में ऐसी घृणित घटनाओं का सृजन हो रहा है कि शर्म से सिर नीचा हो जाता है। इस तथ्य को प्रेस भी स्वीकार करता है। वोट बैंक, जातिवाद और राजनीति के कारण मानव मन, परिवार, गाँव, शहर और समूचे समाज में विघटन की सतत् प्रक्रिया जारी है। इक्कीसवीं सदी के हसीन सपनों में जीता हुआ व्यक्ति स्वतंत्रता, विकास, नई शिक्षा नीति के सुनहरे नारों के बीच आर्थिक संकट से उबरने के लिए भरपूर शक्ति से प्रयास कर रहा है। व्यवस्था की इन विसंगतियों और कुरूपताओं को यथार्थ अभिव्यक्ति देने में इन लघुकथाओं ने सशक्त और जारूक पेशकश की है। इनके माध्यम से पाठक प्रतिदिन के वातावरण में होने वाली घटनाओं एवं कशमकश से वाकिफ़ और रू-ब-रू होता है। दूसरी ओर वह उन परिस्थितियों के लिए ज़िम्मेदार ताक़तों/शक्तियों को पहचानने में सफल होता है, जिसकी वजह से व्यक्ति का जीवन विसंगतिपूर्ण और अमानवीयता की ओर अग्रसर होता चला आ रहा है। लघुकथा का मूल अर्थ/तेवर मानवीय सहानुभूति का भाव एवं व्यवस्था में होने वाली सडांध का विरोध करना पड़ रहा है, जो इसकी सार्थकता को सिद्ध करता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हिन्दी लघुकथाओं के विकास में लघु पत्र/पत्रिकाओं की विशिष्ट भूमिका रही है क्योंकि इन पत्रिकाओं के माध्यम से ही लघुकथाओं की पहचान स्पष्ट हो सकती है। वास्तविकता यह है कि इन पत्रिकाओं के माध्यम से अपनी विकास यात्रा के दौरान इन लघुकथाओं ने उन ऊँचेऊँचे सोपानों को स्पर्श किया जिनके आधार पर ही कहानी केन्द्रीय विधा के रूप में प्रतिष्ठित हुई। अपनी इस आत्म यात्रा में ही लघुकथाओं की लेखन परम्परा समृद्ध और प्रसिद्ध हुई है। सन् सत्तर के दशक में समकालीन विधाओं के बीच लघु कथा ने अपना एक स्वतंत्र वजूद बना दिया था। ’सारिका‘ जैसी महत्वपूर्ण कथापत्रिका ने लघुकथाओं के विशेषांक और महत्वपूर्ण अंकों को प्रकाशित कर लघुकथाओं के महत्व की स्वीकृति को सार्वजनिक किया है। वर्तमान समय में प्रत्येक पत्रिका में इस विधा के प्रति रुचि सम्पादकों का ध्यान आकृष्ट किए हुए हैं। हिन्दी आलोचकों ने अवश्य इस ओर अपनी उपेक्षा दृष्टि और संकीर्ण मानसिकता का परिचय दिया है। समय-समय पर लघुकथाओं के विशेषांक, प्रदर्शनी तथा सेमिनारों के बढ़ते प्रभाव ने इसकी प्रासंगिकता सिद्ध की है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्पष्ट है कि आकार, तकनीक एवं शैली के आधार पर लघुकथा की अपनी पृथक पहचान बन चुकी है। लघुकथा का शिल्प परिणाम एवं विस्तार में प्रौढ़ता प्राप्त कर चुका है। इसलिए वर्तमान में लघुकथा के प्रति अनेक रचनाकारों का समर्थन और उत्साह अकारण नहीं है। जिस तीव्रता के साथ लघुकथा समृद्धता की ओर अग्रसर हो रही है, वह किसी भी साहित्य के लिए आश्चर्य का विशय हो सकता है। यह कहा जा सकता है कि लघुकथा विधा की स्थापना व्यावहारिक, शास्त्रीय और सैद्धान्तिक दृष्टि से अपनी स्वाभाविक व सहज विकास यात्रा के प्रखर सोपान पर है, जो इसकी सार्थकता, प्रासंगिकता एवं उपादेयता को सिद्ध करता है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित!&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8753024558307711180-6486069745824081727?l=kathavyatha.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kathavyatha.blogspot.com/feeds/6486069745824081727/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://kathavyatha.blogspot.com/2009/02/blog-post_08.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8753024558307711180/posts/default/6486069745824081727'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8753024558307711180/posts/default/6486069745824081727'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kathavyatha.blogspot.com/2009/02/blog-post_08.html' title='लघुकथा की प्रासंगिकता एवं उपादेयता -डॉ. वीरेन्द्र सिंह यादव'/><author><name>Shambhu Choudhary"Iac"</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03776713428128546589</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-bM0lY3JA5GU/Te8lUG5KtcI/AAAAAAAAAtM/R5w2g954Y6M/s220/shambhu_choudhary.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8753024558307711180.post-3415825421082063751</id><published>2009-02-08T01:16:00.000-08:00</published><updated>2009-02-09T08:20:40.374-08:00</updated><title type='text'>F.I.R. का अपराधी</title><content type='html'>&lt;p align="justify"&gt;बड़े साहब हड़बड़ी में थे और अपना काम समेट कर कहीं जाने ही वाले थे कि अचानक हिम्मत सिंह ने चेम्बर में प्रवेश करते हुए विस्फोट किया- "साहब ठाकुर दुर्जन सिंह के खिलाफ F.I.R. दर्ज हुई है।"&lt;br /&gt;इस समाचार से मानो कुर्सी खिसक गयी हो साहब की, उसीके पैसों से तो ये थाना चल रहा है; और फिर चुनाव सर पर है, ऐसी स्थिति में....! &lt;br /&gt;क्या मुसीबत है, कोई चैन से बैठने भी नहीं देता है। साहब का मुंह कड़वा हो गया। ठाकुर साहब के खिलाफ ये कोई पहली शिकायत नहीं थी, अभी पिछले दिनों ही छोटे थाने के सिपाही ने दफ़्तर में सरकारी कागजों से छेड़छाड़ का आरोप लगाया था, हालाँकि उसने ठाकुर साहब का नाम नहीं लिया, पर बड़े साहब की तफ्तीश में उनका नाम स्पष्ट उजागर हुआ था। सिपाही को तो डांट-डपट कर और घुड़की देकर मामला दबाने को कह दिया गया था, और साथ में हिदायत भी दे दी गयी थी की अगर थाने में रहना है तो साहब लोगों की बातों को हज़म करने की आदत डाल लेवे, अभी ये मामला शांत भी नहीं हुआ था की ये नया मामला वो भी सीधे-सीधे इसी थाने में।&lt;br /&gt;"मामला क्या है? किसने की है रिपोर्ट" - साहब ने एक प्रश्नभरी मुद्रा में हिम्म्त सिंह से पुछा&lt;br /&gt;साहब का चेहरा देखकर हिम्मत सिंह को तो पसीने ही आ गये, &lt;br /&gt;"आज दुखिया की तो खैर नहीं", हिम्मत सिंह ने मन ही मन में सोचा।&lt;br /&gt;जी...ज्ज्ज्जी ! हजूर ! दुखिया ने कराई है रिपोर्ट, कह रहा है; मेरी जीवन भर की कमाई पूंजी ठाकुर साहब ने हड़प ली। बुढउ को ठाकुर साहब का भी डर नहीं, बताइए तो.. मैंने घुड़की दी पर उसने कहा- "फांसी पर लटक जाईब...  झूठ न बोईली..." रिपोर्ट अभी नोट ही किया है; आगे आप जो आदेश देंवे।" हिम्मत सिंह ने कहा।&lt;br /&gt;उधर मामला तूल पकड़ता जा रहा था, गांव में बात, जंगल की आग की तरह फैल रही थी, पत्रकार लोग सीधे साहब से जवाब पाने को उतावले हो रहे थे। चुप बैठने से भी काम चलने वाला नहीं था।&lt;br /&gt;तुरन्त साहब ने ठाकुर साहब को फ़ोन मिला कर दो मिनट बातें की। पता नहीं ठाकुर सा'ब ने उधर से क्या बातें कही, साहब के चेहरे पर चमक आ गयी। &lt;br /&gt;थाने में सभी हवलदारों की एक "राउंड टेबल मीटिंग" बुलाई गयी। आखिर महकमे की "इज़्ज़त" का सवाल था।&lt;br /&gt;अगले दिन ये चर्चा आम थी- जाँच में पाया गया की दुखिया के पास कोई संपत्ति थी ही नहीं, सो कोई चोरी हुई ही नहीं, सारा मामला ठाकुर साहब की प्रतिष्ठा को धूमिल करने के लिए उठाया गया है,&lt;br /&gt;इस सारे मामले में दुखिया स्पष्ट दोषी है, सरकारी कागजात भी दुखिया के खिलाफ चीख-चीख कर बयान दे रहे थे कि मामला निराधार पाया गया, अतः मामले को फाइनल अनुशंसा के साथ समाप्त समझा जाए। &lt;br /&gt;सूबे में लगे ठाकुर दुर्जन सिंह के बड़े-बड़े बैनर &lt;strong&gt;"कानून में मुझे आस्था है"&lt;/strong&gt; सड़कों पर लगा रहे थे।  जो गाँव के लोगों के लिये जीत का एक बड़ा उत्सव जैसा ही था। &lt;br /&gt;दूसरी तरफ दुखिया अपनी जीवनभर की पूंजी से हमेशा के लिये हाथ धोकर एक कोने में बैठा आँसु बहा रहा था। &lt;br /&gt;मन ही मन में  दुखिया थाने में जाने की भूल के लिये पश्चाताप भी कर रहा था और सोच रहा था- आखिर अपराधी कौन...?&lt;br /&gt;जिसकी चोरी हुई....या  जिसने चोरी की....?   &lt;p align="right"&gt;&lt;small&gt;&lt;strong&gt;- सुमित चमड़िया, पटना से&lt;/strong&gt;&lt;/small&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित!&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8753024558307711180-3415825421082063751?l=kathavyatha.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kathavyatha.blogspot.com/feeds/3415825421082063751/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://kathavyatha.blogspot.com/2009/02/fir.html#comment-form' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8753024558307711180/posts/default/3415825421082063751'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8753024558307711180/posts/default/3415825421082063751'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kathavyatha.blogspot.com/2009/02/fir.html' title='F.I.R. का अपराधी'/><author><name>Shambhu Choudhary"Iac"</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03776713428128546589</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-bM0lY3JA5GU/Te8lUG5KtcI/AAAAAAAAAtM/R5w2g954Y6M/s220/shambhu_choudhary.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8753024558307711180.post-3397521696051107981</id><published>2009-02-04T19:21:00.000-08:00</published><updated>2009-02-08T01:15:44.532-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='shyamskha`shyam'/><title type='text'>मेरे तो गिरधर गोपाल - श्यामसखा'श्याम</title><content type='html'>&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;       कृष्ण गोपाल बैंक में अधिकारी है । इधर कुछ दिनों से उनकी पत्नी मीरा और उनके बीच, कृष्ण गोपाल की सह्कर्मी, चुलबुली राधा को लेकर तना तनी चल रही है । मीरा जब भी टोकती है कि वे राधा से मेल जोल खत्म करदे तो कृष्ण गोपाल गुनगनाने लगते हैं  -&lt;center&gt;&lt;strong&gt;&lt;br /&gt;       ''मैं तो राधा का भी श्याम&lt;br /&gt;       मैं तो मीरा का भी श्याम''&lt;/strong&gt;&lt;/center&gt;&lt;br /&gt;       मीरा मन मसोस कर रह जाती है । एक दिन मीरा जो,  कॉलेज में प्राध्यापिका थी अपने सहकर्मी के साथ घर आई। वे दोनो ड्राईंग रूम में बैठे थे तभी कृष्ण गोपाल राधा के साथ आए तो मीरा अपने सह्कर्मी को लेकर शयन कक्ष में जा बैठी। लगभग दो घन्टे बाद सह्कर्मी और मीरा बाहर निकले। उन्हें विदा कर जब मीरा अन्दर लौटी तो कृष्ण गोपाल ने पूछा 'ये क्या बदतमी$जी है।&lt;br /&gt;ये था कौन जिसे तुम मेरे और राधा के सामने ही बेड़ रूम में ले गई। मीरा तुनक कर बोली ये हमारे नए प्रिंसीपल श्री आई जी गिरधर थे। और गुनगनाने लगी।&lt;br /&gt;-&lt;center&gt;&lt;strong&gt;&lt;br /&gt;      'मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो ना कोई '&lt;/strong&gt;&lt;/center&gt;     &lt;br /&gt;       इससे पहले कि मीरा अगली पंक्ति दोहराती कृष्ण गोपाल ने अपनी हथेली से उसका मुँह बन्द करते हुए कहा ''बस बाबा अब राधा कभी नहीं आएगी इस घर में।&lt;br /&gt;&lt;p align="right"&gt;&lt;strong&gt;श्यामसखा'श्याम;shyamskha`shyam&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित!&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8753024558307711180-3397521696051107981?l=kathavyatha.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kathavyatha.blogspot.com/feeds/3397521696051107981/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://kathavyatha.blogspot.com/2009/02/blog-post_1005.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8753024558307711180/posts/default/3397521696051107981'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8753024558307711180/posts/default/3397521696051107981'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kathavyatha.blogspot.com/2009/02/blog-post_1005.html' title='मेरे तो गिरधर गोपाल - श्यामसखा&apos;श्याम'/><author><name>Katha-Vyatha</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_j9P143p-n-I/SOziqFj8_0I/AAAAAAAAABM/MxtRZWGLxd8/S220/shambhu_choudhary2.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8753024558307711180.post-3967294813826226519</id><published>2009-02-04T05:47:00.000-08:00</published><updated>2009-02-04T05:57:57.988-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कहानी'/><title type='text'>रामी - डॉ.दीप्ति गुप्ता</title><content type='html'>&lt;p align="justify"&gt;                       &lt;br /&gt;देवयानी की नींद निगलती हुई दूर से लहराती घड़ियाल की टन टन टन टन। सुबह के चार बजे थे। सहसा उँघता  हुआ चौकीदार शेरसिंह  कड़ाके की सर्दी में अपने बरसों पुराने फौजी  ऒवरकोट से चिपटता हुआ  लालटेन और लाठी सम्भाल  कर कालेज के निकट ही कुछ ऊँचाई पर टीचर्स हास्टिल के नीचे वाले क्वार्टर की ऒर चला। शेर सिंह की उम्र साठ के लगभग है लेकिन जीवन के प्रति जीवंत  दृष्टिकोण के  कारण उसका हसँता हुआ  चेहरा उसकी  उम्र से दस वर्ष कम दीखता है। उम्र  के इस थके मोड़ पर पहुँचने वाले, इस चौकीदार की चिलगोज़े जैसी आँखों से अभी  भी मसखरी और चुस्ती टपकती है। क्वार्टर में पहुँचते ही शेरसिंह ने  सबसे  पहले दड़बे में फड़फड़ाती, चहकती मुर्गियों को  दाना पानी दिया, फिर  फटे टाट के पर्दे को हटाकर  बरामदे में  घुसते ही उसकी नजर उस कोने की ऒर गई, जो जगह की कमी का कारण एक छोटे से रसोईघर में परिवर्तित कर दिया गया था। अधबुझे चूल्हे के पास उसकी पत्नी रामी अपने चीथड़ों में दुबकी बैठी थी। उसने शेरसिंह के लिए चाय का गिलास तैयार कर रखा था। शेर सिंह ने गर्माहट पाने के लिए पास पड़ी एक छोटी सी लकड़ी से राख को कुरेदते हुए कहीं-कहीं चमक पड़ने वाले अंगारों को देखकर चूल्हे में एक दो बार फूँक मारी और चाय का गिलास थामकर बैठ गया। दोनों पति-पत्नी कबूतर और कबूतरी की तरह पास बैठे हुए धीरे धीरे चाय सुड़कने लगे।&lt;p align="justify"&gt;   &lt;br /&gt;     शेर सिंह से एकदम विपरीत रामी के चेहरे पर समय ने दुःख और विषाद की अमिट रेखाएं खींच दी हैं। पिछले चार वर्षों से जैसे वह एकाएक मौन में चली गई है। तब से आज तक देवयानी ने रामी को कभी भी किसी से एक शब्द भी बोलते नहीं देखा। देवयानी को लगता, या तो रामी के शब्द चुक गए हैं या उसकी बोलने की इच्छा मर गई है। उसके उस अस्वाभाविक मौन तथा चेहरे पर गहरा आई रूग्ण उदासी के कारण कोई उसे विक्षिप्त तो कोई प्रेताभिभूत बताता है। कई बार शेरसिंह के कमरे से आवाजें आती, जो रात भर देवयानी का पीछा करती रहतीं। आज तक कोई डाक्टर व वैद्य रामी की सलोनी मुखाकृति की उन बीमार रेखाऒं को स्वस्थ नहीं कर पाया।&lt;p align="justify"&gt;   &lt;br /&gt;   देवयानी अकसर सोचती कि रामी के जीवन में आए उस बदलाव का क्या कारण होगा? उसकी मोटी पपोटों वाली छोटी आँखों में उठता गिरता भावों का ज्वार-भाटा, रामी के अन्तस में घुमड़ते किसी तूफान का स्पष्ट संकेत देता, लेकिन शब्दों की अभिव्यक्ति के बिना उसे समझ पाना कठिन था। देवयानी ने रामी के उस अटूट मौन को अक्सर एक दर्द भरे  कुमाँऊनी गीत में टूटते देखा था। रामी के दर्दीले स्वर में रचा बसा यह गीत "म्यारा मैता का देस ना बासा, घुघूति रूमझूम" देवयानी के भीतर दूर-दूर तक विचारों और नए-नए अनुमानों के ऐसे विकट झाड़ झंखाड़ खड़े कर देता जिनमें रामी के दुःख को जान लेने के लिए उसका व्याकुल मन  उलझकर रह जाता। देवयानी ने कितनी बार एक कुशल मनोविश्लेषक की भाँति मीठे, तीखे और कड़ुवे प्रसंगों द्वारा रामी के अन्तस को झकझोर कर उसे मन की व्यथा उगल देने को मजबूर कर देना चाहा,किन्तु हठयोगी की तरह रामी ने कभी भी अपनी मौन समाधि को न तोड़ा। एक बार न जाने कैसे रामी देवयानी के बहुत कहने पर एक मस्त लोक गीत "बेडू पाको बारहमासा, काफल पाको चैता मेरी छैला" को उच्च स्वर में गा उठी थी, लेकिन उसके दर्द भरे स्वर ने उस थिरकते गीत को जैसे एक साथ कई पतझड़ों से लाद दिया था।&lt;p align="justify"&gt;&lt;strong&gt;&lt;br /&gt;x    x     x     x     x      x      x     x      x     x  x     x   &lt;/strong&gt;  &lt;br /&gt; ठीक साढ़े नौ बजे तैयार होकर देवयानी जैसे ही हास्टल की सीढ़ियों से नीचे उतरने लगी तो एकाएक चिड़िया कि तरह फुदकती 'नौनी' ने हाथ में तश्तरी से ढके कटोरे में कुछ लिए, देवयानी का रास्ता रोक लिया, और बोली -&lt;br /&gt;                "दीदी, माँ ने आपके लिए अरसा भेजा है।" &lt;br /&gt;रामी का वो स्नेह, ममता भरा अपनत्व देवयानी के दिमाग में फिर विचारों के अनगिनत बुलबुले उठाने लगा। कैसी प्रेममयी है यह विक्षिप्त, भूली - भटकी रामी, या प्रेताभिभूत नारी ? देवयानी को लगता  कि या तो रामी के विषय में लोगों की धारणाएँ सरासर गलत हैं, और यदि सही हैं तो उसे संतुलित व्यक्ति की भाँति उसकी पसंद की चीज भेजना कैसे याद रहता है ? देवयानी के लिए दिल की अतल गहराइयों में डूबकर कुछ सोचने के लिए मजबूर कर देने वाला आश्चर्य थी रामी। देवयानी ने प्यार से नौनी के हलके से चपत जड़ते हुए कहा- "जा रसोई में मेरी जाली की अलमारी में रख आ। अभी उप्रेती दीदी कमरे में ही हैं।" मिनट भर के प्रतीक्षा भरी मुद्रा में खड़ी देवयानी ने नौनी के कमरे से लौट आने पर खट-खट सीढ़ियाँ उतर कर कॉलिज का रास्ता पकड़ लिया।रामी कैसी भी हो, वह अभी भी नियमित रूप  से  स्कूल की  सभी अध्यापिकाऒं को पानी पिलाने की ड्यूटी पूरी निष्ठा से निबाहती है। हाथ में पानी से भरे गिलासों की ट्रे थामे, एक पैर पर  कुछ अधिक  जोर  देकर धीरे-धीरे सपाट  चाल  चलती, रामी कभी कभी तो एकदम रोबोट नज़र आती है।&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;x    x     x     x     x      x      x     x      x     x  x     x   &lt;/strong&gt;   &lt;br /&gt;    आज रविवार है। लेकिन रवि  तो पिछले एक सप्ताह से ईद  का चाँद बना हुआ है। आज भी सघन कोहरे की मोटी चादर ऒढ़े जैसे अटूट निद्रा में सोया हुआ है। हवा के स्पर्श से ऊँचे-ऊँचे चीड़ के पेड़ों की संगीतमयी झनझनाहट लिहाफ में लिपटे होने पर भी शरीर में एक सर्द सिहरन तरंगायित कर रहीं हैं। कोहरे  ने  समूचे परिवेश  को इतना उबाऊ और शिथिल बना दिया है कि परिन्दे भी अपने घोंसलों में निस्पन्द पड़े हैं। दूर बादलों से  घिरी पहाड़ियाँ थोड़े-थोड़े मुँह निकालकर झाँकती हुई, अलसाई सी नज़र आ रही हैं।&lt;br /&gt; तभी बरामदे में कोई गम्भीर स्वर गूँजा। देवयानी ने देखा कि शेरसिंह हाँफता हुआ प्रिंसिपल मिस जंगपांगी से कह रहा है-" बहनजी, रामी इडर आया क्या ? सबेरे चार बजे से गायब है। शब जगह देख आया, मिलता ही नहीं।" इससे पहले कि उसकी बात खत्म होती, देवयानी लपककर शेरसिंह के क्वार्टर में नौनी के पास पहुँच गई। नौनी रूआंसी, खामोश खड़ी थी। देवयानी का दिल किसी दुर्भागी आशंका से भर उठा। दिमाग में एक साथ बुरे ख्यालों के हजारों कैक्टस उग आये। देवयानी झटपट नौनी को साथ लेकर अनायास ही ठण्डी सड़क से होती हुई टिफिन टॉप की ऒर चल पड़ी, जिधर- जिधर मन ने कहा,  उधर ही वे दोनों चलते गये। लगभग सभी ऒर उसकी आँखें एक - एक दरख्त, एक-एक पत्ते को भेदकर रामी की खोज लेने को आतुर हो रही थी। रामी को खोजने में अभी दो घण्टे से अधिक समय नहीं बीता था, लेकिन देवयानी के लगा कि जैसे दो युग बीत गए और इस एहसास ने उसके दिल में निराशा की सर्द परतें जमानी शुरू कर दीं। आस पास कहीं भी जरा सी भी आहट होती तो वे दोनों सजग हुए, आशा भरी दृष्टि से उधर ही लगभग दौड़ पड़ते। कोहरे की धुन्ध में जल्दी से एक फुट  दूर की वस्तु भी साफ नजर नहीं आती थी। कभी कोई जंगली चूहा ढालानों पर पड़े सूखे पत्तों को खड़खड़ाता निकल जाता तो कभी कोई गिलहरी पेड़ों के झुरमुट से सरसराती हुई तेजी से गुजर जाती। एक पल के लिए सुस्ताने को खड़ी हुई देवयानी, जमीन पर पड़े बेडूफल को चुगती हुई नौनी को शून्य दृष्टि से निहारने लगी कि तभी रामी का चिरपरिचित स्वर कहीं से  अंधेरे में आशा की रूपहली किरण की तरह उभरा। देवयानी के हृदय में जैसे हजारों सुर्ख बुरांस एक साथ खिल उठे। सधे स्वर में उठती गिरती  रामी की मधुर आवाज... कितनी  मिठास... कितना दर्द है उसके गाने में। देवयानी और नौनी उस आवाज के सहारे चिकने स्लेटी पत्थरों पर सावधानी से कदम रखती हुईं आगे बढ़ीं और कुछ ही दूरी पर चीड़ के पेड़ों के नीचे निकल कर धीरे- धीरे चलती रामी को आगे जाते हुए देखा।&lt;br /&gt; "रामी, ऒ रामी रूको"। देवयानी की पुकार से रामी के पाँव ठिठक  गये। रामी ने पलटकर सूनी आँखों से देवयानी को देखा और अभिवादन में हाथ जोड़कर खड़ी हो गई। नौनी दौड़ कर उससे लिपट गई और बोली&lt;br /&gt; - "माजी, तू कख गए छे। पिताजी, ई दीदी तिते खुजाणा छै। घोर चल। मिथे भूख लगणी छे।"&lt;br /&gt; और रामी यंत्रवत सी देवयानी के साथ नौनी का हाथ थामें हुए लौट पड़ी। सहसा  रामी  की  नासिका  में  झूलता बुलाक मानो देवयानी के ऊपरी होंठ पर एक अस्वाभाविक सी खुजली का आभास देने लगा। उसके गले में पड़ी लाल मूंगे व काली चरेऊ की मालाएँ  देवयानी  की  जुबान  तक आने वाले अनेक प्रश्नों को मानों उसके गले में ही घोंटने लगी। देवयानी का मन हुआ कि रामी को डाँटे, या धीरे से धमकाए। आखिर उसने सुबह से सबको इस तरह परेशान क्यूं कर डाला ? लेकिन उससे कुछ कहना तो जंगल में रोने जैसा है। दूर-दूर तक भटक कर थका देवयानी का मन कुछ भी समझ पाने में असमर्थ सा हुआ, एक अजीब से दमघोटू एहसास को पीने लगा। विचार के ताने बाने में उलझी देवयानी रामी को लेकर अब तक हॉस्टल पहुँच चुकी थी। कई जोड़ी आँखे इधर उधर से रामी को देखने के लिए उठी और एकाएक गायब हो गई। रामी एक अपराधी की सी चाल से रेंगती हुई नौनी के साथ क्वार्टर की ऒर चली गई। &lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;br /&gt;x    x     x     x     x      x      x     x      x     x  x     x   &lt;/strong&gt;   &lt;br /&gt;     गहरी नींद में सोई देवयानी एकाएक किसी की दर्दनाक चीख से उठ बैठी। घड़ी में देखा तो रात के १२:३० बजे थे। बाहर कहीं दूर गीदड़ों की "हुंआ हुंआ" वातावरण को मनहूस बना रही थी। रात  के सन्नाटे में झींगुरों  की झनझनाहट भरी संगीतमयी चिकमिक ने उस परिवेश को अधिक रहस्यमय बना दिया था। तभी एक भयावह चीख रात की नीरवता को पार करती हुई, देवयानी के हृदय में कहीं गहराई से धँसती चली गई। देवयानी को समझते देर नहीं लगी - निःसन्देह वह रामी की ही आवाज थी। वही ऒझा की झाड़ फूँक और दर्द से छटपटाती रामी ! उसका मन हुआ कि तुरन्त नीचे जाकर रामी को अपनी बाहों में समेट कर अभय दान दे दे। देवयानी किसी द्वन्द्व में उलझी बहुत समय तक वैसे ही बैठी रही। फिर निढाल सी  बिस्तर पे पसर गई। उसे नहीं मालूम कि कब उसकी आँख लगी । सवेरा हुआ तो रामी का चेहरा अनायास ही देवयानी की आँखों के सामने नाचने लगा । बिजली की सी गति से बिस्तर छोड़कर, शाल लपेटती हुई वह सम्मोहित सी शेरसिंह के क्वार्टर की ऒर लपकी । इससे पहले कि वह रामी के करीब पहुँच पाती, बाहर ही उसे शेर सिंह और नौनी का करूण विलाप सुनाई पड़ा । धड़कते दिल से वह कमरे में पहुँची तो देखा रामी चिर निद्रा में सोई थी । उसके चेहरे की उदास रेखाऒं में पहले से भी अधिक दुःख और पीड़ा घुली थी । शायद मरने से पूर्व उसने ओझा  की  झाड़ - फूँक  की जिस पीड़ा को भोगा था, वही उसके मुख पर उभर आयी थी । देवयानी के भीतर घुमड़ती घनीभूत पीड़ा, ऒझा और शेरसिंह के प्रति क्रोध का ज्वालामुखी बनने लगी । किन्तु उस विदा के क्षण पथराये वातावरण में कुछ भी कर पाने में असमर्थ देवयानी का नपुंसक क्रोध आँखों से आँसू बनकर बह निकला । देवयानी को लगा  कि रामी  का दर्द भरा स्वर "म्यार मैता का  देस ना  बासा घुघूति रूमझूम" चारों दिशाऒं में चीख-चीख कर रो रहा है। शेरसिंह के  अंधविश्वास के कारण प्रेताभिभूत समझी जाने वाली रामी ऒझा की झाड़ फूँक की बलि चढ़ चुकी थी । उसकी मौत  मुक्ति  नहीं  वरन मानों एक प्रश्न-चिन्ह  बनकर समाज  के  मस्तक  पर चिपक गई थी !!&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित!&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8753024558307711180-3967294813826226519?l=kathavyatha.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kathavyatha.blogspot.com/feeds/3967294813826226519/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://kathavyatha.blogspot.com/2009/02/blog-post_7518.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8753024558307711180/posts/default/3967294813826226519'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8753024558307711180/posts/default/3967294813826226519'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kathavyatha.blogspot.com/2009/02/blog-post_7518.html' title='रामी - डॉ.दीप्ति गुप्ता'/><author><name>Shambhu Choudhary"Iac"</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03776713428128546589</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-bM0lY3JA5GU/Te8lUG5KtcI/AAAAAAAAAtM/R5w2g954Y6M/s220/shambhu_choudhary.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8753024558307711180.post-3851899842591803575</id><published>2009-02-04T03:58:00.000-08:00</published><updated>2009-02-04T04:00:22.511-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='लघुकथा'/><title type='text'>लघुकथा: मेहमाननवाज़ी</title><content type='html'>&lt;p align="JUSTIFY"&gt;&lt;br /&gt;    प्रासादनुमा आलीशान भवन में दावत चल रही थी। चारों ओर लज़ीज़ पकवानों के स्टाल लगे हुए थे जिनकी गंध सभी मेहमानों को बेचैन किये दे रही थी। तेज़ रंगीन रोशनियों और मादक संगीत की धुनों ने माहौल को और भी हसीन और आकर्षक बना दिया था। आकर्षक पोशाकों में सजी-धजी वेटरों की पूरी फ़ौज वहाँ तैनात थी जो घूम-घूमकर मेहमानों को खाना सर्व कर रही थी। एक चम्मच खाना  भी ठीक से मुँह तक न जा पाता था कि कोई न कोई वेटर नया पकवान लेकर  हाज़िर हो जाता था। दर्जनों फोटोग्राफर ओर वीडियोग्राफर मुस्तैदी से अपने-अपने कामों में लगे हुए थे। फ्लैश पर फ्लैश पड़ रहे थे। प्रशांत कुमार के लिए ये सब असह्य होता जा रहा था। उनके मुँह में दो-चार कौर भी ठीक से नहीं गए थे। वे अपनी प्लेट लिए-लिए चुपचाप एक कोने में जाकर खड़े हो गए। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;    जैसे ही मेज़बान राहुल बाबू की नज़र प्रशांत कुमार पर पड़ी वे उनकी ओर लपके। उनके पीछे-पीछे दर्जनों बैरे भी लज़ीज़ व्यंजनों से भरी ट्रे लेकर लपके और साथ ही फोटोग्राफरों ओर वीडियोग्राफरों का झुंड भी। राहुल बाबू ने प्रशांत कुमार से पूछा, ‘‘भाई साहब यहाँ अकेले क्यों खड़े हैं? क्या ख़िदमत करूँ मैं आपकी?’’ प्रशांत कुमार ने कहा, ‘‘ राहुल भाई मेहमाननवाज़ी की शूटिंग ही चलती रहेगी या खाना भी खाने दोगे?’’ ‘‘मैं समझा नहीं,’’ राहुल बाबू ने प्रशांत कुमार की तरफ किंचित हैरानी से देखते हुए पूछा। ‘‘समझने की ज़रूरत भी नहीं है। बस आप इतनी ख़िदमत कीजिए कि अपनी फौज को अपने साथ ले जाइये ताकि मैं इत्मीनान से खाना खा सकूँ’’, इतना कहकर प्रशांत कुमार राहुल बाबू को उनकी फौज के साथ वहीं छोड़कर पास ही खाली पड़ी एक मेज़ की ओर बढ़ गए।&lt;P ALIGN="RIGHT"&gt;&lt;STRONG&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;     सीताराम गुप्ता&lt;br /&gt;     ए.डी.-106-सी, पीतमपुरा,&lt;br /&gt;     दिल्ली-110034&lt;br /&gt;     फोन नं. 011-27313954/27313679&lt;br /&gt;     Email: srgupta54@yahoo.com&lt;/STRONG&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित!&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8753024558307711180-3851899842591803575?l=kathavyatha.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kathavyatha.blogspot.com/feeds/3851899842591803575/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://kathavyatha.blogspot.com/2009/02/blog-post_04.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8753024558307711180/posts/default/3851899842591803575'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8753024558307711180/posts/default/3851899842591803575'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kathavyatha.blogspot.com/2009/02/blog-post_04.html' title='लघुकथा: मेहमाननवाज़ी'/><author><name>Shambhu Choudhary"Iac"</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03776713428128546589</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-bM0lY3JA5GU/Te8lUG5KtcI/AAAAAAAAAtM/R5w2g954Y6M/s220/shambhu_choudhary.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8753024558307711180.post-941477749774770357</id><published>2009-02-04T03:53:00.000-08:00</published><updated>2009-02-04T03:55:34.598-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='लघुकथा'/><title type='text'>लघुकथाः आवभगत</title><content type='html'>&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;     कई बार कालबेल का बटन दबाने के उपरांत अंदर से एक युवती निकल कर बाहर आई और बरामदे में से ही ऊँची आवा़ज में पूछा, ‘‘यस? क्या बात है? किससे मिलना है?’’ वर्मा जी ने बतलाया कि मैं रामनारायण जी के फिस में ही काम करता हूँ और उन्हें कुछ ज़रूरी कागज़ात देने आया हूँ। ये सुनकर युवती ने कहा कि मैं अभी पापा को बुलाती हूँ और बिना गेट खोले ही ज़ीने से ऊपर चली गई। लगभग पन्द्रह मिनट बाद रामनारायण जी ज़ीने से नीचे उतरते दिखलाई पड़े। साथ ही उनकी बेटी भी एक हाथ में एक ट्रे में पानी से भरा एक गिलास रखे उनके पीछे-पीछे नीचे उतर रही थी। बाहर तेज़ा धूप थी। रामनारायण जी ने लोहे का भारी गेट खोलते हुए पूछा कि भई वर्मा जी इतनी तेज़ा गर्मी में दोपहर के वक्त कैसे आना हुआ? अंदर बरामदे में आने पर वर्माजी ने काग़ज़ों का एक पुलिंदा उनकी ओर बढ़ा दिया। &lt;br /&gt;     रामनारायण जी वहीं बरामदे में खडे़ होकर काग़ज़ों को देखने लगे। काग़ज़ों को देखने के बाद रामनारायण जी के चेहरे पर रौनक़ आ गई और कहने लगे कि वर्मा तुमने बहुत अच्छा किया जो ये पेपर्स मुझे फौरन देने के लिए आ गये। इतना कहकर उन्होंने बेटी के हाथ से ट्रे लेकर पानी का गिलास वर्माजी की ओर बढ़ाते हुए कहा कि लो पहले पानी पीओ। इतनी गर्मी है प्यास लगी होगी। वर्माजी ने गिलास अभी होंठों से लगाया भी नहीं था कि रामनारायण जी ने वहीं बरामदे में खड़े-खड़े पूछा, ‘‘वर्माजी क्या सेवा करूँ आपकी? आओ अंदर तो चलो!’’ वर्माजी ने गिलास का सारा पानी एक ही झटके में हलक़ से नीचे उतार कर कहा कि धन्यवाद रामनारायण जी अब इजाज़ात दीजिए। रामनारायण जी ने हाथ में पकड़ी हुई ट्रे वर्माजी की ओर बढ़ा दी। वर्माजी ने खाली गिलास आहिस्ता से ट्रे में रख दिया और धीरे-धीरे चलते हुए गेट से बाहर आ गए। रामनारायण जी ने झटके से लोहे का भारी गेट बंद करके कुंडी चढ़ा दी।&lt;p align="right"&gt;&lt;strong&gt;&lt;br /&gt;सीताराम गुप्ता,&lt;br /&gt;ए.डी. 106-सी, पीतमपुरा,&lt;br /&gt;दिल्ली-110034&lt;br /&gt;फोन नं. 011-27313954&lt;br /&gt;Email : srgupta54@yahoo.com&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित!&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8753024558307711180-941477749774770357?l=kathavyatha.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kathavyatha.blogspot.com/feeds/941477749774770357/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://kathavyatha.blogspot.com/2009/02/blog-post.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8753024558307711180/posts/default/941477749774770357'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8753024558307711180/posts/default/941477749774770357'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kathavyatha.blogspot.com/2009/02/blog-post.html' title='लघुकथाः आवभगत'/><author><name>Shambhu Choudhary"Iac"</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03776713428128546589</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-bM0lY3JA5GU/Te8lUG5KtcI/AAAAAAAAAtM/R5w2g954Y6M/s220/shambhu_choudhary.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8753024558307711180.post-582008430752733372</id><published>2009-02-04T03:29:00.000-08:00</published><updated>2009-06-27T06:29:04.734-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कहानी'/><title type='text'>कहानी: अपना मुकद्दमा वापस लेती हूँ..... By -शम्भु चौधरी</title><content type='html'>&lt;p align="justify"&gt; &lt;br /&gt;अरे...आप चिन्ता मत किजिए....एक ठाहके के बीच ही वकील सा'ब ने अपने मुवक्किल जो गाँव के मुखिया  भी हैं को कहा.....आपके लड़के को कोई सजा नहीं होगी।&lt;br /&gt;"जी....जी... पर...आप तो जानते ही हैं कि अगले साल चुनाव है... पार्टी ने मुझे चुनाव लड़ने को कहा है... इस मामले में लड़के को सजा हो गई तो मेरी इज़्ज़त ही सारी मिट्टी में मिल जायेगी.... बीच में ही मुखिया जी बोल पड़े।"&lt;br /&gt;"अरे सा'ब आप बस देखते जाईये....वकील सा'ब ने पुनः मुखिया जी को ढाढ़स बंधाया।"&lt;br /&gt;एक ठहाका.....&lt;br /&gt;फिर बोले..." ये तो आपके लड़के ने एक ही लड़की की इज़्ज़त लूटी है.. मुखिया जी...गाँव का कन्हैया है... पूरे गाँव की लड़कियोँ की भी... समझ रहे हैं न मैं क्या कहना चाह रहा हूँ...आप चिन्ता न करें .. फिर थोड़ा रुककर...मुखिया जी का लड़का है.. शौक भी तो मुखिया जैसे ही होने चाहिये।".. ठहाका......&lt;br /&gt;"आप निश्चिंत रहें आपका काम हो जायेगा। एक लड़की की इज़्ज़त से ज्यादा जरूरी है आपकी इज़्ज़त को बचाना... आखिर आप हमारे गाँव के मुखिया भी तो हैं....वकील सा'ब ने यह बात कह कर मुखिया जी के दिल को मजबूत आधार प्रदान कर दिया"&lt;br /&gt; हाँ ! सो तो है...मुखिया जी ने वकील सा'ब से सहमति जताते हुए कहा- "आप भी चिन्ता न करें बस किसी तरह हमारी इज़्ज़त को बचा लीजिये...आपको....गाँव की तिजौरी संभला दूँगा।"&lt;br /&gt;"हूँ.... सो तो ठीक है.. पर आप तो जानते ही हैं... मामला पेचीदा बनता जा रहा है...आपने सुना नहीं कि कल किस तरह पत्रकारों ने कुत्ते की तरह पीछा किया था... बार-बार पूछ रहे थे.. कि मैं इस मामले की पैरवी क्यों कर रहा हूँ।&lt;br /&gt;"बीच में ही टोकते हुए मुखिया जी  ने पूछा.. फिर आपने क्या कहा उनको..."&lt;br /&gt;- कहना क्या था वकील हूँ मेरा पेशा है अपने मुवक्किल की पैरवी करना.. जब तक अपराध साबित नहीं हो जाता, कानून की नज़र में कोई अपराधी नहीं है।.. मुखिया जी का लड़का तो निर्दोष है बेचारे को फंसाया गया है।...."&lt;br /&gt;"फिर वे लोग (पत्रकार) पूछने लगे...कि वो जो मेडिकल रिपोर्ट है....?"&lt;br /&gt;पास टेबल पर पड़े पानी के गिलास को उठाकर पानी पीते हुए...&lt;br /&gt;"फिर क्या कहा आपने......एक साथ कई प्रश्नों से घिरे मुखिया जी  पत्रकारों की बात सुनकर एकबार  कांप से गये..... कड़ाके की ठंडक में भी  चेहरे पर  पसीना  साफ झलकने लगा था"&lt;br /&gt;"कहता क्या....कह दिया मामला अदालत में है...अदालत में देखा जायेगा वकील सा'ब ने जवाब दिया।"&lt;br /&gt;"वकील सा'ब आप इस जिले के सबसे बड़े वकील हैं....."&lt;br /&gt;"हां ... सो तो है ही... आपकी इज़्ज़त से कहीं ज्यादा मेरी इज़्ज़त का भी ख़्याल है मुझे।.... फिर कहने लगे कि मैंने आजतक कोई मुकदमा नहीं हारा है.. आप देखते रहिये...कोर्ट में लड़की की ऐसी इज़्ज़त उतारूँगा कि कमरे के अन्दर आपके लड़के ने क्या इज़्ज़त उतारी होगी वह भी भूल जायेगी।....ठहाका....."&lt;br /&gt;(मानो वकील सा'ब  यह बताना चाहते थे कि इज़्ज़त कचहरी के अन्दर ही उतरती है, इनकी हँसी में वासना की भूख नज़र आ रही थी।)&lt;br /&gt; यह सुनकर मुखिया जी को अब थोड़ी राहत महसूस होने लगी थी।&lt;br /&gt;"वकील सा'ब ने अपनी बात को बढ़ाते हुए आगे कहा- अपने नाम के साथ वकील लिखना बन्द कर दूँगा.. आपका मुक़द्दमा हार गया तो।"&lt;br /&gt;अपने बैग से कुछ नोटों के बण्डल टेबल पर रखते हुए... "बस आप मामला लड़ते जाईए...किसी तरह से लड़की मामला उठा ले तो भी मैं समझौता करने को तैयार हूँ ...लड़के की शादी भी करनी ही है....मुखिया जी ने एक मझे-मझाये  हुए अंदाज में वकील सा'ब की इंसानियत को भी परखने का प्रयास किया।"&lt;br /&gt;"नहीं...नहीं....यह बात दिमाग में भी नहीं लायें...किसी के सामने बोल मत दीजियेगा.... सारा मामला हाथ से निकल जायेगा.... समझे न  क्या कह रहा हूँ.....वकील सा'ब ने अपने अनुभव से मुखिया जी की इंसानियत को जिंदा ही दफ़ना दिया।..... फिर बोलने लगे न जात .....न पात...... ऐसी लड़की को तो गाँव में नहीं, शहर के कोठे पर होना चाहिये...... आपके पवित्र मंदिर जैसे घर की शोभा कैसे बन सकती है?...... जिसने आपकी  इज़्ज़त को कचहरी में चुनौती दे दी हो........ मामला कमजोर पड़ जायेगा।...... आपके यह सब बोलने से........ कचहरी में कानून बोलता है,......... इंसानियत नहीं बोलती..........गवाह देने होते हैं...........फिर एक ठहाका........आपने सुना नहीं ....-"कानून अंधा होता है"........फिर एक ठहाका........ कमरे के भीतर एक अजीब सी हलचल पैदा हो गई थी,  मानो किसी जानवर ने वकील के शरीर में प्रवेश कर सारे वातावरण में हड़कम्प पैदा कर दिया हो........मुखिया जी की बात ने कुछ ऐसा ही माहौल पैदा कर दिया था।"&lt;br /&gt;"हां सो तो .....मुखिया जी ने अपनी बात को वापस लेते हुए कहा ...आप जैसा कहेंगे.. ठीक वैसा ही होगा.. वकील सा'ब ...आप पर मुझे पूरा भरोसा है। पर वो दो टकिया छोकड़ी तो मुँह पर लगाम देती ही नहीं....."&lt;br /&gt;"सब ठीक हो जायेगा... कतरन की सी जुबान पर जब सूई चुभने लगेगी तो खुद व खुद जुबान भी बंद हो जायेगी... फिर एक ठहाका...हहाहहह....बस आप देखते जाईये।"&lt;br /&gt;"हाँ.. पर.. मामला कमजोर है.....वो मेडिकल रिपोर्ट?...फिर एक प्रश्न के समाधान खोजने का प्रयास किया था मुखिया जी  के मन ने"&lt;br /&gt;"आप भी कैसी बात करते हैं....मुखिया जी....कैसा मामला....कोर्ट...कचहरी...थाना...पुलिस....पी.पी....पेशकार...सबतो आपके साथ खड़े हैं...बस वो जज का बच्चा नया आया है....उसे भी कुछ समय लगेगा..... सब ठीक हो जायेगा......।"&lt;br /&gt;"हां!.........जज का नाम सुनते ही मुखिया जी को एक नई शंका ने घेर लिया ।&lt;br /&gt;[मुखिया जी हर प्रश्न का समाधान पहले ही खोज लेना चाहेते थे]  &lt;br /&gt;अब तक वकील सा'ब की बातों से जितना आश्वस्त हुए थे,  नये जज का नाम सामने आते ही पुनः चेहरे पर पसीने की बूंदे झलकने लगी थी..........पर आप तो बता रहे थे....कि जज को आप मेनैज कर लेंगे.....?&lt;br /&gt;"कोशिश तो की थी......पर....मन ही मन में कुछ सोचते हुए  अभी बताना मुनासिब नहीं होगा......अब वकील सा'ब ने मुखिया जी  की कमजोर नबज़ को टटोलते हुए ....एक काम करियेगा...आप कल एक पेटी भिजवा दीजियेगा।"&lt;br /&gt;"किसकी सेव की या संतरा की.. मुखिया जी ने सोचा कि शायद जज सा'ब को भेंट भेजने को कह रहे हैं वकील सा'ब...... वकील सा'ब से पूछा.."&lt;br /&gt;"अरे इतने भोले मत बनिये....... मुखिया जी.. अभी आपका लड़का तो रिमाण्ड पर ही गया है.. ख़ुदा न करे, कल उसे जेल हो जाये। मुझे बताना पड़ेगा कि.... पेटी का क्या मतलब होता है।"&lt;br /&gt;"हां...हाँ समझ गया.. कल सुबह आठ बजे तक आपके पास मेरा आदमी एक पेटी लेकर आ जायेगा।"&lt;br /&gt;"तो बस आप भी समझो कि आपका काम हो गया"&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;दृश्य बदलता है: दिन का समय है सुहानी धूप ने मौसम को सुहावना बना दिया है। &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;"वाह... मदनगोपाल जी (वकील सा'ब का नाम).....आपने तो कमाल ही कर दिया.. क्या इज़्ज़त उतारी.... आपने.... उस लड़की की..... अदालत में मजा आ गया, जैसे लग रहा था, मनोरमा कहानी सुना रहे हों आप......वाह...... मज़्ज़्जा आआआअग्या।"&lt;br /&gt;"दूसरे वकील ने कहा....अरे सा'ब  मदनगोपाल जी का जोड़ा नहीं है अदालत में, कोई फांसी पर भी लटकता हो तो बचा लेंगे उसको।.....क्या टियूस्ट किया था, उस समय... आपने.... "अपने कपड़े खुद खोले थे कि लड़के ने खोले थे"......."&lt;br /&gt;"तीसरे ने कहा...... अरे उस समय तो बड़ा मजा आ गया जब आपने उस लड़की से पूछा था...तुम और कितनों से संबंध रखती हो? सच मुझे तो लगा कि आपको सब पता है कि इस लड़की के कितने मर्दों से संबंध है.. वाह सा'ब!..... कहीं आप भी इस चक्कर में तो नहीं...... रहते..?  ठहाका.....इतने राज की बात तो बस वही जान सकता है...."&lt;br /&gt;"चौथे ने कहा देखा नहीं कैसे बात खुलते ही सहम गई बेचारी...... चिल्ला पड़ी...........नहीं.............नहीं मेरी और इज़्ज़त मत उतारो.........बेचारी......""मैं अपना मुकद्दमा वापस ले लेती हूँ।""" उसके वकील की तो आपने बोलती ही बन्द कर दी थी बेचारा शर्म के मारे सर नीचे कर लिया था ......ठहाका......"&lt;br /&gt;" पुनः एक ने कहा- देखा नहीं कैसे भावनात्मक बातें कर रहा था.... नारी जाति .....नारी जाति.......जैसे कोर्ट में मुकद्दमा नहीं किसी फिल्म में भाषण देने आया हो।" &lt;br /&gt;"दूसरे ने एक प्रश्न भरी निगाहों से मदनगोपाल जी से पूछा... सर वो फोटो कहाँ से मिली उसकी जिसमें उसके........" अरे रहने भी दो यार.... सब यहीं पूछ लोगे तो कल क्या सुनोगे वकील साब ने एक बार सबको अपना आभार व्यक्त करते हुए बात को समाप्त करने की चेष्टा की।"&lt;br /&gt;तभी पास खड़े एक पत्रकार ने पूछ लिया... सर आपने मामला तो जीत ही लिया है मानो, पर यह तो बताते जाईये कि कल को यही घटना आपकी लड़की के साथ हो जाती तो आप क्या करते?....&lt;br /&gt;पत्रकार के इस प्रश्न ने अचानक पास खड़े सभी वकीलों के चेहरे पर सन्नाटा ही पैदा कर दिया था । अभी तक जो हँस-हँस के वकील सा'ब को बधाई दे रहे थे,  धीरे से सटक लिये... मदनगोपाल जी अकेले खड़े इस प्रश्न का उत्तर खोजने में लग गये। रातभर बिस्तर पर तड़पते रहे........&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;सुबह पुनः उसी अदालत में सभी खड़े थे..&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;जज साहेब ने अदालत की कार्यवाही शुरू करने का आदेश दिया।&lt;br /&gt;लड़की के बायन को पुनः दर्ज किया जाना था.... लड़की उठी और मदनगोपाल जी को हाथ जोड़ते हुए कहा..... आप मेरे पिता तुल्य हैं और कटघरे में जाकर खड़ी हो गई। &lt;br /&gt;आज फैसला होना ही था यह सबकी जुबान पर था कि लड़की मुकद्दमा हार चुकी है। मदनगोपाल जी उठे....... अदालत के चारों तरफ देखा। अपने मुवक्किल को ध्यान से देखा उसके चेहरे पर उसकी  हँसी देखी...... लड़की को देखते हुए कहा...... &lt;br /&gt;मैं इस मुकदमे को नहीं लडूँगा.. अपना वकालतनाम वापस लेता हूँ।&lt;br /&gt;अदालत परिसर में यह बात आग की तरह फैल गई....... मदन जी ने मुकदमा लड़ने से इंकार कर दिया है।&lt;br /&gt;जज ने स्वीकृति प्रदान करते हुए लिखा काश! मदनगोपाल जी की जगह यह गौरव मेरे को मिल पाता...... मदनगोपाल जी ने आज इस अदालत में जो इतिहास रचा है.. वह हमेशा याद रखा जायेगा।&lt;br /&gt;&lt;small&gt;नोट: सभी पात्र और घटना काल्पनिक है। &lt;/small&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="right"&gt;&lt;strong&gt;&lt;br /&gt;लेखक का संपर्क पता: &lt;br /&gt;शम्भु चौधरी, एफ-डी- 453/2, साल्टलेक सिटी, कोलकाता- 700106 फोन: 0-9831082737&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित!&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8753024558307711180-582008430752733372?l=kathavyatha.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kathavyatha.blogspot.com/feeds/582008430752733372/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://kathavyatha.blogspot.com/2009/02/by.html#comment-form' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8753024558307711180/posts/default/582008430752733372'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8753024558307711180/posts/default/582008430752733372'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kathavyatha.blogspot.com/2009/02/by.html' title='कहानी: अपना मुकद्दमा वापस लेती हूँ..... By -शम्भु चौधरी'/><author><name>Katha-Vyatha</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_j9P143p-n-I/SOziqFj8_0I/AAAAAAAAABM/MxtRZWGLxd8/S220/shambhu_choudhary2.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8753024558307711180.post-6261896289959614264</id><published>2008-11-12T07:01:00.000-08:00</published><updated>2008-11-20T20:39:16.574-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Kanhaiyalal Sethia'/><title type='text'>Kanhaiyalal Sethia</title><content type='html'>&lt;a name="#novtop"&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="center"&gt;&lt;table bgcolor="#000000" width=100% valign="top"&gt;&lt;tr&gt;&lt;td align="top"&gt;&lt;br /&gt;&lt;font color="#F7F408" size=6&gt;&lt;strong&gt;&lt;br /&gt;महाकवि का महाप्रयाण: पद्मश्री कन्हैयालाल सेठिया नहीं रहे&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;/table&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="center"&gt;&lt;table border=8 bordercolor="#000000" width=100%&gt;&lt;tr&gt;&lt;td valign="top" align="top" width=33%&gt;&lt;br /&gt;&lt;font color="#000000" size=4&gt;&lt;strong&gt;&lt;br /&gt;धरती धोरां री !&lt;br /&gt;आ तो सुरगां नै सरमावै,&lt;br /&gt;ईं पर देव रमण नै आवै,&lt;br /&gt;ईं रो जस नर नारी गावै,&lt;br /&gt;धरती धोरां री !&lt;br /&gt;सूरज कण कण नै चमकावै,&lt;br /&gt;चन्दो इमरत रस बरसावै,&lt;br /&gt;तारा निछरावल कर ज्यावै,&lt;br /&gt;धरती धोरां री !&lt;br /&gt;काळा बादलिया घहरावै,&lt;br /&gt;बिरखा घूघरिया घमकावै,&lt;br /&gt;बिजली डरती ओला खावै,&lt;br /&gt;धरती धोरां री !&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;/td&gt;&lt;td valign="top" align="top" width=33%&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_-_J_ggR3oI4/SRrxNY5MPEI/AAAAAAAAAWo/SQ9iCwYSQ1k/s1600-h/Kanhaiyalal-Sethia.png"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 240px; height: 320px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_-_J_ggR3oI4/SRrxNY5MPEI/AAAAAAAAAWo/SQ9iCwYSQ1k/s400/Kanhaiyalal-Sethia.png" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5267787926486137922" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;a href="#novlast"&gt;&lt;font color="#FF0000"&gt;अपनी श्रद्धांजलि यहाँ पर दें&lt;/font&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;/td&gt;&lt;td valign="top" align="top"&gt;&lt;br /&gt;&lt;font color="#000000" size=4&gt;&lt;strong&gt;&lt;br /&gt;लुळ लुळ बाजरियो लैरावै,&lt;br /&gt;मक्की झालो दे’र बुलावै,&lt;br /&gt;कुदरत दोन्यूं हाथ लुटावै,&lt;br /&gt;धरती धोरां री !&lt;br /&gt;पंछी मधरा मधरा बोलै,&lt;br /&gt;मिसरी मीठै सुर स्यूं घोलै,&lt;br /&gt;झीणूं बायरियो पंपोळै,&lt;br /&gt;धरती धोरां री !&lt;br /&gt;नारा नागौरी हिद ताता,&lt;br /&gt;मदुआ ऊंट अणूंता खाथा !&lt;br /&gt;ईं रै घोड़ां री के बातां ?&lt;br /&gt;धरती धोरां री !&lt;br /&gt;&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;/table&gt;११ सितम्बर १९१९ : ११ नवम्बर 2008&lt;br /&gt;&lt;marquee&gt;&lt;font color="#000000" size=6&gt;&lt;strong&gt; &lt;br /&gt;महाकवि के महाप्रयाण पर हार्दिक श्रद्धांजलि &lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/marquee&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="center"&gt;&lt;font color="#FF0000" size=4&gt;&lt;strong&gt;&lt;br /&gt;प्रकाश चंडालिया और शम्भु चौधरी द्वारा&lt;/font&gt;&lt;font color="#000000" size=3&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="#novKanhaiyalal"&gt;आप हमें अपने संस्मरण ईमेल या डाक से भेज सकते हैं जो इसी अंक में जोड़ दिये जायेगें।&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="mailto:ehindisahitya@gmail.com?subject=Katha-Vyatha"&gt;ehindisahitya@gmail.com&lt;/a&gt;&lt;br&gt; Shambhu Choudhary, Editor: Katha-Vyatha, FD-453, Salt Lake City, Kolkata-700106&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/font&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;कोलकाता 11 नवम्बर'2008 , मंगलवार;&lt;br /&gt;हिन्दी और राजस्थानी भाषा के लब्ध प्रतिष्ठित कवि श्री कन्हैयालाल सेठिया आज मौन हो गए। वे ९० वर्ष के थे। भारत सरकार ने साहित्य के क्षेत्र में उनके अवदानों का मूल्यांकन करते हुए उन्हें पद्मश्री सम्मान से भी नवाजा था। सेठियाजी के निधन पर देश भर से शोक संवाद प्राप्त हो रहे हैं। पूर्व उपराष्ट्रपति भैरोंसिंह शेखावत, राजस्थान की मुख्या मंत्री वसुंधरा राजे ने अपने संदेशों में सेठिया जी के साहित्यिक अवदानों के साथ-साथ सामाजिक विषयों पर उनके कार्यों को मील का पत्थर कहा है। व्यापारिक घराने से होने के बावजूद श्री सेठिया ने कभी भी साहित्य के साथ समझौता नही किया। उनका जन्म राजस्थान के सुजानगढ़ में ११ सितम्बर १९१९ को हुआ था। उनके पिता का नाम छगनमल सेठिया और माता का नाम मनोहारी देवी सेठिया था। सेठिया जी की प्रारम्भिक पढ़ाई कलकत्ता में हुई। स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़ने के कारण कुछ समय के लिए आपकी शिक्षा बाधित हुई, लेकिन बाद में आपने राजस्थान विश्वविद्यालय से स्नातक की उपाधि प्राप्त की। दर्शन, राजनीती और साहित्य आपका प्रिय विषय था। राजस्थान में सामंतवाद के ख़िलाफ़ आपने जबरदस्त मुहीम चलायी और पिछड़े वर्ग को आगे लाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। भारत छोड़ो आन्दोलन के समय आप कराची में थे। १९४३ में सेठियाजी, जयप्रकाश नारायण और राम मनोहर लोहिया के संपर्क में आए। सेठियाजी को ज्ञानपीठ की ओर से मूर्तिदेवी साहित्य पुरास्कार १९८८ में दिया गया। उसके बाद आपकी विविध कृतियों के लिए साहित्य अकादमी सहित देश की असंख्य संस्थाओं ने सम्मानित किया। &lt;p align="justify"&gt;सेठिया जी की अमर कृतियों में धरती धोरा री राजस्थान का वंदना गीत है, जो करोड़ों राजस्थानी लोगों के ह्रदय की आवाज है। राणाप्रताप पर उनकी लिखी कविता- &lt;strong&gt;पातल'र पीथल&lt;/strong&gt; काफ़ी लोकप्रिय रही। 'कुन जमीं रो धनि' जैसी सैकड़ों कविताओं के मध्यम से सेठिया जी ने आम आदमी के उत्थान का कार्य किया। &lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="#novlast"&gt;अपनी श्रद्धांजलि यहाँ पर दें&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;hr&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="#novtop"&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#330000"  size=3 &gt;ऊपर जाएं&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="center"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#660000"  size=5 &gt;मनीषी, कर्म-प्रतिभा एवं संवेदनशीलता की त्रिवेणी के साकार प्रतीक&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_-_J_ggR3oI4/SRkIq1hPN1I/AAAAAAAAAV4/faXNJ31sdpg/s1600-h/Kanhaiyalal+Sethia_1.JPG"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 133px; height: 200px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_-_J_ggR3oI4/SRkIq1hPN1I/AAAAAAAAAV4/faXNJ31sdpg/s400/Kanhaiyalal+Sethia_1.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5267250771200522066" /&gt;&lt;/a&gt;मंगलवार 11 नवम्बर 2008; कोलकाता: 89 वर्षिय महामनीषी पद्मश्री श्री कन्हैयालाल सेठिया का आज सुबह निधन हो गया। अपने पीछे पत्नी धापू देवी, पुत्र जयप्रकाश, विनय प्रकाश, पुत्री संपत दूगड़ पौत्र-पौत्रि सहित भरा पूरा परिवार छोड़ गये। 2004 में पद्मश्री से सम्मानित श्री सेठिया के अंतिम दर्शन को सारा साहित्य जगत उमड़ पड़ा। श्री हरीश भादानी अपनी अस्वस्थता के बावजूद नीमतल्ला घाट पहूँच कर श्री सेठियाजी के पार्थीव शरीर को पुष्पमाला अर्पित की। इनकी मृत्यु पर भारतीय भाषा परिषद के निदेशक श्री विजय बहादुर सिंह ने कहा कि इनके जाने से राजस्थानी और हिन्दी साहित्य जगत को भारी क्षति हुई है।&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;मनीषी, कर्म-प्रतिभा एवं संवेदनशीलता की त्रिवेणी के साकार प्रतीक, करोड़ों राजस्थानियों की धड़कनों के प्रतिनिधि गीत ‘धरती धौरां री’ एवं अमर लोक गीत ‘पातल और पीथल’ के यशस्वी रचियता, श्री कन्हैयालाल सेठिया का जन्म 11 सितम्बर 1919 ई0 को राजस्थान के सुजानगढ़ शहर में एक सुप्रसिद्ध व्यवसायी परिवार में हुआ था । माता श्रीमती मनोहरी देवी व पिता छगनमल जी दोनों ही शिक्षाप्रमी थे । महाकवि श्री सेठिया जी का विवाह लाडनू के चोरड़िया परिवार में श्रीमती धापूदेवी के साथ सन् 1939 ई0 में हुआ । आपके परिवार में दादाश्री स्वनामधन्य स्व.रूपचन्द सेठिया का तेरापंथी ओसवाल समाज में बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान था। इनको श्रावकश्रेष्ठी के नाम से संबोधित किया जाता है। श्री जयप्रकश सेठिया इनके बड़े पुत्र हैं, छोटे पुत्र का नाम श्री विनय प्रकाश सेठिया है और एक सुपुत्री  सम्पतदेवी दूगड़ है । &lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;जब आप आठ वर्ष के थे, तभी से पद्य-रचना करने लगे । उस समय इनकी कविता का विषय भारत के स्वाधीनता-संग्राम से जुड़े लोगों की गौरवगाथा लिखना था । इनकी पहली कृति राजस्थानी में ‘रमणिये रा सोरठा’ 1940 में प्रकाशित हुई । हिन्दी की प्रथम कृति ‘वनफूल’  भी इसके बाद 1941 में प्रकाशित हुई । उसकी भूमिका डॉ.हरिवंश राय ‘बच्चन’ ने लिखी थी । तब से अब तक कवि चिन्तक, दार्शनिक सेठियाजी अनवरत लिखते रहे हैं । आपकी दो दर्जन से अधिक काव्य-रचनाओं में प्रमुख हैं-हिन्दी काव्य&lt;p align="justify"&gt;&lt;strong&gt;&lt;br /&gt; कृतियाँ ‘वनफूल’, ‘मेरायुग’, ‘अग्निवीणा’, ‘प्रतिबिम्ब’, ‘अनाम’, ‘निर्गन्थ’, ‘दीपकिरण’, ‘मर्म’, ‘आज हिमालय बोला’, ‘खुली खिड़कियाँ चौड़े रास्ते’, ‘प्रणाम’, ‘त्रयी’ आदि और राजस्थानी काव्य-कृतियाँ हैं- ‘मींझर’, ‘गळगचिया’, ‘रमणिये रा सोरठा’, ‘धर कूंचा धर मजलाँ’, ‘कूँ कूँ’, ‘लीलटांस’ आदि ।&lt;/strong&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_-_J_ggR3oI4/SRkNGH5_PoI/AAAAAAAAAWA/xP8Y8mTLE6I/s1600-h/Kanhaiyalal+Sethia_6.JPG"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 150px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_-_J_ggR3oI4/SRkNGH5_PoI/AAAAAAAAAWA/xP8Y8mTLE6I/s400/Kanhaiyalal+Sethia_6.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5267255638039150210" /&gt;श्री सेठिया जी के साथ लेखक शम्भु चौधरी&lt;/a&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt; 1942 में जब गांधीजी ने ‘करो या मरो’ का आह्नान किया, तब इनकी कृति ‘अग्निवीणा’ प्रकाशित हुई । जिस पर बीकानेर राज्य में इनके ऊपर राजद्रोह का मुकदमा चला और बाद में राजस्थान सरकार ने आपको स्वतंत्रता-संग्राम सेनानी के रूप में सम्मानित भी किया ।  महात्मा गांधीजी की मृत्यु पर भी आपकी एक कृति प्रकाशित हुई थी । इसमें देश बंटवारे के दौरान हुई लोमहर्षक व वीभत्स घटनाओं से जुड़ी रचनाएं संग्रहीत हैं । इसके बाद 1962 में  हिन्दी-कृति ‘प्रतिबिम्ब’ का प्रकाशन हुआ । इसका अंग्रेजी अनुवाद भी प्रकाशित हुआ है । इसकी भूमिका हरेन्द्रनाथ चट्टोपाध्याय ने लिखी है ।&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;आपकी ‘लीलटांस’ को 1976 में साहित्य अकादमी द्वारा राजस्थानी भाषा की उस वर्ष की सर्वश्रेष्ठ कृति के रूप में पुरस्कृत किया गया एवं ‘निर्ग्रन्थ’ पर भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा ज्ञानपीठ का ‘मूर्तिदेवी पुरस्कार’ मिला । 1987 में आपकी राजस्थानी कृति ‘सबद’ पर राजस्थानी अकादमी का सर्वोच्च ‘सूर्यमल्ल मिश्रण शिखर पुरस्कार’ प्राप्त हुआ । सन् 2004 में आपको ‘पद्मश्री’ से सम्मानित किया गया । आपके समस्त साहित्य को ‘राजस्थान परिषद’ ने चार खंडों में ‘समग्र’ के रूप में प्रकाशित किया है । एक खंड में राजस्थानी की 14 पुस्तकें, दो खंडो में हिन्दी एवं उर्दू की 20 पुस्तकें समाहित हैं । चौथा खंड इनके 9 ग्रन्थों का विभिन्न भाषाओं में हुए अनुवाद का है जिसमें मूल पाठ भी साथ है ।&lt;p align="justify"&gt;  &lt;br /&gt;श्री सेठिया जी का परिवार 100 वर्षों से ज्यादा समय से बंगाल में है । पहले इनका परिवार 199/1 हरीसन रोड में रहा करता था । सन् 1973 से सेठियाजी का परिवार भवानीपुर में 6, आशुतोष मुखर्जी रोड, कोलकात्ता-20 के प्रथम तल्ले में निवास कर रहा है। ई-हिन्दी साहित्य सभा की तरफ से हमारी भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित।&lt;br /&gt;&lt;a href="#novlast"&gt;अपनी श्रद्धांजलि यहाँ पर दें&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;hr&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="#novtop"&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#330000"  size=3 &gt;ऊपर जाएं&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="left"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#FF0000" size=6&gt;&lt;u&gt; इनकी दो अमर रचना&lt;/u&gt;&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;table width=100%&gt;&lt;tr&gt;&lt;td valign="top" width=50%&gt;&lt;p align="center"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#660000" size=5&gt;&lt;u&gt;पातल’र पीथल&lt;/u&gt;&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;p align="center"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;रोटी ही जद बन बिलावड़ो ले भाग्यो।&lt;br /&gt;नान्हो सो अमर्यो चीख पड्यो राणा रो सोयो दुख जाग्यो।&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;हूं लड्यो घणो हूं सह्यो घणो, मेवाड़ी मान बचावण नै,&lt;br /&gt;हूं पाछ नहीं राखी रण में, बैर्यां री खात खिडावण में,&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;जद याद करूँ हळदी घाटी नैणां में रगत उतर आवै,&lt;br /&gt;सुख दुख रो साथी चेतकड़ो सूती सी हूक जगा ज्यावै,&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;पण आज बिलखतो देखूं हूँ, जद राज कंवर नै रोटी नै,&lt;br /&gt;तो क्षात्र-धरम नै भूलूं हूँ, भूलूं हिंदवाणी चोटी नै&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;मैं’लां में छप्पन भोग जका मनवार बिनां करता कोनी,&lt;br /&gt;सोनै री थाल्यां नीलम रै बाजोट बिनां धरता कोनी,&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;ऐ हाय जका करता पगल्या,फूलां री कंवळी सेजां पर,&lt;br /&gt;बै आज रुळै भूखा तिसिया,हिंदवाणै सूरज रा टाबर,&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;आ सोच हुई दो टूक तड़क राणा री भीम बजर छाती,&lt;br /&gt;आंख्यां में आंसू भर बोल्या मैं लिख स्यूं अकबर नै पाती,&lt;br /&gt;पण लिखूं कियां जद देखै है आडावळ ऊंचो हियो लियां,&lt;br /&gt;चितौड़ खड्यो है मगरां में विकराळ भूत सी लियां छियां,&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;मैं झुकूं कियां ? है आण मनैं, कुळ रा केसरिया बानां री,&lt;br /&gt;मैं बुझूं कियां ? हूं सेस लपट, आजादी रै परवानां री,&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;पण फेर अमर री सुण बुसक्यां राणा रो हिवड़ो भर आयो,&lt;br /&gt;मैं मानूं हूँ दिल्लीस तनैं समराट् सनेषो कैवायो।&lt;br /&gt;राणा रो कागद बांच हुयो अकबर रो’ सपनूं सो सांचो,&lt;br /&gt;पण नैण कर्यो बिसवास नहीं जद बांच नै फिर बांच्यो,&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;कै आज हिंमाळो पिघळ बह्यो, कै आज हुयो सूरज सीतळ,&lt;br /&gt;कै आज सेस रो सिर डोल्यो, आ सोच हुयो समराट् विकळ,&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;बस दूत इसारो पा भाज्यो पीथळ नै तुरत बुलावण नै,&lt;br /&gt;किरणां रो पीथळ आ पूग्यो ओ सांचो भरम मिटावण नै,&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;बीं वीर बांकुड़ै पीथळ नै, रजपूती गौरव भारी हो,&lt;br /&gt;बो क्षात्र धरम रो नेमी हो, राणा रो प्रेम पुजारी हो,&lt;br /&gt;बैर्यां रै मन रो कांटो हो बीकाणूँ पूत खरारो हो,&lt;br /&gt;राठौड़ रणां में रातो हो बस सागी तेज दुधारो हो,&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;आ बात पातस्या जाणै हो,धावां पर लूण लगावण नै,&lt;br /&gt;पीथळ नै तुरत बुलायो हो, राणा री हार बंचावण नै,&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;म्है बाँध लियो है पीथळ सुण पिंजरै में जंगळी शेर पकड़,&lt;br /&gt;ओ देख हाथ रो कागद है तूं देखां फिरसी कियां अकड़ ?&lt;br /&gt;मर डूब चळू भर पाणी में, बस झूठा गाल बजावै हो,&lt;br /&gt;पण टूट गयो बीं राणा रो, तूं भाट बण्यो बिड़दावै हो,&lt;br /&gt;मैं आज पातस्या धरती रो मेवाड़ी पाग पगां में है,&lt;br /&gt;अब बता मनै किण रजवट रै रजपती खून रगां में है ?&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;जंद पीथळ कागद ले देखी, राणा री सागी सैनाणी,&lt;br /&gt;नीचै स्यूं धरती खसक गई, आंख्यां में आयो भर पाणी,&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;पण फेर कही ततकाळ संभळ आ बात सफा ही झूठी है,&lt;br /&gt;राणा री पाघ सदा ऊँची राणा री आण अटूटी है।&lt;br /&gt;ल्यो हुकम हुवै तो लिख पूछूं, राणा नै कागद रै खातर,&lt;br /&gt;लै पूछ भलांई पीथळ तूं, आ बात सही बोल्यो अकबर,&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;म्हे आज सुणी है नाहरियो, स्याळां रै सागै सोवै लो,&lt;br /&gt;म्हे आज सुणी है सूरजड़ो, बादळ री ओटां खोवैलो;&lt;br /&gt;म्हे आज सुणी है चातगड़ो, धरती रो पाणी पीवै लो,&lt;br /&gt;म्हे आज सुणी है हाथीड़ो, कूकर री जूणां जीवै लो&lt;br /&gt;म्हे आज सुणी है थकां खसम, अब रांड हुवैली रजपूती,&lt;br /&gt;म्हे आज सुणी है म्यानां में, तरवार रवैली अब सूती,&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;तो म्हांरो हिवड़ो कांपै है मूंछ्यां री मोड़ मरोड़ गई,&lt;br /&gt;पीथळ नै राणा लिख भेज्यो आ बात कठै तक गिणां सही ?&lt;br /&gt;पीथळ रा आखर पढ़तां ही, राणा री आँख्यां लाल हुई,&lt;br /&gt;धिक्कार मनै हूँ कायर हूँ, नाहर री एक दकाल हुई,&lt;br /&gt;हूँ भूख मरूं हूँ प्यास मरूं, मेवाड़ धरा आजाद रवै&lt;br /&gt;हूँ घोर उजाड़ां में भटकूं, पण मन में मां री याद रवै,&lt;br /&gt;हूँ रजपूतण रो जायो हूं रजपूती करज चुकाऊंला,&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;ओ सीस पड़ै पण पाघ नही दिल्ली रो मान झुकाऊंला,&lt;br /&gt;पीथळ के खिमता बादल री, जो रोकै सूर उगाळी नै,&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;सिंघां री हाथळ सह लेवै,बा कूख मिली कद स्याळी नै?&lt;br /&gt;धरती रो पाणी पिवै इसी, चातग री चूंच बणी कोनी,&lt;br /&gt;कूकर री जूणां जिवै इसी, हाथी री बात सुणी कोनी,&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;आं हाथां में तलवार थकां, कुण रांड़ कवै है रजपूती ?&lt;br /&gt;म्यानां रै बदळै बैर्यां री, छात्याँ में रैवैली सूती,&lt;br /&gt;मेवाड़ धधकतो अंगारो आंध्यां में चमचम चमकै लो,&lt;br /&gt;कड़खै री उठती तानां पर पग पग पर खांडो खड़कैलो,&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;राखो थे मूंछ्याँ ऐंठ्योड़ी, लोही री नदी बहा द्यूंला,&lt;br /&gt;हूँ अथक लडूंला अकबर स्यूँ , उजड्यो मेवाड़ बसा द्यूंला,&lt;br /&gt;जद राणा रो संदेष गयो पीथळ री छाती दूणी ही,&lt;br /&gt;हिंदवाणों सूरज चमकै हो अकबर री दुनियां सूनी ही।&lt;p align="right"&gt;&lt;br /&gt;&lt;small&gt;&lt;strong&gt;मींझर से&lt;/strong&gt;&lt;/small&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="#novtop"&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#330000"  size=3 &gt;ऊपर जाएं&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;/td&gt;&lt;td valign="top" align="center" width=50%&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="center"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#660000" size=5&gt;&lt;u&gt;धरती धोरां री !&lt;/u&gt;&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;p align="center"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;धरती धोरां री !&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;आ तो सुरगां नै सरमावै,&lt;br /&gt;ईं पर देव रमण नै आवै,&lt;br /&gt;ईं रो जस नर नारी गावै,&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;धरती धोरां री !&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;सूरज कण कण नै चमकावै,&lt;br /&gt;चन्दो इमरत रस बरसावै,&lt;br /&gt;तारा निछरावल कर ज्यावै,&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;धरती धोरां री !&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;काळा बादलिया घहरावै,&lt;br /&gt;बिरखा घूघरिया घमकावै,&lt;br /&gt;बिजली डरती ओला खावै,&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;धरती धोरां री !&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;लुळ लुळ बाजरियो लैरावै,&lt;br /&gt;मक्की झालो दे’र बुलावै,&lt;br /&gt;कुदरत दोन्यूं हाथ लुटावै,&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;धरती धोरां री !&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;पंछी मधरा मधरा बोलै,&lt;br /&gt;मिसरी मीठै सुर स्यूं घोलै,&lt;br /&gt;झीणूं बायरियो पंपोळै,&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;धरती धोरां री !&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;नारा नागौरी हिद ताता,&lt;br /&gt;मदुआ ऊंट अणूंता खाथा !&lt;br /&gt;ईं रै घोड़ां री के बातां ?&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;धरती धोरां री !&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;ईं रा फल फुलड़ा मन भावण,&lt;br /&gt;ईं रै धीणो आंगण आंगण,&lt;br /&gt;बाजै सगळां स्यूं बड़ भागण,&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;धरती धोरां री !&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;ईं रो चित्तौड़ो गढ़ लूंठो,&lt;br /&gt;ओ तो रण वीरां रो खूंटो,&lt;br /&gt;ईं रे जोधाणूं नौ कूंटो,&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;धरती धोरां री !&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;आबू आभै रै परवाणै,&lt;br /&gt;लूणी गंगाजी ही जाणै,&lt;br /&gt;ऊभो जयसलमेर सिंवाणै,&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;धरती धोरां री !&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;ईं रो बीकाणूं गरबीलो,&lt;br /&gt;ईं रो अलवर जबर हठीलो,&lt;br /&gt;ईं रो अजयमेर भड़कीलो,&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;धरती धोरां री !&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;जैपर नगर्यां में पटराणी,&lt;br /&gt;कोटा बूंटी कद अणजाणी ?&lt;br /&gt;चम्बल कैवै आं री का’णी,&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;धरती धोरां री !&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;कोनी नांव भरतपुर छोटो,&lt;br /&gt;घूम्यो सुरजमल रो घोटो,&lt;br /&gt;खाई मात फिरंगी मोटो&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;धरती धोरां री !&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;ईं स्यूं नहीं माळवो न्यारो,&lt;br /&gt;मोबी हरियाणो है प्यारो,&lt;br /&gt;मिलतो तीन्यां रो उणियारो,&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;धरती धोरां री !&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;ईडर पालनपुर है ईं रा,&lt;br /&gt;सागी जामण जाया बीरा,&lt;br /&gt;अै तो टुकड़ा मरू रै जी रा,&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;धरती धोरां री !&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;सोरठ बंध्यो सोरठां लारै,&lt;br /&gt;भेळप सिंध आप हंकारै,&lt;br /&gt;मूमल बिसर्यो हेत चितारै,&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;धरती धोरां री !&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;ईं पर तनड़ो मनड़ो वारां,&lt;br /&gt;ईं पर जीवण प्राण उवारां,&lt;br /&gt;ईं री धजा उडै गिगनारां,&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;धरती धोरां री !&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;ईं नै मोत्यां थाल बधावां,&lt;br /&gt;ईं री धूल लिलाड़ लगावां,&lt;br /&gt;ईं रो मोटो भाग सरावां,&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;धरती धोरां री !&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;ईं रै सत री आण निभावां,&lt;br /&gt;ईं रै पत नै नही लजावां,&lt;br /&gt;ईं नै माथो भेंट चढ़ावां,&lt;br /&gt;भायड़ कोड़ां री,&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;धरती धोरां री !&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="right"&gt;&lt;br /&gt;&lt;small&gt;&lt;strong&gt;मींझर से&lt;/strong&gt;&lt;/small&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="#novtop"&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#330000"  size=3 &gt;ऊपर जाएं&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;/table&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="#novlast"&gt;अपनी श्रद्धांजलि यहाँ पर दें&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;hr&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#FF0000"  size=4 &gt;स्मृति शेष: कन्हैयालाल सेठिया की कालजयी रचनायें&lt;br /&gt;&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;center&gt;&lt;table border=10 bordercolor="#000000" bgcolor="#FFFFF4" valign="top"&gt;&lt;tr&gt;&lt;td valign="top" align="top"&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_-_J_ggR3oI4/SR8D4cEs9XI/AAAAAAAAAaI/X97Z3orgYJE/s1600-h/kanhaiyalalsethia1.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;  width: 400px; height: 350px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_-_J_ggR3oI4/SR8D4cEs9XI/AAAAAAAAAaI/X97Z3orgYJE/s400/kanhaiyalalsethia1.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5268934357190243698" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br&gt;कन्हैयालाल सेठिया &lt;br&gt;११ सितम्बर १९१९ : ११ नवम्बर 2008&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;/table&gt;&lt;/center&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="center"&gt;&lt;br /&gt;&lt;font color="#FF0000" size=5&gt;&lt;strong&gt;आज हिमालय बोला&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="center"&gt;&lt;br /&gt;जागो, जीवन के अभिमानी !&lt;br /&gt;जागो, जीवन के अभिमानी !&lt;br /&gt;लील रहा मधु-ऋतु को पतझर,&lt;br /&gt;मरण आ रहा आज चरण धर,&lt;br /&gt;कुचल रहा कलि-कुसुम,&lt;br /&gt;कर रहा अपनी ही मनमानी !&lt;br /&gt;जागो, जीवन के अभिमानी !&lt;br /&gt;साँसों में उस के है खर दव,&lt;br /&gt;पद चापों में झंझा का रव,&lt;br /&gt;आज रक्त के अश्रु रो रही-&lt;br /&gt;निष्ठुर हृदय हिमानी !&lt;br /&gt;जागो, जीवन के अभिमानी !&lt;br /&gt;हुआ हँस से हीन मानसर,&lt;br /&gt;वज्र गिर रहे हैं अलका पर,&lt;br /&gt;भरो वक्रता आज भौंह में,&lt;br /&gt;ओ करुणा के दानी ! &lt;br /&gt;जागो, जीवन के अभिमानी !&lt;p align="left"&gt;&lt;br /&gt;&lt;font color="#FF0000" size=5&gt;&lt;strong&gt;कुँआरी मुट्ठी !&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="left"&gt;&lt;br /&gt;युद्ध नहीं है नाश मात्र ही&lt;br /&gt;युद्ध स्वयं निर्माता है,&lt;br /&gt;लड़ा न जिस ने युद्ध राष्ट्र वह&lt;br /&gt;कच्चा ही रह जाता है,&lt;br /&gt;नहीं तिलक के योग्य शीश वह&lt;br /&gt;जिस पर हुआ प्रहार नहीं,&lt;br /&gt;रही कुँआरी मुट्ठी वह जो&lt;br /&gt;पकड़ सकी तलवार नहीं,&lt;br /&gt;&lt;p align="center"&gt;&lt;br /&gt;हुए न शत-शत घाव देह पर&lt;br /&gt;तो फिर कैसा साँगा है?&lt;br /&gt;माँ का दूध लजाया उसने&lt;br /&gt;केवल मिट्टी राँगा है,&lt;br /&gt;राष्ट्र वही चमका है जिसने&lt;br /&gt;रण का आतप झेला है,&lt;br /&gt;लिये हाथ में शीश, समर में&lt;br /&gt;जो मस्ती से खेला है,&lt;br /&gt;उन के ही आदर्श बचे हैं&lt;br /&gt;पूछ हुई विश्वासों की,&lt;br /&gt;धरा दबी केतन छू आये&lt;br /&gt;ऊँचाई आकाशों की,&lt;br /&gt;ढालों भालों वाले घर ही&lt;br /&gt;गौतम जनमा करते हैं,&lt;br /&gt;दीन-हीन कायर क्लीवों में&lt;br /&gt;कब अवतार उतरते हैं?&lt;br /&gt;&lt;p align="right"&gt;&lt;br /&gt;नहीं हार कर किन्तु विजय के&lt;br /&gt;बाद अशोक बदलते हैं&lt;br /&gt;निर्दयता के कड़े ठूँठ से&lt;br /&gt;करुणा के फल फलते हैं,&lt;br /&gt;&lt;p align="left"&gt;&lt;br /&gt;बल पौरुष के बिना शन्ति का&lt;br /&gt;नारा केवल सपना है,&lt;br /&gt;शन्ति वही रख सकते जिनके&lt;br /&gt;कफन साथ में अपना है,&lt;br /&gt;उठो, न मूंदो कान आज तो&lt;br /&gt;नग्न यथार्थ पुकार रहा,&lt;br /&gt;अपने तीखे बाण टटोलो&lt;br /&gt;बैरी धनु टंकार रहा।&lt;br /&gt;&lt;p align="center"&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="#novtop"&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#330000"  size=3 &gt;ऊपर जाएं&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;hr&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="center"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#660000"  size=5 &gt;श्री कन्हैयालाल सेठियाः क्रान्तिकारी और परिवर्तनशील युग के साक्षी&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_-_J_ggR3oI4/SRsJHJkCXSI/AAAAAAAAAWw/vaoRZwxHN9s/s1600-h/Kanhaiyalal+Sethia1.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 267px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_-_J_ggR3oI4/SRsJHJkCXSI/AAAAAAAAAWw/vaoRZwxHN9s/s400/Kanhaiyalal+Sethia1.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5267814207570730274" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;स्वतंत्रता-संग्रामी व क्रान्तिकारी:&lt;/strong&gt; पद्मश्री श्री कन्हैयालाल सेठिया भारतीय स्वतंत्रता-संग्राम से उत्प्रेरित गांधीयुग की एक उपलब्धि हैं, जो न सिर्फ क्रान्तिकारी और परिवर्तनशील युग के साक्षी रहे हैं वरन् क्रान्तिचेत्ता के रूप में दिशा-दर्षक भी रहे हैं। श्री सेठिया राजस्थान के प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी और लोकनायक श्री जयनारायण व्यास, श्री सुमनेश जोशी, श्री रघुवर दयाल गोयल, श्री गौरीशंकर आचार्य आदि अनेक राष्ट्र-सेवियों के सहकर्मी रहे हैं। आपने समाज की जर्जर रूढ़ियों से बगावत करते हुए क्रान्तिकारी वातावरण का निर्माण किया और आवश्यकता हुई, वहाँ संघर्ष भी किया । प्रारम्भ में आपने आजादी के पूर्व और पश्चात् राजनैतिक क्षेत्र में भी  सक्रिय रूप में कार्य किया था । राजनीति से सन्यास ग्रहण कर अपना जीवन सामाजिक सुधार के कार्यों, लोकसेवा, साहित्य-संरचना, काव्य-रचना, राजस्थानी भाषा के विकास- प्रसार व उसकी मान्यता हेतु समर्पित कर दिया । वे व्यापारिक झंझटों से परे एक सामाजिक संत हैं । देश व मातृभूमि को समर्पित हैं । ऐसा उदाहरण अन्य राजनीतिज्ञ का पद्मश्री शायद ही मिले! दलितोत्थान के क्षेत्र में  सेठियाजी का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। आपके व्यक्तित्व की एक विशेषता रही कि आप में कभी किसी संस्था का मोह व्याप्त नहीं हुआ । आप परिग्रह प्रकृति से कोसों दूर रहे। आप दलितों के मसीहा तथा असहायों के सहायक हैं । आपकी कथनी एवं करनी में कभी भी कोई अन्तर नहीं रहा । धर्म, जाति, समुदाय का बिना ख्याल किए आप सदा पीड़ित मानव मात्र की सेवा में लगे रहे। इस सेवा-कार्य में आप अपनी साधन-सुविधा को भी भूल जाते, खान-पान, रहन-सहन का दुराव भी इनके व्यवहार में कभी नहीं रहा। कार्यक्षेत्र में वे खूब पैदल घूमे और बाजरे की रूखी रोटी, लाल मिर्च के साथ प्रेम से खाई। आप सदा सेवा और सेवक की एकरूपता में रहे। सेवा-कार्य में तल्लीनता, सेवापरायणता, निःस्वार्थ भाव इनकी विशेषता है। इसी कारण खान-पान, रहन-सहन असुविधा का ध्यान भी नहीं रहता था, जो जैसा था, उसी में रस लेते रहे। इसी का परिणाम था कि किसानों, मजदूरों, हरिजनों में खूब लोकप्रिय रहे। आप एक स्वाभिमानी पर संकोची व्यक्ति हैं। आपका व्यक्तित्व अपनत्व से भरा है। इसलिए सब इनके अपने हैं। कहीं दुराव, छलाव, अभिमान नहीं है।  गांधीजी के जीवन-दर्शन और इनके विचारों में बहु साम्य है। जो भी इनके सम्पर्क में आया, सीधे या इनके द्वारा रचित पुस्तकों के माध्यम से, वह प्रभावित हुए बिना नहीं रहा। उसके हृदय-पटल पर इनके प्रकाण्ड व्यक्तित्व की एक अटल छवि अवश्य अंकित हो गई। इनका व्यक्तित्व ही निराला है जिसे बहुआयामी कहें तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। श्री सेठियाजी समय-समय पर धर्मान्धता, कुपरम्परा एवं कुरीति पर तीव्र प्रहार कर धर्म के मूल स्वरूप को आत्मसात करने की सदैव प्रेरणा देते रहते हैं। निष्काम सेवाभावी कार्यकत्र्ताओं के लिए तो आप एक आलोक स्तम्भ ही हैं। सामाजिक रूप से भी आप अत्यंत जागरूक हैं। समाज में बढ़ रही कुरीतियों को आप तत्काल समाप्त किए जाने के पक्षधर हैं आपका मानना है कि अगर इन बढ़ती कुरीतियों को रोका न गया तो राजस्थान की महान परंपरा, संस्कार और गौरव हमेशा-हमेशा के लिए कालकवलित हो जायगा। आप सर्व-धर्म समन्वय की जीवन्त मूर्ति हैं और साथ ही भगवान महावीर के महान् सिद्धान्त ‘‘अपरिग्रह’’ में अटूट निष्ठा रखने वाले महान ऋषि भी। &lt;p align="justify"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_-_J_ggR3oI4/SRsKCup2CfI/AAAAAAAAAXA/WJvv5jpXYfQ/s1600-h/Kanhaiyalal+Sethia2b.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 300px; height: 234px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_-_J_ggR3oI4/SRsKCup2CfI/AAAAAAAAAXA/WJvv5jpXYfQ/s400/Kanhaiyalal+Sethia2b.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5267815231139482098" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;लोक प्रचेताः&lt;/strong&gt; श्री सेठिया जी आधुनिक राजस्थान के उन साहित्यवेत्ताओं में हैं, जिन्होंने अपने कवित्व से राजस्थानी साहित्य को न सिर्फ प्रकाशमान किया है, वरन् गौरवन्वित भी किया है। जिन्होंने परिवर्तनशील युग की धारा को काव्यगंगा से प्रवाहित कर राजस्थान के लोकजीवन को उद्बोधित किया। इनके द्वारा रचित युग निर्माणकारी साहित्य इसका ज्वलन्त प्रमाण है। एक तरफ आप जहाँ हिन्दी-जगत के जाज्वल्यमान कवि हैं, वहीं आप राजस्थानी साहित्य के लोक प्रचेता भी। श्री सेठियाजी सुजानगढ़ में जन्मे, राजस्थान में बढ़े कोलकात्ता को अपनाया, आपका कार्यक्षेत्र सुजानगढ़ और राजस्थान से अधिक कलकत्ता हो गया है। सुजानगढ़ तहसील चुरू जिला व बीकानेर संभाग एवं फिर राजस्थान की राजनैतिक गतिविधियों में आजादी के पहले व बाद के वर्षों में अपकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। बीकानेर संभाग ही नहीं, राजस्थान के विकास हेतु कलकत्ता में बैठे-बैठे वे बराबर चिंतित रहते हैं और अनेक बिन्दुओं पर नेताओं, मंत्रियों व जन प्रतिनिधियों से पत्राचार द्वारा व प्रत्यक्ष में वार्ता करके प्रयास करते रहे हैं।  &lt;p align="justify"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_-_J_ggR3oI4/SRsKCRPgqzI/AAAAAAAAAW4/Uz4CWcOLXjE/s1600-h/Kanhaiyalal+Sethia2a.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 300px; height: 234px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_-_J_ggR3oI4/SRsKCRPgqzI/AAAAAAAAAW4/Uz4CWcOLXjE/s400/Kanhaiyalal+Sethia2a.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5267815223244401458" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;राजस्थानी भाषा:&lt;/strong&gt; राजस्थानी भाषा और संस्कृति भारतीय राष्ट्र का एक महत्वपूर्ण अंग बने, इस आवाज को सशक्त रूप से बुलन्द करने का प्रथम श्रेय इन्ही को जाता है। राजस्थानी को संविधान की आठवीं अनुसूची में मान्यता दिलाने के लिए बहुत कम लोगों ने ईमानदारी से गंभीरता दिखाई। न देश के दूसरे हिस्सों में रहने वाले प्रवासी राजस्थानियों ने और न राजस्थान के नागरिकों ने। कई बार यह सुनने को मिलता है कि राजस्थान में किसी वर्ग विशेष ने राजस्थानी को मान्यता देने का विरोध किया है। इस परिस्थिति में गहरी वेदना होती है और सेठियाजी की ये पंक्तियां सहज ही ध्यान में आ जाती हैः &lt;center&gt;&lt;strong&gt;&lt;br /&gt;‘‘मायड़ भाषा बोलतां जिणनैं आवै लाज । &lt;br /&gt;इस्या कपूतां सैं दुखी आखों देस-समाज ।’’&lt;/strong&gt;&lt;/center&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;‘‘मायड़ भासा’’&lt;/strong&gt; के प्रति ऐसी तड़प बहुत कम लोगों में है । कुछ लोगों को इनकी इस तड़प से कई बार अरुचि भी होने लगती है लेकिन वे यह अलख...... &lt;strong&gt;&lt;center&gt;&lt;br /&gt;‘‘बिन भाषा बिन पाणी, बिलखै राजस्थानी’’ &lt;/strong&gt;&lt;/center&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_-_J_ggR3oI4/SRsLP7qznSI/AAAAAAAAAXo/OF69GnptbpM/s1600-h/Kanhaiyalal+Sethia8.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 300px; height: 200px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_-_J_ggR3oI4/SRsLP7qznSI/AAAAAAAAAXo/OF69GnptbpM/s320/Kanhaiyalal+Sethia8.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5267816557483105570" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;निरंतर और बेहिचक अलापते रहते हैं। इसके लिए पत्राचार, फैक्स, तार का एक बड़ा जखीरा इनके पास है । एक बार तो इन्होंने राजस्थानी भाषा को संविधान की आठवीं सूची में शामिल करने की मांग को लेकर अनशन करने की धमकी राजस्थान के तत्कालीन मुख्यमंत्री भैरोसिंह शेखावत को दे दी थी।&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;काव्ययात्राः&lt;/strong&gt; इसमें कोई दो मत नहीं कि श्री सेठियाजी की साहित्य-यात्रा राजस्थानी साहित्य के विकास को भी प्रतिबिंबित करती है। उनकी रचनाएं बताती हैं कि राजस्थानी का साहित्य धीरे-धीरे गंभीर हो रहा है, उसका दायरा व्यापक हो रहा और समाज की नवीनताओं को उसी तरह आत्मसात कर रहा है । आपकी काव्ययात्रा, युवा अवस्था में लिखे गीत और काव्य जनभाषा और जन-आन्दोलनों से जुड़े हुऐ हैं। उस वक्त सेठियाजी ने धरती, किसान, मजदूर, ऐतिहासिक वीरों, देशभक्तों, जन-नेताओं और देशाभिमान के गीत लिखे और गाये ।&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_-_J_ggR3oI4/SRsLFhyusoI/AAAAAAAAAXg/Rwan9111D6s/s1600-h/Kanhaiyalal+Sethia7.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 237px; height: 320px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_-_J_ggR3oI4/SRsLFhyusoI/AAAAAAAAAXg/Rwan9111D6s/s320/Kanhaiyalal+Sethia7.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5267816378738324098" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;कई लोग इनसे वैचारिक स्तर पर एकमत न होते हुए भी इनकी काव्य-शैली से अति प्रभावित रहते हैं। क्योंकि इस अणु युग में इनके द्वारा शब्दों का चुनाव बड़ा ही कौशलपूर्ण व मार्मिक है। प्रत्येक शब्द मानस पर एक रंगीन रेखाचित्र खींच, अपनी अमिट छाप छोड़ देता है। स्वभाव से श्री सेठियाजी बहुत संवेदनशील और भाव प्रवण व्यक्ति हैं। मानवमात्र का उत्पीड़न, शोषण, उपेक्षा और अनादर इनके संवेदनशील हृदय को झकझोर देता है। उनकी भावनाओं के उद्वेग ने ही शायद इनको कवि का हृदय दिया। गद्य और पद्य में इनकी अभिव्यक्ति समान रूप से प्रभावपूर्ण रही है।&lt;br /&gt;श्री सेठियाजी को अपनी मातृभाषा राजस्थानी और मातृभूमि अभावों से पीड़ित रेतीले धोरों की धरती से असीम प्यार है। वह उनकी प्रेरणा का आधार रही हैं। कई काव्य-रचनाएँ और &lt;strong&gt;‘धरती धोरां री’&lt;/strong&gt; का अमर गान इसका प्रतीक है। श्री सेठियाजी राजस्थानी और हिन्दी के उच्चकोटि के कवि और साहित्यकार हैं। साहित्य की कई विधाओं में इन्होंने उत्कृष्ट साहित्यिक रचनाएँ की हैं। इनके साहित्य में गंभीर भाव-प्रवणता, उच्चकोटि की अभिव्यक्ति एवं उत्कृष्ट रचना कौशल है। इनकी रचनाएँ व्यक्ति के मानस एवं विचारों को छूती हैं ।&lt;p align="justify"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_-_J_ggR3oI4/SRsK77XYy2I/AAAAAAAAAXY/b3nQ-Syrry0/s1600-h/Kanhaiyalal+Sethia6.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 237px; height: 320px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_-_J_ggR3oI4/SRsK77XYy2I/AAAAAAAAAXY/b3nQ-Syrry0/s320/Kanhaiyalal+Sethia6.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5267816213804272482" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;‘धरती धोरां री’,&lt;/strong&gt;  इसे बहुत से व्यक्ति एक अमर रचना मानते है, वस्तुतः ऐसा ही नहीं यह तो राष्ट्र गान है। &lt;strong&gt;‘पातल और पीथल’&lt;/strong&gt; मरुभूमि के दुरूह जीवन, राजपूताने के शौर्य एवम् बलिदान, वहां के कण-कण में बिखरे सौन्दर्य की प्रखर वाणी है। ‘धरती धोरां री’ ऐसी वाणी जिसे सुन सार्थकता पाई कृष्ण के रंग में रंगी मीरा ने, धधकती ज्वाला का वरण करने वाली पद्मिनियों ने, पत्थरों में प्राण फूंक देने वाले शिल्पियों ने, ढोला मारू ने और संभवतः यही कारण है कि शहरों, नगरों को छोड़ राजस्थानी की ढाणी-ढाणी में अंकित है, महाकवि कन्हैयालाल सेठिया जी का नाम, कभी-कभी तो इन पंक्तियों को देख ऐसा लगता ही नहीं है कि ये मानव रचित है बल्कि आभास होता है मानों स्वयं माँ शारदे ने वरण किया हो सेठियाजी को, कुछ अनछुई भावाभिव्यक्तियों हेतु !&lt;br /&gt;सेठियाजी की हर पंक्ति में एक ईमानदार दिल धड़कता है जिसमें किसी दूसरे की खुशी और उसके सपने शामिल होते हैं, जो कि दर्द को बांट सके ।&lt;p align="justify"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_-_J_ggR3oI4/SRsKxroc8AI/AAAAAAAAAXQ/qKbvA32aqw0/s1600-h/Kanhaiyalal+Sethia5.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 214px; height: 320px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_-_J_ggR3oI4/SRsKxroc8AI/AAAAAAAAAXQ/qKbvA32aqw0/s320/Kanhaiyalal+Sethia5.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5267816037782188034" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;सभी साहित्यकार, पत्रकार, राजस्थानी उद्यमी और प्रवासी राजस्थानी सेठियाजी को अपने-अपने दृष्टिकोण से भले ही देखते हों लेकिन इस बारे में सभी एकमत हैं कि वे अकेले ही राजस्थानी की तुरही तड़प के साथ बजाते हैं ।&lt;br /&gt;काव्य-मनीषी, साहित्य-मर्मज्ञ, दार्शनिक, सामाजिक कार्यकत्र्ता, संस्कृति के पोषक श्री सेठियाजी समाज, संस्कृति व मातृभूमि को समर्पित हैं । वे आज इस उम्र व अवस्था में भी आशा से अधिक सक्रिय और कर्मठ हैं। &lt;br /&gt;आप राजस्थानी (अपनी मातृभाषा) बोलना गौरव समझते है और प्रत्येक को इसी भाषा में बोलने पर जोर व प्रेरणा देते हैं। ऐसे हैं श्री सेठियाजी राजस्थानी धरती के सपूत, जिन्हें अपनी संस्कृति, भाषा, मातृभूमि व देश पर नाज है। राजस्थानी भाषा में उन्होंने काफी काव्य-रचनाएँ की हैं जो एक से एक बढ़कर हैं । इनकी कोई भी कविता या गीत को ले लीजिए, प्रभाव छोड़े बिना नहीं रहेगी । इनमें सरस्वतीजी विराजमान हैं, जिन्होंने आपको महाकवि बना दिया । &lt;strong&gt;‘‘धरती धोरां री’’&lt;/strong&gt;  इनके यौवनकाल में ही अमर हो चुका था यदि माने तो आज यह गीत लोकगीत का स्थान ग्रहण कर चुका है, जो घर-घर में, समारोह-समारोह में गुनगुनाया व गौरव से गाया जाता है और विशेषता यह कि इसके रचीयता श्री सेठियाजी का नाम भी साथ-साथ सबकी जबान पर चढ़ चुका है। ऐसा सम्मान दुष्कर है जो श्री सेठियाजी को प्राप्त हुआ है। आप धन्य हैं। &lt;strong&gt;‘‘धरती धोरां री’’&lt;/strong&gt; में जो राजस्थान का सरस गौरवशाली वर्णन, कल्पना, भाव, आनन्द व रस तथा अलंकारिता है वह आज तक किसी अन्य गीत में सुनने को नहीं मिला । प्रत्येक राजस्थानी इनके इस गीत पर गर्व करता है, सिर्फ राजस्थानी ही क्यों, अन्य प्रदेशवाले भी जब इस सुरीले गीत को सुनते हैं वे इसके भावों में खो जाते हैं, वे ईर्ष्या करने लगते हैं कि ऐसा सुन्दर वर्णन उनके प्रदेश के गीतों में क्यों नहीं हुआ? उपरोक्त गीत को श्रवण करने से मन में शान्ति व प्रसन्नता की ऐसी लहर दौड़ जाती है कि &lt;strong&gt;‘मरुधर’ देश देव-रमण का स्थान व सिरमौर लगने लगता है।&lt;/strong&gt; यह अकेला ही ऐसा उदाहरण नहीं है जो श्री सेठियाजी को अमर बना देगा - न जाने इनके कितने ही गीत व गद्य, कविताएँ आदि पुस्तकों में प्रकाशित हुई हैं जो जन-जन को सदा याद रहेंगी। भारतीय स्वतंत्रता-संग्राम को लक्ष्य करते हुए उनकी काव्य-रचना ‘‘पातल और पीथल’’ भी एक ऐसी ही मौलिक कृति है जो एक बार सुनने पर बार-बार सुनने को जी करता है । उनकी काव्य-प्रतिभा, प्रकाण्डता निराली, सौम्य, सटीक व ऐसी गरिमा-मण्डित है जो इन्हें महाकवि बना देती है । इन्होंने राजस्थानी, हिन्दी व उर्दू भाषा (जिसका आपने कभी अध्ययन नहीं किया) में उच्चकोटि की काव्य-रचनाएँ की हैं। इनकी गद्य-रचना भी उत्तम साहित्यिक होते हुए भी नैतिक सन्देश देती हैं। आप उच्चकोटि के गद्यकार व साहित्यकार हैं। आधुनिकता की अंधी होड़ से आपने कभी समझौता नहीं किया और यह छाप इनकी रचनाओं में भी स्पष्टतया उजागर होती है।&lt;p align="justify"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_-_J_ggR3oI4/SRsKinDiioI/AAAAAAAAAXI/NIwhXvBUhWY/s1600-h/Kanhaiyalal+Sethia3.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 300px; height: 200px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_-_J_ggR3oI4/SRsKinDiioI/AAAAAAAAAXI/NIwhXvBUhWY/s320/Kanhaiyalal+Sethia3.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5267815778855586434" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;महामनीषी:&lt;/strong&gt; महामनीषी सेठियाजी अध्यात्म के मूर्त रूप हैं। आपके हृदय की धड़कन अध्यात्म की धड़कन है। आपके उर्ध्वमुखी चिन्तन में जीवन को समझने का विशेष दृष्टिकोण है। भोग नहीं, त्याग की चिंतनशीलता है। सहिष्णुता की मूर्ति महामनीषी पद्मश्री श्री सेठियाजी के व्यक्तित्व की, चिन्तन की गहराई, उन्मुक्तता, विचारों का खुलापन, भाषा की प्रांजलता, वर्णन शैली की स्पष्टता, आचार की सरलता, अकृत्रिम मुस्कुराहट एवं सहज स्नेहिल मुखाकृति हम सबको आकृष्ट एवं प्रभावित करती है । इनके गीतों में राजस्थान के पशु-पक्षी, निर्झर, राजपथ, पहाड़ सभी जैसे बोलते हैं। वह स्वभावतः कवि हैं और न केवल राजस्थानी को अपितु समस्त हिन्दी साहित्य को भी उन पर गर्व है ।&lt;br /&gt;आपके गहन चिंतन और अद्भुत रचना कौशल का प्रमाण हैं आपकी कविताएँ । जहाँ विद्वानों और समालोचकों को प्रभावित करती हैं, वहीं जन-सामान्य के बीच इनकी लोकप्रियता बेमिशाल है ।&lt;br /&gt;श्री सेठियाजी &lt;strong&gt;वसुधैवकुटुम्बकम्&lt;/strong&gt; की भावना से विश्व के कल्याण की चिन्ता रखते हैं । राष्ट्रीय भावनाओं से ओतप्रोत श्री सेठियाजी गृहस्थ में होते हुए भी ऋषि की तरह सादगी के साथ सदा सार्वजनिक प्रवृत्तियों व कार्यों मे लगे रह हैं।&lt;br /&gt;श्री सेठियाजी साहित्य-मनीषी के रूप में देश मे सर्वत्र जाने जाते हैं। राजस्थान व प्रवासी राजस्थानियों में इनका नाम बड़े सम्मान व आदर से लिया जाता है। गोधन की रक्षा, अकाल निवारण, कला व संस्कृति, संगीत व रगमंचीय प्रवृत्तियों, पत्रकारिता, संस्थाओं के गठन व विकास- सब में आप समर्पित भाव से योग देते रहे हैं। आप एक अच्छे ओजस्वी वक्ता व चिंतक हैं। &lt;br /&gt;वणिक परिवार में जन्म लेकर भी आप प्रारंभ से ही सार्वजनिक व लोक कल्याणकारी प्रवृत्तियों में तथा साहित्य सृजन में लगे रहकर व्यापार से दूर रहे। साधक की तरह जीने वाले श्री सेठियाजी हर एक को सदा सुलभ रहते हैं और हर एक को देशहित व सामाजिक कार्यों में लगे रहने व सृजन की प्रेरणा उनसे मिलती रहती है। भारतीय ज्ञानपीठ एवं हिन्दी साहित्य सम्मेलन, राजस्थानी भाषा-साहित्य व संस्कृति अकादमी एवं अन्य अनेक  संस्थाओं द्वारा पुरस्कारों से आपको सम्मानित किया जा चुका है।&lt;br /&gt;इनके साहित्य की एक अन्य महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि इन्होंने अपने साहित्य में समाज के वास्तविक स्वरूप का चित्रांकन निष्पक्ष रूप से किया है। श्री सेठियाजी ने राजस्थानी भाषा के साथ ही हिन्दी भाषा को भी अपने साहित्य का आधार बनाया है। राजस्थानी भाषा को अपना गौरवपूर्ण स्थान प्राप्त कराने में श्री सेठियाजी की सफल भूमिका रही है।&lt;br /&gt;सेठियाजी का व्यक्तित्व एक ऐसा चुम्बकीय व्यक्तित्व है कि जो भी इनके निकट आता है, इनसे आकर्षित हुए बिना नहीं रहता । सरलता, सहृदयता तथा निश्छलता की वे जीवन्त प्रतिमूर्ति हैं । निर्भीकता, स्पष्टता एवं अनाग्रहता ने इनके व्यक्तित्व को जो उदारता प्रदान की है, वह अन्यत्र विरल है। अनेक उदीयमान एवं प्रतिभा सम्पन्न कवि इनसे प्रेरणा पाकर अपने को धन्य-धन्य तथा कृतकृत्य मानते हैं।&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;एक स्वर मेरा मिला लो:&lt;/strong&gt; कृष्ण प्रेम में पगी मीरां ने तो घुँघरू बाँध अपनी अनुभूति को अभिव्यक्ति दे दी लेकिन जिस माटी को उसने ललाट पर लगाया, उसके दर्द की कौन कहे? पद्मिनी ने तो जौहर का आलिंगन कर अपनी अस्मत, अपनी मर्यादा बचा ली, लेकिन उसकी माटी की अस्मिता की बात कौन कहे? रण बाँकुरे साँगा, बलिदानों के पुरोधा प्रताप ने आक्रान्ताओं से तो अपना लोहा मनवा लिया मगर उनकी माटी के शौर्य की गाथा जन-जन तक कौन कहे? ढोला मरवण, पातल-पीथल, अगणित इतिहास पुरुषों की इस रत्न प्रसू मरुधरा को पहली बार मुखरित किया महाकवि ने, इससे पहले तो राजस्थान को केवल बालू के टीलों और रेत के अनन्त विस्तार के रूप में या फिर ज्यादा से ज्यादा पश्चिमी सीमान्त के सजग व प्रबल प्रहरी के रूप में जाना था ।&lt;br /&gt;उनकी रचनाओं से पहली बार विश्व ने जाना कि अतीत को जीवन और प्रकाश से रंजित कर देनेवाले राजस्थान में जीवन के सभी इन्द्रधनुषी रंग खिलते हुए देखे जा सकते हैं।&lt;br /&gt;भले ही यह अतिशयोक्तिपूर्ण लगे मगर धुव्र सत्य यही है कि आपने राजस्थान की माटी की चेतना को सशक्त अभिव्यक्ति ही नहीं दी बल्कि उसे सार्थकता प्रदान की है।&lt;br /&gt;आपकी समस्त रचनाओं का अभी मूल्यांकन होना बाकी है। शायद अगली सदी इस मनीषी की अद्भुत मेधा को ज्यादा बेहतर समझ सकने में सक्षम हो।&lt;br /&gt;सेवा, श्रम, संवेदना, ज्ञान, आचरण और अदम्य साहस की प्रतिमूर्ति श्री  सेठियाजी के विषय में इतना ही लिखना काफी है कि 20वीं शताब्दी में ये सब गुण एक साथ विरले ही मनीषियों में किसी ने अनुभूत किये हों । शायद नहीं, कारण भी स्पष्ट है कि सेठियाजी, कवि होने के साथ-साथ, मनीषी भी हैं और उनके मस्तिष्क में जो गहन चिन्तन चलता है उस समुद्र-मन्थन के पश्चात् उनके हृदय में जो अमृत-तत्व निथर कर आ जाता है, उसका वे किसी तटस्थ तृतीय व्यक्ति की भाँति, ‘दर्शन’ भी कर लेते हैं - जो सामान्य कवियों के वश की बात नहीं होती।&lt;br /&gt;सेठियाजी ने रवीन्द्रनाथ ठाकुर की भाँति, स्वयं के चाहे चित्र नहीं बनाए हों, किन्तु चित्रकला में, राजस्थानी कलम का उन्हें बारीक ज्ञान है । मो.रफी साहब ने &lt;strong&gt;‘धरती धोरां री’&lt;/strong&gt; की रचना पर धुनें बनाई और राजस्थानी-प्रकृति की पृष्ठभूमि प्रदान करते हुए, उस पर एक अति भव्य वृत्त-चित्र भी बना है, उसी भाँति उन्होंने जिन सैकड़ों छन्दबद्ध कविताओं में उत्तम गीति-तत्त्व पिरोया है  यदि इनके कविताओं  को संगीत-शास्त्र की स्वर-लिपि प्रदान की जाय तो रवीन्द्र संगीत की भाँति, राजस्थानियों के गौरव स्वरूप ‘सेठिया-संगीत’ भी सहज ही हमें प्राप्त हो सकता है।&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;विशेषता:&lt;/strong&gt; इन्होंने युवावस्था में हरिजनों एवं दलितों को सवर्णों के बराबर अधिकार दिलाने के लिये परिवार और समाज के साथ सतत संघर्ष किया, इनकी प्रेरणा से हरिजन बच्चों के लिये प्रथम पाठशाला स्थापित हुई, इन्होंने&lt;strong&gt; ‘‘अग्निवीणा’’&lt;/strong&gt; का प्रखर स्वर घर-घर में गुंजा कर स्वाधीनता-संग्राम के दौरान राजद्रोह के अभियोग का सामना किया और इनकी प्रबल प्रेरणा से महाराणा प्रताप के अप्रतिम साहस एवं शौर्य की साक्षी हल्दीघाटी की पुण्य पावन माटी को पुनः शीर्ष स्थान मिला । स्मरण रहे कि श्री सेठिया जी ने हल्दीघाटी की पावन माटी को छाटी-छोटी काव्य मंजुषाओं में भर कर देश के शीर्ष राजनेताओं को भेंट कर उनसे आग्रह किया था कि इस पावन परिसर को गरिमामय रूप दिया जाए । इसका प्रभाव हुआ एवं हल्दीघाटी के सौंदर्यकरण की योजना स्वीकृत हुई ।&lt;br /&gt;कवि सेठियाजी की विशेषता है कि ये मरुधरा की मिट्टी की सोंधी सुवास से जुड़े हैं । माटी से जुड़नेवाला कवि जन-मानस से अनायास जुड़ जाता है । यही कारण है कि ‘धरतीं धोरा री’ के बाद सेठियाजी की ‘पातल और पीथल’ सर्वाधिक चर्चित राजस्थानी कविता है । इसको राजस्थान के पाठ्यक्रम में संकलित कर लिया गया। उनका राजस्थानी गीत ‘धरती धोरां री’ तो जन-जन का कण्ठहार बन गया है । सेठियाजी की प्रथम राजस्थानी काव्यकृत&lt;strong&gt; ‘रमणियां रा सोतठा’ &lt;/strong&gt;जिसका प्रकाशन 1940 ई0 में हुआ एवं प्रथम हिन्दी काव्यकृति ‘बनफूल’ है जिसका प्रकाशन 1941 में हुआ था । तब से अब तक कवि चिन्तक, दार्शनिक सेठियाजी अनवरत लिखते रहे हैं। आपकी दो दर्जन से अधिक &lt;strong&gt;काव्य-रचनाओं में प्रमुख हैं-हिन्दी काव्य कृतियाँ ‘वनफूल’, ‘मेरा युग’, ‘अग्निवीणा’, ‘प्रतिबिम्ब’, ‘अनाम’, ‘निर्गन्थ’, ‘दीपकिरण’, ‘मर्म’, ‘आज हिमालय बोला’, ‘खुली खिड़कियाँ चौड़े रास्ते’, ‘प्रणाम’, ‘त्रयी’ आदि और राजस्थानी काव्य-कृतियाँ हैं-‘मींझर’, ‘गलगचिया’, ‘रमणिये रा सोरठा’, ‘धर कूंचा धर मजलाँ’, ‘कूँ कूँ’, ‘लीलटांस’ आदि।&lt;/strong&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;इनका चिन्तन सदैव विराट से जुड़ने, उसे आत्मसात करने की ओर उन्मुख करता है, जिसमें जातिगत संकीर्णता या धर्मगत संकीर्णता या भाषायी वैमनस्य को कोई स्थान नहीं है । यह सब मानव को एक-दूसरे से मिलने में बाधक है । सत्य किसी छोटे दायरे में आबद्ध नहीं होता, उसकी अपार भंगिमाएं, संभावनाएँ युग-युग में व्यक्त होती रहती हैं । अतः ‘‘अपना अनुभूत सत्य ही जीवन में प्रमुखता रखता है ।’’ इस तथ्य को वे सदा संस्थापित करते हैं । इसलिए जो व्यक्ति इनसे मिलने जाते हैं, वे सदा उत्साहित एवं प्रेरणा प्राप्त कर लौटतें हैं।&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="#novtop"&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#330000"  size=3 &gt;ऊपर जाएं&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;विख्यात कवि के रूप आपने हिन्दी एवं राजस्थानी में अनेक पुस्तकें लिखी हैं, जिसमें इनकी कविताएं जन-जन में सदा गाई जाती है । आपकी कृति ‘‘लीलटांस’’ (राजस्थानी) साहित्य अकादमी द्वारा एवं ‘निर्ग्रन्थ’ ज्ञानपीठ मूर्तिदेवी पुरस्कार से सम्मानित की गई हैं । इसके अतिरिक्त आपको साहित्य वाचस्पति के रूप में अलंकृत भी किया गया है ।&lt;br /&gt;आपका मानना है कि जैसे चेहरे बिना व्यक्ति की पहिचान नहीं हो पाती, वैसे ही प्रान्त के व्यक्तित्व की अस्मिता मातृभाषा या मायड़ भाषा के बिना स्थापित नहीं होती ।&lt;br /&gt;आपके हिन्दी और राजस्थानी लिखे काव्यों का दूसरी भाषाओं में भी अनुवाद हुआ है । आपकी प्रेरणा और सहयोग से देशभर में साहित्य, संस्कृति और सेवा की अनेकों संस्थाएँ चल रही हैं । सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि आपने कभी भी किसी पद और अधिकार को नहीं स्वीकारा है । व्यवहार में सदैव उदार, निश्छल और साफ रहे हैं । आप विशाल जनसमूह के सुख-दुःख, घर-परिवार, शिक्षा और स्वास्थ्य से जुड़े हुए हैं । आपका व्यक्तित्व इतना सरल और विशाल है कि प्रत्येक कार्य को करने के उपयुक्त सेवाभावी आपके सामने आते रहते हैं ।आज ये राष्ट्रकवि के रूप में सर्वत्र स्वीकृत हैं । निस्संदेह यह राजस्थान की एक धरोहर हैं, जिनकी काव्य-विरासत को पाकर राजस्थानी समाज गौरवान्वित है। एक युगकवि हैं, राष्ट्रकवि हैं और राजस्थानी के प्रेरणादायी उद्घोषक हैं । वे क्या नहीं हैं? वे हमारे हैं, यही हमारे लिए प्रेरणात्मक है । इसके लिये आपका नाम भारत और राजस्थान के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में लिखा जायेगा । &lt;p align="right"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;- शम्भु चौधरी&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="#novlast"&gt;अपनी श्रद्धांजलि यहाँ पर दें&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;hr&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="#novtop"&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#330000"  size=3 &gt;ऊपर जाएं&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="center"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#660000"  size=5 &gt;श्री कन्हैयालाल सेठिया से एक ऐतिहासिक मुलाकात&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_-_J_ggR3oI4/SRsP3H9M8SI/AAAAAAAAAXw/pWiXkARlwXY/s1600-h/Kanhaiyalal+Sethia9.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 267px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_-_J_ggR3oI4/SRsP3H9M8SI/AAAAAAAAAXw/pWiXkARlwXY/s400/Kanhaiyalal+Sethia9.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5267821628842897698" /&gt;&lt;small&gt;श्री सेठिया जी के साथ लेखक शम्भु चौधरी, एक दम से बायें श्री सरदारमल कांकरिया, सेठिया ही के ठीक पीछे उनके पुत्र श्री जयप्रकाश सेठिया&lt;/small&gt;&lt;/a&gt;&lt;br&gt; &lt;br /&gt;कोलकात्ता 15.5.2008: आज शाम पाँच बजे श्री कन्हैयालाल सेठिया जी के कोलकात्ता स्थित उनके निवास स्थल 6, आशुतोष मखर्जी रोड जाना था। &lt;strong&gt;‘समाज विकास’&lt;/strong&gt; का अगला अंक श्री सेठिया जी पर देने का मन बना लिया था, सारी तैयारी चल रही थी,  मैं ठीक समय पर उनके निवास स्थल पहुँच गया। उनके ज्येष्ठ पुत्र श्री जयप्रकाश सेठिया जी से मुलाकत हुई। थोड़ी देर उनसे बातचीत होने के पश्चात वे, मुझे श्री सेठिया जी के विश्रामकक्ष में ले गये। बिस्तर पर लेटे श्री सेठिया जी का शरीर काफी कमजोर हो चुका है, उम्र के साथ-साथ शरीर थक सा गया है, परन्तु बात करने से लगा कि श्री सेठिया जी में कोई थकान नहीं। उनके जेष्ठ पुत्र भाई जयप्रकाश जी बीच में बोलते हैं, - &lt;strong&gt; ‘‘ थे थक जाओसा....... कमती बोलो ! ’’ &lt;/strong&gt; परन्तु श्री सेठिया जी कहाँ थकने वाले, कहीं कोई थकान उनको नहीं महसूस हो रही थी, बिल्कुल स्वस्थ दिख रहे थे। बहुत सी पुरानी बातें याद करने लगे। स्कूल-कॉलेज, आजादी की लड़ाई, अपनी पुस्तक ‘‘अग्निवीणा’’ पर किस प्रकार का देशद्रोह का मुकदमा चला । जयप्रकाश जी को बोले कि- वा किताब दिखा जो सरकार निलाम करी थी, मैंने तत्काल दीपज्योति (फोटोग्राफर) से कहा कि उसकी फोटो ले लेवे । जयप्रकाश जी ने&lt;strong&gt; ‘‘अग्निवीणा’’ &lt;/strong&gt; की वह मूल प्रति दिखाई जिस पर मुकदमा चला था । किताब के बहुत से हिस्से पर सरकारी दाग लगे हुऐ थे, जो इस बात का आज भी गवाह बन कर सामने खड़ा था । सेठिया जी सोते-सोते बताते हैं  - ‘‘ हाँ! या वाई किताब है जीं पे मुकदमो चालो थो....देश आजाद होने...रे बाद सरकार वो मुकदमो वापस ले लियो ।’’  थोड़ा रुक कर फिर बताने लगे कि आपने करांची में भी जन अन्दोलन में भाग लिया था । स्वतंत्राता संग्राम में आपने जिस सक्रियता के साथ भाग लिया, उसकी सारी बातें बताने लगे, कहने लगे&lt;strong&gt; ‘‘भारत छोड़ो आन्दोलन’’&lt;/strong&gt; के समय आपने कराची में स्व.जयरामदास दौलतराम व डॉ.चौइथराम गिडवानी जो कि सिंध में कांग्रेस बड़े नेताओं में जाने जाते थे, उनके साथ कराची के खलीकुज्जमा हाल में हुई जनसभा में भाग लिया था, उस दिन  सबने मिलकर स्व.जयरामदास दौलतराम व डॉ.चौइथराम गिडवानी के नेतृत्व में एक जुलूस निकाला था, जिसे वहाँ की गोरी सरकार ने कुचलने के लिये लाठियां बरसायी, घोड़े छोड़ दिये, हमलोगों को कोई चोट तो नहीं आयी, पर अंग्रेजी सरकार के व्यवहार से मन में गोरी सरकार के प्रति नफरत पैदा हो गई । आपका कवि हृदय काफी विचलित हो उठा, इससे पूर्व आप&lt;strong&gt; ‘‘अग्निवीणा’’&lt;/strong&gt; लिख चुके थे।  बात का क्रम टूट गया, कारण इसी बीच शहर के जाने-माने समाजसेवी श्री सरदारमल कांकरियाजी आ गये। उनके आने से मानो श्री सेठिया जी के चेहरे पे रौनक दमकने लगी हो। वे आपस में बातें करने लगे। कोई शिथिलता नहीं, कोई विश्राम नहीं, बस मन की बात करते थकते ही नहीं,  इस बीच जयप्रकाश जी से परिवार के बारे में बहुत सारी बातें जानने को मिली। श्री जयप्रकश जी, श्री सेठिया जी के बड़े पुत्र हैं, छोटे पुत्र का नाम श्री विनय प्रकाश सेठिया है और एक सुपुत्री सम्पतदेवी दूगड़ है। महाकवि श्री सेठिया जी का विवाह लाडनू के चोरड़िया परिवार में श्रीमती धापूदेवी के साथ सन् 1939 में हुआ। &lt;p align="justify"&gt;आपके परिवार में दादाश्री स्वनामधन्य स्व.रूपचन्द सेठिया का तेरापंथी ओसवाल समाज में बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान था। इनको श्रावकश्रेष्ठी के नाम से संबोधित किया जाता है। इनके सबसे छोटे सुपुत्र स्व.छगनमलजी सेठिया अपने स्व. पिताश्री की भांति अत्यन्त सरल-चरित्रनिष्ठ-धर्मानुरागी, दार्शनिक व्यक्तित्व के धनी थे। समाज सेवा में अग्रणी, आयुर्वेद का उनको विशेष ज्ञान था।&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_-_J_ggR3oI4/SRsQaXIY5EI/AAAAAAAAAX4/tR-aI3WQTJ4/s1600-h/Kanhaiyalal+Sethia10.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 220px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_-_J_ggR3oI4/SRsQaXIY5EI/AAAAAAAAAX4/tR-aI3WQTJ4/s400/Kanhaiyalal+Sethia10.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5267822234211771458" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;श्री सेठिया जी का परिवार 100 वर्षों से ज्यादा समय से बंगाल में है । पहले इनका परिवार 199/1 हरीसन रोड में रहा करता था । सन् 1973 से सेठियाजी का परिवार  भवानीपुर में 6, आशुतोष मुखर्जी रोड, कोलकात्ता-20 के प्रथम तल्ले में निवास कर रहा है। इनके पुत्र ( श्री सेठियाजी से पूछकर ) बताते हैं कि आप 11 वर्ष की आयु में सुजानगढ़ कस्बे से कलकत्ता में शिक्षा  ग्रहन हेतु आ गये थे। उन्होंने जैन स्वेताम्बर तेरापंथी स्कूल एवं माहेश्वरी विद्यालय में प्रारम्भिक शिक्षा ली, बाद में रिपन कॉलेज एवं विद्यासागर कॉलेज में शिक्षा ली। 1942 में द्वितीय विश्वयुद्ध के समय शिक्षा अधूरी छोड़कर पुनः राजस्थान चले गये, वहाँ से आप कराची चले गये। इस बीच हमलोग उनके साहित्य का अवलोकन करने में लग गये। सेठिया जी और सदारमल जी आपस में मन की बातें करने में मसगूल थे, मानो दो दोस्त कई वर्षों बाद मिले हों । दोनों अपने मन की बात एक दूसरे से आदान-प्रदान करने में इतने व्यस्त हो गये कि, हमने उनके इस स्नेह को कैमरे में कैद करना ही उचित समझा। जयप्रकाश जी ने तब तक उनकी बहुत सारी सामग्री मेरे सामने रख दी, मैंने उन्हें कहा कि ये सब सामग्री तो राजस्थान की अमानत है, हमें चाहिये कि श्री सेठिया जी का एक संग्राहलय बनाकर इसे सुरक्षित कर दिया जाए, &lt;strong&gt;बोलने लगे - ‘म्हाणे कांइ आपत्ती है’ &lt;/strong&gt; मेरा समाज के सभी वर्गों से, सरकार से निवेदन है कि श्री सेठियाजी की समस्त सामग्री का एक संग्राहल बना दिया जाना चाहिये, ताकि हमारी आनेवाली पीढ़ी उसे देख सके, कि कौन था वह शख्स जिसने करोड़ों दिलों की धड़कनों में अपना राज जमा लिया था।&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="#novtop"&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#330000"  size=3 &gt;ऊपर जाएं&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;किसने ‘धरती धौरां री...’ एवं अमर लोक गीत  ‘पातल और पीथल’  की रचना की थी! &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;कुछ देर बाद श्री सेठिया जी को बिस्तर से उठाकर बैठाया गया, तो उनका ध्यान मेरी तरफ मुखातिफ हुआ, मैंने उनको पुनः अपना परिचय बताने का प्रयास किया, कि शायद उनको याद आ जाय, याद दिलाने के लिये कहा - शम्भु! - मारवाड़ी देस का परदेस वालो - शम्भु....! बोलने लगे... ना... अब तने लोग मेरे नाम से जानगा- बोले... असम की पत्रिका म वो लेख तूं लिखो थो के?, मेरे बारे में...ओ वो शम्भु है....तूं.. अपना हाथ मेरे माथे पर रख के अपने पास बैठा लिये। बोलने लगे ... तेरो वो लेख बहुत चोखो थो। वो राजु खेमको तो पागल हो राखो है। मुझे ऐसा लग रहा था मानो सरस्वती बोल रही हो। शब्दों में वह स्नेह, इस पडाव पर भी इतनी बातें याद रखना, आश्चर्य सा लगता है। फिर अपनी बात बताने लगे- ‘आकाश गंगा’  तो सुबह 6 बजे लिखण लाग्यो... जो दिन का बारह बजे समाप्त कर दी। हम तो बस उनसे सुनते रहना चाहते थे, वाणी में सरस्वती का विराजना साक्षात् देखा जा सकता था। मुझे बार-बार एहसास हो रहा था कि यह एक मंदिर बन चुका है श्री सेठियाजी का घर। यह तो कोलकाता वासी समाज के लिये सुलभ सुयोग है, आपके साक्षात् दर्शन का, घर के ठीक सामने 100 गज की दूरी पर सामने वाले रास्ते में नेताजी सुभाष का वह घर है जिसमें नेताजी रहा करते थे और ठीक दक्षिण में 300 गज की दूरी पर &lt;strong&gt;माँ काली&lt;/strong&gt; का दरबार लगा हो,  ऐसे स्थल में श्री सेठिया जी का वास करना महज एक संयोग भले ही हो, परन्तु इसे एक ऐतिहासिक घटना ही कहा जा सकता है। हमलोग आपस में ये बातें कर रहे थे, परन्तु श्री सेठियाजी इन बातों से बिलकुल अनजान बोलते हैं कि उनकी एक कविता ‘राजस्थान’ (हिन्दी में) जो कोलकाता में लिखी थी, यह कविता सर्वप्रथम ‘ओसवाल नवयुवक’ कलकत्ता में छपी थी, मानो मन में कितना गर्व था कि उनकी कविता उस समय &lt;strong&gt;‘ओसवाल नवयुवक’&lt;/strong&gt;  में छपी थी। एक पल मैं सोचने लगा मैं क्या सच में उसी कन्हैयालाल सेठिया के बगल में बैठा हूँ जिस पर हमारे समाज को ही नहीं, राजस्थान को ही नहीं, सारे हिन्दुस्थान को गर्व है।&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="#novtop"&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#330000"  size=3 &gt;ऊपर जाएं&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;मैंने सुना है, कि कवि का हृदय बहुत ही मार्मिक व सूक्ष्म होता है, कवि के भीतर प्रकाश से तेज जगमगता एक अलग संसार होता है, उसकी लेखनी ध्वनि से भी तेज रफ्तार से चलती है,  उसके विचारों में इतने पड़ाव होते हैं कि सहज ही कोई उसे नाप नहीं सकता, श्री सेठियाजी को देख ये सभी बातें स्वतः प्रमाणित हो जाती हैं। सच है&lt;strong&gt; जब बंगलावासी रवीन्द्र संगीत सुनकर झूम उठते हैं, तो राजस्थानी श्री कन्हैयालाल सेठिया के गीतों पर थिरक उठता है, मयूर की तरह अपने पंख फैला के नाचने लगता है। शायद ही कोई ऐसा राजस्थानी आपको मिल जाये कि जिसने श्री सेठिया जी की कविता को गाया या सुना न हो । इनके काव्यों में सबसे बड़ी खास बात यह है कि जहाँ एक तरफ राजस्थान की परंपरा, संस्कृति, ऐतिहासिक विरासत, सामाजिक चित्रण का अनुपम भंडार है, तो वीररस, श्रृंगाररस का अनूठा संगम भी जो असाधारण काव्यों में ही देखने को मिलता है।&lt;/strong&gt; बल्कि नहीं के बराबर ही कहा जा सकता है। हमारे देश में दरबारी काव्यों की रचना की लम्बी सूची पाई जा सकती है, परन्तु,  बाबा नागार्जुन, महादेवी वर्मा, सुभद्रा कुमारी चौहान, निराला, हरिवंशराय बच्चन, भूपेन हजारिका जैसे गीतकार हमें कम ही देखने को मिलते हैं। श्री सेठिया जी के काव्यों में हमेशा नयापन देखने को मिलता है, जो बात अन्य किसी में भी नहीं पाई जाती, कहीं कोई बात तो जरूर है, जो उनके काव्यों में हमेशा नयापन बनाये रखने में सक्षम है। इनके गीतों में लय, मात्राओं का जितना पुट है, उतना ही इनके काव्यों में सिर्फ भावों का ही नहीं, आकांक्षाओं और कल्पनाओं की अभिनव अभिव्यक्ति के साथ-साथ समूची संस्कृति का प्रतिबिंब हमें देखने को मिलता है। लगता है कि राजस्थान का सिर गौरव से ऊँचा हो गया हो। इनके गीतों से हर राजस्थानी इठलाने लगता हैं। देश-विदेश के कई प्रसिद्ध संगीतकारों-गीतकारों ने, रवींद्र जैन से लेकर राजेन्द्र जैन तक, सभी ने इनके गीतों को अपने स्वरों में पिरोया है।&lt;br /&gt;‘समाज विकास’ का यह अंक यह प्रयास करेगा कि हम समाज की इस अमानत को सुरक्षित रख पाएं । श्री कन्हैयालाल सेठिया न सिर्फ राजस्थान की धरोहर हैं बल्कि राष्ट्र की भी धरोहर हैं। समाज विकास के माध्यम से हम राजस्थान सरकार से यह निवेदन करना चाहेगें कि श्री सेठियाजी को इनके जीवनकाल तक न सिर्फ राजकीय सम्मान मिले,  इनके समस्त प्रकाशित साहित्य, पाण्डुलिपियों व अन्य दस्तावेजों को सुरक्षित करने हेतु उचित प्रबन्ध भी करें। स&lt;br /&gt;&lt;p align="right"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;- शम्भु चौधरी&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;hr&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="#novtop"&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#330000"  size=3 &gt;ऊपर जाएं&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;a name="#novKanhaiyalal"&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#FF0000"  size=5 &gt;स्मृति शेष: जद बन बिलावड़ो ले भाग्यो.... &lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#FF0000" size=3&gt;श्री सेठिया जी के काव्यों पर हिन्दी जगत के विचारों की एक झलक:&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;आपकी कविता तथा कला का मणि-कांचन संयोग मुझे बहुत पसन्द आया । ऐसे संयोजित रूप से अपनी भावनाओं तथा चिन्तन स्फुरणों को काव्याभिव्यक्ति देकर आपने रचना सौष्ठव का अत्यन्त सुन्दर उदाहरण प्रस्तुत किया है। आपकी रचनाओं को पढ़कर स्वतः ही लगता है कि कविता इस युग में मरी नहीं है बल्कि और भी गहन गंभीर होकर जीवन के निकट आ गई है।&lt;strong&gt; - सुमित्रानन्दन पन्त&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;आप अन्तर्मुखी कलाकार हैं। अन्तर्जगत में प्रवेश कर वस्तुवादी जगत की जो व्याख्या करते हैं, उससे सत्य शतमुखी होकर उजागर होता है । छोटी-छोटी अभिव्यक्तियां मधु की वे बूंदे हैं जिनमें अनेक पुष्पों के पराग की सुगन्ध समाहित है। मैं अपनी श्रद्धा व्यक्त करता हूँ। &lt;strong&gt;- डॉ.रामकुमार वर्मा&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;प्रणाम- ‘प्रणाम’ पढ़ने बैठा, तो इसके गीत मुझे लिपट गये और तीन दिन की बैठकों में ही इसे पूरा पढ़ गया। आप चिन्तन के कलाकार हैं । चिन्तन को विवेचन। विश्लेषण का रूप देना आसान है, गंभीर बात गंभीर विधा पर उसे गीत का रूप देना और गीत में तितली की सी जो सकुमारता अनिवार्य है उसे बचाये रखना बहुत-बहुत मुष्किल है। आप इस मुश्किल काम में इतने सफल हुए है कि गीतकारों में मुझे कोई दूसरा नाम ही याद नहीं आ रहा है कि जिसने इस कार्य में, आपके समकालीन काव्य में ऐसी सफलता पाई हो । आपके चिन्तन की पृष्ठभूमि संस्कृति-धर्म-दर्शन है इससे आपकी सफलता का मूल्य और भी बढ़ गया है।&lt;br /&gt;मर्म- ‘मर्म’ मिला। एक-एक हीरा बार-बार देखा, परखा, पहचाना, माना । मेरा अभिवादन ।&lt;br /&gt;अनाम- रत्नकृति ‘अनाम’ मिली । आपने एक नई विधा की ही सृष्टि नहीं की। एक नया विधान भी साहित्य को दिया जिसके द्वारा आपके गीत भी अनुशासित हैं और दूसरी कृतियां भी। आप अमर कार्य कर रहे हैं।&lt;br /&gt;‘ताजमहल’- मिला, जैसे मजदूर को भला मालिक मजदूरी से निबटते ही शरबत पिला दे, वाह । &lt;br /&gt;&lt;strong&gt;- कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;प्रणाम- ‘प्रणाम’ की कविताएं मेरे मर्म पर बड़ी शक्ति से रेखापात कर गई ।&lt;br /&gt;खुली खिड़कियां चैड़े रास्ते- नयापन और काव्यत्व दोनो से समृद्ध है ।&lt;strong&gt; - कुबेरनाथ राय&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;प्रतिबिम्ब- ‘प्रतिबिम्ब’ के गीत पढ़कर हिन्दी के उज्जवल भविष्य की आशा बंधती है ।&lt;br /&gt;प्रणाम- ‘प्रणाम’ के सभी गीत उच्च कोटि के हैं । &lt;strong&gt;- रामधारीसिंह ‘दिनकर’&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;प्रतिबिम्ब-‘प्रतिबिम्ब’ आप के सुन्दर हृदय का प्रतिबिम्ब है। &lt;strong&gt;- मैथिलीशरण गुप्&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;मर्म- ‘मर्म’ गहरे में स्पर्ष करनेवाली कृति है । &lt;strong&gt;- जैनेन्द्रकुमार जैन&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;अनाम- चिन्तन का यह नया आयाम है । हम लोगों के लिये यह चिन्तन बोध का विशेष दिशा निर्देष है । बहुत कुछ नया प्रयोग किया है । &lt;strong&gt;- बालकवि बैरागी&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;तुमुल साहित्यिक कलह के कोलाहल में श्रद्धा की ऐसी सहज अभिव्यक्ति, ऐसी नपी-तुली भाषा, ऐसी तन्मयता, यह तो आश्चर्य की बात है । ‘प्रणाम’ के गीतों में सहज समर्पण का स्वर है । &lt;strong&gt;- विष्णुकांत शास्त्री&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;आपके लिखने में जो गहराई है, वह असामान्य है, विरल है। &lt;strong&gt;- भवानी प्रसाद मिश्र&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;कन्हैयालाल सेठिया का उर्दू काव्य ताजमहल के सौन्दर्य पर चमकता हुआ प्रदीप्त हीरा है । &lt;strong&gt;- अली सरदार जाफरी&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;महाकवि सेठिया शब्द ब्रह्म के साधक हैं ।&lt;strong&gt;- प्रो0 सिद्धेश्वर प्रसाद&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="#novtop"&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#330000"  size=3 &gt;ऊपर जाएं&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;hr&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#660000"  size=3&gt;&lt;u&gt;राजस्थान पत्रिका 12 नवम्बर,जयपुर संस्करण:&lt;/u&gt;&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#FF0000"  size=6 &gt;'शान्त हुई अग्निवीण'&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;राजस्थान पत्रिका ने लिखा कि महात्मा गांधी द्वारा 1942 में 'करो और मरो'के आह्वान पर जगी कन्हैयालाल सेठिया की 'अग्निवीणा' मंगलवार को शान्त हुई तो राजस्थानी साहित्य जगत शोक सागर में डूब गया। जब कन्हैयालाल की राष्ट्रभक्ति से परिपूर्ण कालजयी कृति 'अग्निवीणा' प्रकाशित हुई तो बीकानेर राज्य ने इन पर राजद्रोह का मुकदमा चलाया। उन्हैं जेल जाना पड़ा। माउण्ड आबू के राजस्थान विलय में भी उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वे स्वतंत्रा आंदोलन के योद्धा भी थे।&lt;br /&gt;&lt;hr&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#660000"  size=3&gt;&lt;u&gt;दैनिक भास्कर 12 नवम्बर,जयपुर संस्करण:&lt;/u&gt;&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_-_J_ggR3oI4/SR5oUl6eq8I/AAAAAAAAAZo/tMtY1VLE2sA/s1600-h/klsethianews4.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 239px; height: 400px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_-_J_ggR3oI4/SR5oUl6eq8I/AAAAAAAAAZo/tMtY1VLE2sA/s400/klsethianews4.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5268763317054122946" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;दैनिक भास्कर, जयपुर ने बुधवार 2008 के एक पेज के स्मृति शेष: कन्हैयालाल सेठिय जी पर विशेष अंक निकाला, इसमें लिखा है कि ' &lt;strong&gt;'धरती धोरां री' और 'अरै घास री रोटी'  जैसे अमर गीतों को रचकर राजस्थान को एक नई पहचान और गरिमा दिलाने वाले कवि कन्हैयालाला सेठिया नहीं रहे। वे राजस्थान ही नहीं बल्कि देश के इने-गिने कवियों में थे, जिनकी रचना 'धरती धोरां री' को तो इतना सम्मान प्राप्त हुआ कि वह राजस्थान ही नहीं बल्कि विश्वभर के राजस्थानी भाषा प्रेमियों के लिए प्राणगीत के समान बन गई है। उनका काव्य केवल हिंदी व राजस्थानी तक ही सीमित नहीं था उर्दू भाषा पर भी उनका अधिकार चमकृत करने वाला था।" &lt;/strong&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="#novtop"&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#330000"  size=3 &gt;ऊपर जाएं&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;font color="#FF0000" size=5&gt;&lt;strong&gt;श्री श्यामजी आचार्य ने राजस्थान से लिखा:&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;p align="justify"&gt;प्रयाग में हिन्दी साहित्य सम्मेलन के हीरक जयंती समारोह में कन्हैयालाल सेठिया ने हिन्दी भाषा-भाषियों के भूखंड में एक सांस्कृतिक महासंघ की कल्पना की थी। उन्होंने कहा था कि &lt;strong&gt; "हिन्दी के विशाल वट-वृ्क्ष की शाखाएं सुदूर देशों में भी पल्लवित-पुष्पित और फलित हो रही हैं। वह दिन दूर नहीं जब विश्व के हिन्दी भाषा-भाषी भूखण्ड एक सांस्कृतिक महासंघ के रूप में गठित होकर अपने वर्चस्व को प्रतीति विश्व को करा सकेंगे।" &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;उन्होंने इसी हीरक जयंती समारोह में हिन्दी लेखन के बारे में कहा था- &lt;strong&gt; 'हिन्दी के अधिकांश लेखक शाश्वत  सत्य की अन्वेषक ऋषि-प्रज्ञा की उपेक्षा कर पश्चिम का अंधानुकरण कर रहे हैं। सतत विकाशशील चेतना को वादों के नागपाश में आबद्ध करने का जो विश्व-व्यापी षड्यंत्र चल रहा है उससे हम हिन्दी के लेखकों को बचाएं और समग्र सत्य के प्रति ही हमारा लेखन प्रतिबद्ध रहे, यही हिन्दी की अस्मिता और समृद्धि के लिए श्रेय है। केवल परिस्थितियों से जुड़ा हुआ साहित्य कालक्रम में मात्र घटना बनकर रह जाता है और वह जीवंत मूल्यों से कट जाता है।'&lt;/strong&gt; उनका सृजन आत्म-दर्शन करने वाला और पाठक को भी भीतर क्षांकने की प्रवृत्ति पैदा करने वाला था। &lt;strong&gt;'सृजन' &lt;/strong&gt;शीर्षक से अनकी कविता पढ़िए - &lt;p align="center"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;center&gt;&lt;i&gt;&lt;br /&gt;मुझे है शब्द की प्रतिष्ठा का ध्यान,&lt;br /&gt;वही जहां जिसका स्थान&lt;br /&gt;अनुशासित मेरे भावाकुल छन्द,&lt;br /&gt;उनमें परस्पपर रक्त का संबंध,&lt;br /&gt;नहीं सृजन मेरे लिए व्यसन,&lt;br /&gt;वह संजीवन प्राण का स्पन्दन।&lt;br /&gt;&lt;/i&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/center&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;उनकी कविताओं में मानव-मात्र के लिये अगाध स्नेह, प्यार और संवेदना का स्पंदन था। अनकी कविता 'सबसे मेरी प्रेम सगाई" पढ़िए-&lt;p align="center"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;center&gt;&lt;i&gt;&lt;br /&gt;मेरा है संबंध सभी से&lt;br /&gt;सबसे मेरी स्नेह सगाई। &lt;br /&gt;मैं अखण्ड हूं, खंडित होना&lt;br /&gt;मेरे मन को नहीं सुहाता&lt;br /&gt;पक्ष विपक्ष करूं मैं किसका&lt;br /&gt;मैं निष्पक्ष सभी से नाता&lt;br /&gt;मेरे सन्मुख सभी बराबर&lt;br /&gt;राजा, रंक, हिमालय, राई।।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सबके कुशलक्षेम का इच्छुक&lt;br /&gt;सब में सत है, मुझे प्रतिष्ठा&lt;br /&gt;सब ही मेरे सखा बंधु हैं&lt;br /&gt;मैं सबके मन की परछाई।।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सबकी पद-रज चंदन मुझको&lt;br /&gt;सबके सांस सुरभिमय कुंकुम&lt;br /&gt;सबका मंगल मेरा मंगल&lt;br /&gt;गाता मेरी प्राण विहंगम&lt;br /&gt;जीवन का श्रम ताप हरे, यह&lt;br /&gt;मेरे गीतों की अमराई&lt;br /&gt;सबसे मेरी प्रेम सगाई।&lt;br /&gt;&lt;/i&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/center&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;राजस्थानी, हिन्दी, उर्दू और संस्कृत में मानवीय संवेदनाओं को अभिव्यक्त करने वाले दार्शनिक कवि सेठिया की स्मृतियां राजस्था की धरा को उनके गीतों से गुंजाती रहेगी। चाहे वह 'धरती धोरां री' या 'अरे घास की रोटी'  हो या कि 'कुण जमीन को धणी' ये गीत ही इस प्रदेश की प्रेरक शक्ति बन गए हैं।  &lt;small&gt;साभार:  दैनिक भास्कर, राजस्थान: 12 नवम्बर 2008&lt;/small&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="#novtop"&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#330000"  size=3 &gt;ऊपर जाएं&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;font color="#FF0000" size=5&gt;&lt;strong&gt;समाचार पत्रों की नजर में&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="center"&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_-_J_ggR3oI4/SR5bjbrjNrI/AAAAAAAAAZY/-Se6-nL_9oU/s1600-h/klsethianews2.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 330px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_-_J_ggR3oI4/SR5bjbrjNrI/AAAAAAAAAZY/-Se6-nL_9oU/s400/klsethianews2.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5268749278354028210" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;table&gt;&lt;tr&gt;&lt;td&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_-_J_ggR3oI4/SR59WPuQzZI/AAAAAAAAAZw/vSjEqWQMAXA/s1600-h/klsethianews5.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 300px; height: 397px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_-_J_ggR3oI4/SR59WPuQzZI/AAAAAAAAAZw/vSjEqWQMAXA/s400/klsethianews5.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5268786435201224082" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;/td&gt;&lt;td&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_-_J_ggR3oI4/SR5bMjCOfRI/AAAAAAAAAZQ/pT-bv3sUDdg/s1600-h/klsethianews.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 300px; height: 400px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_-_J_ggR3oI4/SR5bMjCOfRI/AAAAAAAAAZQ/pT-bv3sUDdg/s400/klsethianews.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5268748885191195922" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;tr&gt;&lt;td&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_-_J_ggR3oI4/SSY5uZfzj9I/AAAAAAAAAbY/3v1ohEupvtI/s1600-h/kanhiyalalsetia2.jpg"&gt;&lt;img style="cursor:pointer; cursor:hand;width: 150px; height: 319px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_-_J_ggR3oI4/SSY5uZfzj9I/AAAAAAAAAbY/3v1ohEupvtI/s400/kanhiyalalsetia2.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5270963883164798930" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br&gt;दैनिक पूर्वोदय,असम&lt;/br&gt;&lt;br /&gt;&lt;/td&gt;&lt;td&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_-_J_ggR3oI4/SSY5uVooUxI/AAAAAAAAAbg/EvStk6WfqXE/s1600-h/kanhiyalalsetia.jpg"&gt;&lt;img style="cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 252px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_-_J_ggR3oI4/SSY5uVooUxI/AAAAAAAAAbg/EvStk6WfqXE/s400/kanhiyalalsetia.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5270963882128069394" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br&gt;पूर्वांचल प्रहरी, असम&lt;/br&gt;&lt;/td&gt;&lt;br /&gt;&lt;/tr&gt;&lt;/table&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;hr&gt;&lt;br /&gt;&lt;font color="#FF0000" size=5&gt;&lt;strong&gt;पूर्व उपराष्ट्रपति भैरोसिंह शेखावत:&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;पूर्व उपराष्ट्रपति भैरोसिंह शेखावत ने स्व. सेठिया के निधन पर शोक व्यक्त करते हुए फैक्स संदेश में कहा कि - &lt;strong&gt;" साहित्य मनीषी कन्हेयालाल सेठिया के निधन का समाचार पाकर मैं स्तब्ध रह गया। उन्होंने अपनी कालजयी रचनओं से राजस्थानी साहित्य, कला व  संस्कृति की जो सेवा की है, वह सदैव स्मरण की जायेगी। उन्होंने अपनी काव्य रचना "धरती धोरां री...." के जरिये राजस्थान  की समृद्धि व सांस्कृतिक पहचान पूरे देश व विदेश में पहुंचाई। उनके निधन से पूरे राजस्थान व साहित्य जगत की ऐसी क्षति हुई है जिसकी पूर्ति करना असंभव है। सेठियाजी के साथ मेरे वर्षों से व्यक्तिगत संबंध थे। राजस्थानी भाषा को मान्यता दिलवाने के प्रश्न को लेकर वे कई बार मुझसे मिले और ये उनके प्रास का ही फ़ल था कि राजस्थानी भाषा को मान्यता दिलवाने का संकल्प विधानसभा में 2003 में पारित किया गया।"&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;hr&gt;&lt;br /&gt;&lt;font color="#FF0000" size=5&gt;&lt;strong&gt;वरिष्ठ साहित्यकार श्री कृष्ण बिहारी मिश्र&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;हिन्दी जगत के वरिष्ठ साहित्यकार श्री कृष्ण बिहारी मिश्र ने कहा कि-&lt;strong&gt; " कवि सेठिया राजस्थानी के सर्वश्रेष्ठ कवि के रूप में सम्मानित थे। राजस्थानी भाषा को उन्होंने आजीवन प्रतिष्ठा दिलाने का प्रयास करते रहे। पिछले कुछ दिनों से वयजनित निष्क्रियता उनमें आ गयी थी। अपनी साहित्य साधना से उन्होंने लोक यात्रा की कृतार्थरा आयोजित की। किसी भी व्यक्ति के लिये यह बड़ी उपलब्धी है। &lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;hr&gt;&lt;br /&gt;&lt;font color="#FF0000" size=5&gt;&lt;strong&gt;मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे &lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जयपुर, 11 नवम्बर। मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे ने राजस्थानी भाषा के यशस्वी कवि एवं साहित्यकार श्री कन्हैयालाल सेठिया के निधन पर गहरा शोक व्यक्त किया है।&lt;br /&gt;श्रीमती राजे ने अपने शोक संदेश में कहा कि &lt;strong&gt;" श्री सेठिया ने मायड़ भाषा एवं राजस्थानी साहित्य के क्षेत्र में जीवनपर्यंत अमूल्य योगदान दिया। मुख्यमंत्री ने कहा कि राजस्थानी गीत " धरती धोरां री" उनकी अमर रचना है, जिसके बोल जन-जन के मन में प्रदेश के गौरव एवं स्वाभिमान को जगाता है। मुख्यमंत्री ने ईश्वर से दिवगंत आत्मा की शान्ति एवं शोक संतप्त परिजनों को यह आघात सहन करने की शक्ति देने की प्रार्थना की है।"&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;hr&gt;&lt;br /&gt;&lt;font color="#FF0000" size=5&gt;&lt;strong&gt;श्री सीताराम महर्षि ने गहरा शोक प्रकट करते हुए कहा कि:&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी, बीकानेर के अध्यक्ष श्री सीताराम महर्षि ने गहरा शोक प्रकट करते हुए कहा कि सेठिया का निधन राजस्थानी भाषा के लिए एक अपूरणीय क्षति है। वे राजस्थानी साहित्यकारों के आदर्श थे तथा राजस्थानी भाषा की मान्यता के लिए सदैव अग्रपंक्ति में खड़े रहे और अनेक कविताओं के द्वारा राजस्थानी के महत्त्व को प्रतिपादित किया।&lt;br /&gt;&lt;a href="#novtop"&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#330000"  size=3 &gt;ऊपर जाएं&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;hr&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;[Script code:  Kanhaiyalal Sethia  कन्हैयालाल सेठिया]&lt;br /&gt;&lt;a name="#novlast"&gt;&lt;FONT color="#FF0000"  size=2 &gt; कृपया नीचे दिये लिंक में अपनी समीक्षा पोस्ट करें।&lt;/a&gt;&lt;/font&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित!&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8753024558307711180-6261896289959614264?l=kathavyatha.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kathavyatha.blogspot.com/feeds/6261896289959614264/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://kathavyatha.blogspot.com/2008/11/kanhaiyalal-sethia.html#comment-form' title='15 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8753024558307711180/posts/default/6261896289959614264'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8753024558307711180/posts/default/6261896289959614264'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kathavyatha.blogspot.com/2008/11/kanhaiyalal-sethia.html' title='Kanhaiyalal Sethia'/><author><name>Shambhu Choudhary"Iac"</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03776713428128546589</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-bM0lY3JA5GU/Te8lUG5KtcI/AAAAAAAAAtM/R5w2g954Y6M/s220/shambhu_choudhary.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_-_J_ggR3oI4/SRrxNY5MPEI/AAAAAAAAAWo/SQ9iCwYSQ1k/s72-c/Kanhaiyalal-Sethia.png' height='72' width='72'/><thr:total>15</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8753024558307711180.post-4753696392771979110</id><published>2008-10-09T09:18:00.000-07:00</published><updated>2008-12-12T00:25:50.577-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कथा-व्यथा'/><title type='text'>कथा-व्यथा  :: अक्टूबर 2008</title><content type='html'>&lt;a name="#octtop"&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#330000"  size=5 &gt;क्रमांक:&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;table width=100% valign="top" align="top" border=3 bordercolor="#E87C0F"&gt;&lt;tr&gt;&lt;td width=30% valign="top" align="top"&gt;&lt;br /&gt;&lt;ul&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;&lt;a href="#editoriayal"&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#330000"  size=4 &gt; संपादकीय&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;&lt;a href="#oct08patrika"&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#330000"  size=4 &gt;पत्र-पत्रिका प्राप्ती समाचार&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;&lt;a href="#oct08parichay"&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#FF0000"  size=4 &gt;परिचय: डॉ. महेंद्र भटनागर का&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt; &lt;br /&gt;&lt;li&gt;&lt;a href="#oct08Samicha"&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#660000"  size=4 &gt;समीक्षा: ज्योति प्रभा &lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;&lt;a href="#oct08kahani"&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#FF0000"  size=4&gt; दो कहानीयाँ&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="#oct08kahani1"&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#330000"  size=3 &gt;1. आजादी की कीमतः देवी नागरानी&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="#oct08kahani2"&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#330000"  size=3 &gt;2. परित्यक्ता  - कुसुम सिन्हा&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;&lt;a href="#oct08gandhi"&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#330000"  size=4 &gt;आज भी प्रासंगिक हैं महात्मा गाँधी के विचार&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;br&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#FF0000"  size=4 &gt;लघुकथा&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="#oct08laghukahani"&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#660000"  size=3 &gt;नहीं........ - शम्भु चौधरी&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;/il&gt;&lt;/ul&gt;&lt;br /&gt;&lt;/td&gt;&lt;td width=40% valign="top" align="top"&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_-_J_ggR3oI4/SPS5SgcWCrI/AAAAAAAAATQ/NaZXPSRF1ac/s1600-h/katha-vyathaCover.jpg"&gt;&lt;img style="cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://3.bp.blogspot.com/_-_J_ggR3oI4/SPS5SgcWCrI/AAAAAAAAATQ/NaZXPSRF1ac/s400/katha-vyathaCover.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5257030392645814962" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br&gt;&lt;br /&gt;&lt;marquee&gt;&lt;a href="#octend"&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#FF0000"  size=4 &gt;कथा-व्यथा का अगला अंक कुछ व्यवधान होने के चलते समय पर नहीं आ सकेगा- संपादक&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;/font&gt;&lt;/marquee&gt;&lt;br /&gt;&lt;/td&gt;&lt;br /&gt;&lt;td width=30% valign="top" align="top"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#FF0000"  size=4 &gt;कविताएँ&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;ul&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;&lt;a href="#oct08poem1"&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#660000"  size=3 &gt;1.  देवमणि पांडेय&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;&lt;a href="#oct08poem2"&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#660000"  size=3 &gt;2.  निशा भोसले&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;&lt;a href="#oct08poem3"&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#660000"  size=3 &gt;3.  सुनिल कुमार 'सोनु&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;&lt;a href="#oct08poem4"&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#660000"  size=3 &gt;4.  पवन  भट्ट&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;&lt;a href="#oct08poem5"&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#660000"  size=3 &gt;5.  महेश कुमार वर्मा&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;&lt;a href="#oct08poem6"&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#660000"  size=3 &gt;6.  अखिलेश सोनी&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;&lt;a href="#oct08poem7"&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#660000"  size=3 &gt;7.  देवेन्द्र कुमार मिश्रा&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;&lt;a href="#oct08poem8"&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#660000"  size=3 &gt;8. प्रकाश यादव "निर्भीक"&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;&lt;a href="#oct08poem9"&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#660000"  size=3&gt;9.  राजीव तनेजा&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;&lt;a href="#oct08poem10"&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#660000"  size=3 &gt;10. दिव्या माथुर&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;&lt;a href="#oct08poem11"&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#660000"  size=3 &gt;11. सीमा गुप्ता &lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;&lt;a href="#oct08poem12"&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#660000"  size=3 &gt;12. डॉ. परमजीत ओबेरॉय&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;&lt;a href="#oct08poem13"&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#660000"  size=3 &gt;13. दीप्ति गुप्ता&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;&lt;a href="#oct08poem14"&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#660000"  size=3 &gt;14. आकांक्षा यादव&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;&lt;a href="#oct08poem15"&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#660000"  size=3 &gt;15. पवन निशांत &lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;&lt;a href="#octend"&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#FF0000"  size=5 &gt;16. आपका मंच&lt;/a&gt;&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;/li&gt;&lt;/ul&gt;&lt;br /&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;/table&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;hr color="#FF0000" size=5&gt;&lt;br /&gt;&lt;a name="#editoriayal"&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#330000"  size=4 &gt; संपादकीय:&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_-_J_ggR3oI4/SPyymfQ3cII/AAAAAAAAATo/Vzk2mgFZccI/s1600-h/shambhu_choudhary2.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://3.bp.blogspot.com/_-_J_ggR3oI4/SPyymfQ3cII/AAAAAAAAATo/Vzk2mgFZccI/s320/shambhu_choudhary2.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5259274839158911106" /&gt;&lt;/a&gt;कथा-व्यथा का तीसरा अंक हम जारी कर रहें है। हमारी टीम में नित्य नये सदस्य जुड़ते जा रहें हैं। सिंगापुर से श्रद्धा जैन तो पटना से महेश कुमार वर्मा हमारे टीम के दो नये सदस्यों से मुझे काफी सहयोग मिला। पिछले माह हमने कवियों के लिये अलग मंच बनाने का प्रयोग किया, उसकी सफलता को देखते हुऐ इस माह से हमने 'कवि मंच' का श्रीगणेश भी कर दिया है। एक सप्ताह से भी कम समय में हमारे पास जो मेल आये उसे 24 घंटे के भीतर ही 'कवि मंच' पर स्थान दे दिया गया। कथा-व्यथा और कवि मंच के पन्ने को तकनीकी कारणों से साधारण पृष्ठ रखा गया है। फोटो का प्रयोग जरूरत को देखते हुए ही किया गया है। कारण स्पष्ट है कि हम चाहते हैं कि हमारे पेज को खोलते समय आपको अधिक इंतजार न करना पड़े। कुछ लोगों ने सुझाव दिया कि इस ई-पत्रिका का अपना 'डोनेम' होना चाहिये। आपको हम बता दें कि हमारी टीम पूर्ण रूप से इस बात से सहमत नहीं हैं। यह नहीं कि हमें इस बात की पूरी जानकारी नहीं है। हमें इस बात की तकनीकी जानकारी होते हुये भी हम चाहते हैं कि  ब्लॉग के माध्यम से ही इस ई-पत्रिका का संचालन किया जाय ताकी साहित्य को हम अधिक सरल बना सके। इस ई-पत्रिका का उद्देश्य साहित्य की दुकान नहीं सजानी है, हमें साहित्य की सेवा करनी है। हम सभी साहित्यकारों को एक ही नज़र से देखते हैं। कथा-व्यथा को विश्वविद्यालय की पत्रिका नहीं बनाना चाह्ते, हम चाहते हैं कि तुतली जबान तक यह पत्रिका पहुंचे। हम तारे को जमीं से उठा कर आसमान पर लगाना चाहतें हैं, न कि आसमान के तारे को जमीं पर। इस ई-पत्रिका को जन-जन तक हम आप सब के सहयोग से ही पहुंचा सकते हें। अन्त में हम इतना ही कह सकते हैं कि कम समय में हमें जो सफलता मिली है। उसके लिये आप सभी बधाई के पात्र हैं। दीपावली की शुभकामना इस संदेश के साथ:&lt;p align="center"&gt; &lt;strong&gt;जलते हुए दीये से एक संदेश तो लेना ही होगा,&lt;br&gt;अंधेरे को मिटाने के लिये, किसी को तो जलना ही होगा।&lt;p align="right"&gt;शम्भु चौधरी&lt;/p&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;ul&gt;&lt;li&gt;&lt;a href="http://kavimanch.blogspot.com/" target="new"&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#660000"  size=3 &gt;http://kavimanch.blogspot.com/&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;li&gt;&lt;a href="http://ehindisahitya.blogspot.com/" target="new"&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#660000"  size=3 &gt;http://ehindisahitya.blogspot.com/&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;li&gt;&lt;a href="http://kathavyatha.blogspot.com/" target="new"&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#660000"  size=3 &gt;http://kathavyatha.blogspot.com/&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://kathavyatha.blogspot.com/2008/08/2008_09.html"  target="new"&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#660000"  size=3 &gt;कथा-व्यथा का पिछला अंक-1&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &lt;a href="http://kathavyatha.blogspot.com/2008/09/september-on-work.html" target="new"&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#660000"  size=3 &gt;कथा-व्यथा का पिछला अंक-2&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;&lt;a href="mailto:kathavyatha@gmail.com?subject=Th:Oct-2008"&gt;&lt;br /&gt;Email: kathavyatha@gmail.com&lt;/a&gt;&lt;/li&gt;&lt;/ul&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="mailto:kathavyatha@gmail.com?subject=Th:Oct-2008"&gt;&lt;br /&gt;Email: kathavyatha@gmail.com&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;Our Poastal Address:&lt;br&gt; FD-453/2, Salt Lake City, Kolkata- 700106. Phone No&gt; 0-9831082737&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;hr color="#FF0000" size=5&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="center"&gt;&lt;br /&gt;&lt;a name="#oct08parichay"&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#FF0000"  size=5 &gt;&lt;u&gt;एक परिचय: डॉ.महेंद्र भटनागर &lt;/u&gt;&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt; &lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_-_J_ggR3oI4/SOx_rRnnXMI/AAAAAAAAAO8/To0xImlsWzM/s1600-h/Mahendra_bhatnagar.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://3.bp.blogspot.com/_-_J_ggR3oI4/SOx_rRnnXMI/AAAAAAAAAO8/To0xImlsWzM/s200/Mahendra_bhatnagar.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5254715246675188930" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;डॉ.महेंद्र भटनागर &lt;br /&gt;एम.ए., पी-एच. डी. (हिंदी)&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;p aling="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;जन्म:&lt;/strong&gt; आपका जन्म २६ जून १९२६ को प्रातः ६ बजे झाँसी (उ. प्र.) में, ननसार में हुआ। &lt;br /&gt;द्वि-भाषिक कवि — हिन्दी और अंग्रेज़ी। सन् १९४१ के लगभग अंत से काव्य-रचना आरम्भ। तब कवि (पन्द्रह वर्षीय) 'विक्टोरिया कॉलेज, ग्वालियर' में इंटरमीडिएट (प्रथम वर्ष) के छात्र थे, सम्भवतः  प्रथम कविता 'सुख-दुख' है; जो वार्षिक पत्रिका &lt;strong&gt;'विक्टोरिया कॉलेज मेगज़ीन'&lt;/strong&gt; के किसी अंक में छपी थी। वस्तुतः प्रथम प्रकाशित कविता 'हुंकार' है; जो 'विशाल भारत' (कलकत्ता) के मार्च १९४४ के अंक में भी पुनः प्रकाशित हुई। लगभग छह वर्ष की काव्य-रचना का परिप्रेक्ष्य स्वतंत्रता-पूर्व भारत; शेष स्वातंत्र्योत्तर। &lt;br /&gt;आप हिन्दी की तत्कालीन तीनों काव्य-धाराओं से सम्पृक्त — राष्ट्रीय काव्य-धारा, उत्तर छायावादी गीति-काव्य, प्रगतिवादी कविता और समाजार्थिक-राष्ट्रीय-राजनीतिक चेतना-सम्पन्न रचनाकार हैं। सन् १९४६ से आप प्रगतिवादी काव्यान्दोलन से सक्रिय रूप से सम्बद्ध रहें हैं। &lt;br /&gt;&lt;strong&gt;कविताओं का प्रकाशन&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;'हंस' (बनारस / इलाहाबाद) में कविताओं का प्रकाशन। तदुपरान्त अन्य जनवादी-वाम पत्रिकाओं में भी। प्रगतिशील हिन्दी कविता के द्वितीय उत्थान के चर्चित हस्ताक्षर। सन् १९४९ से काव्य-कृतियों का क्रमशः प्रकाशन। &lt;br /&gt;आप प्रगतिशील मानवतावादी कवि के रूप में प्रतिष्ठित हैं। आपके काव्यों में समाजार्थिक यथार्थ के अतिरिक्त अन्य प्रमुख काव्य-विषय — प्रेम, प्रकृति, जीवन-दर्शन तो होते ही हैं।साथ ही आप दर्द की गहन अनुभूतियों के समान्तर जीवन और जगत के प्रति आस्थावान कवि भी हैं। अदम्य जिजीविषा एवं आशा-विश्वास के अद्भुत-अकम्प स्वरों के सर्जक। काव्य-शिल्प के प्रति विशेष रूप से जागरूक। छंदबद्ध और मुक्त-छंद दोनों में काव्य-सॄष्टि। छंद-मुक्त गद्यात्मक कविता अत्यल्प। मुक्त-छंद की रचनाएँ भी मात्रिक छंदों से अनुशासित। काव्य-भाषा में तत्सम शब्दों के अतिरिक्त तद्भव व देशज शब्दों एवं अरबी-फ़ारसी (उर्दू), अंग्रेज़ी आदि के प्रचलित शब्दों का प्रचुर प्रयोग। सर्वत्र प्रांजल अभिव्यक्ति। लक्षणा-व्यंजना भी दुरूह नहीं। सहज काव्य के पुरस्कर्ता। सीमित प्रसंग-गर्भत्व। विचारों-भावों को प्रधानता। कविता की अन्तर्वस्तु के प्रति सजग। &lt;br /&gt;आपकी प्रारम्भिक शिक्षा झाँसी, मुरार (ग्वालियर), सबलगढ़ (मुरैना) में हुई। आपने  शासकीय विद्यालय, मुरार (ग्वालियर) से मैट्रिक (सन् १९४१), विक्टोरिया कॉलेज, ग्वालियर (सत्र ४१-४२) और माधव महाविद्यालय, उज्जैन (सत्र् ४२-४३) से इंटरमीडिएट (सन् १९४३), विक्टोरिया कॉलेज, ग्वालियर से बी. ए. (सन् १९४५), नागपुर विश्वविद्यालय से सन् १९४८ में एम. ए. (हिन्दी) और सन्१९५७ में 'समस्यामूलक उपन्यासकार प्रेमचंद' विषय पर पी-एच. डी. की।&lt;br /&gt;आप जुलाई १९४५ से अध्यापन-कार्य — उज्जैन, देवास, धार, दतिया, इंदौर, ग्वालियर, महू, मंदसौर में करते रहे। आपने &lt;strong&gt;'कमलाराजा कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय,&lt;/strong&gt; ग्वालियर (जीवाजी विश्वविद्यालय, ग्वालियर) से १ जुलाई १९८४ को प्रोफ़ेसर-अध्यक्ष पद से सेवानिवृत्त ली। &lt;br /&gt;&lt;strong&gt;कार्यक्षेत्र:&lt;/strong&gt; चम्बल-अंचल, मालवा, बुंदेलखंड। &lt;br /&gt;&lt;strong&gt;सम्प्रति शोध-निर्देशक&lt;/strong&gt; - हिन्दी भाषा एवं साहित्य। आपके अधिकांश साहित्य &lt;strong&gt;'महेंद्रभटनागर-समग्र'&lt;/strong&gt; के छह-खंडों में एवं काव्य-सृष्टि&lt;strong&gt; 'महेंद्रभटनागर की कविता-गंगा'&lt;/strong&gt; के तीन खंडों में प्रकाशित हुऐ हैं। &lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;table width=100% valign="top" align="top" border=2 bordercolor="#1E37F3"&gt;&lt;tr&gt;&lt;td width=50% valign="top" align="top"&gt;&lt;br /&gt;&lt;ul&gt;&lt;li&gt;&lt;strong&gt;'महेंद्रभटनागर की कविता-गंगा'&lt;/strong&gt; &lt;br /&gt;[खंड: 1]  तारों के गीत, विहान,  अन्तराल, अभियान, बदलता युग, टूटती शृंखलाएँ ।&lt;br /&gt;[खंड: 2] नयी चेतना, मधुरिमा, जिजीविषा, संतरण, संवर्त। &lt;br /&gt;[खंड: 3] संकल्प, जूझते हुए, जीने के लिए, आहत युग, अनुभूत-क्षण, मृत्यु-बोध : जीवन-बोध, राग-संवेदन, प्रतिनिधि संकलन,गीति-संगीति [प्रतिनिधि गेय गीत] और महेंद्रभटनागर की कविता-यात्रा [प्रतिनिधि कविताएँ]&lt;br /&gt;&lt;li&gt;&lt;strong&gt;मूल्यांकन / शोध &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;[1] महेंद्रभटनागर की काव्य-संवेदना : अन्तःअनुशासनीय आकलन &lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;डॉ. वीरेंद्र सिंह (जयपुर) &lt;br /&gt;[2] कवि महेंद्रभटनागर का रचना-कर्म &lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;डॉ. किरणशंकर प्रसाद (दरभंगा) &lt;br /&gt;[3] डॉ. महेंद्रभटनागर की काव्य-साधना &lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;ममता मिश्रा (स्व.) &lt;br /&gt;[4] महेंद्रभटनागर की कविता : परख और पहचान &lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;सं. डॉ. पाण्डेय शशिभूषण 'शीतांशु' (अमृतसर) &lt;br /&gt;[5] डॉ. महेंद्रभटनागर की काव्य-सृष्टि &lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;सं. डॉ. रामसजन पाण्डेय (रोहतक) &lt;br /&gt;[6] डॉ. महेंद्रभटनागर का कवि व्यक्तित्व &lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;सं. डॉ. रवि रंजन (हैदराबाद) &lt;br /&gt;[7] सामाजिक चेतना के शिल्पी : कवि महेंद्रभटनागर &lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbspसं. डॉ. हरिचरण शर्मा (जयपुर) &lt;br /&gt;[8] कवि महेंद्रभटनागर का रचना-संसार &lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;सं. डॉ. विनयमोहन शर्मा (स्व.) &lt;br /&gt;[9] कवि महेंद्रभटनागर : सृजन और मूल्यांकन &lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;डॉ. दुर्गाप्रसाद झाला (शाजापुर) &lt;br /&gt;[10] महेंद्रभटनागर की सर्जनशीलता (शोध / नागपुर वि.) &lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;डॉ. विनीता मानेकर (तिरोड़ा-भंडारा / महाराष्ट्र) &lt;br /&gt;[11] प्रगतिवादी कवि महेंद्रभटनागर : अनुभूति और अभिव्यक्ति / &lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;(शोध / जीवाजी वि., ग्वालियर) &lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;डॉ. माधुरी शुक्ला (स्व.) &lt;br /&gt;[12] महेंद्रभटनागर के काव्य का वैचारिक एवं संवेदनात्मक धरातल &lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;(शोध / सम्बलपुर वि., उड़ीसा) &lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;डॉ. रजत कुमार षड़ंगी (कोरापुट-उडी़सा) &lt;br /&gt;[13] डॉ. महेंद्रभटनागर : व्यक्तित्व और कृतित्व (शोध / कर्नाटक वि.) &lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;डॉ. मंगलोर अब्दुलरज़ाक बाबुसाब (गदग-कर्नाटक) &lt;br /&gt;[14] डॉ. महेंद्रभटनागर के काव्य का नव-स्वछंदतावादी मूल्यांकन &lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;(शोध / दयालबाग डीम्ड वि., आगरा) &lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;डॉ. कविता शर्मा (आगरा) &lt;br /&gt;[15] डॉ. महेंद्रभटनागर के काव्य में सांस्कृतिक चेतना &lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;(शोध / कानपुर वि.) &lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;डॉ. अलका रानी (कन्नौज) &lt;br /&gt;[16] महेंद्रभटनागर के काव्य में युग-बोध &lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;(शोध / ललितनारायण वि., दरभंगा) &lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;डॉ. मीना गामी (दरभंगा)&lt;/li&gt;&lt;/ul&gt;&lt;br /&gt; &lt;/td&gt;&lt;td width=50% valign="top" align="top"&gt;&lt;br /&gt;&lt;ul&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;&lt;strong&gt;CRITICAL STUDY OF MAHENDRA BHATNAGAR'S POETRY&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;[1] The Poetry of Mahendra Bhatnagar :&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;Realistic &amp; Visionary Aspects&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;Ed. Dr. O.P. Budholia &lt;br /&gt;[2] Living Through Challenges :&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;A Study of Dr.Mahendra Bhatnagar's Poetry &lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;By Dr. B.C. Dwivedy.&lt;br /&gt;[3] Poet Dr. Mahendra Bhatnagar : &lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;His Mind And Art / (In Eng. &amp; French) &lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;Ed. Dr. S.C. Dwivedi &amp; Dr. Shubha Dwivedi&lt;br /&gt;&lt;li&gt;Works :&lt;br /&gt;Forty Poems of Mahendra Bhatnagar, After The Forty Poems, Exuberance and other poems, Dr. Mahendra Bhatnagar's Poetry, Death-Perception : Life-Perception, Poems : For A Better World, Passion and Compassion, Lyric-Lute, A Handful of Light, Dawn to Dusk, New Consciousness And Resolution, [Later Poems], &lt;br /&gt;&lt;li&gt;Translations : In French: &lt;br /&gt;A Modern Indian Poet : Dr. Mahendra Bhatnagar : UN POÈTE INDIEN ET MODERNE / Tr. Mrs. Purnima Ray&lt;br /&gt;&lt;li&gt;In Tamil: Kaalan Maarum, Mahendra Bhatnagarin Kavithaigal.&lt;br /&gt;&lt;li&gt;In Telugu: Deepanni Veliginchu. &lt;br /&gt;&lt;li&gt;In Kannad &amp; In Bangla: &lt;br /&gt;&lt;li&gt;Mrityu-Bodh : Jeewan-Bodh. &lt;br /&gt;&lt;li&gt;In Marathi: Samkalp Aaani Anaya Kavita &lt;br /&gt;&lt;li&gt;In Oriya : Kala-Sadhna. &lt;br /&gt;&lt;li&gt;In Malyalam, Gujrati, Manipuri, Urdu.&lt;br /&gt;&lt;li&gt;In Czech, Japanese, Nepali, &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;Links : HINDI&lt;br /&gt;www.kavitakosh.org/ mbhatnagar.htm &amp;nbsp;&amp;nbsp; www.rachanakar.blogspot.com &amp;nbsp;&amp;nbsp; www.sahityakunj.net &amp;nbsp;&amp;nbsp; www.anubhuti-hindi.org &amp;nbsp;&amp;nbsp; www.blogbud.com/author 5652&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;ENGLISH-FRENCH&lt;br /&gt;www.poetrypoem.com/mpb1&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;ENGLISH&lt;br /&gt;(1) www.poetrypoem.com/mpb2 &lt;br /&gt;[Selected Poems 1,2,3]&lt;br /&gt;(2) www.poetrypoem.com/mpb4 &lt;br /&gt;['Exuberance and other poems' / &lt;br /&gt;'Poems : For A Better World /&lt;br /&gt;Passion and Compassion]&lt;br /&gt;(3) www.poetrypoem.com/mpb3&lt;br /&gt;['Death-Perception : Life-Perception' /&lt;br /&gt;'A Handful Of Light'] &lt;br /&gt;(4) www.poetrypoem.com/mpb&lt;br /&gt;['Lyric-Lute']&lt;br /&gt;(5)www.anindianenglishpoet.blogspot.com &lt;br /&gt;['…A Study Of Dr. Mahendra Bhatnagar's Poetry']&lt;br /&gt;(6)www.mahendrabhatnagar.blogspot.com &lt;br /&gt;[ Critics &amp; Mahendra Bhatnagar's Poetry] &lt;br /&gt;&lt;li&gt;PATRON :&lt;br /&gt;www.creativesaplings.com&lt;/li&gt;&lt;/ul&gt;&lt;br /&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;/table&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;संपर्क: &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;डॉ. महेंद्रभटनागर &lt;br /&gt;सर्जना-भवन, 110 बलवन्तनगर, गांधी रोड, ग्वालियर - 474 002 [म. प्र.] &lt;br /&gt;फोन: 0751-4092908 / मो. 98934 09793 &lt;br /&gt;&lt;a href="mailto:drmahendrabh@rediffmail.com?subject=Th:Katha-Vyatha"&gt;E-mail:drmahendrabh@rediffmail.com&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="right"&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="#octtop"&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#330000"  size=3 &gt;ऊपर जाएं&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="center"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#1E37F3"  size=6 &gt; डॉ. महेंद्र भटनागर चार कविताएँ &lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="center"&gt;&lt;br /&gt;&lt;table width=100% valign="top" align="top" border=2 bordercolor="#1E37F3"&gt;&lt;tr&gt;&lt;td width=50% valign="top" align="top"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#660000"  size=4 &gt;  1. चाँद से&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="center"&gt;&lt;br /&gt;कपोलों को तुम्हारे चूम लूंगा,&lt;br /&gt;मुसकराओ ना !&lt;br /&gt;तुम्हारे पास माना रूप का आगार है,&lt;br /&gt;सुनयनों में बसा सुख-स्वप्न का संसार है,&lt;br /&gt;अनावृत अप्सराएँ नृत्य करती हैं जहाँ,&lt;br /&gt;नवेली तारिकाएँ ज्योति भरती हैं जहाँ,&lt;br /&gt;उन्हीं के सामने जाओ ; यहाँ पर,&lt;br /&gt;झलमलाओ ना !&lt;br /&gt;बड़ी खामोश आहट है तुम्हारे पैर की&lt;br /&gt;तभी तो चोर बनकर आसमाँ की सैर की,&lt;br /&gt;खुली ज्यों ही पड़ी चादर सुनहली धूप की&lt;br /&gt;न छिप पायी किरन कोई तुम्हारे रूप की,&lt;br /&gt;बहाना अंग ढकने का लचर इतना&lt;br /&gt;बनाओ ना !&lt;br /&gt;युगों से देखता हूँ तुम बड़े ही मौन हो&lt;br /&gt;बताओ तो ज़रा, मैं पूछता हूँ कौन हो ?&lt;br /&gt;न पाओगे कभी जा दृष्टि से यों भाग कर&lt;br /&gt;तुम्हारा धन गया है आज आँगन में बिखर,&lt;br /&gt;रुको पथ बीच, चुपके से मुझे उर में&lt;br /&gt;बसाओ ना !&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="#octtop"&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#330000"  size=3 &gt;ऊपर जाएं&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;/td&gt;&lt;td width=50% align="top"&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="center"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#660000"  size=4 &gt;  2. चाँद सोता है !&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="center"&gt;&lt;br /&gt;सितारों से सजी चादर बिछाए चाँद सोता है !&lt;br /&gt;बड़ा निश्चिन्त है तन से,&lt;br /&gt;बड़ा निश्चिन्त है मन से,&lt;br /&gt;बड़ा निश्चिन्त जीवन से,&lt;br /&gt;किसी के प्यार का आँचल दबाए चाँद सोता है !&lt;br /&gt;नयी सब भावनाएँ हैं,&lt;br /&gt;नयी सब कल्पनाएँ हैं,&lt;br /&gt;नयी सब वासनाएँ हैं,&lt;br /&gt;हृदय में स्वप्न की दुनिया बसाए चाँद सोता है !&lt;br /&gt;सुखद हर साँस है जिसकी,&lt;br /&gt;मधुर हर आस है जिसकी,&lt;br /&gt;सनातन प्यास है जिसकी,&lt;br /&gt;विभा को वक्ष पर अपने लिटाए चाँद सोता है !&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="#octtop"&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#330000"  size=3 &gt;ऊपर जाएं&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;tr&gt;&lt;td align="top"&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="center"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#660000"  size=4 &gt;  3. शिशिर की रात (1)&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="center"&gt;&lt;br /&gt;शिशिर-ऋतु-राज, राका-रश्मियाँ चंचल !&lt;br /&gt;कि फैला दिग-दिगन्तों में सघन कुहरा,&lt;br /&gt;सजल कण-कण कि मानों प्यार आ उतरा,&lt;br /&gt;प्रकृति-संगीत-स्वर बस गूँजता अविरल !&lt;br /&gt;शिथिल तरु-डाल, सम्पुट फूल-पाँखुड़ियाँ,&lt;br /&gt;रहीं चुपचाप गिर ये ओस की लड़ियाँ,&lt;br /&gt;धवल हैं सब दिशाएँ झूमती उज्वल !&lt;br /&gt;गगन के वक्ष पर कुछ टिमटिमाते हैं,&lt;br /&gt;सितारे जो नहीं फूले समाते हैं,&lt;br /&gt;सुखद प्रत्येक उर है नृत्यमय-झलमल !&lt;br /&gt;धरा आकाश एकाकार आलिंगन,&lt;br /&gt;प्रणय के तार पर यौवन भरा गायन,&lt;br /&gt;फिसलता नीलवर्णी शून्य में आँचल !&lt;br /&gt;विहग तरु पर अकेला कूक देता है,&lt;br /&gt;किसी की याद में बस हूक देता है,&lt;br /&gt;नयन प्रिय-पंथ पर प्रतिपल बिछे निर्मल !&lt;br /&gt;सबेरा है कहाँ ? संसार सब सोया,&lt;br /&gt;पवन सुनसान में बहता हुआ खोया,&lt;br /&gt;अभी हैं स्वप्न के पल शेष कुछ कोमल !&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="#octtop"&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#330000"  size=3 &gt;ऊपर जाएं&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;/td&gt;&lt;td align="top"&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="center"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#660000"  size=4 &gt;  4. शिशिर की रात (2)&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="center"&gt;&lt;br /&gt;स्तब्ध, गीली, शुभ्र धुँधली रात है,&lt;br /&gt;बह रहा शीतल शिशिर का वात है !&lt;br /&gt;छा रहा कुहरा धुआँ-सा दूर तक,&lt;br /&gt;छिप गया है चन्द्रमा का नूर तक !&lt;br /&gt;हो गयी फीकी नशीली ज्योत्स्ना,&lt;br /&gt;व्योम मानों शीत का बंदी बना !&lt;br /&gt;घोंसलों से मूक चिड़ियाँ झाँकतीं,&lt;br /&gt;नींद में डूबी हुईं कुछ आँकतीं !&lt;br /&gt;शांत धरती पर खड़ी ज्यों भित्तियाँ&lt;br /&gt;जम गयी प्रत्येक तरु की पत्तियाँ !&lt;br /&gt;आज चंचल धूल भी चुपचाप है,&lt;br /&gt;उच्च टूटे शृंग पर हिमताप है,&lt;br /&gt;बर्फ़ का तूफ़ान आएगा अभी,&lt;br /&gt;श्वेत चादर-सी बिछाएगा अभी !&lt;br /&gt;बन्द कर लो ये झरोखे द्वार सब,&lt;br /&gt;आज तो उमड़े हृदय का प्यार सब !&lt;br /&gt;रात लम्बी है सबेरा दूर है,&lt;br /&gt;क्या करें, यह मन बड़ा मजबूर है !&lt;br /&gt;इस तरह अब और शरमाओ नहीं,&lt;br /&gt;पास आओ, दूर यों जाओ नहीं !&lt;br /&gt;रूठने का आज यह अवसर नहीं&lt;br /&gt;ज़िन्दगी इस रात से बेहतर नहीं !&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="#octtop"&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#330000"  size=3 &gt;ऊपर जाएं&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;/table&gt;&lt;br /&gt;&lt;hr color="#FF0000" size=5&gt;&lt;br /&gt;&lt;marquee&gt;&lt;a href="#octend"&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#FF0000"  size=4 &gt;आपका मंच&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;/font&gt;&lt;/marquee&gt;&lt;br /&gt;&lt;hr color="#FF0000" size=5&gt;&lt;br /&gt;&lt;hr color="#440000" size=2&gt;&lt;br /&gt;&lt;center&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#FF0000"  size=6 &gt;कविताएँ&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/center&gt;&lt;br /&gt;&lt;hr color="#440000" size=2&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="left"&gt;&lt;br /&gt;&lt;a name="#oct08poem1"&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#1E37F3"  size=5 &gt; देवमणि पांडेय की  ग़ज़ल &lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;नहीं  और  कोई  कमी  ज़िन्दगी  में&lt;br /&gt;चलो मिल के ढ़ूंढ़ें ख़ुशी ज़िन्दगी में&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;हज़ारों नहीं एक ख़्वाहिश है दिल में&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;मिले काश  कोई  कभी  ज़िन्दगी में&lt;br /&gt;अगर दिल किसी को बहुत चाहता  है&lt;br /&gt;उसे कर लो शामिल अभी ज़िन्दगी में&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;मोहब्बत की शाख़ों पे गुल तो खिलेंगे&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;अगर  होगी  थोड़ी  नमी  ज़िन्दगी  में&lt;br /&gt;निगाहों में ख़ुशबू क़दम बहके बहके&lt;br /&gt;ये दिन भी हैं आते सभी ज़िन्दगी में&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;मिलेंगे  बहुत  चाहने  वाले  तुमको&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;मिलेगा न हमसा कभी ज़िन्दगी में&lt;br /&gt; बिछड़कर किसी से न मर जाए कोई&lt;br /&gt;वो मौसम न आए किसी ज़िन्दगी में&lt;br /&gt;&lt;p aling="right"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;ना हंसते  हैं ना रोते हैं&lt;br /&gt;ऐसे भी इंसा भी होते हैं।&lt;br /&gt;वक्त बुरा दिन दिखलाए तो&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;br /&gt;अपने भी दुश्मन होते हैं।&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;br /&gt;दुख में रातें कितनी तन्हा&lt;br /&gt;दिन कितने मुश्किल होते हैं।&lt;br /&gt;खुद्दारी से जीने वाले&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;br /&gt;अपने बोझ को खुद ढोते हैं।&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;br /&gt;दिल की धरती है वो धरती&lt;br /&gt;हम जिसमें आंसू बोते हैं।&lt;br /&gt;बात बात में डरने वाले &amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;br /&gt;गहरी नींद में में कम सोते हैं।&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;br /&gt;सपने हैं उन आंखों में भी&lt;br /&gt;फुटपाथों पर जो सोते हैं।&lt;/strong&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="#octtop"&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#330000"  size=3 &gt;ऊपर जाएं&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="left"&gt;&lt;br /&gt;दिल के ज़ख़्मों को क्या सीना&lt;br /&gt;दर्द नहीं तो फिर क्या जीना&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;प्यार नहीं तो बेमानी हैं&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;काबा , काशी और मदीन ।&lt;br /&gt;महलों वालों क्या समझेंगे&lt;br /&gt;क्या मेहनत,क्या धूल पसीना ।&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;मैं तो दरिया पार हुआ&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;बीच भंवर में रहा सफ़ीना ।&lt;br /&gt;दूनी हो गई दिल की क़ीमत&lt;br /&gt;इसे मिला है इश्क़ नगीना ।&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;तुम बिन तनहा है हर लम्हा&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;रीता रीता , साल - महीना ।&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="#octtop"&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#330000"  size=3 &gt;ऊपर जाएं&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="center"&gt;&lt;br /&gt;जो इंसां बदनाम बहुत है&lt;br /&gt;यारो उसका नाम बहुत है।&lt;br /&gt;दिल की दुनिया महकाने को&lt;br /&gt;एक तुम्हारा नाम बहुत है।&lt;br /&gt;लिखने को इक गीत नया सा&lt;br /&gt;इक प्यारी सी शाम बहुत है।&lt;br /&gt;सोच समझ कर सौदा करना&lt;br /&gt;मेरे दिल का दाम बहुत  है।&lt;br /&gt;दिल की प्यास बुझानी हो तो&lt;br /&gt;आंखों का इक जाम बहुत है।&lt;br /&gt;तुमसे बिछड़कर हमने जाना&lt;br /&gt;ग़म का भी ईनाम बहुत है।&lt;br /&gt;इश्क़ में मरना अच्छा तो है&lt;br /&gt;पर ये क़िस्सा आम बहुत है।&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;देवमणि पांडेय का संक्षिप्त परिचय:&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_-_J_ggR3oI4/SPQkbFyKPNI/AAAAAAAAASg/iM75AJCPE3E/s1600-h/devmanipandey.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://1.bp.blogspot.com/_-_J_ggR3oI4/SPQkbFyKPNI/AAAAAAAAASg/iM75AJCPE3E/s400/devmanipandey.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5256866712875842770" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;देवमणि पांडेय जी का जून 1958 को सुलतानपुर (उ.प्र.) में हुआ। आप हिन्दी और संस्कृत में प्रथम श्रेणी एम.ए. हैं। अखिल भारतीय स्तर पर लोकप्रिय कवि और मंच संचालक के रूप में सक्रिय। आपके अब तक दो काव्यसंग्रह प्रकाशित हो चुके हैं- &lt;strong&gt;"दिल की बातें" और "खुशबू की लकीरें"&lt;/strong&gt;। मुम्बई में एक केंद्रीय सरकारी कार्यालय में कार्यरत पांडेय जी ने फ़िल्म &lt;strong&gt;'पिंजर', 'हासिल' और 'कहां हो तुम'&lt;/strong&gt; के अलावा कुछ सीरियलों में भी गीत लिखे हैं। फ़िल्म ' पिंजर ' के गीत '' चरखा चलाती माँ '' को वर्ष 2003 के लिए 'बेस्ट लिरिक आफ दि इयर' पुरस्कार से सम्मानित किया गया।  आपके द्वारा संपादित सांस्कृतिक निर्देशिका 'संस्कृति संगम' ने मुम्बई के रचनाकारों को एकजुट करने में अहम भूमिका निभाई है।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;सम्पर्कः&lt;/strong&gt; देवमणि पाण्डेयः ए-2, हैदराबाद एस्टेट, नेपियन सी रोड, मालाबार हिल, मुम्बई - 400 036, &lt;br /&gt;M: 99210-82126 / R : 022-23632727, &lt;br&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="mailto:devmanipandey@gmail.com?subject=Th:Katha-Vyatha"&gt;E-mail:  devmanipandey@gmail.com&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="#octtop"&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#330000"  size=3 &gt;ऊपर जाएं&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt; &lt;br /&gt;&lt;hr color="#FF0000" size=5&gt;&lt;br /&gt;&lt;marquee&gt;&lt;a href="#octend"&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#FF0000"  size=4 &gt;आपका मंच&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;/font&gt;&lt;/marquee&gt;&lt;br /&gt;&lt;hr color="#FF0000" size=5&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="left"&gt;&lt;br /&gt;&lt;a name="#oct08poem2"&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#1E37F3"  size=5 &gt; निशा भोसले :  "मेरा होना कितना जरूरी"&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="left"&gt;&lt;br /&gt;मैं पेड़ हूँ,&lt;br /&gt;मुझे मत काटो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक मैं ही हूँ&lt;br /&gt;जन्म से मृत्यु तक&lt;br /&gt;तुम्हारे साथ-साथ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे ही बने पलंग पर&lt;br /&gt;तुमने जन्म पाया है&lt;br /&gt;और मेरे ही बने झूले में&lt;br /&gt;झूलकर बड़े हुए हो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब टूट जाते है, &lt;br /&gt;सारे रिश्ते&lt;br /&gt;लाठी बनकर&lt;br /&gt;मैं ही साथ निभाता हुँ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और आज तुम &lt;br /&gt;मेरे ही अस्तित्व को&lt;br /&gt;मिटा देना चाहते हो&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;सोचो !&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;इस पृथ्वी पर&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;मेरा होना कितना जरूरी है।&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;संपर्क पता:&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_-_J_ggR3oI4/SPQlIhxyygI/AAAAAAAAASo/D-fTsO2v-oQ/s1600-h/nishabhosle2.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://3.bp.blogspot.com/_-_J_ggR3oI4/SPQlIhxyygI/AAAAAAAAASo/D-fTsO2v-oQ/s320/nishabhosle2.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5256867493484612098" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;शुभम विहार कालोनी बिलासपुर&lt;br /&gt;छत्तीसगढ़ पिन 495001&lt;br /&gt;शिक्षाः एम.ए. सोसियालोजी (M.A. Sociology)&lt;br /&gt;छत्तीसगढ़ राज्य विधुत बोर्ड में कार्यरत साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं में रचनाऐं प्रकाशित।&lt;br /&gt;&lt;br&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="mailto:kathavyatha@gmail.com?subject=Th:Nisha Bhosle"&gt;E-mail:kathavyatha@gmail.com&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="#octtop"&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#330000"  size=3 &gt;ऊपर जाएं&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt; &lt;br /&gt;&lt;hr color="#FF0000" size=5&gt;&lt;br /&gt;&lt;marquee&gt;&lt;a href="#octend"&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#FF0000"  size=4 &gt;आपका मंच&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;/font&gt;&lt;/marquee&gt;&lt;br /&gt;&lt;hr color="#FF0000" size=5&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="left"&gt;&lt;br /&gt;&lt;a name="#oct08poem3"&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#1E37F3"  size=5 &gt; सुनिल कुमार 'सोनु':  सपनो का घरौंदा &lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="left"&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;टूट चुकी है सपनो का घरौंदा &lt;br /&gt;लुट चुकी है अपनों की दुनिया &lt;br /&gt;नदी सी बीच प्रवाह में&lt;br /&gt;अनजानी सी राह में &lt;br /&gt;भटक रहा हूँ मैं&lt;br /&gt;जहाँ अँधेरा ही अँधेरा है &lt;br /&gt;है आँखों में आंसू के सैलाब &lt;br /&gt;दिल में जख्मो का डेरा है &lt;br /&gt;शेष क्या रहा अब जीवन में&lt;br /&gt;फ़िर भी धरकने कहती&lt;br /&gt;क्या निराश हुआ जाय ?&lt;br /&gt;&lt;p align="right"&gt;&lt;br /&gt;अब प्रकृति के नियम पे&lt;br /&gt;मेरी गर गई दृष्टी&lt;br /&gt;'एक' है जो विनाश करता &lt;br /&gt;एक ही करता है नव श्रृष्टि.&lt;br /&gt;सूरज आज अंधेरे से निकल के &lt;br /&gt;कल नव प्रभात ले आयेगी&lt;br /&gt;जनता मैं भी विधि के विधान को&lt;br /&gt;इस लोक के हैवान को,उस लोक के भगवान को&lt;br /&gt;"समय सरे जख्मो को भर देती है"&lt;br /&gt;असमंजस्य में हूँ तुम्ही बता दो &lt;br /&gt;क्या इसपे विश्वास किया जाय ?&lt;br /&gt;&lt;p align="left"&gt;&lt;br /&gt;जिंदगी के रंग हज़ार,&lt;br /&gt;कभी पतझर कभी बहार &lt;br /&gt;कभी भर देती है असीम खुशिया &lt;br /&gt;कभी कर देती है दिल को तार-तार&lt;br /&gt;भरती है कोयल जीवन में राग &lt;br /&gt;अच्छी लगाती है प्यार-अनुराग&lt;br /&gt;सब किताबी बातें है,मेल नही जीवन में इसका&lt;br /&gt;जब दिखे चरों तरफ़ आग ही आग &lt;br /&gt;बदलेगी कुछ मंजर &lt;br /&gt;रखती है कुदरत सबपे नजर&lt;br /&gt;क्रूर मजाक तो कर लिया &lt;br /&gt;उसने मुझे दुःख ही दुःख दिया&lt;br /&gt;मैं तो अर्धमूर्छित हूँ &lt;br /&gt;बहुत ही व्यथित हूँ&lt;br /&gt;अन्तःकरण से एक सवाल उठे&lt;br /&gt;"कुछ अच्छा होने की "&lt;br /&gt;क्या आश किया जाय?&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;संपर्क पता:&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;SUNIL KUMAR SONU&lt;br /&gt;36th ADC student NIFFT HATIA,Ranchi-834003&lt;br /&gt;(Jharkhand)&lt;br /&gt;mob no.9852341209&lt;br&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="mailto:sunilkumarsonus@yahoo.com?subject=Th:Katha-Vyatha"&gt;E-mail:sunilkumarsonus@yahoo.com&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="#octtop"&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#330000"  size=3 &gt;ऊपर जाएं&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt; &lt;br /&gt;&lt;hr color="#FF0000" size=5&gt;&lt;br /&gt;&lt;marquee&gt;&lt;a href="#octend"&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#FF0000"  size=4 &gt;आपका मंच&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;/font&gt;&lt;/marquee&gt;&lt;br /&gt;&lt;hr color="#FF0000" size=5&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="left"&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="left"&gt;&lt;br /&gt;&lt;a name="#oct08poem4"&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#1E37F3"  size=5 &gt;4. निशांत भट्ट &lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="center"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#660000"  size=4 &gt;आज तुम सफल हो&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="center"&gt;&lt;br /&gt;आज तुम सफल हो&lt;br /&gt;आगे भी सफल रहो&lt;br /&gt;यही कामना है ,&lt;br /&gt;मेरे हृदय की !&lt;br /&gt;सफल हो तुम मुझे -&lt;br /&gt;भूल जाओगे ,&lt;br /&gt;यही चिंता है&lt;br /&gt;मेरे मन की !&lt;br /&gt;पर मैं तुम्हारी ,&lt;br /&gt;कहीं दूर छोर पर&lt;br /&gt;प्रतीक्षा  कर पल - पल ,&lt;br /&gt;दीपक सा जलता जाऊंगा&lt;br /&gt;और तुम मेरे स्नेह &lt;br /&gt;प्रकाश  की आभा &lt;br /&gt;की सीमा  को&lt;br /&gt;छोड़ जाओगे &lt;br /&gt;यही दुखित घटना होगी ,&lt;br /&gt;मेरे जीवन की !&lt;br /&gt;पर तुम निश्चिन्त हो&lt;br /&gt;अपने लक्ष्य को एकाग्र करो ,&lt;br /&gt;क्योंकि&lt;br /&gt;यही मेरा भी लक्ष्य होगा ! &lt;br /&gt;पाओगे तुम आदर समाज में ,&lt;br /&gt;तो मेरा भी आदर होगा !&lt;br /&gt;ईश्वर  से पार्थना है बस इतनी&lt;br /&gt;कि मेरे पथ के सुख, बन पुष्प&lt;br /&gt;तुम्हारे पथ पर बिछ जाये .&lt;br /&gt;और तुम्हारे पथ के दुख -&lt;br /&gt;मेरे पथ पर काँटे   बन&lt;br /&gt;मुझ को चुभ जाये !&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;आज तुम सफल हो ,&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;आगे भी सफल रहोगे ,&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;यह निश्चित होगा!&lt;br /&gt;बस एक छोटी सी&lt;br /&gt;बात ध्यान रखना&lt;br /&gt;हर क्ष ण ,&lt;br /&gt;सफल हो अभिमनीत मत होना ,&lt;br /&gt;इस वृक्ष   को अपनी चरित भूमि&lt;br /&gt;पर मत लगने देना ,&lt;br /&gt;क्योंकि यही फलित करता&lt;br /&gt;असफलता  के कड़वे फलो को !&lt;br /&gt;जो पक कर, सड़-कर&lt;br /&gt;गिर-कर ख़राब करेंगे&lt;br /&gt;तुम्हारे ही जीवन-तल को!&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;आज तुम सफल हो&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;आगे भी सफल होगे ,&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;यही कामना मैं करता हूँ&lt;br /&gt;तुम तो कर्म करो , यही कामना मैं करता हूँ।&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;संपर्क पता:&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;Nishant bhatt , &lt;br /&gt;Talab Mohulla ,&lt;br /&gt;Vipin nagar , Itarsi , MP,&lt;br /&gt;Pin - 461111&lt;br /&gt;Mob no. 9926313524&lt;br&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="mailto:nishant8ips@gmail.com?subject=Th:Katha-Vyatha"&gt;E-mail: nishant8ips@gmail.com&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="#octtop"&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#330000"  size=3 &gt;ऊपर जाएं&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;hr color="#FF0000" size=5&gt;&lt;br /&gt;&lt;marquee&gt;&lt;a href="#octend"&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#FF0000"  size=4 &gt;आपका मंच&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;/font&gt;&lt;/marquee&gt;&lt;br /&gt;&lt;hr color="#FF0000" size=5&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="center"&gt;&lt;br /&gt;&lt;a name="#oct08poem5"&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#1E37F3"  size=5 &gt; महेश कुमार वर्मा की तीन कविताएँ&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="right"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#660000"  size=4 &gt;1. आज का संसार &lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="right"&gt;&lt;br /&gt;न्याय मांगने पर जहाँ होता है प्रहार&lt;br /&gt;छीन लेता है मुख का आहार&lt;br /&gt;पीड़ित के साथ होता है दुराचार&lt;br /&gt;यही तो है आज का संसार&lt;br /&gt;&lt;p align="left"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#660000"  size=4 &gt;2. पंच &lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="left"&gt;&lt;br /&gt;परमेश्वर या पापी &lt;br /&gt;सुना था पंचायत में पंच आते हैं &lt;br /&gt;जो ईमानदार व निष्पक्ष होते हैं &lt;br /&gt;वह धर्मानुकुल उचित निर्णय सुनाते हैं &lt;br /&gt;इसी लिए पंच को परमेश्वर कहते हैं &lt;br /&gt;पर जब मैं देखा कि &lt;br /&gt;आए हुए पंच ईमानदार नहीं पक्षपाती है &lt;br /&gt;वह दूसरे पक्ष को सुनने वाला नहीं &lt;br /&gt;बल्कि एकतरफा दोषी का साथ देने वाला है &lt;br /&gt;वह निष्पक्ष फैसला करने वाला नहीं &lt;br /&gt;बल्कि निर्दोष पर ही जानलेवा हमला करने वाला है &lt;br /&gt;तो मुझे सोचना पड़ा कि &lt;br /&gt;यह पंच परमेश्वर नहीं बल्कि पंच पापी है &lt;br /&gt;&lt;p align="center"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#660000"  size=4 &gt;3. कोई नहीं है मेरा मुझे पहचानकर &lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="center"&gt;&lt;br /&gt;आते हैं आंखों में आंसू यह जानकर&lt;br /&gt;कोई नहीं है मेरा मुझे पहचानकर&lt;br /&gt;अंधे हैं वो आँख रखकर&lt;br /&gt;बहरे हैं वो कान रखकर&lt;br /&gt;गूंगे हैं वो मुँह रखकर&lt;br /&gt;कोई नहीं है मेरा मुझे पहचानकर&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हैवानियत की हद कर दी उसने&lt;br /&gt;इंसानियत की नाम नहीं है&lt;br /&gt;कितने भी बड़े क्यों न हो&lt;br /&gt;मानवता की पहचान नहीं है&lt;br /&gt;कहने को तो हैं वो सज्जन&lt;br /&gt;पर दुर्जन से कम नहीं हैं&lt;br /&gt;कुछ बोलो तो होगी पिटाई&lt;br /&gt;जल्लाद से वो कम नहीं हैं&lt;br /&gt;हैं वो हैवान इन्सान बनकर&lt;br /&gt;तड़पाते हैं वो हमेशा शैतान बनकर&lt;br /&gt;कोई नहीं है मेरा मुझे पहचानकर&lt;br /&gt;कोई नहीं है मेरा मुझे पहचानकर।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#FF0000"  size=4 &gt;महेश कुमार वर्मा: का परिचय&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_C7XLNvx-FVI/R2HutHzF5_I/AAAAAAAAAEA/1PN6Q1_PWTk/S220/mk.bmp"&gt;&lt;img style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 66px; CURSOR: hand; HEIGHT: 68px" height="117" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_C7XLNvx-FVI/R2HutHzF5_I/AAAAAAAAAEA/1PN6Q1_PWTk/S220/mk.bmp" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; &lt;br&gt;&lt;br /&gt;शिक्षा : प्राथमिक / मध्य विद्यालय : राजकीय कन्या मध्य विद्यालय, छत्तरपुर, पलामू (झारखण्ड); उच्च विद्यालय : राजकीय संपोषित उच्च विद्यालय, छत्तरपुर, पलामू (झारखण्ड); मैट्रिक : राजकीय संपोषित उच्च विद्यालय, छत्तरपुर, पलामू (झारखण्ड); बोर्ड : बिहार विद्यालय परीक्षा समिति, पटना; वर्ष : 1993; इंटर --I.Sc. (Math) : B. D. Evening College, Patna; बोर्ड : Bihar Intermediate Education Council, Patna; वर्ष : 1995 &lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#330000"  size=3 &gt;वर्तमान पता:&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;  DTDC कुरियर ऑफिस, सत्यनारायण मार्केट, मारुती (कारलो) शो रूम के सामने, बोरिंग रोड, पटना (बिहार), पिन : 800001 (भारत); &lt;br /&gt;Contact No. : +919955239846&lt;br /&gt;&lt;ul&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;Web Site: &lt;a href="http://popularindia.blogspot.com/ " target="new"&gt;http://popularindia.blogspot.com&lt;/a&gt;&lt;/li&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;Email: &lt;a href="mailto:vermamahesh7@gmail.com?subject=Kavi Manch"&gt;vermamahesh7@gmail.com&lt;/a&gt;&lt;/li&gt;&lt;/ul&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="#octtop"&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#330000"  size=3 &gt;ऊपर जाएं&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt; &lt;br /&gt;&lt;hr color="#FF0000" size=5&gt;&lt;br /&gt;&lt;marquee&gt;&lt;a href="#octend"&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#FF0000"  size=4 &gt;आपका मंच&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;/font&gt;&lt;/marquee&gt;&lt;br /&gt;&lt;hr color="#FF0000" size=5&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="center"&gt;&lt;br /&gt;&lt;a name="#oct08poem6"&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#1E37F3"  size=5 &gt; अखिलेश सोनी:  कब तलक चुपचाप तमाशा देखोगे ?... &lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="right"&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कब तलक चुपचाप तमाशा देखोगे ?... &lt;br /&gt;ये समय नहीं हैं आँख बंद कर सोने का&lt;br /&gt;ये समय नहीं हैं वक्त को ऐसे खोने का&lt;br /&gt;चलो बदल दो देश की हालत आगे आओ&lt;br /&gt;ये समय नहीं हैं नेताओं को ढ़ोने का&lt;br /&gt;वरना तुम घनघोर तमाशा देखोगे ?...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कह विकास का सर्वनाश यह करते आए&lt;br /&gt;भारत माँ का मान सदा यह हारते आए&lt;br /&gt;खाद, हवाला हो या हो चारा घोटाला&lt;br /&gt;जेबें अपनी नोटों से यह भरते आए&lt;br /&gt;क्या विकास की यह परिभाषा देखोगे ?...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपने स्वार्थ के खातिर जो विस्फोट कराते &lt;br /&gt;मन्दिर, मस्जिद धर्म के नाम पर चोट कराते &lt;br /&gt;चोर लुटेरे थे कल तक जो अपने देश में &lt;br /&gt;नेता बनकर कितने जाली वोट कराते &lt;br /&gt;इनकी ओर तुम किस आशा से देखोगे ?...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब तो जरूरी है संभल जाना तुम्हारा&lt;br /&gt;अब तो जरूरी है मचल जाना तुम्हारा&lt;br /&gt;अब तो तुम्हारी आंखों से अंगार बरसें&lt;br /&gt;अब तो जरूरी है उबल जाना तुम्हारा&lt;br /&gt;दुष्टों को क्या खून का प्यासा देखोगे ?...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;राम राज्य सी हो जाए तस्वीर देश की&lt;br /&gt;स्वर्ग से सुंदर हो जाए तस्वीर देश की&lt;br /&gt;मूक बना यह देश तुम्हारी ओर देखता&lt;br /&gt;नौजवान ही बदल सका तकदीर देश की&lt;br /&gt;कब तक तुम और दीप बुझा सा देखोगे ?...&lt;br /&gt;कब तलक चुपचाप तमाशा देखोगे ?&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;अखिलेश सोनी का परिचय:&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_-_J_ggR3oI4/SPSA27AyyrI/AAAAAAAAATA/PqL1oMbge9g/s1600-h/akhileshsoni.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://4.bp.blogspot.com/_-_J_ggR3oI4/SPSA27AyyrI/AAAAAAAAATA/PqL1oMbge9g/s200/akhileshsoni.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5256968346090523314" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="right"&gt; &lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#330000"  size=3 &gt;&lt;br /&gt;वर्तमान में 'पत्रिका' समाचार समुह में "Graphic Designer" के रूप में कार्यरत।&lt;br /&gt;शिक्षा: B.A. (Hindi sahitya) aur M.A. (urdu saahitya)&lt;br /&gt;फोन : +91-9993759314&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;Address : New Subhash Nagar, Bhopal&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="right"&gt;&lt;br /&gt;&lt;ul&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;www.jazbaat-dilse.blogspot.com&lt;/li&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;www.akhileshsoni.blogspot.com&lt;/li&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;&lt;a href="mailto: akhilesh.designer2@gmail.com ?subject=Kavi Manch"&gt;akhilesh.designer2@gmail.com&lt;/a&gt;&lt;/li&gt;&lt;/ul&gt;&lt;a href="#octtop"&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#330000"  size=3 &gt;ऊपर जाएं&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt; &lt;br /&gt;&lt;hr color="#FF0000" size=5&gt;&lt;br /&gt;&lt;marquee&gt;&lt;a href="#octend"&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#FF0000"  size=4 &gt;आपका मंच&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;/font&gt;&lt;/marquee&gt;&lt;br /&gt;&lt;hr color="#FF0000" size=5&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="center"&gt;&lt;br /&gt;&lt;a name="#oct08poem7"&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#1E37F3"  size=5 &gt; देवेन्द्र कुमार मिश्रा:  ऐसा भी हो सकता है &lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="left"&gt;&lt;br /&gt;कभी नहीं था सोचा मैंने, ऐसा भी हो सकता है । &lt;br /&gt;बिन ईधन के चलना मुश्किल, सब की हालत खसता है ।। &lt;br /&gt;सब की हालत खसता है,  ईधन हुआ मंहगा नशा । &lt;br /&gt;अमेरिका-ईरान संबंधों से, हुई यह दुर्दशा ।। &lt;br /&gt;कच्चे तेल की बढती कीमत, परेशान हैं आज सभी । &lt;br /&gt;दादा गिरी, आपना असत्तव, असर दिखाये कभी-कभी ।।&lt;br /&gt;&lt;p align="right"&gt;&lt;br /&gt;बिगडा पर्यावरण, कहीं है बाढ-कहीं है सूखा ।&lt;br /&gt;कृषि उत्पादन कमी आई है, आज किसान है भूखा ।। &lt;br /&gt;आज किसान है भूखा, लागत ज्यादा उत्पादन कम ।&lt;br /&gt;कर्जा चुका नहीं है पाता, तोड रहा है दम ।। &lt;br /&gt;सुरसा जैसा मुँह फैलाये, मंहगाई ने झिगडा । &lt;br /&gt;विदेशी आनाज मगाया, देशी बजट है बिगडा ।। &lt;br /&gt;&lt;p align="left"&gt;&lt;br /&gt;मकान, सोना चाँदी, हुई आज है सपना । &lt;br /&gt;बेरोजगारी बढती जाती, रंग दिखाती अपना ।। &lt;br /&gt;रंग दिखाती अपना, आज है  मुश्किल शिक्षा पाना । &lt;br /&gt;भ्रष्टाचार का जाल है फैला, योग्य-अयोग्य न जाना ।। &lt;br /&gt;शादी के संजोये सपने, मंहगाई फीके पकवान । &lt;br /&gt;कर्मचारी, मजदूर, किसान, बचा सके न आज मकान ।। &lt;br /&gt;&lt;p align="right"&gt;  &lt;br /&gt;नेता की परिभाषा बदली, पाखंडी बनाया बेश । &lt;br /&gt;कभी भूनते तंदूरों में, बाहुबली चलाते देश ।। &lt;br /&gt;बाहुबली चलाते देश, धर्म-जाति आपस लडबाते । &lt;br /&gt;सत्ता में आ जाते , वेतन सुख-सुविधाएं पाते ।।&lt;br /&gt;सब कुछ मंहगा मौत है सस्ती, लाज के ये क्रेता । &lt;br /&gt;कुछ नही सिद्धांत इनका,  भ्रष्ट  आचरण  नेता ।।&lt;br /&gt;&lt;p align="left"&gt;&lt;br /&gt;दर-दर बढती जनसंख्या, भूमि है स्थाई । &lt;br /&gt;कृषि भूमि में बनी हैं बस्ती,  ऐसी  नौबत आई ।। &lt;br /&gt;ऐसी  नौबत आई, जनसंख्या पर रोक लगाओ । &lt;br /&gt;नूतन तकनीती से, आवश्यकता पूर्ण कराओ ।। &lt;br /&gt;विज्ञानकों का कर आव्हान, अविष्कार को कर । &lt;br /&gt;पर्यावरण का कर संरक्षण, रोको मंहगाई की दर ।।&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;संपर्क पता:&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_-_J_ggR3oI4/SPLbkkQ52uI/AAAAAAAAAQ4/hEAZyd-CLxY/s1600-h/devendra+kr.+mishra.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://4.bp.blogspot.com/_-_J_ggR3oI4/SPLbkkQ52uI/AAAAAAAAAQ4/hEAZyd-CLxY/s320/devendra+kr.+mishra.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5256505136351140578" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;देवेन्द्र कुमार मिश्रा&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;अमानगंज मोहल्ला नेहरु बार्ड न0 13&lt;br /&gt;छतरपुर (म0प्र0)&lt;br&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="mailto:devchp@gmail.com?subject=Th:Katha-Vyatha"&gt;E-mail:devchp@gmail.com&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="#octtop"&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#330000"  size=3 &gt;ऊपर जाएं&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt; &lt;br /&gt;&lt;hr color="#FF0000" size=5&gt;&lt;br /&gt;&lt;marquee&gt;&lt;a href="#octend"&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#FF0000"  size=4 &gt;आपका मंच&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;/font&gt;&lt;/marquee&gt;&lt;br /&gt;&lt;hr color="#FF0000" size=5&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="left"&gt;&lt;br /&gt;&lt;a name="#oct08poem8"&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#1E37F3"  size=5 &gt;प्रकाश यादव "निर्भीक" की दो कविता&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="center"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#660000"  size=4 &gt;1. वेदना विरह की &lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="center"&gt;&lt;br /&gt;पहला विरह है यह पहली मिलन की, &lt;br /&gt;लगता है यह विरह है धरती व गगन की; &lt;br /&gt;खुशबू अब जाती रही अपनी चमन की,&lt;br /&gt;जीवन मेँ न चमक रही अब कंचन की।    &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;अकेलापन का ही दर्द अब रह सा गया,  &lt;br /&gt;मिलन की मिठास को विरह ही खा गया; &lt;br /&gt;अभी-अभी बसंत था वो कहाँ खो गया, &lt;br /&gt;देखते ही देखते अभी पतझड़ आ गया।        &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;यादोँ की परिधि मेँ  जिन्दगी सिमट गई, &lt;br /&gt;धड़कन जो थी ज़िगर की वही विछड़ गई;&lt;br /&gt;सुबह होने से पहले ही फिर शाम हो गई, &lt;br /&gt;कली खिलते-खिलते  अधखिली रह गई।      &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;वेदना विरह की अब कम होने से रही, &lt;br /&gt;मिलन की मिठास अब मिलने से रही; &lt;br /&gt;जो बात है उसमेँ इस तस्वीर मेँ नहीँ, &lt;br /&gt;सदाबहार शायद मेरी तकदीर मेँ नहीँ। &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;विरह के बाद फिर मिलन होगी कभी, &lt;br /&gt;इसी आस से बैठा है सुखी डाल पे अलि; &lt;br /&gt;बनेगेँ फूल फिर इस उपवन की कली, &lt;br /&gt;आयेगी बहार तब  जीवन जो मेँ मिली थी कभी।&lt;br /&gt;&lt;p align="right"&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="#octtop"&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#330000"  size=3 &gt;ऊपर जाएं&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#660000"  size=4 &gt;2. प्यार का सागर&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span&gt;&lt;br /&gt;रुक जा  रात  ठहर  जा चन्दा&lt;br /&gt;देख लेने दे जी भर  जर मुझे&lt;br /&gt;कौन जाने ऎसी  अनमोल घडी&lt;br /&gt;जिन्दगी में फिर आये या नहीं&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;कमलकान्त  सी  सुन्दर  हंसी  को&lt;br /&gt;आत्मसात  कर  लेने दे अब  मुझे&lt;br /&gt;गम भरी इस दुनियां में फिर कभी&lt;br /&gt;ऎसी कुमुदिनी हंसी मिले न  मिले&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;मन्द मन्द चल ये जीवन के पल&lt;br /&gt;क्यों  जल्दी  हैं तुम्हें  इतनी  पडी&lt;br /&gt;जीवन  में  मिला  अमूल्य  मौका&lt;br /&gt;शायद  ही  सफ़र में  मिले  कभी&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;नीली झील  सी इन  आंखों में&lt;br /&gt;समायी है  दुनियां आनन्दमयी&lt;br /&gt;उस आनन्दमयी झील में मुझे&lt;br /&gt;समा लेने दे कुछ  देर ही सही&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;सुन्दरतम सी इस कोमल  ह्रिदय  में&lt;br /&gt;है  छिपा  असीम   प्यार  का  सागर&lt;br /&gt;इस  सागर  में   मुझ  निर्भीक   को&lt;br /&gt;अम्रितपा्न कर लेने दे कुछ देर सही&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;दयावान  सी  इस विशाल  ह्रिदय की&lt;br /&gt;सुकोमल  छाया में  मुझे जी लेने दे&lt;br /&gt;निष्ठुर ह्रिदय भरी   इस   दुनियां  में&lt;br /&gt;कभी फिर ऎसी छाया मिले न मिले&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;रजनी की काली  कालिमा  में  भी&lt;br /&gt;जो देती है कान्तिमय मणी प्रकाश&lt;br /&gt;उस मणी के  मधुर  सानिध्य  से&lt;br /&gt;मत दूर भगा ले जा मुझे आकाश&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;मधुमास   के   इस   मधुरिमा  में&lt;br /&gt;जीने  की  चाह है यहां किसे नहीं&lt;br /&gt;मेरे सौभाग्य को इस पलछिन को&lt;br /&gt;उडा कर कोई मत ले जा कहीं&lt;/p&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="left"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;संपर्क पता:&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_-_J_ggR3oI4/SPLaNP1hf9I/AAAAAAAAAQg/hcBci_gQK3E/s1600-h/praksh+yaday%27nirvik%27.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://2.bp.blogspot.com/_-_J_ggR3oI4/SPLaNP1hf9I/AAAAAAAAAQg/hcBci_gQK3E/s320/praksh+yaday%27nirvik%27.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5256503636218970066" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;प्रकाश यादव "निर्भीक", अधिकारी, बैँक ऑफ़ बड़ौदा, &lt;br /&gt;तिलहर शाखा, जिला-शाहजहाँपुर,उ0प्र0, मो.09935734733&lt;br /&gt;&lt;a href="mailto:nirbhik_prakash@yahoo.co.in?subject=Th:Katha-Vyatha"&gt;E-mail:nirbhik_prakash@yahoo.co.in&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="#octtop"&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#330000"  size=3 &gt;ऊपर जाएं&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt; &lt;br /&gt;&lt;hr color="#FF0000" size=5&gt;&lt;br /&gt;&lt;marquee&gt;&lt;a href="#octend"&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#FF0000"  size=4 &gt;आपका मंच&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;/font&gt;&lt;/marquee&gt;&lt;br /&gt;&lt;hr color="#FF0000" size=5&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="left"&gt;&lt;br /&gt;&lt;a name="#oct08poem9"&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#1E37F3"  size=5 &gt; राजीव तनेजा - "भडास दिल की कागज़ पे उतार लेता हूँ मैं"&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="left"&gt;&lt;br /&gt;क्या लिखूँ.. कैसे लिखूँ...&lt;br /&gt;लिखना मुझे आता नहीं...&lt;br /&gt;टीवी की झकझक..&lt;br /&gt;रेडियो की बकबक.. &lt;br /&gt;मोबाईल में एम.एम.एस.. &lt;br /&gt;कुछ मुझे भाता नहीं&lt;br /&gt;भडास दिल की...&lt;br /&gt;कब शब्द बन उबल पडती है&lt;br /&gt;टीस सी दिल में..&lt;br /&gt;कब उभर पडती है... &lt;br /&gt;कुछ पता नहीं&lt;br /&gt;&lt;p align="right"&gt;&lt;br /&gt;सोने नहीं देती है ..&lt;br /&gt;दिल के चौखट पे.. &lt;br /&gt;ज़मीर की ठक ठक&lt;br /&gt;उथल-पुथल करते.. &lt;br /&gt;विचारों के जमघट&lt;br /&gt;जब बेबस हो..तमाशाई हो.. &lt;br /&gt;देखता हूँ अन्याय हर कहीं&lt;br /&gt;फेर के सच्चाई से मुँह..&lt;br /&gt;कभी हँस भी लेता हूँ&lt;br /&gt;ज़्यादा हुआ तो.. &lt;br /&gt;मूंद के आँखे... &lt;br /&gt;ढाँप के चेहरा...&lt;br /&gt;पलट भाग लेता हूँ कहीं&lt;br /&gt;आफत गले में फँसी&lt;br /&gt;जान पडती है मुझको&lt;br /&gt;कुछ कर न पाने की बेबसी...&lt;br /&gt;जब विवश कर देती मुझको..&lt;br /&gt;&lt;p align="left"&gt;&lt;br /&gt;असमंजस के ढेर पे बैठा&lt;br /&gt;मैं 'नीरो' बन बाँसुरी बजाऊँ कैसे&lt;br /&gt;क्या करूँ...कैसे करूँ...&lt;br /&gt;कुछ सूझे न सुझाए मुझे...&lt;br /&gt;बोल मैं सकता नहीं &lt;br /&gt;विरोध कर मैं सकता नहीं&lt;br /&gt;आज मेरी हर कमी...&lt;br /&gt;बरबस सताए मुझको&lt;br /&gt;&lt;p align="right"&gt;&lt;br /&gt;उहापोह त्याग...कुछ सोच ..&lt;br /&gt;लौट मैं  फिर &lt;br /&gt;डर से भागते कदम थाम लेता हूँ ...&lt;br /&gt;उठा के कागज़-कलम...&lt;br /&gt;भडास दिल की...&lt;br /&gt;कागज़ पे उतार लेता हूँ&lt;br /&gt;ये सोच..खुश हो  &lt;br /&gt;चन्द लम्हे. ..&lt;br /&gt;खुशफहमी के भी कभी&lt;br /&gt;जी लेता हूँ मैं कि.. &lt;br /&gt;होंगे सभी जन  आबाद&lt;br /&gt;कोई तो करेगा आगाज़ &lt;br /&gt;आएगा इंकलाब यहीं..&lt;br /&gt;हाँ यहीँ...हाँ यहीँ &lt;br /&gt;सच..&lt;br /&gt;लिखना मुझे आता नहीं...&lt;br /&gt;फिर भी कुछ सोच..&lt;br /&gt;भडास दिल की...&lt;br /&gt;कागज़ पे उतार लेता हूँ मैं"&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="left"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;संपर्क पता:&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;राजीव तनेजा&lt;br /&gt;&lt;a href="mailto:rajivtaneja2004@gmail.com?subject=Th:Katha-Vyatha"&gt;E-mail:rajivtaneja2004@gmail.com&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="#octtop"&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#330000"  size=3 &gt;ऊपर जाएं&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt; &lt;br /&gt;&lt;hr color="#FF0000" size=5&gt;&lt;br /&gt;&lt;marquee&gt;&lt;a href="#octend"&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#FF0000"  size=4 &gt;आपका मंच&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;/font&gt;&lt;/marquee&gt;&lt;br /&gt;&lt;hr color="#FF0000" size=5&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="center"&gt;&lt;br /&gt;&lt;a name="#oct08poem10"&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#1E37F3"  size=5 &gt;दिव्या माथुर की कुछ कविताएँ&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_-_J_ggR3oI4/SPNyP_J7l_I/AAAAAAAAASI/_hMiolbhdEA/s1600-h/DivyaMathur.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://4.bp.blogspot.com/_-_J_ggR3oI4/SPNyP_J7l_I/AAAAAAAAASI/_hMiolbhdEA/s400/DivyaMathur.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5256670809048193010" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="left"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#660000"  size=4 &gt;1. पहला झूठ&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="left"&gt;&lt;br /&gt; जली हुई रुई की बत्ती &lt;br /&gt;बड़ी आसानी से जल जाती है &lt;br /&gt;नई बत्ती &lt;br /&gt;जलने में बड़ी देर लगाती है&lt;br /&gt;आसान हो जाता है&lt;br /&gt;रफ़्ता रफ़्ता&lt;br /&gt;है बस पहला झूठ ही&lt;br /&gt;मुश्किल से निकलता. &lt;br /&gt;&lt;p align="right"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#660000"  size=4 &gt;2. ज़ुबान&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="right"&gt;&lt;br /&gt;सिर पर चढ़ के&lt;br /&gt;बोलता है झूठ &lt;br /&gt;यही सोच के&lt;br /&gt;ख़ामोश हूँ मैं&lt;br /&gt;इसका क़तई &lt;br /&gt;ये अर्थ न लो&lt;br /&gt;कि मेरे मुँह में&lt;br /&gt;ज़ुबान नहीं&lt;br /&gt;&lt;p align="center"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#660000"  size=4 &gt;3. मेरी ख़ामोशी&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="center"&gt;&lt;br /&gt;मेरी ख़ामोशी&lt;br /&gt;एक गर्भाशय है&lt;br /&gt;जिसमें पनप रहा है&lt;br /&gt;तुम्हारा झूठ&lt;br /&gt;एक दिन जनेगी ये&lt;br /&gt;तुम्हारी अपराध भावना को&lt;br /&gt;मैं जानती हूँ&lt;br /&gt;तुम साफ़ नकार जाओगे&lt;br /&gt;इससे अपना कोई रिश्ता&lt;br /&gt;यदि मुकर न भी पाए तो&lt;br /&gt;उसे किसी के भी&lt;br /&gt;गले मढ़ दोगे तुम&lt;br /&gt;कोई कमज़ोर तुम्हें &lt;br /&gt;फिर कर देगा बरी&lt;br /&gt;पर तुम&lt;br /&gt;भूल कर भी न इतराना&lt;br /&gt;क्योंकि  एक गर्भाशय है&lt;br /&gt;जिसमें पनप रहा है&lt;br /&gt;तुम्हारा झूठ! &lt;br /&gt;&lt;p align="left"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#660000"  size=4 &gt;4. बचाव&lt;br /&gt;&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="left"&gt;&lt;br /&gt;कचहरी में बड़े बड़े झूठ &lt;br /&gt;एक छोटे से&lt;br /&gt;सच के सामने&lt;br /&gt;सिर झुकाए खड़े थे&lt;br /&gt;और बाहर&lt;br /&gt;सबसे नज़रें चुराता&lt;br /&gt;सच&lt;br /&gt;छिपता छिपाता&lt;br /&gt;अपने बचने का &lt;br /&gt;रस्ता ढूँढ रहा था।&lt;br /&gt;&lt;p align="right"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#660000"  size=4 &gt;5. जंगल&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="right"&gt;&lt;br /&gt;शक और झूठ&lt;br /&gt;बो दिये उसने मेरे मन में&lt;br /&gt;खर पतवार से &lt;br /&gt;लगे वे बढ़ने&lt;br /&gt;अब तो बस &lt;br /&gt;जंगल ही जंगल है&lt;br /&gt;बाहर जंगल&lt;br /&gt;जंगल मन में!&lt;br /&gt;&lt;p align="left"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#660000"  size=4 &gt;6. शैतान &lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="left"&gt;&lt;br /&gt;शैतान का पिता है झूठ &lt;br /&gt;लम्बा चौड़ा और मज़बूत&lt;br /&gt;सच है गांधी जैसा कृशकाय&lt;br /&gt;बदन पे धोती लटकाए!&lt;br /&gt;&lt;p align="right"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#660000"  size=4 &gt;7. अँधेरा&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="right"&gt;&lt;br /&gt;सच को न तो&lt;br /&gt;ओढ़नी चाहिए&lt;br /&gt;न ही कोई बिछौना&lt;br /&gt;झूठ ही ढूँढता है&lt;br /&gt;एक काली चादर&lt;br /&gt;और छिपने के लिए&lt;br /&gt;एक अँधेरा कोना!&lt;br /&gt;&lt;p align="center"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#660000"  size=4 &gt;8. आरोप &lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="center"&gt;&lt;br /&gt;झोंपड़े की&lt;br /&gt;झिर्रियों से&lt;br /&gt;झर के आते झूठ&lt;br /&gt;ख़सरे से फैलने लगे&lt;br /&gt;बदन पर मेरे&lt;br /&gt;कितने छिद्रों को बन्द करती&lt;br /&gt;केवल अपने दो हाथों से&lt;br /&gt;सच को सीने में छिपा&lt;br /&gt;मैं जलती चिता पर&lt;br /&gt;बैठ गई&lt;br /&gt;न रहीं झिर्रियाँ&lt;br /&gt;न झोंपड़ा&lt;br /&gt;न ही झूठ!&lt;br /&gt;&lt;p align="left"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#660000"  size=4 &gt;9. सती हो गया सच&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="left"&gt;&lt;br /&gt;तुम्हारे छोटे, मँझले&lt;br /&gt;और बड़े झूठ&lt;br /&gt;खौलते रहते थे मन में&lt;br /&gt;दूध पर मलाई सा&lt;br /&gt;मैं जीवन भर&lt;br /&gt;ढकती रही उन्हें&lt;br /&gt;पर आज उफ़न के&lt;br /&gt;गिरते तुम्हारे झूठ&lt;br /&gt;मेरे सच को&lt;br /&gt;दरकिनार गए&lt;br /&gt;मेरी ओट लिए&lt;br /&gt;तुम साधु बने खड़े रहे&lt;br /&gt;और झूठ की चिता पर&lt;br /&gt;सती हो गया सच!&lt;br /&gt;&lt;p align="right"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#660000"  size=4 &gt;10. आधा सच &lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="right"&gt;&lt;br /&gt;तुम्हारा आधा सच  &lt;br /&gt;बड़ा खतरनाक निकला&lt;br /&gt; आधी ज़िन्दगी को मेरी&lt;br /&gt; मसला कुचला&lt;br /&gt; बाकी को दिया&lt;br /&gt;तुमने झुठला! &lt;br /&gt;&lt;p align="center"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#660000"  size=4 &gt;11. औकात&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="center"&gt;&lt;br /&gt;जानते हुए कि&lt;br /&gt;वह झूठ बोल रहा है&lt;br /&gt;सब चुपचाप सुनते रहे&lt;br /&gt;जानते हुए कि&lt;br /&gt;मैं सच बोल रही हूँ&lt;br /&gt;किसी ने मेरी न सुनी&lt;br /&gt;बात सच या झूठ की नहीं&lt;br /&gt;औकात की है!&lt;br /&gt;&lt;p align="left"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#660000"  size=4 &gt;12. रवायत&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="left"&gt;&lt;br /&gt;अजब ये रवायत चली आ रही है&lt;br /&gt;झूठे को झूठा कहते नहीं है&lt;br /&gt;सुन झूठ लेती है दुनिया अदब से&lt;br /&gt;सच को सदा पर सब सहते नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="center"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#FF0000"  size=4 &gt;दिव्या माथुर जी का संक्षिप्त परिचय&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_-_J_ggR3oI4/SPNyP_J7l_I/AAAAAAAAASI/_hMiolbhdEA/s1600-h/DivyaMathur.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://4.bp.blogspot.com/_-_J_ggR3oI4/SPNyP_J7l_I/AAAAAAAAASI/_hMiolbhdEA/s400/DivyaMathur.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5256670809048193010" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;जन्म एवं शिक्षा दीक्षा: &lt;/strong&gt;दिल्ली में एम. ए. (अँग्रेज़ी) के अतिरिक्त दिल्ली एवं ग्लास्गो से पत्रकारिता में डिप्लोमा। चिकित्सा-आशुलिपि का स्वतंत्र अध्ययन।&lt;br&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;कर्मक्षेत्र:&lt;/strong&gt;1985 में आप भारतीय उच्चायोग से जुड़ीं और 1992 से नेहरु केंद्र में वरिष्ठ कार्यक्रम अधिकारी के पद पर कार्यरत हैं।  पिछले दो सालों में उन्होने क़रीब 500 से भी अधिक कार्यक्रमों का आयोजन किया, उनका ये रिकार्ड अभी तक शायद ही कोई तोड़ पाया हो। आपका लन्दन के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन मे अपूर्व योगदान रहा है।&lt;br&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;रौयल सोसाइटी की फ़ेलो,&lt;/strong&gt; वातायन : साउथ बैंक पर कविता की संस्थापक, आशा फ़ाउंडेशन और पेन संस्थाओं की संस्थापक सदस्य, यू के हिन्दी समिति की उपाध्यक्ष, नाज़िया हसन फ़ाउंडेशन और विंडरश पुरस्कार समितियों की सदस्य, कथा यू के की पूर्व अध्यक्ष और अंतर्राष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन की सांस्कृतिक अध्यक्ष, ग्रेट ब्रिटेन हिन्दी लेखक संघ की प्रबंध सचिव, आप 'प्रवासी टाईम्स' की प्रबंध संपादक और कई पत्र, पत्रिकाओं के संपादक मंडल में शामिल हैं, जैसे कि 'अक्षरम', 'पुरवाई' और 'विश्व विवेक'। नेत्रहीनता से सम्बंधित कई संस्थाओं में इनका अभूतपूर्व योगदान रहा है. इसी विषय पर इनकी कहानियाँ और कविताऎं ब्रेल लिपि में प्रकाशित हो चुकी हैं।&lt;br /&gt;&lt;br&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;प्रकाशित रचनाएँ :&lt;/strong&gt;अंतःसलिला, रेत का लिखा, ख़्याल तेरा, चंदन पानी और 11 सितम्बर : सपनों की राख तले,  झूठ,  झूठ और झूठ (कविता संग्रह), पंगा और आक्रोश (कहानी संग्रह - पदमानंद साहित्य सम्मान द्वारा सम्मानित), &lt;strong&gt;Odyssey&lt;/strong&gt; : Stories by Indian Women Writers Settled Abroad (अँग्रेज़ी में संपादन) एवं &lt;strong&gt;Asha &lt;/strong&gt;: Stories by Indian Women Writers (अँग्रेज़ी में संपादन) । &lt;strong&gt;आक्रोश, Odyssey एवं Asha&lt;/strong&gt; तीनों संग्रहों के पेपरबैक संस्करण आ चुके हैं।&lt;br&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;साहित्येतर गतिविधियाँ :&lt;/strong&gt; पॉल रौबसन द्वारा प्रस्तुत आपके नाटक Tete-a-tete  और अन्य कहानियों का भी सफल मंचन. हाल ही में दिल्ली दूरदर्शन ने इनकी कहानी, सांप सीढी, पर एक फ़िल्म निर्मित की है. नैशनल फ़िल्म थियेटर के लिये अनुवाद के अतिरिक्त बी बी सी द्वारा निर्मित फ़िल्म, कैंसर, का हिंदी रूपांतर, मंत्रा लिंगुआ के लिए बच्चों की कई पुस्तकों का हिंन्दी में अनुवाद, रेडियो एवं दूरदर्शन पर इनके कार्यक्रम के नियमित प्रसारण के अतिरिक्त, इनकी कविताओं को कला संगम संस्था ने भारतीय नृत्य शैलियों के माध्यम से सफलतापूर्वक प्रस्तुत किया। राधिका चोपड़ा, रीना भारद्वाज, कविता सेठ और सतनाम सिंह सरीखे विशिष्ट संगीतज्ञों ने इनके गीत और ग़ज़लों को न केवल संगीतबद्ध किया, अपनी आवाज़ से भी नवाज़ा।&lt;br&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;सम्मान:&lt;/strong&gt;राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं द्वारा सम्मानित एवं निमंत्रित, दिव्याजी को Arts Achiever-2003 Award for the oustanding contribution and innovation in the field of Arts by the Arts Council of England), Individuals of Inspiration and Dedication Honour (Chinmoy Mission),  कथा यू के द्वारा पदमानंद साहित्य सम्मान, प्रवासी साहित्य सम्मान, समाज सेवा में योगदान के लिए Experience Corps Recognition &amp; Merit Certificate, यू.के. हिंदी समिति द्वारा संस्कृति सेवा सम्मान और कविता के क्षेत्र में इंटरनैशनल लाएब्रोरी ऑफ़ पोइटरी द्वारा सम्मानित किया जा चुका है. कानपुर विश्वविध्याल के अंतर्गत, डा अर्चना देवी ने ‘दिव्या माथुर की साहित्यिक उपलब्धियाँ नामक स्नातकोत्तर शोध निबन्ध लिखा है. इन्हें  ‘इक्कीसवीं सदी की प्रेणात्मक महिलाएं’ और ‘ऐशियंस हू ज़ हू की सूचियों में भी सम्मलित किया गया है।&lt;br&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;संप्रति :&lt;/strong&gt; नेहरु केंद्र (लंदन में भारतीय उच्चायोग का सांस्कृतिक विभाग) में वरिष्ठ कार्यक्रम अधिकारी। &lt;br /&gt;&lt;strong&gt;संपर्क पता:&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;Senior Programme Officer&lt;br /&gt;The Nehru Centre&lt;br /&gt;8 South Audley Street, London W1K 1HF&lt;br /&gt;Tel : 020 7491 3567/7493 2019, &lt;br /&gt;www.nehrucentre.org.uk&lt;br /&gt;&lt;a href="mailto:divyamathur@aol.com?subject=Th:Katha-Vyatha"&gt;E-mail: divyamathur@aol.com&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="#octtop"&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#330000"  size=3 &gt;ऊपर जाएं&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt; &lt;br /&gt;&lt;hr color="#FF0000" size=5&gt;&lt;br /&gt;&lt;marquee&gt;&lt;a href="#octend"&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#FF0000"  size=4 &gt;आपका मंच&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;/font&gt;&lt;/marquee&gt;&lt;br /&gt;&lt;hr color="#FF0000" size=5&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="center"&gt;&lt;br /&gt;&lt;a name="#oct08poem11"&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#1E37F3"  size=5 &gt;सीमा गुप्ता की चार कविताएँ&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;table border=3  bordercolor="#660008"&gt;&lt;tr&gt;&lt;td&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="left"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#660000"  size=4 &gt;1. " मैं  दूंढ लाता हूँ"&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;table&gt;&lt;tr&gt;&lt;td valign="top" align="top"&gt; &lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_-_J_ggR3oI4/SPLdfD3ra_I/AAAAAAAAARQ/9UTQoepNEt4/s1600-h/seema3.jpg"&gt;&lt;img style="cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://4.bp.blogspot.com/_-_J_ggR3oI4/SPLdfD3ra_I/AAAAAAAAARQ/9UTQoepNEt4/s320/seema3.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5256507240779312114" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/td&gt;&lt;td&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="left"&gt; &lt;br /&gt;अगर उस पार हो तुम " मैं अभी कश्ती से आता हूँ .....&lt;br /&gt;जहाँ हो तुम मुझे आवाज़ दो " मैं दूंढ लाता हूँ"&lt;br /&gt;किसी बस्ती की गलियों में किसी सहरा के आँगन में .....&lt;br /&gt;तुम्हारी खुशबुएँ फैली जहाँ भी हों मैं जाता हूँ&lt;br /&gt;तुम्हारे प्यार की परछाइयों में रुक के जो ठहरे .....&lt;br /&gt;सफर मैं जिंदिगी का ऐसे ख्वाबों से सजाता हूँ&lt;br /&gt;तुम्हारी आरजू ने दर बदर भटका दिया मुझको .....&lt;br /&gt;तुम्हारी जुस्तुजू से अपनी दुनिया को बसाता हूँ&lt;br /&gt;कभी दरया के साहिल पे कभी मोजों की मंजिल पे....&lt;br /&gt;तुम्हें मैं ढूँडने हर हर जगह अपने को पाता हूँ&lt;br /&gt;हवा के दोष पर हो कि पानी की रवानी पे ....&lt;br /&gt;तुम्हारी याद में मैं अपनी हस्ती को भुलाता हूँ&lt;br /&gt;मुझे अब यूँ ने तड़पाओ चली आओ चली आओ ......&lt;br /&gt;चली आओ चली आओ चली आओ चली आओ&lt;br /&gt;अगर उस पार हो तुम " मैं अभी कश्ती से आता हूँ .....&lt;br /&gt;जहाँ हो तुम मुझे आवाज़ दो " मैं दूंढ लाता हूँ".....&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;/table&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;br /&gt;&lt;tr&gt;&lt;td&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="right"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#660000"  size=4 &gt;2. "आतंकवाद " &lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;table&gt;&lt;tr&gt;&lt;td valign="top" align="top"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_-_J_ggR3oI4/SPLd4pWhOpI/AAAAAAAAARY/ujtFZatdMRQ/s1600-h/seema5.jpg"&gt;&lt;img style="cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://4.bp.blogspot.com/_-_J_ggR3oI4/SPLd4pWhOpI/AAAAAAAAARY/ujtFZatdMRQ/s320/seema5.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5256507680337509010" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/td&gt;&lt;td&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="right"&gt;&lt;br /&gt;आतंकवादीयों को मुह तोड़ जवाब ,&lt;br /&gt;अखीर कब दिया जाएगा,&lt;br /&gt;क्या यूँही देखते रहेंगे हम ???&lt;br /&gt;और वक्त निकल जाएगा....&lt;br /&gt;भगवान ने तो बस इंसान बनाये ,&lt;br /&gt;फ़िर ये आतंकवादी कहाँ से आए?&lt;br /&gt;इस सवाल का जवाब कब&lt;br /&gt;और किस्से लिया जाएगा ....&lt;br /&gt;गुमराह करके नौजवानों को&lt;br /&gt;आतंक का जहर पिलाते हैं जो&lt;br /&gt;उन्हें प्रेम की धारा का अम्रत&lt;br /&gt;आखिर कब पिलाया जाएगा?&lt;br /&gt;जिस्म पर बम लगाकर,&lt;br /&gt;हमे बर्बाद करते है जो,&lt;br /&gt;उन्हें जिन्दगी का सबक,&lt;br /&gt;आखिर कब दिया जाएगा?&lt;br /&gt;ह्थीयारों हथगोलों से ,&lt;br /&gt;खून की होली खेल रहें है जो,&lt;br /&gt;उन्हें इंसानीयत का मतलब,&lt;br /&gt;कब समझाया जाएगा ?&lt;br /&gt;रोकना होगा हमे&lt;br /&gt;इस बढ़ती हुई बीमारी को&lt;br /&gt;वरना ये आतंकवाद का सांप&lt;br /&gt;हम सबको डस जाएगा .... &lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;/table&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;br /&gt;&lt;tr&gt;&lt;td&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="left"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#660000"  size=4 &gt;3. "बस यूँही ......"&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;table&gt;&lt;tr&gt;&lt;td valign="top" align="top"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_-_J_ggR3oI4/SPLeK7TaCGI/AAAAAAAAARg/lL1itC00RY8/s1600-h/seema6.jpg"&gt;&lt;img style="cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://2.bp.blogspot.com/_-_J_ggR3oI4/SPLeK7TaCGI/AAAAAAAAARg/lL1itC00RY8/s320/seema6.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5256507994393938018" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/td&gt;&lt;td&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="left"&gt;&lt;br /&gt;है बडा दिलनशी प्यार का सिलसिला ,&lt;br /&gt;मेरे दिल को है तेरे दिल से मिला .&lt;br /&gt;तुम मुझे बस यूँही प्यार करते रहो ,&lt;br /&gt;बस यूँही , बस यूँही ,बस यूँही ......&lt;br /&gt;दिन गुज़र जाने पर रात होती है यूँ ,&lt;br /&gt;दिल से तेरे मेरी बात होती है यूँ ,&lt;br /&gt;मुझसे तुम बस यूँही बात करते रहो&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बस यूँही , बस यूँही ,बस यूँही ......&lt;br /&gt;दिल में मेरे जला कर मोहब्बत के दीप ,&lt;br /&gt;तुम ने उम्मीद को कर दिया है समीप ,&lt;br /&gt;इनको बुझने ना देना जलाते रहो ,&lt;br /&gt;बस यूँही , बस यूँही ,बस यूँही ......&lt;br /&gt;मेरी दुनिया को था बस तेरा इंतज़ार ,&lt;br /&gt;इसको महका दिया तुने जाने बहार ,&lt;br /&gt;इस चमन में खड़े मुस्कुराते रहो ,&lt;br /&gt;बस यूँही , बस यूँही ,बस यूँही &lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;/table&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;br /&gt;&lt;tr&gt;&lt;td&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="center"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#660000"  size=4 &gt;4. "हो जाने दो " &lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="center"&gt;&lt;br /&gt;&lt;table&gt;&lt;tr&gt;&lt;td valign="top" align="top"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_-_J_ggR3oI4/SPLcQLGsYxI/AAAAAAAAARI/CYOyEwYBVW8/s1600-h/seema2.jpg"&gt;&lt;img style="cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://1.bp.blogspot.com/_-_J_ggR3oI4/SPLcQLGsYxI/AAAAAAAAARI/CYOyEwYBVW8/s320/seema2.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5256505885511672594" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/td&gt;&lt;td&gt;&lt;br /&gt;ना छुपाओ अपने वजूद को इस जमाने से ,&lt;br /&gt;की ,दुनिया मे ख़ुद की पहचान हो जाने दो.&lt;br /&gt;आईना हूँ , तेरा त्स्सब्बुर नज़र आऊंगा ,&lt;br /&gt;की , मुझे अपने अक्स मे एक बार ढल जाने दो.&lt;br /&gt;मोहब्बत गुनाह ही सही, पर खूबसूरत तो है ,&lt;br /&gt;की , इश्क मे आज अपने बदनाम हो जाने दो.&lt;br /&gt;दिल की धड़कन , शोला -ऐ - एहसास ही सही&lt;br /&gt;की , इस आग मे आज मुझको जल जाने दो.&lt;br /&gt;हाँ, मोहब्बत है मुझसे , ये इकरार कर लो&lt;br /&gt;की , अपने आगोश मे मुझको बिखर जाने दो .....&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;/table&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;br /&gt;&lt;tr&gt;&lt;td&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;br&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="left"&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="#octtop"&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#330000"  size=3 &gt;ऊपर जाएं&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;FONT color="#ff0000"  size=3 &gt;&lt;strong&gt;सीमा गुप्ता का परिचय:&lt;/strong&gt;&lt;/font&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_-_J_ggR3oI4/SO9Cf8wJlfI/AAAAAAAAAP0/UzGcdTPllpw/s1600-h/seema+gupta.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://2.bp.blogspot.com/_-_J_ggR3oI4/SO9Cf8wJlfI/AAAAAAAAAP0/UzGcdTPllpw/s320/seema+gupta.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5255492406816118258" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;जन्म : अम्बाला (हरियाणा) शिक्षा : एम.कॉम. लेखन और प्रकाशन : अपकी पहली कविता “लहरों की भाषा" चौथी कक्षा में लिखी थी जिसे की बहुत सराहा गया। यहीं से आपको लिखने के लिए प्रोत्साहन मिला। इनकी कई कविताएँ और ग़ज़लें पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। आपकी अधिकतर कविताओं में पीड़ा, विरह, बिछुड़ना और आँसू होते हैं; क्यों – शायद इनके अन्तर्मन से उभरती इन कविताओं में कुछ खास कहने को है जो हर किसी का ध्यान अपनी ओर खींच लेता है। आपकी कई कविताएँ अंतरजाल पर “हिन्दी युग्म" में भी प्रकाशित हो चुकी हैं। आपने उद्योग जगत पर ख्याति प्राप्त दो पुस्तकें भी लिखीं हैं, ये दोनों पुस्तकें राष्ट्रीय स्तर पर उद्योग जगत में काफी चर्चित रही। प्रथम पुस्तक का नाम है - &lt;strong&gt;"GUIDE LINES INTERNAL AUDITING FOR QUALITY SYSTEM"&lt;/strong&gt; (प्रकाशित:2000 में) और दूसरी पुस्तक &lt;strong&gt;"GUIDE LINES FOR QUALITY SYSTEM AND MANAGEMENT REPRESENTATIVE"&lt;/strong&gt; (प्रकाशित: 2001 में) है। &lt;strong&gt;संप्रती:&lt;/strong&gt; जनरल मैनेजर (नवशिखा पॉली पैक), गुड़गाँव ।&lt;br /&gt;&lt;p align="center"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;संपर्क:&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;ul&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;Web Site: &lt;a href="http://mairebhavnayen.blogspot.com/ " target="new"&gt;http://mairebhavnayen.blogspot.com&lt;/a&gt;&lt;/li&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;Email:&lt;a href="mailto:seemagupta9@gmail.com?subject=Th:Katha-Vyatha"&gt;E-mail: seemagupta9@gmail.com&lt;/a&gt;&lt;/li&gt;&lt;/ul&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;/table&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="#octtop"&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#330000"  size=3 &gt;ऊपर जाएं&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;hr color="#FF0000" size=5&gt;&lt;br /&gt;&lt;marquee&gt;&lt;a href="#octend"&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#FF0000"  size=4 &gt;आपका मंच&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;/font&gt;&lt;/marquee&gt;&lt;br /&gt;&lt;hr color="#FF0000" size=5&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="center"&gt;&lt;br /&gt;&lt;a name="#oct08poem12"&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#1E37F3"  size=5 &gt;डॉ परमजीत ओबेरॉय  की चार कविताएँ&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="left"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#660000"  size=4 &gt;1.  रे मन&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="left"&gt; &lt;br /&gt;मन कर तू चिंतन&lt;br /&gt;सदा सच्चाई और मृत्यु का।&lt;br /&gt;मृत्यु शाश्वत&lt;br /&gt;अन्य सब नश्वर।&lt;br /&gt;देता सभी को एक सा ईश्वर&lt;br /&gt;कर्मोंनुसार बदलता है भाग्य क्षण क्षण।&lt;br /&gt;सबमें उसी का ही अंश बसा&lt;br /&gt;रखकर यह ध्यान&lt;br /&gt;सबसे कर प्रेम व्यवहार&lt;br /&gt;जाएगा जब तू उसके द्वार&lt;br /&gt;तभी दे पायेगा उत्तर&lt;br /&gt;करके आँखें चार।&lt;br /&gt;जिसके जीवन में सदाचार&lt;br /&gt;उसे मिलता है बड़ों का बरदान।&lt;br /&gt;सभी कुकर्मों का छोड़ ध्यान&lt;br /&gt;अपने में भर ले शुभविचार।&lt;br /&gt;जाना है सबको इस जीवन सागर के पार&lt;br /&gt;कर इसका अपने मन में विचार बारंबार।&lt;br /&gt;&lt;br&gt;&lt;a href="#octtop"&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#330000"  size=3 &gt;ऊपर जाएं&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="right"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#660000"  size=4 &gt;2.  चक्र&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="right"&gt; &lt;br /&gt;वर्षा के दिन देख&lt;br /&gt;सहसा कुछ कीट पतंगें&lt;br /&gt;मन हो जाता है व्यग्र&lt;br /&gt;सोचकर यह कि&lt;br /&gt;हम भी थे कभी उन जैसे&lt;br /&gt;आज हमें है घृणा उनसे&lt;br /&gt;कभी उन्हें भी होती होगी हमसे&lt;br /&gt;जब वे थे मनुष्य।&lt;br /&gt;घृणा का यह चक्र&lt;br /&gt;दिन पति दिन होता जा रहा है&lt;br /&gt;चक्र।&lt;br /&gt;&lt;br&gt;&lt;a href="#octtop"&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#330000"  size=3 &gt;ऊपर जाएं&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="left"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#660000"  size=4 &gt;3.  समय की आग&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="left"&gt; &lt;br /&gt;धधकती आग&lt;br /&gt;मानव मन में&lt;br /&gt;ईर्ष्या की द्वेष की&lt;br /&gt;भूख की द्नंद्व की।&lt;br /&gt;स्वयं को&lt;br /&gt;अपनी विद्वत्ता श्रेष्ठता&lt;br /&gt;महानता दिखाने की&lt;br /&gt;वास्तव में आग है&lt;br /&gt;पवित्रता दृढ़ता सच्चाई और&lt;br /&gt;उज्ज्वलता का प्रतीक।&lt;br /&gt;&lt;br&gt;&lt;a href="#octtop"&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#330000"  size=3 &gt;ऊपर जाएं&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="right"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#660000"  size=4 &gt;4. शरीर घट में &lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="right"&gt; &lt;br /&gt;शरीर घट में &lt;br /&gt;आत्मारूपी यात्री का डेरा&lt;br /&gt;यात्री जब चाहे चला जाए&lt;br /&gt;उसका न कोई एक बसेरा।&lt;br /&gt;घूम सर्व विश्व सागर में&lt;br /&gt;मिला उसे न कहीं सवेरा&lt;br /&gt;जन्म सवेरा &lt;br /&gt;जवानी दोपहर&lt;br /&gt;शाम संध्या&lt;br /&gt;रात बुढ़ापा जान&lt;br /&gt;लगे सब ओर अँधेरा&lt;br /&gt;इन सब का ज्ञान है तुझे&lt;br /&gt;हे मानव &lt;br /&gt;फिर भी मन न तेरा फिरा&lt;br /&gt;भेद भाव और माया जाल में &lt;br /&gt;बीत रहा यह जीवन तेरा&lt;br /&gt;मनुष्य जन्म नहीं मिलना आसान&lt;br /&gt;जान सब अनजान बना रहा तू&lt;br /&gt;मन में ले चिंताओं का घेरा&lt;br /&gt;अज्ञान धुंध में न दिखता तुझे&lt;br /&gt;खोई सपना सुंदर सुनहला&lt;br /&gt;कितने क्षण आए जागने के तेरे&lt;br /&gt;सदा तूने है जिनसे मुख मोड़ा&lt;br /&gt;इस झूठ और माया की दुनिया में &lt;br /&gt;जीवन भर करता रहा तू&lt;br /&gt;मेरा मेरा &lt;br /&gt;अंत समय जब आएगा&lt;br /&gt;रह जाएगा यहाँ सब तेरा&lt;br /&gt;याद रख सदा &lt;br /&gt;जाना पड़ेगा ईश द्वार में &lt;br /&gt;खाली और अकेला&lt;br /&gt;इस क्षणभंगुर शरीर से&lt;br /&gt;करता रहा तू मोह बहुतेरा&lt;br /&gt;पंचतत्वों का जो बना &lt;br /&gt;था उसे सत्य मान &lt;br /&gt;तू बहुत खेला।&lt;br /&gt;&lt;br&gt;&lt;a href="#octtop"&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#330000"  size=3 &gt;ऊपर जाएं&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#FF0000"  size=4 &gt;डॉ परमजीत ओबेरॉय:  संक्षिप्त परिचय&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_-_J_ggR3oI4/SPLa_ynXY8I/AAAAAAAAAQw/Wh_l9GYht98/s1600-h/Paramjitoberai.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://3.bp.blogspot.com/_-_J_ggR3oI4/SPLa_ynXY8I/AAAAAAAAAQw/Wh_l9GYht98/s320/Paramjitoberai.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5256504504548287426" /&gt;&lt;/a&gt;4, दिसंबर 1966 को जन्म। दिल्ली यूनिवर्सिटी से एम.ए. और पी.एच-डी.। 16 सालों तक विभिन्न स्कूलों में अध्यापन के बाद बहरीन में पढ़ाती हैं ।&lt;br /&gt;1. Welham Boys’ School, Dehradun, Uttranchal, India. Residential School affiliated with ICSE.[1992-1996] 2. The Indian School, Al-Ghubra, Muscat, Oman. CBSE syllabus. [1996-1998]  3. Shanti Gyan Niketan, New Delhi. CBSE syllabus. [1998-1999]   4. The Indian School, Sohar, Oman. CBSE syllabus. [1999-2005]  5. The Indian School, Bahrain. CBSE syllabus. [2005-2007]   6. New Millennium School [Delhi Public School] Bahrain. CBSE Syllabus. [2007- Cont.]   Extra Co-Curricular Activities : She can organize various Literary activities.  Special Knowledge : Hindi - English Typing and Computer.  Publish Work : Workbooks for classes : 10th, 9th, 7th and 4th.  She can teach Punjabi as Third language and looking the school magazine (Hindi Section) &lt;br /&gt;&lt;strong&gt;संपर्क पता:&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;NEW MILLENNIUM SCHOOL, P.O.BOX 26271, AL-AHLI CLUB&lt;br /&gt;COMPLEX, ZINJ-KINGDOM OF BAHRAIN. &lt;br /&gt;MOBILE NOS. 00973-39629609/ 36676203. &lt;br /&gt;&lt;a href="mailto:rajesh_oberoi67@yahoo.com?subject=Th:Katha-Vyatha"&gt;E-mail:rajesh_oberoi67@yahoo.com&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;a href="#octtop"&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#330000"  size=3 &gt;ऊपर जाएं&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;hr color="#FF0000" size=5&gt;&lt;br /&gt;&lt;marquee&gt;&lt;a href="#octend"&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#FF0000"  size=4 &gt;आपका मंच&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;/font&gt;&lt;/marquee&gt;&lt;br /&gt;&lt;hr color="#FF0000" size=5&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="center"&gt;&lt;br /&gt;&lt;a name="#oct08poem13"&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#1E37F3"  size=5 &gt;दीप्ति गुप्ता की कविता:&amp;nbsp;&amp;nbsp;'जीवन'&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="center"&gt;&lt;br /&gt;फूल ने कहा दरख्त से जीवन क्या है ? &lt;br /&gt;दरख्त ने कहा - जीवन विकास की एक अनूठी वर्तुल यात्रा है,&lt;br /&gt;जो शुरू होती है – बीज के प्रस्फुटन से,  परिवर्द्धित होती  है, &lt;br /&gt;पोषित  होती  है  शाखा,   प्रशाखाओं  में........ हरियाती है, &lt;br /&gt;किसलयों में, किसलयों से  पत्तों  में  पत्तों  के बीच  पुष्पित &lt;br /&gt;फूलों में, फूलों  से  फलते  फलों में, फलों में छुपे ‘बीज’ में &lt;br /&gt;‘वही बीज’  जिसने  जड़ों  को  धरती  में  गहरे जमाया था &lt;br /&gt;तने,  शाखाओं,  पतों,  फूलों  से   होता  हुआ  मेरे   शीर्ष, &lt;br /&gt;मेरी  अन्तिम  परिणति  फल  में  चुपके  से  समा जाता है ! &lt;br /&gt;&lt;p align="center"&gt;  &lt;br /&gt;फूल को चकित देख, दरख्त ने पूछा - क्यों तुम इतने खामोश हो ? &lt;br /&gt;क्या  जीवन  तुम्हें  वर्तुल  नहीं  लगता ? &lt;br /&gt;तो फिर तुम्हारी दृष्टि में ‘‘जीवन क्या है ?’’ &lt;br /&gt;फूल गहरी उदासी से, हौले-हौले बोला - जीवन  एक महायात्रा है,&lt;br /&gt;जो  सूर्य  की  सुनहरी किरणों से शुरू होकर दिन के  उजाले से &lt;br /&gt;गुजरती हुई संध्या झुटपुटे से सरकती हुई रात के गहन अँधेरे में &lt;br /&gt;खो जाती है ! तुम   देखते  नहीं,  प्रातः  खिला मेरा रूप &lt;br /&gt;शाम  तक  कितना  बेरौनक हो जाता है ? &lt;br /&gt;सुबह  सीधी  तनी  मेरी  कमर  शाम तक कैसी झुक जाती है ! &lt;br /&gt;मुरझाई  झुर्राई  मेरी  पँखुड़ियाँ  कैसी   बेजान  हो  जाती  हैं ? &lt;br /&gt;रात   के   आने   तक   मेरा  अस्तित्व &lt;br /&gt;एक कंकाल में परिणत हो चुका होता है.......! &lt;br /&gt;&lt;p align="center"&gt;             &lt;br /&gt;तभी फूल ने वृक्ष की शाख पर बैठी बुलबुल की ओर देखा &lt;br /&gt;और कहा - क्यों ? तुम क्या सोचती हो चिरैया कि - &lt;br /&gt;जीवन क्या है ?&lt;br /&gt;चिरैया ने पँख फड़फड़ाए, इस डाल से उस डाल पर फुदकी &lt;br /&gt;और बोली - भाई मेरे ! जीवन तो परिश्रम है, &lt;br /&gt;भोर भये उठती हूँ, दूर - दूर तक उड़ती हूँ,&lt;br /&gt;तब भी नहीं थकती हूँ सारे दिन दाने की तलाश में &lt;br /&gt;श्रम ही श्रम करती हूँ दाना चुगती हूँ, &lt;br /&gt;बच्चो को खिलाती हूँ, बैठे - बैठे सोती हूँ &lt;br /&gt;आराम कहाँ है जीवन में ..!!!&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;a href="#octtop"&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#330000"  size=3 &gt;ऊपर जाएं&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="left"&gt;&lt;br /&gt;&lt;FONT color="#ff0000"  size=4 &gt;&lt;strong&gt;डॉ.दीप्ति गुप्ता का परिचय:&lt;/strong&gt;&lt;/font&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_j9P143p-n-I/SO9ntUzBXUI/AAAAAAAAABs/ECkw3DWrDOA/s1600-h/dr_deepti_gupta.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://4.bp.blogspot.com/_j9P143p-n-I/SO9ntUzBXUI/AAAAAAAAABs/ECkw3DWrDOA/s320/dr_deepti_gupta.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5255533318539140418" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="justtify"&gt;&lt;br /&gt;आगरा विश्वविद्यालय से शिक्षा- दीक्षा ग्रहण की। कालजयी साहित्यकार अमृतलाल नागर के उपन्यासों पर पी.एच-डी. की उपाधि प्राप्त की । तदनन्तर क्रमश : तीन विश्वविद्यालयों - रूहेलखंड विश्वविद्यालय, जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्ली एवं पुणे विश्वविद्यालय के हिंदी  विभाग में अध्यापनरत रहीं। तीन  वर्ष के लिए भारत सरकार व्दारा "मानव संसाधन विकास मंत्रालय", नई दिल्ली में "शैक्षिक सलाहकार" पद पर नियुक्त रहीं। समय से पूर्व रीडर पद से स्वैच्छिक अवकाश लेकर से पूर्णतया रचनात्मक लेखन में संलग्न।&lt;br /&gt;राजभाषा विभाग, हिन्दी संस्थान, शिक्षा निदेशालय,  व शिक्षा मंत्रालय, नई दिल्ली एवं Casp, MIT,  Multiversity  Software Company , Unicef ,Airlines आदि अनेक  सरकारी एवं गैर-सरकारी विख्यात संस्थानों में एक प्रतिष्ठित अनुवादक के रूप में अपनी सेवाएँ दी। &lt;br /&gt;हिंदी और अंग्रेज़ी में कहानियाँ व कविताएँ, सामाजिक सरोकारों के लेख व पत्र आदि प्रसिध्द साहित्यिक पत्रिकाओं - "साक्षात्कार"  (भोपाल), "गगनांचल" (ICCR, Govt of India), "अनुवाद"," नया ग्यानोदय" (नई दिल्ली), हिंदुस्तान,  पंजाब केसरी,  नवभारत टाइम्स, जनसत्ता, विश्वमानव, सन्मार्ग(कलकत्ता),  Maharashtra  Herald, Indian Express, Pune Times ( Times  of India) और मॉरिशस के  "जनवाणी" तथा "Sunday Vani में प्रकाशित। नैट पत्रिकाओं में कहानियाँ और कविताओं  का प्रकाशन एवं प्रसारण । नैट  पर  English  की भी 30 कविताओं का प्रसारण, जिनमें से अनेक कविताएँ गहन विचारों, भावों, सम्वेदनाओं व उत्कृष्ट भाषा के लिए "All Time Best " के रूप में सम्मानित एवं स्थापित।&lt;br /&gt;हिंदी में 'अंतर्यात्रा' और अंग्रेज़ी में 'Ocean In The Eyes' कविता संग्रह  प्रकाशित व पद्मविभूषण 'नीरज जी' व्दारा विमोचन।  &lt;br /&gt; कहानी संग्रह "शेष प्रसंग " की अविस्मरणीय उपलब्धि है - भूमिका  में  कथा सम्राट् "कमलेश्नर जी" द्वारा अभिव्यक्त बहुमूल्य विचार, जो आज हमारे बीच नहीं हैं। प्रख्यात साहित्यकार - अमरकान्त जी, मन्नू भंडारी, सूर्यबाला, ममता कालिया द्वारा "शेष प्रसंग " की कहानियों पर उत्कृष्ट प्रतिक्रिया  दी है।&lt;br /&gt;''हरिया काका'' कहानी को उसकी मूल्यपरकता के कारण पुणे विश्वविद्यालय के हिन्दी स्नातक (F.Y) पाठ्यक्रम में शामिल में होने का गौरव प्राप्त हुआ है तथा अन्य एक और कहानी व कविताओं को भी स्नातक (S.Y.) में शामिल किए जाने की योजना है।  इन्टरनैट पर संचरण करती, सामाजिक एवं साम्प्रदायिक सदभावना से भरपूर ''निश्छल भाव''  कविता एवं माँ और बेटी के खूबसूरत संवाद को प्रस्तुत करती ''काला चाँद'' कविता को Cordova Publishers  द्वारा New  Model  Indian School (NRI ) भारत एवं विदेश की सभी शाखाओं  के लिए, पाठ्यक्रम  में शामिल किया गया है।  &lt;br /&gt;दिल्ली और पुणे रेडिओ पर अनेक चर्चाओं और साक्षात्कारों में  भागीदारी।&lt;br /&gt;लेखन के अतिरिक्त  "चित्रकारी" में गहन रुचि । "ईश्वर" "प्रकृति" के रूप में चारों ओर विद्यमान "उसका ऐश्वर्य" और "मानवीय भाव" प्रमुख रूप से चित्रों की थीम बनकर उभरे तथा साहित्यिक रचनाओं की भाँति ही दूसरों  के लिए सकारात्मक प्रेरणा का स्त्रोत  रहे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br&gt;&lt;br /&gt;&lt;ul&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;Email:&lt;a href="mailto:drdeepti25@yahoo.co.in?subject=Th:Katha-Vyatha"&gt;drdeepti25@yahoo.co.in&lt;/a&gt;&lt;/li&gt;&lt;/ul&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="#octtop"&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#330000"  size=3 &gt;ऊपर जाएं&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;hr color="#FF0000" size=5&gt;&lt;br /&gt;&lt;marquee&gt;&lt;a href="#octend"&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#FF0000"  size=4 &gt;आपका मंच&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;/font&gt;&lt;/marquee&gt;&lt;br /&gt;&lt;hr color="#FF0000" size=5&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="center"&gt;&lt;br /&gt;&lt;a name="#oct08poem14"&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#1E37F3"  size=5 &gt;आकांक्षा यादव की तीन कविताएँ&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="right"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#660000"  size=4 &gt;1. श्मशान&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="right"&gt;&lt;br /&gt;कंक्रीटों के जंगल में&lt;br /&gt;गूँज उठते हैं सायरन &lt;br /&gt;शुरू हो जाता है&lt;br /&gt;बुल्डोजरों का ताण्डव&lt;br /&gt;खाकी वर्दियों के बीच&lt;br /&gt;दहशतजदा लोग&lt;br /&gt;निहारते हैं याचक मुद्रा में&lt;br /&gt;और दुहायी देते हैं&lt;br /&gt;जीवन भर की कमाई का&lt;br /&gt;बच्चों के भविष्य का&lt;br /&gt;पर नहीं सुनता कोई उनकी&lt;br /&gt;ठीक वैसे ही&lt;br /&gt;जैसे श्मशान में&lt;br /&gt;चैनलों पर लाइव कवरेज होता है&lt;br /&gt;लोगों की गृहस्थियों के &lt;br /&gt;श्मशान में बदलने का।  &lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="#octtop"&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#330000"  size=3 &gt;ऊपर जाएं&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="center"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#660000"  size=4 &gt;2. एस. एम. एस.&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="center"&gt;&lt;br /&gt;अब नहीं लिखते वो खत&lt;br /&gt;करने लगे हैं एस. एम. एस.&lt;br /&gt;तोड़ मरोड़ कर लिखे शब्दों के साथ&lt;br /&gt;करते हैं खुशी का इजहार&lt;br /&gt;मिटा देता है हर नया एस. एम. एस.&lt;br /&gt;पिछले एस. एम. एस. का वजूद&lt;br /&gt;एस. एम. एस. के साथ ही&lt;br /&gt;शब्द छोटे होते गए&lt;br /&gt;भावनाएँ सिमटती गईं&lt;br /&gt;खो गयी सहेज कर रखने की परम्परा &lt;br /&gt;लघु होता गया सब कुछ&lt;br /&gt;रिश्तों की कद्र का अहसास भी&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="#octtop"&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#330000"  size=3 &gt;ऊपर जाएं&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="left"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#660000"  size=4 &gt;3. सिमटता आदमी&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="left"&gt;&lt;br /&gt;सिमट रहा है आदमी&lt;br /&gt;हर रोज अपने में&lt;br /&gt;भूल जाता है भावनाओं की कद्र&lt;br /&gt;हर नयी सुविधा और तकनीक &lt;br /&gt;घर में सजाने के चक्कर में&lt;br /&gt;देखता है दुनिया को&lt;br /&gt;टी. वी. चैनल की निगाहों से&lt;br /&gt;महसूस करता है फूलों की खुशबू &lt;br /&gt;कागजी फूलों में&lt;br /&gt;पर नहीं देखता &lt;br /&gt;पास-पड़ोस का समाज&lt;br /&gt;कैद कर दिया है &lt;br /&gt;बेटे को भी&lt;br /&gt;चहरदीवारियों में&lt;br /&gt;भागने लगा है समाज से&lt;br /&gt;चैंक उठता है&lt;br /&gt;कॉलबेल की हर आवाज पर&lt;br /&gt;मानो &lt;br /&gt;खड़ी हो गयी हो&lt;br /&gt;कोई अवांछित वस्तु&lt;br /&gt;दरवाजे पर आकर। &lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="#octtop"&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#330000"  size=3 &gt;ऊपर जाएं&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="left"&gt;&lt;br /&gt;&lt;FONT color="#ff0000"  size=4 &gt;&lt;strong&gt;आकांक्षा यादव  का परिचय:&lt;/strong&gt;&lt;/font&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_-_J_ggR3oI4/SPLb5QjV1gI/AAAAAAAAARA/dO-8n7qhFcs/s1600-h/akanchayaday.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://3.bp.blogspot.com/_-_J_ggR3oI4/SPLb5QjV1gI/AAAAAAAAARA/dO-8n7qhFcs/s320/akanchayaday.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5256505491837015554" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="justtify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;जन्म :&lt;/strong&gt; 30 जुलाई 1982, सैदपुर, गाजीपुर (उ0 प्र0) शिक्षा: एम0 ए0 (संस्कृत) विधा: कविता, लेख व लघु कथा,  &lt;strong&gt;प्रकाशन:&lt;/strong&gt; साहित्य अमृत, कादम्बिनी, दैनिक जागरण, राष्ट्रीय सहारा, अमर उजाला, दैनिक आज, अहा जिन्दगी, गोलकोण्डा दर्पण, युगतेवर, प्रगतिशील आकल्प, शोध दिशा, इण्डिया न्यूज, रायसिना, साहित्य क्रांति, साहित्य परिवार, साहित्य परिक्रमा, साहित्य जनमंच, सामान्यजन संदेश, राष्ट्रधर्म, समकालीन अभिव्यक्ति, सरस्वती सुमन, शब्द, लोक गंगा, रचना कर्म, नवोदित स्वर, आकंठ, प्रयास, नागरिक उत्तर प्रदेश, गृहलक्ष्मी, गृहशोभा, मेरी संगिनी, वुमेन आन टॉप, वात्सल्य जगत, प्रज्ञा, पंखुड़ी, लोकयज्ञ, कथाचक्र, नारायणीयम्, मयूराक्षी, चांस, गुतगू, मैसूर हिन्दी प्रचार परिषद पत्रिका, हिन्दी प्रचार वाणी, गुर्जर राष्ट्रवीणा, युद्धरत आम आदमी, अरावली उद्घोष, मूक वक्ता, सबके दावेदार, कुरूक्षेत्र संदेश, सेवा चेतना, बाल साहित्य समीक्षा, कल्पान्त इत्यादि पत्र-पत्रिकाओं में रचनाओं का प्रकाशन।एक दर्जन से अधिक स्तरीय काव्य संकलनों में रचनाओं का प्रकाशन। वेब पत्रिकाओं में कविताओं का प्रकाशन। &lt;br /&gt;&lt;strong&gt;सम्मान:&lt;/strong&gt; साहित्य गौरव, काव्य मर्मज्ञ, साहित्य श्री, साहित्य मनीषी, शब्द माधुरी, भारत गौरव, साहित्य सेवा सम्मान, देवभूमि साहित्य रत्न ब्रज-शिरोमणि इत्यादि सम्मानों से अलंकृत। राष्ट्रीय राजभाषा पीठ इलाहाबाद द्वारा  ’’भारती ज्योति’’ एवं भारतीय दलित साहित्य अकादमी द्वारा ‘‘वीरांगना सावित्रीबाई फुले फेलोशिप सम्मान‘‘।  दिल्ली से  प्रकाशित पत्रिका ‘वुमेन आन टॉप‘ द्वारा देश की शीर्षस्थ 13 महिला प्रतिभाओं में स्थान। &lt;br /&gt;&lt;strong&gt;रुचियाँ :&lt;/strong&gt; रचनात्मक अध्ययन व लेखन। नारी विमर्श, बाल विमर्श व सामाजिक समस्याओं सम्बन्धी विषय में विशेष रूचि। &lt;strong&gt;सम्प्रति:&lt;/strong&gt; प्रवक्ता, राजकीय बालिका इण्टर कॉलेज, नरवल, कानपुर (उ.प्र.)- 209401 &lt;br /&gt;&lt;strong&gt;सम्पर्क:&lt;/strong&gt; आकांक्षा यादव द्वारा श्री कृष्ण कुमार यादव, वरिष्ठ डाक अधीक्षक, कानपुर मण्डल, कानपुर (उ.प्र.)&lt;br&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="mailto:kk_akanksha@yahoo.com?subject=Th:Katha-Vyatha"&gt;E-mail: kk_akanksha@yahoo.com&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="#octtop"&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#330000"  size=3 &gt;ऊपर जाएं&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;hr color="#FF0000" size=5&gt;&lt;br /&gt;&lt;marquee&gt;&lt;a href="#octend"&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#FF0000"  size=4 &gt;आपका मंच&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;/font&gt;&lt;/marquee&gt;&lt;br /&gt;&lt;hr color="#FF0000" size=5&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="center"&gt;&lt;br /&gt;&lt;a name="#oct08poem15"&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#1E37F3"  size=5 &gt;15.  पवन निशांत  की दो कविता&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="center"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#660000"  size=4 &gt;1. गांधी की स्मृति में एक अहिंसक प्रार्थना&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="center"&gt;&lt;br /&gt;देवता देख लें&lt;br /&gt;समझ लें कर लें चिंतन&lt;br /&gt;बाद में उनका स्यापा &lt;br /&gt;माना नहीं जाएगा&lt;br /&gt;कि मैंने जो किया गलत किया&lt;br /&gt;यह वह शहर है&lt;br /&gt;जहां देवता भी दिखायेंगे बुजदिली&lt;br /&gt;तो शामिल कर लिए जायेंगे &lt;br /&gt;गुनहगारों की जमात में&lt;br /&gt;देवता देख लें समझ लें और सुना दें &lt;br /&gt;अपने हथियारों उपकरणों से निकलने वाला&lt;br /&gt;तमतमाता हुआ अंतिम फैसला &lt;br /&gt;उनके अंत से पहले &lt;br /&gt;मैं प्रार्थना जरूर कर रहा हूं मगर&lt;br /&gt;देवताओं, तुम्हें सुनने के लिए... &lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="#octtop"&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#330000"  size=3 &gt;ऊपर जाएं&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="right"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#660000"  size=4 &gt; 2. बाजार से बाहर जब सभी बिकने वाली &lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="right"&gt;&lt;br /&gt;बाजार से बाहर जब सभी बिकने वाली &lt;br /&gt;चीजें खरीदी जा रही थीं&lt;br /&gt;तुम्हारा अंतिम प्रेम पत्र छिपाने को &lt;br /&gt;मैंने खरीदा एक संदूक&lt;br /&gt;जब बड़ी कविता बड़े शिल्प बड़े कैनवस&lt;br /&gt;बड़े हादसे बड़ी खुशियां और बड़े फरेब&lt;br /&gt;बदले जा रहे थे रुपयों में&lt;br /&gt;एक संदूक में बदल लिए मैंने रुपए&lt;br /&gt;तुम्हारे जैसा छिछोरापन&lt;br /&gt;तुम्हारे जैसी लालसाएं&lt;br /&gt;तुम्हारे जैसी मुस्कराहटें &lt;br /&gt;झांक रही थीं अपने-अपने फ्रेम से&lt;br /&gt;उन्हें में झांक कर पढ़ा मैंने &lt;br /&gt;उसी बाजार में तुम्हारा प्रेम पत्र&lt;br /&gt;बाजार में प्रेम पत्र भी हो रहे थे नीलाम&lt;br /&gt;टालस्टाय के लेनिन के नेहरू के&lt;br /&gt;एक छोटे कवि को लिखा गया प्रेम पत्र भी &lt;br /&gt;नीलाम हुआ था और उसे मिले थे पूरे एक लाख&lt;br /&gt;पर तुम्हारे प्रेम पत्र को पैसों में &lt;br /&gt;बदलने से मैंने किया परहेज&lt;br /&gt;बाजार में साधुओं ने खरीदे भक्त&lt;br /&gt;आतंकियों ने खरीदी अमानुषिकता&lt;br /&gt;नेताओं ने खरीदे वोटर मंत्रियों ने खरीदे सांसद&lt;br /&gt;और पूंजीपतियों ने सरकार&lt;br /&gt;वैसे ही लेकिन मैंने खरीदा एक संदूक&lt;br /&gt;यह भी तो नहीं हो पाता कि हाट लगे &lt;br /&gt;और बिकवाली न हो&lt;br /&gt;बाजार में हों आप और कुछ भी न खरीद कर लौंटें&lt;br /&gt;वैसे भी अपने कुछ रुपयों में मैं नहीं खरीदता संदूक&lt;br /&gt;तो मां खरीदती चिमटा बहन खरीदती नेपकिन&lt;br /&gt;या पापा खरीदते ऐसे ब्लेड वाला रेजर&lt;br /&gt;जो उनकी खुरदरी दाढ़ी को&lt;br /&gt;एक महीने तक साफ कर पाता&lt;br /&gt;लेकिन मैंने खरीदा एक संदूक&lt;br /&gt;छिपाए रखने के लिए तुम्हारा प्रेम पत्र&lt;br /&gt;उस अकेलेपन के लिए&lt;br /&gt;जब मैं नितांत अकेला होऊं और&lt;br /&gt;बाजार के बाजीगर ढोल मजीरा पीट रहे हों&lt;br /&gt;स्त्रियों के विमर्श से अकेलापन ऐसे &lt;br /&gt;दूर रहता है आदमियों से जैसे अंधेरा उजाले से&lt;br /&gt;और बाजार ऐसे दूर रहता है हर उस आदमी से&lt;br /&gt;जो उनका ग्राहक न हो इसीलिए &lt;br /&gt;जब खरीदी जा रही थीं सभी बिकने वाली चीजें&lt;br /&gt;मैंने खरीद लिया एक संदूक&lt;br /&gt;बुरे समय के लिए यह निवेश&lt;br /&gt;क्या कभी बेवकूफी कहा जाएगा &lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt; पवन निशांत का परिचय&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;जन्म-11 अगस्त 1968,  रिपोर्टर दैनिक जागरण,  रुचि-कविता, व्यंग्य,  ज्योतिष और पत्रकारिता&lt;br /&gt;पता: 69-38, महिला बाजार, &lt;br /&gt;सुभाष नगर, मथुरा, (उ.प्र.) पिन-281001&lt;br /&gt;&lt;a href="mailto:pawannishant@yahoo.com?subject=Th:Katha-Vyatha"&gt;E-mail: pawannishant@yahoo.com&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt; &lt;br /&gt;&lt;a href="#octtop"&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#330000"  size=3 &gt;ऊपर जाएं&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt; &lt;br /&gt;&lt;hr color="#FF0000" size=5&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;marquee&gt;&lt;a href="#octend"&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#FF0000"  size=4 &gt;आपका मंच&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;/font&gt;&lt;/marquee&gt;&lt;br /&gt;&lt;hr color="#FF0000" size=5&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="center"&gt;&lt;br /&gt;&lt;a name="#oct08Samicha"&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#1E37F3"  size=5 &gt;समीक्षा:&amp;nbsp;&amp;nbsp; 'ज्योति प्रभा' &lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_-_J_ggR3oI4/SPNjjLf1L1I/AAAAAAAAARw/jjN7ytN19T8/s1600-h/jyotiprabha.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://3.bp.blogspot.com/_-_J_ggR3oI4/SPNjjLf1L1I/AAAAAAAAARw/jjN7ytN19T8/s320/jyotiprabha.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5256654646104371026" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;ज्योतिप्रसाद अगरवाला  का जन्म 17 जून सन् 1903  को डिब्रूगढ़ अंचल के तामुलबारी चाय बगीचे (असम) में हुआ। उन्होंने हाईस्कूल की शिक्षा डिब्रूगढ़ तथा तेजपुर में प्राप्त की। सन् 1921 में वे तेजपुर सरकारी उच्च विद्यालय से 'प्रवेशिका निर्वाचन' परीक्षा में उत्तीर्ण होकर कलकत्ता में चित्तरंजन दास द्वारा स्थापित राष्ट्रीय विद्यापीठ से द्वितीय श्रेणी में उत्तीर्ण हुए। वह समय था महात्मा गांधी द्वारा संचालित असहयोग का। ज्योतिप्रसाद ने उच्च शिक्षा से मुँह मोड़कर असहयोग आन्दोलन में सक्रिय रूप से भाग लेने लगे। आन्दोलन धीमा होने पर कलकत्ता के नेशनल कॉलेज में अध्ययन कर कुछ दिन अपने ताऊ चन्द्रकुमार अगरवाला द्वारा स्थापित 'न्यू प्रेस' के संचालन में सहयोग दिया। सन् 1926 में उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिये वे इंग्लैण्ड चले गये। वहाँ एडिनबरा विश्वविद्यालय में कुछ दिनों तक अध्ययन करने के बाद जर्मनी में सात माह तक चलचित्र तकनीक संबंधी प्रशिक्षण लिया। 1930 में स्वदेश वापसी के पश्चात आजादी की लड़ाई में सक्रिय रूप से भागीदारी । 1932 में 15 महीनों का सश्रम कारावास और 500 रुपये का जुर्माने की सजा। 14 वर्ष की आयु में &lt;strong&gt;&lt;FONT color="#660000"  size=3 &gt;'शोणित कुँवरी नाटक'&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt; की रचना। अन्तिम समय तक नाटक, कविता, जीवनी, शिशु-काव्य और साहित्य की अन्य विधाओं में कार्य। रचना एवं स्वर संयोजन में अभिनवता से भरे असंख्य गीतों के माध्यम से असमीया संगीत को नवरूप प्रदान । 1934 में भोलागुरि चाय बगीचे में अस्थायी &lt;strong&gt;&lt;FONT color="#660000"  size=3 &gt;'चित्रवन स्टूडियो'&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt; स्थापित कर, सर्वप्रथम असमीया चलचित्र &lt;strong&gt;&lt;FONT color="#660000"  size=3 &gt;'जयमती &lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;का निर्माण। 1935 में जयमती का प्रदर्शन। 1936-37 में विष्णुप्रसाद राभा के साथ नाटक जयमती और शोणित कुँवरी के ग्रामोफोन रेकॉर्ड निर्माण। 1937 में तेजपुर में 'जोनाकी' चलचित्र-गृह का निर्माण। 1939 में द्वितीय असमीया चलचित्र  'इन्द्रमालती का निर्माण। 1940 में तेजपुर में संगीत विद्यालय की स्थापना। असम में एक दिन की सरकारी छुट्टी इनके जन्म दिन पर मनायी जाती है। अनके करीब 367 गीत (सभी मूल  असमीया भाषा में) प्रकाश में आये। उन्होंने कुछेक गीतों के लिए स्वयं स्वरलिपि तैयार की थी। जसकी अपनी कुछ विशेषताएँ हैं। इसी कारण असम के संगीत प्रेमियों ने इस संगीत को &lt;strong&gt;&lt;FONT color="#660000"  size=3 &gt;'ज्योति संगीत'&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt; की संज्ञा दी। जिस प्रकार &lt;strong&gt;&lt;FONT color="#660000"  size=3 &gt;' रवीन्द्र संगीत' &lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;में भाव, भाषा, स्वर और कल्पना का समन्वय हुआ है उसी प्रकार ज्योतिप्रसाद के गीतों में भी समन्वय के दर्शन होते हैं। ज्योतिप्रसाद ने असमीया संगीत के मूल रूप को अक्षुण्ण रखते हुए, पाश्चात्य संगीत का समावेश कर, एक पथ-प्रदर्शक के रूप में असमीया साहित्य को स्मृद्ध तो किया ही असमीया समाज में नई चेतना का संचार भी किया।&lt;br /&gt;आप प्रकृतितः कवि थे। उनके गद्य में भी उनके कवित्व की सुषमा और सौरभ व्याप्त है। संख्या की दृष्टि से  उनकी कविताएँ कम हैं - उनकी 50 सम्पूर्ण कविताएँ एवं 12 शिशु-कविताएँ प्रकाशित ( सभी असमीया भाषा में) हुई हैं। किन्तु काव्य, भाव एवं शिल्प की दृष्टि से वे अनुपम हैं। इसी कारण असमीया काव्य साहित्य में उन्हें शीर्ष स्थान प्राप्त है। कवि के रूप में ज्योतिप्रसाद में कुछ विशेष गुण हैं। उनकी कविता में असमीया जातीयता के भाव की प्रधानता होने पर भी भारतीय तथा विश्वजनीन भाव के साथ कहीं विरोध नहीं झलकता। जातीयता के प्रति निष्ठा रकह्ते हुए, उससे दृढ़तापूर्वक जुड़े रहते हुए भी वे संकीर्ण जातीयता से ऊपर अठने में सक्षम हैं।&lt;br&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_-_J_ggR3oI4/SPNkiRv3MLI/AAAAAAAAAR4/SUrWm2wl188/s1600-h/Jyoti+Prasad+agarwala.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://2.bp.blogspot.com/_-_J_ggR3oI4/SPNkiRv3MLI/AAAAAAAAAR4/SUrWm2wl188/s200/Jyoti+Prasad+agarwala.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5256655730113982642" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;ज्योतिप्रसाद को असम में  लोग 'रूपकुँवर' के नाम से जानते -पहचानते हैं। यह शब्द उनके नाम का एक अभिन्न अंग बन गया है। ज्योतिप्रसाद को 'रूपकुँवर' की उपाधि किस प्रकार मिली, इस विषय में कई विचार और भ्रान्तियाँ हैं। इस सम्बन्ध में असम के सुप्रसिद्ध कवि आनन्दचन्द्र बरुवा ने कहा है, " अखबार में काम करते समय ज्योतिप्रसाद के 'चित्रवन' में दो दिन रहकर आया और 'रूपकुँवर ज्योतिप्रसाद' नाम से एक लेख प्रकाशित करवाया । मेरे द्वारा कल्पित यह उपाधी लोकप्रिय होकर अजर-अमर हो गयी, इसका मुझे संतोष है। आपके द्वारा रचित कुछ रचनाओं का हिन्दी अनुवाद असम के देवीप्रसाद बागड़ोदिया जी ने की है। इनखी एक पुस्तक 'ज्योति प्रभा' का प्रथम संस्करण जनवरी 1995 एवं दूसरा संस्करण 2003 में प्रकाशित हुआ है। 650 पृष्ठ की यह पुस्तक का मूल्य 250/- + डाकखर्च  अतिरिक्त रखा गया है।  &lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#660000"  size=3 &gt;पुस्तक प्राप्ति स्थान:&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;  &lt;br /&gt;ई- हिन्दी साहिय सभा के अलावा आप सीधे श्री देवी प्रसाद बागड़ोदिया, बागड़ोदिया निवास, ज्योतिनगर, डिब्रूगढ़ - 786005,  फोन नम्बर: 09435032796 से भी प्राप्त कर सकते हैं।&lt;br&gt; &lt;a href="mailto:ehindisahitya@gmail.com?subject=Jyoti Prabha"&gt;Mail To E-Hindi Sahitya Shaba&lt;/a&gt;&lt;br&gt; &lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#660000"  size=3 &gt;ज्योतिप्रसाद की कुछ रचनाएँ नीचे दे रहे हैं।  &lt;br /&gt;सभी गीत असमीया मूल से हिन्दी में अनुवाद श्री देवी प्रसाद बागड़ोदिया के द्वारा :-&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="right"&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="#octtop"&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#330000"  size=3 &gt;ऊपर जाएं&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#660000"  size=3 &gt;1. रुपहले पानी में सोने की नाव&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;रूपहले पानी में सोने की नाव&lt;br /&gt;खोल दे रे&lt;br /&gt;खोल दे, खोल दे, खोल दे रे।&lt;br /&gt;तितली के पंखों से उड़ते हैं पाल&lt;br /&gt;फूल के पत्तों की छाजन&lt;br /&gt;वह नील आकाश की किस सीमा में&lt;br /&gt;बाजे असीम की बंसी&lt;br /&gt;वहाँ निद्रा तिमिर भेदकर&lt;br /&gt;जागे अरूण की हँसी&lt;br /&gt;उसी ओर, उसी ओर&lt;br /&gt;खोल दे, खोल दे, खोल दे रे।&lt;br /&gt;जीवन तट का हरियाला खेत&lt;br /&gt;खिले फूल की ज्योति अपार&lt;br /&gt;मरणाकुल फेनिल उफान&lt;br /&gt;पीछे छोड़ जाये&lt;br /&gt;विहर की वेदना में आनन्द झलके&lt;br /&gt;मिलन में विहर का लेख&lt;br /&gt;जीवन मरण जीत चमके&lt;br /&gt;प्र्णय का ध्रुवतारा&lt;br /&gt;चमक कर बुलाये रे&lt;br /&gt;प्रकाश की ओर, प्रकाश की ओर&lt;br /&gt;ज्योति के देश की ओर।&lt;br /&gt;&lt;p align="left"&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="#octtop"&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#330000"  size=3 &gt;ऊपर जाएं&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#660000"  size=3 &gt;2. लुइत* तट का अग्निसुर&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लुइत तट का अग्निसुर&lt;br /&gt;तुम्हें लिख दिया अपने रक्त से&lt;br /&gt;लुइत तट का अग्निसुर।&lt;br /&gt; तुम्हें रच दिया&lt;br /&gt;  &amp;nbspव्यथा वेदना से&lt;br /&gt;   &amp;nbsp;&amp;nbsp;कर दिया तुम्हें&lt;br /&gt;    &amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;;अपने हृ्दय की&lt;br /&gt;    &amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; अग्निशिखा से&lt;br /&gt;लुइत तट का अग्निसुर।&lt;br /&gt;  &amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;छा जाओगे तुम&lt;br /&gt;  &amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; लुइत के दोनों पार&lt;br /&gt;चमकना तुम सागर के उस पार&lt;br /&gt;भारत के घर-घर में&lt;br /&gt;परिचय बनाना भावी पृथ्वी में&lt;br /&gt;            &amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; नये प्राण में&lt;br /&gt;            &amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; नये गान में &lt;br /&gt;विकरित कर&lt;br /&gt;ज्योति स्फुलिंग&lt;br /&gt;जाना दूर अति दूर&lt;br /&gt;लुइत तट का अग्निसुर।&lt;p&gt; &lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#660000"  size=2 &gt;* लुइत : (लोहित) ब्रह्मपुत्र नदी का लोक-प्रचलित नाम।&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="right"&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="#octtop"&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#330000"  size=3 &gt;ऊपर जाएं&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#660000"  size=3 &gt;3. स्वाधीनता के लिये तड़पते प्राण&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;स्वाधिनता के लिये तड़पते प्राण&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;देश का दुःख देख कलपे हिया&lt;br /&gt;भिक्षा की झोली ले निकला है&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;विमुख न करना हमें माँ।&lt;br /&gt;त्याग दी हमने विषय वासना&lt;br /&gt;अग्नि लुइत में प्राणों का कर संधान&lt;br /&gt;गृहस्थ घर की लक्ष्मी बहू&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;अन्न की मुट्ठी करो दान।&lt;br /&gt;देश का दुःख देख लुइत सिसक रही&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;रोक न पाये कोई अश्रुजल&lt;br /&gt;अहिंसा युद्ध में रण की रणभेरी&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;बजे बार  बार&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;जाये तत्काल&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;विमुख न करना हमें माँ।&lt;br /&gt;&lt;p align="left"&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="#octtop"&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#330000"  size=3 &gt;ऊपर जाएं&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#660000"  size=3 &gt;4. कौन गढ़ना चाहता है सोने का देश&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कौन गढ़ना चाहता है सोने का देश&lt;br /&gt; माँ असमी को पहनाना चाहता&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;प्रकाशित सुन्दर वेश&lt;br /&gt;कौन गढ़ना चाहता है सोने का देश&lt;br /&gt;मेरे इस देश के खेतों में सोना&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;अपने आप उपजे&lt;br /&gt;स्वर्न प्रभात की सुनहरी हँसी&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;मेरे आँगन में खेले&lt;br /&gt;संध्या लुइत का वक्ष चमका&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;स्वर्णिम रंग भरे&lt;br /&gt;सुनहले मूँगो के पट से&lt;br /&gt;युवती सुन्दर सजे&lt;br /&gt;रुपहली रेत पर स्वर्णिम धूल&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;झलमल रूप धरे&lt;br /&gt;स्वर्ण केतकी की, स्वर्ण रेणु झरे&lt;br /&gt;शिल्पी दल का स्वर्णिम स्वप्न&lt;br /&gt;&amp;nbsp;हरित वन विचरे।&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;स्वर्णिम देश की&lt;br /&gt;महापुरुष की&lt;br /&gt;शंकर माधव* की&lt;br /&gt;&amp;nbsp;स्वर्ण मूल्या संस्कृति&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;देती प्रकाश&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;इस पृथ्वी को&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;स्वर्णिम जीवन की&lt;br /&gt;महा मनीषा&lt;br /&gt;महा प्रतिभा जन जीवन की&lt;br /&gt;स्वर्णीम सपनों की&lt;br /&gt;इसी देश में स्वर्णिम भविष्य की&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;स्वर्ण ज्योति जले&lt;br /&gt;इसी देश में शिल्पी मन के&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;महा स्वप्न की&lt;br /&gt;इस पृथ्वी के स्वर्ण यथार्थ की, स्वर्णिम पहचान&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;स्वर्ण चित्र में ढले।&lt;br /&gt;बोधन कर विश्व शिल्पी मन&lt;br /&gt;इसी देश में जनजीवन में&lt;br /&gt;स्वर्णिम मन की स्वर्णिम पंखुड़ी&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;स्वर्ण हँसी सी खिले।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#660000"  size=2 &gt;* शंकर माधव ;  महापुरुष शंकरदेव&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="right"&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="#octtop"&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#330000"  size=3 &gt;ऊपर जाएं&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#660000"  size=3 &gt;5. मनुष्य जन्म लेकर कौन&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मनुष्य जीवन लेकर कौन&lt;br /&gt;पशु का खेल खेलो?&lt;br /&gt;देव किरीट पहन भाल पर&lt;br /&gt;राक्षस रूप धरो&lt;br /&gt;आसुरी नृत्य करो&lt;br /&gt;स्वर्ग की छवि पृथ्वी पर चाहकर&lt;br /&gt;नर्क की ओर डग भरो&lt;br /&gt;अपनी आँख आप फोड़कर&lt;br /&gt;गहरे गर्त गिरो।&lt;br /&gt;ज्ञानी को तू मूर्ख बताये&lt;br /&gt;हँसे आप ही आप ही रोये&lt;br /&gt;खुद को मार रहा खुद ही&lt;br /&gt;गली गली घूमो पगलाये।&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="#octtop"&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#330000"  size=3 &gt;ऊपर जाएं&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;hr color="#FF0000" size=5&gt;&lt;br /&gt;&lt;marquee&gt;&lt;a href="#octend"&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#FF0000"  size=4 &gt;आपका मंच&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;/font&gt;&lt;/marquee&gt;&lt;br /&gt;&lt;hr color="#FF0000" size=5&gt;&lt;br /&gt;&lt;a name="#oct08laghukahani"&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#FF0000"  size=5 &gt;लघुकथा:&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;FONT color="#330000"  size=4 &gt;नहीं.......... - शम्भु चौधरी&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;नरेश को आज न जाने क्या 
